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छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला ‘लाल सलाम’ का जवाब बातचीत?

समय आ गया है कि नक्सलियों को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाये। बातचीत का राग तथा राज्य और सुरक्षाबलों की असफलता सामने आने के बाद जरूरत इस बात की है कि सेना का इस्तेमाल किया जाये। इस ताजा हमले के बाद राजनीतिक दलों को समझ में आ जाना चाहिये कि एक तरफ हथियार और दूसरी ओर बातचीत की रणनीति हमें ही नुकसान पहुंचा रही है। बस्तर से ए. द्विवेदी की रिपोर्ट :
हजारों पुलिसकर्मी, मजबूत खुफिया तंत्र और सरकार को ठेंगा दिखाते हुए बस्तर के माओवादियों ने कांग्रेस परिवर्तन यात्रा पर आत्मघाती हमला बोला तथा संदेश दे दिया कि उन्हें कमजोर समझने की भूल ना की जाये। नक्सलियों का किसी राजनीतिक दल पर यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है जिसमें 29 से ज्यादा लोगों की जान चली गई और 32 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं जो जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। अब तक हुए ऐसे 13 घातक हमलों में 212 लोगों की जान जा चुकी है लेकिन अफसोस कि किसी दोषी की गर्दन पकड़ में नहीं आ सकी। हास्यास्पद यह है कि जिन हमलों में दोषी नक्सली गिरफ्तार हुए हैं, उनमें से कई सबूतों के अभाव में जेल से बाहर आ गये यानी पुलिस अपने ही साथियों की शहादत के दोषियों को सजा नहीं दिला सकी।

यकीनन नक्सलियों का यह हमला कायरता का प्रतीक और अमानवीयता की पराकाष्ठा है और पूरी तरह अक्षम्य है। जरूरत पड़े तो उन्हें, उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए ताकि हमले में शहीद हुए जवान और नेताओं के परिवार को न्याय मिल सके। नक्सली हमले में अपने लोगों को खो चुके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तथा राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने भी कहा है कि नक्सलियों को जवाब दिया जायेगा और ‘हिम्मत है तो सामने आकर लड़ें’ हालांकि नक्सलियों से बातचीत का भी रास्ता खोजा जाने लगा है, लेकिन फिलहाल बड़ी जरूरत इस बात की है कि सरकारी अफसरों की भी जिम्मेदारी तय हो, उनसे पूछा जाना चाहिये कि नेताओं की सुरक्षा-व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई और इसके लिये कौन जिम्मेदार है? राज्य की पुलिस खुफिया तंत्र पर अब तक 60 करोड़ से ज्यादा खर्च कर चुकी है-जिसका खुलासा आरटीआई के जरिये भी नहीं हो सकता,तो यह पूछा जाना चाहिये कि इस पैसे का क्या हुआ और परिणाम क्या मिले?

बस्तर का सुकमा जिला नक्सलगढ़ के तौर पर जाना जाता है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक यहां पर नक्सलियों के 28 से ज्यादा छोटे-बड़े कैम्प चल रहे हैं। कांग्रेस की परिवर्तन रैली की जानकारी भी पुलिस प्रशासन को बहुत पहले से थी, इसके बावजूद मुट्ठी भर जवान रैली की सुरक्षा में लगाये गये! वैसे सुकमा जिला पुलिस ने रैली खत्म होने तक सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये थे, लेकिन जगदलपुर जिला पुलिस ने सुरक्षा देने में गंभीर चूक की। एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक दरभा घाटी में यदि पुलिस तैनात की जाती या नेताओं के काफिले के साथ कोई पुलिस पार्टी जोड़ दी जाती तो हताहतों की संख्या कम होती तथा बड़े नेताओं की जान बचाई जा सकती थी।

