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मृत्यु नहीं, मृत्यु के भय को जीतने की जरुरत है

बुद्ध ने दुख के निवारण के जो उपाय बताये उन्हें ‘आष्टांगिक मार्ग’ के नाम से जानते हैं। वे ‘आष्टांगिक मार्ग’ हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक् , सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक अभ्यास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। यदि मानव की दृष्टि, संकल्प, वचन, कर्म, आजीविका, अभ्यास, स्मृति, और समाधि मर्यादित तथा लोकव्यवहार के अनुरूप हों, तो व्यक्ति तमाम तरह की परेशानियों एवं पीड़ाओं से सुरक्षित रहता है।

महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ने कहा कि इस दुनिया में मनुष्य रोज जीवों को यमलोक प्रस्थान करते हुए देखता है, किन्तु जो जीवित हैं, उनको यही लगता है कि उनकी मृत्यु नहीं होगी मृत्यु के बारे में यही अज्ञान इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है।
भय कई प्रकार के होते हैं-अपनों को खोने का भय, परायों से हानि का भय, अंधकार से भय, असफ लता से भय और तो और कभी-कभी तो भय से भी भय लगता है। निस्संदेह मृत्यु का भय सर्वाधिक डरावना है, जो वास्तविक मौत के पूर्व ही हमें कई बार मार देता है। कभी-कभी तो मृत्यु का भय हमारी सोच के ढंग, जीने के ढंग तथा जीवन के प्रति हमारे नजरिये एवं दर्शन में भी क्रांतिकारी परिवर्तन का सबब होता है।

प्रश्न उठता है कि यदि मानव मरणशील है तथा जीवन का पटाक्षेप मृत्यु के अंतिम एपिसोड के साथ होना तय है, तो फि र मृत्यु से हम डरते ही क्यों हैं? मृत्यु के स्याह साये का भय ताउम्र हमारी चिंता एवं चिंतन का कारण क्यों बन जाता है? और यदि मृत्यु से डर भी मानव जीवन के स्वाभाविक गुणों में आता है, तो फि र यह प्रश्न कम महत्वपूर्ण नहीं है कि आखिर इस भय से मुक्ति का रास्ता क्या है? काल के गाल में जिस तरीके से सनातन काल से सृष्टि समाती जा रही है, आखिर उससे निवारण का रास्ता क्या है?

मृत्यु का दर्शन एवं मनोविज्ञान अत्यंत रहस्यमय एवं छायावादी हैं, शास्त्रों तथा पुराणों में कहा गया है कि यह नश्वर संसार कागज की पुडिय़ा है, जिसे अंतत: गल जाना है, नष्ट हो जाना है। संसार को माया के नाम से भी जाना जाता है। यह अपना है तथा वह पराया है। मानव मन इस प्रकार की बेशुमार चिंताओं से भयभीत एवं परेशान रहता है। माया तथा स्वार्थ के इस मकडज़ाल हस्तिनापुर के नरेश धृतराष्ट्र भी नहीं बच पाए थे, बल्कि पूरी महाभारत की लड़ाई इसी आपसी स्वार्थ एवं लिप्सा की गाथा है। देवी-देवता भी इन गुणों एवं अवगुणों से महफूज नहीं रह पाए। मृत्यु का भय परिवार, माया-मोह, आशा-तृष्णा, रिश्तों-नातों की असुरक्षा तथा उनके बिछुड़ जाने से जनित दुख का का परिणाम होता है।

यदि खुद के कल्याण एवं सुख का प्रश्न होता, तो मानव मृत्यु सरीखे अपरिहार्य बंधन से जरा भी नहीं घबराता। मनुष्य को कष्ट सगे-सम्बन्धियों के सुख-दु:ख में दर्द से आहत होने की कोमल अनुभूति से होता है। यहीं पर हमें सांसारिक लिप्सा में फंसे मन को नियन्त्रित करने की दरकार है। गीता के अनुसार मानव शरीर मृत्यु के रूप में पुराने परिधान को बदलकर नए परिधान का वरण करता है। आत्मा को न तो कोई शस्त्र काट सकता है और ना ही इसे आग जला सकती है। जल का भी इस पर कोई असर नहीं होता और हवा भी इसे नहीं सुखा सकती। अर्थात यह अजन्मा एवं अमर है तथा इस पर किसी का नियंत्रण संभव नहीं है। सनातन काल से जिस भय से देवताओं तक को निजात नहीं मिल पाई, हमारे पूर्वज काल के गाल में अपने वजूद खोते चले गए। मृत्यु सरीखे सार्वभौमिक शाश्वत सत्य से बचने की हमारी कोशिश निरर्थक ही नहीं नितांत अविवेकपूर्ण है।

