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जब रोम जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था

जब रोम जल रहा था, तब नीरो बांसुरी बजा रहा था और जब छत्तीसगढ़ में सुकमा के जंगलों में राज्य के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं को नृशंसता से गोलियों से भून कर उनके शवों पर नक्सली नाच रहे थे, तब देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे अमेरिका में ठंडी हवा खा रहे थे। अधिकारिक यात्रा पूरी होने के बाद श्री शिन्दे के साथ अमेरिका के दौरे पर गए अन्य अधिकारी तो स्वदेश लौट आए थे, लेकिन श्री शिन्दे छुट्टियां मनाने के लिए अमेरिका में ही रूक गए थे। लोकतन्त्र पर नक्सली हमले के चार दिन बाद श्री शिन्दे का स्वदेश लौटना, उनकी अपनी पार्टी द्वारा उन पर उंगली उठाने के लिए काफी था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी रोंगटे खड़े कर देने वाले इस भयंकर कांड के बाद राज्य के दौरे पर गए तो उनके साथ या पहले
अथवा बाद में श्री शिन्दे नहीं थे। पार्टी प्रवक्ता भक्तचरण दास का यह कहना कि इस वक्त कोई भी व्यक्तिगत दौरा महत्व नहीं रखता और गृह मंत्री को स्वदेश लौट आना चाहिए, पार्टी की चिन्ता दिखाने के लिए काफी है। संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने श्री शिन्दे का यह कहते हुए निशाने पर लिया कि जिसे हालात को संभालने के लिए देश में होना चाहिए था, वही यहां नहीं हैं। श्री शिन्दे का यह कहना बेमानी है कि वह अमेरिका से ही हालात पर नजर रखे हैं। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे चांद से धरती पर नजर रखी जाए।
सरकार को अपना नजरिया बदलना होगा
अरुण रघुनाथ
छत्तीसगढ़ में 25 मई को हुए नक्सली हमले ने एक बार फिर ‘व्यवस्था’ के सामने एक सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि आखिर पिछले 46 सालों में केन्द्र और राज्य सरकारें इस समस्या की जड़ तक क्यों नहीं पहुंची। इस अवधि में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक हालात में बड़े बदलाव आए हैं। लेकिन अगर नहीं बदली है तो शोषण और भेदभाव के खिलाफ कथित लड़ाई।

केन्द्र और राज्य सरकारों के इस समस्या को लेकर जो दावे हैं, उनकी गहराई में जाने से एक बात तो साफ हो जाती है कि सरकारों के स्तर पर किया कुछ और जा रहा है और धरातल पर कुछ और नजर आ रहा है। पिछले सालों में इस मुद्दे को लेकर केन्द्र और राज्य संस्थाओं में टकराव की स्थिति भी आई है। लेकिन दोनों ने ही समस्या के असली और प्रभावी समाधान की तरफ न देखा और न ही सोचा है।

नक्सली समस्या की शुरूआत 60 के दशक के उत्तरार्ध में बंगाल के नक्सलबाड़ी कस्बे से हुई थी। तब यह लड़ाई बड़े जमींदारों के अत्याचार और शोषण के खिलाफ शुरू हुई थी। नक्सलबाड़ी के नाम पर ही इस आंदोलन का नाम नक्सलवाद पड़ा। आज इस लड़ाई की कमान सरकार द्वारा प्रतिबंधित भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) के हाथों में है, लेकिन इसका प्रचलित नाम ‘नक्सली’ ही है। पिछले 46 सालों में इस नक्सल आंदोलन ने कई रुप बदले हैं। अलग-अलग संगठनों ने ये लड़ाई लड़ी है। लेकिन व्यवस्था के खिलाफ उनका संपर्क किसी मुकाम तक नहीं पहुंचा है। यह भी कहा जा सकता है कि सरकार ने बंदूक की नोंक पर इस आंदोलन को कुचला। लेकिन सच यह है कि जिनके लिए यह लड़ाई लड़ी जा रही है, वे खुद पूरी तरह इसमें शामिल नहीं हुए।

22 राज्यों में
आज की स्थिति यह है कि नक्सलवाद पश्चिम बंगाल से निकलकर देश के करीब 22 राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्जा करवा चुका है। देश की राजधानी दिल्ली में भी नक्सलियों के समर्थक और सहयोगी सबसे ज्यादा हैं। बंगाल से निकलकर नक्सलवाद ने सबसे ज्यादा जड़ें आंध्र प्रदेश में जमाई थी। वहीं से उसका दोबारा विस्तार हुआ। आज आंध्र प्रदेश में तो नक्सली गतिविधियां थमी हुई हैं लेकिन ओडिशा, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के करीब 110 जिले नक्सलवाद की चपेट में है। सबसे ज्यादा नक्सल गतिविधियां छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में चल रही है। बिहार का भी एक इलाका नक्सलवाद की चपेट में है। महाराष्ट्र के एक खास इलाके तक नक्सली गतिविधियां सीमित हैं। लेकिन आंध्र प्रदेश में उनका आधार तो है, लेकिन गतिविधियां फिलहाल ठप्प है।

