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पेड़-पौधों से बिजली और बैक्टीरिया से डीजल

पौधों में सौर ऊर्जा के उपयोग की दर लगभग 100 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह हुआ कि पौधे द्वारा ग्रहण किया जाने वाला प्रत्येक फोटोन अथवा प्रकाश कण इलेक्ट्रोन उत्पन्न करता है। पौधा जितने फोटोन प्राप्त करता है, वह उतने ही इलेक्ट्रोन उत्पन्न करता है। यदि हम इसके मामूली अंश को भी बिजली में बदल दें तो हम सौर पैनलों से मिलने वाली बिजली की तुलना में ज्यादा बिजली प्राप्त कर सकते हैं।
ऊर्जा संकट का हल खोजने के लिए दुनिया के वैज्ञानिक ईंधन उत्पादन के नए तरीके खोज रहे हैं। कुछ वैज्ञानिक जहां प्रकाश संश्लेषण की कुदरती प्रक्रिया को प्रयोगशाला में दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं कुछ अन्य वैज्ञानिक बैक्टीरिया से डीजल बनाने की चेष्टा कर रहे हैं। सूरज हमारे लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन पृथ्वी को मिलने वाले सौर विकिरण का बहुत मामूली अंश ही उपयोगी ऊर्जा में तब्दील हो पाता है। इस समस्या का समाधान खोजने के लिए अमेरिका की जार्जिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने प्रकृति से प्रेरणा लेकर एक नई टेकनोलॉजी विकसित की है। इस टेक्नोलॉजी की मदद से विद्युत उत्पादन के लिए पौधों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्रमुख रिसर्चर रामराजा रामासामी का कहना है कि स्वच्छ ऊर्जा आज वक्त का तकाजा है। नई टेकनोलॉजी की बदौलत हम वनस्पति आधारित सिस्टम का इस्तेमाल करके सूरज की रोशनी से स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। सौर ऊर्जा के उपयोग में पौधों की दक्षता की बराबरी कोई नहीं कर सकता। अरबों वर्ष के विकास के बाद पौधों ने सूरज की रोशनी को बहुत ही कारगर तरीके से ऊर्जा में बदलना सीख लिया है।

पौधों में सौर ऊर्जा के उपयोग की दर लगभग 100 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह हुआ कि पौधे द्वारा ग्रहण किया जाने वाला प्रत्येक फोटोन अथवा प्रकाश कण इलेक्ट्रोन उत्पन्न करता है। पौधा जितने फोटोन प्राप्त करता है, वह उतने ही इलेक्ट्रोन उत्पन्न करता है। यदि हम इसके मामूली अंश को भी बिजली में बदल दें तो हम सौर पैनलों से मिलने वाली बिजली की तुलना में ज्यादा बिजली प्राप्त कर सकते हैं।

प्रकाश-संश्लेषण अथवा फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया के दौरान पौधे पानी के मोलिक्यूल्स को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं में विखंडित करने के लिए लिए सूरज की रोशनी का प्रयोग करते हैं। इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रोन भी निकलते हैं। ये इलेक्ट्रोन पौधों को शूगर उत्पन्न करने में मदद करते हैं। रामासामी के अनुसार उनकी टीम ने प्रकाश-संश्लेषण में हस्तक्षेप करके इलेक्ट्रोन को बीच में ही पकडऩे का तरीका खोज लिया है। पौधों की कोशिकाओं में थाईलेकोइड्स नामक संरचनाएं होती हैं। इन खास संरचनाओं की मदद से पौधे सूरज की रोशनी से मिलने वाली ऊर्जा को ग्रहण करते हैं और उन्हें संग्रहित करते हैं।
रामासामी की टीम द्वारा विकसित टेक्नोलॉजी में इन संरचनाओं को अलग करके संशोधित किया जाता है
ताकि इलेक्ट्रोन को तार में प्रवाहित किया जा सके। छोटे स्तर पर किए गए प्रयोगों में रिसर्चर इस विधि से विद्युत करेंट प्राप्त करने में सफल रहे। रामासामी का कहना है कि इस टेक्नोलॉजी को व्यावसायिक बनाने के लिए अभी और विस्तृत रिसर्च की आवश्यकता है, लेकिन उनकी टीम अपने उपकरण की स्थिरता और आउटपुट बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
भविष्य में इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग रिमोट सेंसरों और पोर्टेबल इलेक्ट्रोनिक उपकरणों में किया जा सकता है, जिन्हें चलाने के लिए कम ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। यदि हम प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया में आनुवंशिक इंजीनियरिंग के जरिए फेरबदल कर सकें तो यह टेक्नोलॉजी भविष्य में पारंपरिक सौर पैनलों को टक्कर दे सकती है। आज भले ही इससे उत्पन्न होने वाली बिजली की मात्रा बहुत कम है, लेकिन यह बात दूसरी तकनीकों पर भी लागू होती है। मसलन 30 साल पहले हाइड्रोजन ईंधन सेल अपनी शैशवावस्था में थे। आज इनकी मदद से कारें और बसें चलाई जा रही हैं।