मृत्य एक शाश्वत सत्य है, जिसके लिए हमें मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से तैयार रहना चाहिए। युवावस्था में शारीरिक सुंदरता एवं मानसिक तीक्ष्णता से मानव जीवन एवं लौकिक संसार देदीप्यमान रहता है। तमाम प्रकार की उर्जा से मन तथा शरीर कांतिमय बना रहता है, वक्त के साथ बुढ़ापे के कारण शरीर तथा मन शिथिल तथा निष्क्रिय पड़ता जाता है,उसे लंबे विश्राम की जरुरत होती है। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु अपरिहार्य है। सृष्टि की रचना के साथ उसके विनाश की अनिवार्यता भी एक चिरंतन सत्य है, जिसे नकारने की मानव की मिथ्या कोशिश एवं नासमझी ही मृत्यु के बारे में इस धरती पर इंसान की व्यथा एवं दुर्भाग्य का अहम कारण है।

गौतमी नाम की एक स्त्री के पुत्र की मृत्यु हो गयी वह दहाड़ मारकर विलाप कर रही थी। बेटे को जीवित करने की कोशिश में गौतमी वैद्य से लेकर साधु-संतों तक गुहार कर आई, किन्तु हर तरफ से उसे निराशा ही हाथ लगी। फिर भी उस शोकग्रस्त स्त्री का दिल नहीं माना उसे लगता था कि कदाचित वह यदि किसी सिद्ध पुरुष के पास जाकर अपने बेटे को जीवित करने की प्रार्थना करेगी तो संभव है कि उसका नौनिहाल से जीवित होकर अपनी तुतली जुबान से मां कह उठे।

वह बेटे के शव के साथ गौतम बुद्ध के पास गयी। बुद्ध ने उससे कहा यदि वह इस गांव के किसी घर से एक मुट्ठी सरसों मांगकर ले आये तो उसके बेटे को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इस बात ने मां के अंधेरे मन में आशा का दीप जला दिया। वह अति उत्साहित होकर बड़ी तेजी से वहां से प्रस्थान करने लगी, तो बुद्ध ने उसे रोका तथा कहा कि ‘सरसों ऐसे घर से मांग कर लानी है, जहां आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई हो।’ गोतमी ने दिन भर में गांव के प्रत्येक घर की परिक्रमा कर ली, लेकिन उसे ऐसा कोई भी घर नहीं मिला जहां किसी की मृत्यु नहीं हुई हो। थक-हार कर वह फिर गौतम बुद्ध के पास पहुंची। लेकिन इस बार वह आत्मज्ञान के साथ आई।

वह बुद्ध के पावों पर गिर पड़ी और कहने लगी, ‘मुझे अब मृत्यु सरीखे चिरंतन सत्य के बारे में आत्मज्ञान हो चुका है। मैं अब समझ चुकी हूं कि इस दुनिया में जन्म के साथ मृत्यु अपरिहार्य है।’ गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्यों के बारे में उपदेश दिया है। वे हैं- दु:ख, दु:ख का कारण, दु:ख का निवारण और दु:ख से निवारण के उपाय। उन्होंने बताया। कि मानव के दुखों का मूल कारण जन्म है। मनुष्य जन्म लेता है, इसीलिए वह दु:ख पाता है।

मानव की इच्छा भी उसके दुखों का मुख्य कारण है। इच्छारहित जीवन की तो कल्पना नहीं की जा सकती, किन्तु इच्छाओं को सीमित करना, शमित करना तथा इच्छा की पूर्ति ना होने की स्थिति में निराशा को जन्म नहीं देना-हमें कई प्रकार के दुखों से दूर रखता है।
मन का भटकाव भी इंसान के जीवन में दुखों का एक मुख्य कारण है, मन के भटकाव का केंद्र बिंदु इच्छाओं के भंवर से ही जन्म लेता है। बुद्ध ने दुख के निवारण के जो उपाय बताये उन्हें ‘आष्टांगिक मार्ग’ के नाम से जानते हैं। वे ‘आष्टांगिक मार्ग’ हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक् , सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक अभ्यास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। यदि मानव की दृष्टि, संकल्प, वचन, कर्म, आजीविका, अभ्यास, स्मृति, और समाधि मर्यादित तथा लोकव्यवहार के अनुरूप हों, तो व्यक्ति तमाम तरह की परेशानियों एवं पीड़ाओं से सुरक्षित रहता है।

जब हम अपने आचरण के पारिवारिक एवं सामाजिक संस्कारों की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कर बैठते हैं तो हम खुद ही कई मुसीबतों को निमंत्रण दे बैठते हैं। लिहाजा इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि हम अपने व्यक्तिगत जीवन में परिवारिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का इस प्रकार से पालन करें कि वह हमारे लिए किसी मुसीबत का सबब नहीं बन जाएं। पतंजलि जी ने कहा है, ‘योग: चित वृत्ति निरोध:अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।’ और जिस व्यक्ति ने अपने चित्त पर नियंत्रण नहीं रखा, वह अपने जीवन के लिए परेशानियां खुद पैदा कर लेता है। मानव जीवन के तमाम दु:ख उसके खुद के कर्मों का नतीजा हैं।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

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