हालांकि नक्सलियों का हमला तब भी रूक जाता, यह दावा नहीं किया जा सकता। कांग्रेस प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी कहते हैं : मुख्यमंत्री की विकास यात्रा में हजारों जवान झोंके गये, लेकिन कांग्रेस नेताओं की सुरक्षा में मुट्ठी भर जवान तैनात किये गये। इस बात में वाकई दम है। रमनसिंह की विकास यात्रा में सुरक्षा का आलम यह था कि यात्रा में तीन हजार से ज्यादा जवान सुरक्षा में लगे थे। घर की छतों तक जवान तैनात किये गये थे।
हमले में घायल लोगों से जब उदय इण्डिया ने बातचीत की तो पता चला कि गत 25 मई को सुकमा में परिवर्तन रैली आयोजित करने के बाद जब कांग्रेस नेता 20 गाडिय़ों के काफिले के साथ जगदलपुर की ओर रवाना हुए तो महज 40 किलोमीटर पर दूरी पर दरभा घाटी में घातक
हथियारों से लैस 300 से ज्यादा नक्सलियों ने हमला बोल दिया. पहले बम विस्फोट किया गया और फिर कुछ समय तक गोलीबारी होने के बाद नक्सलियों ने नेताओं का नाम ले-लेकर उनकी हत्या कर दी। शुरूआत सलवा जुड़ूम अभियान के नेता महेन्द्र कर्मा से हुई। आश्चर्य कि नक्सली महेन्द्र कर्मा को पहचानते भी नहीं थे। कर्मा ने खुद परिचय दिया और कार्यकर्ताओं की जान बख्शने की अपील करते हुए नक्सलियों के सामने आ गये।
निशाने पर जोगी?
इस हमले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर भी निशाना साधा जा रहा है। फेसबुक पर उनकी भूमिका को लेकर काफी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैं। अजीत जोगी हेलीकाप्टर में उड़कर बच निकले और उनके समर्थक विधायक कवासी लखमा को नक्सलियों ने क्यों छोड़ दिया? जोगी समर्थकों ने इस आरोप के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है। कांग्रेस ने एक पत्रकार वार्ता में आरोप लगाया कि रमन सरकार अपनी नाकामी को छिपाने के लिये आमजन के मन में यह बात बिठाने का प्रयास कर रही है कि यह घटना पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी का नतीजा है। जोगी कार्यालय से जारी एक विज्ञप्ति के मुताबिक इस घटना के लिये सुकमा के पुलिस अधीक्षक को भी जिम्मेदार ठहराया गया है, जिन्होंने समय पर सूचना मिलने के बाद भी पुलिस टीम घटनास्थल पर नहीं भेजी।
नक्सलियों ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए हमले को सलवा जुडूम अभियान के दौरान ग्रामीणों पर हुए अत्याचार का बदला बताया है। प्रवक्ता गुडसा उसेण्डी के नाम से जारी बयान में कहा गया है कि कर्मा ने भू-स्वामी बनकर आदिवासियों का शोषण किया तथा एनएमडीसी और अन्य औद्योगिक घरानों के लिये दलाल होने का काम किया। उन्होंने सलवा जुडूम अभियान चलाकर आदिवासियों पर एक तरह का दमनचक्र चलाया, इसलिए उनकी हत्या की गई। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल की हत्या को उन्होंने सही करार देते हुए कहा कि पटेल ने गृहमंत्री रहते हुए बस्तर में पहली बार अर्धसैनिक बलों की तैनाती की थी, जिसने आदिवासियों पर सालों तक अत्याचार किया, इसलिए उन्हें भी मारा गया। विद्याचरण शुक्ल पर पूंजीपतियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए नक्सलियों ने उन पर हमले को जायज ठहराया है और कहा कि शुक्ल ने शोषणकारी नीतियां लागू करवाईं। नक्सलियों ने इस हमले में मारे गये निर्दोष आदिवासियों की मौत पर अफसोस भी जताया।
नहीं चेती सरकार
कांग्रेस के काफिले पर यह पहला हमला नहीं था, लगभग दो साल पहले गरियाबंद से रैली करके लौटते वक्त प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के वाहन पर नक्सलियों ने हमला किया था। इस घातक हमले में पटेल तो बच गये थे लेकिन तीन कार्यकर्ताओं की मृत्यु हो गई थी। महज एक साल पूर्व ही महिला एवं बाल विकास मंत्री लता उसेण्डी के कोण्डागांव स्थित बंगले में नक्सलियों ने धावा बोला था। शुक्र है कि लता घर पर नहीं थे, लेकिन नक्सलियों ने उनके सुरक्षाकर्मी की हत्या कर दी थी। हमले में मारे गये महेन्द्र कर्मा पर पांच बार से ज्यादा घातक हमले किये गये लेकिन वे बच निकले। उनके परिवार के चार सदस्य मारे जा चुके हैं। तीन साल पहले मंत्री केदार कश्यप के परिवार पर हमला हुआ था, जिसमें उनके बड़े भाई तानसेन कश्यप की मौत हो गई थी। खुद केदार पर दो जानलेवा हमले हो चुके हैं। इसी तरह वन मंत्री विक्रम उसेण्डी भी नक्सली हमले का शिकार होते-होते रह गये थे।
लेकिन इन हादसों से राज्य सरकार या पुलिस प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। पुलिस अफसरों के बंगले में सेवाएं दे रहे या उनके पालतू कुत्तों को घुमाने का काम जवान कर सकते हैं लेकिन विधायक की सुरक्षा के लिये जवानों की कमी हमेशा बनी रहती है। महीनों पूर्व नक्सल क्षत्र के एक भाजपा विधायक ने मुख्यमंत्री रमनसिंह को शिकायत की थी कि सरकार ने जो सुरक्षाकर्मी उन्हें दिये थे, एक पुलिस अफसर ने उन्हें वापस बुला लिया। कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेन्द्र पामभोई, अपने इलाके में दो साल से नहीं गये क्योंकि नक्सलियों ने हत्या कर देने की धमकी दी थी।
फिलहाल केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से भेजी गई एनआईए टीम यानी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने मामले की जांच शुरू कर दी है। एक बड़ा विवाद और आम आदमी के बीच चर्चा यह भी है कि कांग्रेस नेताओं के बीच कोई नक्सलियों का भेदिया भी था। जिसने उन्हें पल-पल की जानकारी दी। केंद्रीय राज्यमंत्री और राज्य के वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ. चरणदास महंत ने भी बयान दिया है कि अग्रणी कांग्रेस नेताओं को खत्म करने की साजिश रची गई। मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने भाजपा पर नक्सलियों से गठबंधन होने के आरोप लगाये हैं।

