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भारत पर मंडराता ड्रैगन का डेंगू

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में महेन्द्र कर्मा और अन्य कांग्रेसजनों की हत्या से केन्द्र सरकार की नींद उड़ गई है। राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह पर चारों तरफ से आरोपों की बौछार हो रही है। उन पर सुरक्षा के मामले में लापरवाही बरतने के आरोप लगाए जा रहे हैं। चुनाव के समय राजनैतिक दल इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं, यह बात समझ में आती है, लेकिन एक-दूसरे पर आरोप मढऩे से कभी कोई समस्या हल नहीं होती।

भारत में आज एक बड़ी चुनौती नक्सल-माओवादी समस्या है, जिसे वामपंथी चरमपंथ कहा जाता है। छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवाद, आज इतना व्यापक हो गया है कि उसे भारत का ”लाल गलियारा” कहा जाने लगा है। यह ‘लाल’ चुनौती पिछले कुछ महीनों या साल भर में इतनी विकराल नहीं हुई है। सन 1967 से 2013 तक आते-आते यह मामूली ‘फुंसी’ आज कैंसर बन गई है।

कैंसर बनी इस बीमारी को जड़ से उखाडऩे के लिए काटकर फेंकने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है। भले ही इस शल्यक्रिया में कुछ स्वस्थ सेल भी नष्ट क्यों न हो जाएं। यह निश्चित है कि इसके बड़े ऑपरेशन के बाद देश एक बहुत बड़ी आपदा से मुक्ति पा जाएगा।

यह समस्या तुरंत फुरत दूर हो सके, इसके लिए सरकार के पास ऐसा कोई समाधान नहीं है। सत्तारुढ़ दल का अपना एजेंडा है और विपक्षी दलों को इस चुनौती से कुछ लेना-देना नहीं है। जब कुछ नागरिकों, पुलिसकर्मियों या सैनिकों की बड़े पैमाने पर हत्या होती है तो कुछ हो-हल्ला करने के बाद सब ज्यों का त्यों हो जाता है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं की हत्या हुई। इस तरह का कोई बड़ा हत्याकांड होने पर भारी शोरगुल मचता है। पिछले 45 सालों में यह चुनौती लगातार बढ़ती रही है। विचार करें तो पता लगेगा कि हमारे नेताओं में दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह प्रश्न विकराल रुप धारण करता जा रहा है। इस मामले में अब तक कोई स्पष्ट नीति नहीं अपनायी गई है। राजनैतिक कारणों से केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच बने मतभेदों ने आग में और घी डालने का काम किया है। गुरिल्ले युद्ध और आधुनिक हथियारों के चलाने में प्रशिक्षित नक्सलवादी बेहतरीन हथियारों से लैस भी हैं। दूसरी ओर हमारे सुरक्षाबल पुराने हथियारों से काम चला रहे हैं। सरकार का गुप्तचर संगठन भी लचर बना हुआ है। नक्सलवाद से ग्रस्त राज्यों की सरकारें और विभिन्न सरकारी विभागों में उचित तालमेल का पूर्ण अभाव है। ऐसी हालत में इस आंदोलन को कुचलना असंभव है। विशेषज्ञों का कहना है कि नक्सलवाद के प्रचार के लिए देश की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं, लेकिन यह गलत है।

एक अनुमान के अनुसार नक्सलवादियों के संगठन में 50,000 सशस्त्र प्रतिबद्ध नौजवान हैं। ये नौजवान बारुदी सुरंगों के प्रयोग में भली प्रकार प्रशिक्षित हैं। वे आधुनिक स्वचालित चीनी शस्त्रों से लैस हैं। माओवादियों की वार्षिक उगाही 8,000 करोड़ रुपये से अधिक है, जिसके बल पर वे हिंसक संघर्ष आगे बढ़ाते हैं।
15 राज्यों में सैकड़ों जिलों के घने जंगलों में फैले नक्सलियों से निबटने के लिए सुरक्षाबलों को बेहतर हथियार और गोला बारुद मुहैया कराये जाने चाहिए। उन्हें जंगल की युद्ध कला – ‘गुरिल्ला युद्ध’ का प्रशिक्षिण दिया जाना चाहिए। वातानुकुलित कमरों में बैठकर राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी नीतियां बनाकर यह उम्मीद करना कि राज्य सरकारें उनका पालन करेंगी, बेवकूफी है।

वास्तविकता से दूर वर्तमान नीतियों और तरीकों से इस गंभीर आतंरिक समस्या को हल करना संभव नहीं है। केन्द्रीय नेताओं को स्थानीय सरकारों की प्रतिक्रियाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। उन्हें राज्य सरकारों को भी विश्वास में लेना चाहिए, ताकि आदिवासी और ग्रामीण जनता को भी लगे कि नए भारत के निर्माण में उनका भी योगदान है। सारे राजनैतिक दलों को दलगत राजनीति से उपर उठकर, इस राजनीतिक समस्या के हल के लिए एकजुट होना चाहिए। इसके लिए मजबूत राष्ट्रीय नीति बनाकर उसका दृढ़ता से पालन किया जाना चाहिए।

विकलिक्स की बात एक बार फिर … 8 दिसंबर 2005 को भारत में अमरीकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने एक गुप्त केबल अमेरिका भेजा था, जिसमें बताया गया था कि ”भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से सुधर रही है, पर गरीब ग्रामीण इलाकों में नक्सलवादी संगठन सक्रिय हैं। शहरों में उनके पढ़े-लिखे समर्थक भी बढ़ते जा रहे हैं। इन संगठनों ने 12 राज्यों में अपने प्रभाव क्षेत्र बढ़ा लिये हैं। ये कभी भी सरकारी सुविधाओं पर भारी हमला बोल सकते हैं।’ राजदूत के केबल के अनुसार ”भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास से ग्रामीण समाज का बहुत बड़ा भाग वंचित है। भारत में अनुसूचित आदिवासी और जन जातियां दूर दराज के इलाकों में रहती हैं। उनमें भारी निराशा है। वे मानते हैं कि केवल नक्सलवादी ही उनके रक्षक हैं। अधिकतर आदिवासियों को यह विश्वास नहीं है कि भारत सरकार उनकी रक्षक है। उन्हें कोई विकल्प नजर नहीं आता। अपने सभी विकल्पों में से वे माओवादियों को सबसे अच्छा मानते हैं।”

अमेरिकियों की यह बात सही है। सुकमा संहार के बाद सारे राजनैतिक दलों को जाग जाना चाहिए। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था खालिस्तान से लेकर उल्फा, बोडोलैंड, नागा और अन्य उत्तर-पूर्व के संगठन आदि के अनेक भूमिगत आंदोलनों से सफलतापूर्वक निपटी है। नक्सलवादी आंदोलन भी एक बार कुचला गया और पराजित हो गया था, लेकिन सिर्फ राजनैतिक कारणों से उसे राख से पुन: पुनर्जीवित होने दिया गया। पुराने सारे सबक भुला दिए गए हैं। यदि जल्दी नहीं चेते तो, इस सामूहिक बेहोशी के लिए हमें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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