यह संयोग ही है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर नक्सली हमला उस समय हुआ है, जिस समय केन्द्र सरकार का गृहमंत्रालय यह दावा कर रहा था कि पिछले सालों की तुलना में नक्सली हिंसा में कमी आयी है। सरकार का दावा है कि वह नक्सल समस्या से निपटने के लिए द्विआयामी रणनीति अपना रही है। वह नक्सलियों के खिलाफ एक ओर जहां सुरक्षाबलों का इस्तेमाल कर रही है, वहीं दूसरी ओर नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों पर जोर दे रही है। पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने अपने स्तर पर यह पूरी कोशिश की थी कि सरकार की मदद प्रभावितों तक पहुंचें। सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में विकास के सभी साधन मुहैया हों। साथ ही उन्होंने नक्सल नेतृत्व से बातचीत की पेशकश भी की थी। कुछ लोगों को माध्यम भी बनाया गया। लेकिन वार्ता की मेज का एक सिरा खाली ही रहा। केन्द्र सरकार इस संबंध में बड़े बड़े आंकड़े भी गिनाती रही है। लेकिन वास्तविकता यह है कि आंकड़े सिर्फ दिखाने के लिए ही हैं। यदि वास्तविकता में काम हुआ होता तो नक्सल प्रभावित इलाकों में सड़कों का जाल बिछा होता। मोबाइल नेटवर्क होता। स्कूल होते। अस्पताल होते। रोजगार के साधन होते। ये सब होता तो लोग खुशहाल होते। और खुशहाली होती तो फिर वे किसी को अपना ‘मालिक’ क्यों बनने देते।

दरअसल कड़वी सच्चाई यह है कि सरकार की ज्यादातर योजनाएं अमली जामा ही नहीं पहन पाती हैं। नेता, ठेकेदार और नौकरशाह का गठजोड़ इतना मजबूत है कि सब कुछ बड़ी आसानी से कागजों पर ही पूरा हो जाता है। नक्सलियों ने इसी गठजोड़ का फायदा उठाया है।

बदलता चेहरा
पिछले सालों में नक्सलवाद का चेहरा लगातार बदला है। संगठनों के नामों के साथ नेता भी बदले हैं। खासतौर पर एक ही राज्य आंध्र प्रदेश के नेता ही ‘नक्सल नेतृत्व’ हैं। राज्य चाहे कोई भी है, मुखिया मूलत: आंध्र प्रदेश का ही होता है। आज भी जो प्रमुख नाम सामने आ रहे हैं वे सभी आंध्र प्रदेश के हैं।

बंदूक की नोंक पर देश की सत्ता को उलटकर तथाकथित ‘साम्यवादी’ सत्ता स्थापित करने के लिए लड़ रहे नक्सलियों का वर्चस्व देश के उन इलाकों में है जो अकूत प्राकृतिक संपदा से भरपूर हैं। सोना, लोहा, कोयला एवं अन्य खनिज पदार्थ इन्हीं इलाकों में पाए जाते हैं, जहां नक्सल काबिज हैं।

सरकार यह मानती है कि नक्सलियों का प्रचारतंत्र काफी मजबूत है। इसी तंत्र के चलते वे सरकार और सुरक्षाबलों को बदनाम करते रहे हैं। सुरक्षाबलों के साथ होनेवाली हर मुठभेड़ पर नक्सलियों से जुड़े संगठन सवाल उठाते हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश की न्याय प्रणाली भी सरकार पर ही सवाल उठाती है। मानवाधिकारों के हनन के नाम पर नक्सली और उनके सहयोगी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अभियान चला रहे हैं।

शोषण की बात
यदि असमानता, भेदभाव और शोषण की बात करें तो यह सच है कि ये सभी तत्व हमारे समाज में मौजूद हैं। नक्सली इन्हीं की आड़ लेकर अपना अभियान चला रहे हैं।

करीब डेढ़ दशक पहले मध्य प्रदेश के तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखीराम कांवरे को नक्सलियों ने बालाघाट जिले में उनके घर से निकालकर नृशंसतापूर्वक मारा था। केन्द्रीय सुरक्षाबलों और राज्य पुलिस के हजारों जवानों को नक्सलियों ने अबतक मौत के घाट उतारा है। कुछ साल पहले बस्तर के ही ताड़मेरला में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 78 जवानों को घेर कर मार डाला था। नक्सल प्रभावित राज्यों में कई प्रशासनिक अधिकारियों को भी नक्सलियों ने निशाना बनाया है। छत्तीसगढ़ में ही एसपी रैंक के तीन अधिकारी नक्सलियों द्वारा मारे गए हैं।

छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेताओं के बाद केन्द्र सरकार जिस तरह हरकत में आयी है, वह एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। दरअसल अभी तक नक्सल समस्या केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप में ही उलझी हुई है। यह संयोग ही है कि महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश को छोड़ दें तो ज्यादातर नक्सल प्रभावित राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें हैं। राजनैतिक विचारधारा में अंतर के कारण केन्द्र और राज्यों में एक राय नहीं बन पा रही है। राज्य सरकारें यह कहती आ रही है कि केन्द्र सरकार को नक्सलवाद को राष्ट्रीय समस्या मानकर रणनीति बनानी चाहिए। जिस तरह वह आतंकवाद से निपट रही है, उसी तरह उसे नक्सलवाद से भी निपटना चाहिए।

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