एक घायल ने इस संवाददाता को बताया कि नक्सलियों ने वायरलेस सेट पर जब पटेल को खत्म करने की इजाजत मांगी तो कर्मा के मृत जवान के सेट पर भी वह आवाज सुनाई दी! पुलिस को यह भी पता चला है कि परिवर्तन यात्रा का रूट सुकमा से गादीरास की ओर था, लेकिन ऐन वक्त पर किसी स्थानीय नेता के कहने पर इसे बदलकर तोंगपाल और दरभा घाटी के रास्ते कर दिया गया। हालांकि कांग्रेस नेताओं ने रूट बदले जाने की बात

का खंडन किया है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि माओवादी कमांडर गणपति, जोनल कमेटी का सचिव रमन्ना, दरभा का कमांडर विनोद और आंध्र ओडिशा बॉर्डर कमेटी के सचिव गगन्ना के नेतृत्व में हमले के लिए रणनीति करीब डेढ़ महीने से बनाई जा रही थी और नक्सलियों ने इस कदर तैयारी कर रखी थी कि यदि काफिले का रास्ता बदला जाये तो भी हमले को अंजाम दिया जा सके। जिस दरभा घाटी पर हमला हुआ, वहां पर नक्सलियों ने एक दर्जन से ज्यादा अस्थायी कैम्प लगा रखे थे और हमले की तैयारी कर रहे थे।
पैर उखडऩे लगे नक्सलियों के!
आज हकीकत यह है कि माओवादी बस्तर में ‘करो या मरो’ की लड़ाई लड़ रहे हैं। स्थानीय आदिवासियों की नई पीढ़ी बंदूक थामने के बजाय इंजीनियर-डॉक्टर बनना चाहती है, विकास के रास्ते पर चलकर सुकून की जिंदगी जीने का सपना रखती है। इसलिए नक्सली दलम में बाहरी राज्यों के युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है और माओवादियों को स्थानीय समर्थन भी नहीं मिल रहा है।

नक्सली बसंती इंद्रावती नेशनल पार्क एरिया की कमाण्डर है, उस के पुसनार गांव में रात को नक्सलियों ने धावा बोला और उसके 50 वर्षीय पिता पोयम सुक्कू को जनअदालत में पहले फांसी दी और जब उसकी मौत नहीं हुई तो फिर जिंदा दफना दिया!

नक्सली कमाण्डरों के बीच दलम की कमान संभालने को लेकर गहरा विवाद सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक नक्सली नेताओं ने बस्तर डिवीजन को चार हिस्सों में बांटकर इसकी कमान आंध्र के नेताओं को सौंप दी है, जिसे लेकर बस्तर के नक्सली खासे नाराज हैं और इसे ज्यादती करार दे रहे हैं। इसी को लेकर जब तीन नक्सली कमाण्डरों के बीच विवाद बढ़ा तो एक को गोली मार दी गई वह गंभीर रूप से घायल हो गया। छह महीने पहले सरगुजा में धन के बंटवारे और हथियार सप्लाई को लेकर नक्सलियों के दो गुट भिड़ गये थे और छंदपाल गांव में खुलेआम हुई गोलीबारी में एक नक्सली की मौत हो गई थी, लेकिन अब दलम की कमान संभालने को लेकर ताजा विवाद सामने आया है।

नक्सलियों के पांव अब गांवों से भी उखडऩा शुरू हो गये हैं और ग्रामीण परिवार उनका साथ देने के बजाय शांति और विकास चाहते हैं। ताजा मामला राजनांदगांव जिले के कासीबहरा गांव से है जहां सौ से ज्यादा ग्रामीण परिवारों ने यह कहते हुए गांव छोड़ दिया कि नक्सली उनके जवान बेटों को लाल सेना में शामिल होने का दबाव डाल रहे हैं,लेकिन अपने जिगर के टुकड़ों को माओवादियों के हवाले करने के बजाय ग्रामीणों ने गांव छोडऩा बेहतर समझा। ग्रामीणों ने अपना सामान इकट्ठा किया और 65 किलोमीटर दूर पैदल चलकर कवर्धा जिले के ग्राम तेंदूटोला में शरण ली। ग्रामीणों का कहना है कि वे शांति और तरक्की केसाथ जीना चाहते हैं। कबीरधाम जिला के कलेक्टर मुकेश बसंल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि प्रशासन उनकी पूरी मदद करेगा ग्रामीणों के विस्थापन की तैयारी की जा रही है।

यही हाल बस्तर का है जहां लोग नक्सलियों के डर से अपने बगाों को दूसरे राज्यों में भेज रहे हैं। इसका खुलासा नारायणपुर जिले के चेरीबेड़ा और बेनूर गांव के उन युवकों ने किया जिन्हें पुलिस ने रांची जाते हुए जशपुर में पकड़ लिया था। युवकों ने बताया कि वे और उनके परिवार नक्सलियों से तंग आ चुके हैं। नक्सली जबरन डरा-धमकाकर गांव के लड़कों को साथ ले जाते हैं, और बात नहीं मानने पर हत्या कर देते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, युवाओं की तलाश में निकले नक्सलियों के एक दल ने चंद दिनों पूर्व दोरनापाल क्षेत्र में ग्राम दुब्बाटोटा को घेरा और पांच से छह युवाओं को पकड़कर अपने साथ ले गये।

राजनीतिक दलों को इस घटना से एक सबक यह भी लेना चाहिये कि जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास खासकर नक्सलीगढ़ में सबकी जान खतरे में डाल देता है। खुफिया विभाग ने कांग्रेस नेताओं को सड़क मार्ग के बजाय हवाई मार्ग का इस्तेमाल करने की सलाह दी थी, लेकिन उसे दरकिनार कर दिया गया। लगभग डेढ़ साल से सुकमा में जिस तरह कार्यकर्ता सम्मेलन, दौरे और रैलियों का सफल आयोजन जारी था, उससे कांग्रेस नेता आश्वस्त थे कि नक्सली उन पर हमला नहीं कर सकते। एक वजह उनकी पार्टी का विधायक होना भी था, लेकिन पार्टी नेता यह भूल गये कि नक्सली इतने बड़े नरसंहार को अंजाम देने की तैयारी कर रहे हैं। नक्सलियों ने इस गफलत का पूरा फायदा उठाया।
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नक्सलियों ने अपने ताजा बयान में कहा है कि ग्रीन हंट ऑपरेशन बंद ना हुआ तो मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह, गृहमंत्री ननकीराम कंवर, मंत्रीत्रय रामविचार नेताम, केदार कश्यप और विक्रम उसेण्डी सहित पुलिस महानिदेशक रामनिवास, एडीजी मुकेश गुप्ता और महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटिल उनके निशाने पर हैं। मौका मिलते ही इन्हें जवाब दिया जायेगा, क्योंकि ये सभी दण्डकारण्य के क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ खड़े हुए हैं।
फिलहाल रक्षा सचिव आर.के. सिंह के नेतृत्व में एनआइए ने मामले की जांच शुरू कर दी है, जिसे 90 दिन के अंदर अपनी रिर्पोट सौंपनी होगी। केन्द्र सरकार ने 2000 से ज्यादा अर्द्धसैनिक बल छत्तीसगढ़ रवाना किये है , 30 हजार से ज्यादा अर्धसैनिक बल पहले से ही तैनात हैं। इसके अलावा नक्सलियों की खोज में इंडियन एयर फोर्स के चार हेलिकॉप्ट उड़ान भर रहे हैं। सीमावर्ती राज्यों की सीमाओं पर चौकसी बढ़ा दी गई है, ताकि नक्सली दूसरे राज्यों का रूख न कर पाएं, लगभग छह महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं अत: नेताओं की सुरक्षा ज्यादा जरूरी होगी, क्योंकि चुनाव प्रचार और तेज होगा। कांग्रेस ने भी अपने नेताओं को स्पष्ट कर दिया है कि इस हमले से हताश होने के बजाय राज्य सरकार के खिलाफ वही आक्रामक रूख बरकरार रखा जाये जो दिवंगत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने अख्तियार कर रखा था।

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