अमेरिका में ड्यूक यूनिवर्सिटी के इंजीनियरों ने कैलिफोर्निया ऊर्जा आयोग के सहयोग से स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पन्न करने का एक नया तरीका खोजा है। हाइड्रोजन हमारे वायुमंडल में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यदि हम इसका दोहन कर सकें तो हम न सिर्फ खनिज ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं, बल्कि पर्यावरण पर उसके दुष्प्रभावों से भी बच सकते हैं। लेकिन परिवहन और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए आणविक हाइड्रोजन का उत्पादन और भंडारण बहुत ही जटिल है और यह महंगा भी पड़ता है। अभी हाइड्रोजन उत्पन्न करने के लिए प्रयोग में लाई जा रही विधियों में बायप्रोडक्ट के रूप में कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती है, जो मनुष्यों और जानवरों के लिए विषाक्त होती है। ड्यूक के इंजीनियरों ने नए केटेलिस्टों के प्रयोग से यह दर्शाया है कि हाइड्रोजन की उपस्थिति में कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा को लगभग शून्य के स्तर पर लाया जा सकता है। जर्नल ऑफ केटेलिसिस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार रिसर्चरों ने यह भी सिद्ध किया कि हाइड्रोजन को कम तापमान पर भी उत्पन्न किया जा सकता है, जो अभी प्रचलित तरीकों में संभव नहीं है। इस तरह यह हाइड्रोजन ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन सकती है।

कुछ अन्य रिसर्चर प्रकाश-संश्लेषण के जरिए ऊर्जा प्राप्त करने के दूसरे तरीके भी खोज रहे हैं। ब्रिटेन की ग्लैस्गो यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने प्रकाश-संश्लेषण के सिद्धांत पर हाइड्रोजन उत्पन्न करने का एक नया तरीका विकसित किया है। रिसर्चरों का दावा है कि उनकी खोज से हाइड्रोजन को एक स्वच्छ, सस्ते और भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत के रूप में विकसित किया जा सकता है। जीवाश्म आधारित ईंधन जहां ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं, वहीं ऊर्जा प्राप्ति के लिए हाइड्रोजन को जलाने पर उत्सर्जन नहीं होता। लेकिन पानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग करना आसान नहीं है। वैज्ञानिक वर्षों से पानी को विखंडित करके हाइड्रोजन निकालने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। वे एक ऐसी विधि की तलाश कर रहे हैं, जिससे किफायती तरीके से हाइड्रोजन निकल जाए और खतरनाक विस्फोटों का जोखिम भी खत्म हो जाए।

यह बात कुछ साइंस फिक्शन जैसी लगती है, लेकिन ब्रिटेन की एक्सटर यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने बैक्टीरिया से डीजल बनाने का तरीका खोज लिया है। ई.कोलाई बैक्टीरिया की खास किस्मों द्वारा तैयार डीजल सामान्य डीजल जैसा ही है और उसमे दूसरे पेट्रोलियम पदार्थ मिलाने की आवश्यकता नहीं है। वनस्पति तेलों से बने बायोडीजल में अक्सर पेट्रोलियम पदार्थ मिलाने पड़ते हैं। एक्सटर रिसर्चरों की इस सफलता का अर्थ यह है कि इस डीजल को सीधे मौजूदा व्यवस्था में सप्लाई के लिए शामिल किया जा सकता है। इसके लिए इंजिनों, पाइपलाइनों और टैंकरों में फेरबदल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन इस टेक्नोलॉजी को व्यावसायिक बनाने में बहुत सी दिक्कतें हैं।

एक्सटर यूनिवर्सिटी में बायोसाइंसेस के प्रोफेसर जॉन लव का कहना है कि हम शुरू से ही एक ऐसा व्यायसायिक जैविक ईंधन उत्पन्न करना चाह रहे थे, जिसे वाहनों में फेरबदल के बगैर ही प्रयुक्त किया जा सके। सामान्य डीजल के स्थान पर व्यावसायिक जैविक ईंधन का इस्तेमाल करके हम 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 80 प्रतिशत कटौती के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। दुनिया में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। हमें एक ऐसा ईंधन चाहिए, जो दुनिया में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और राजनीतिक अस्थिरता से प्रभावित नहीं हो। इस दृष्टि से नया जैविक डीजल काफी आकर्षक लगता है। ई-कोलाई बैक्टीरिया अपनी कोशिकाओं की झिल्लियां निर्मित करने के लिए कार्बोहाइड्रेट्स को वसा में बदलते हैं। इस कुदरती तेल उत्पादन प्रक्रिया का इस्तेनाल ईंधन के तेल मोलिक्यूल्स उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है। दवा उद्योग में निर्माण प्रक्रिया में ई-कोलाई का प्रयोग उत्प्रेरक के रूप में पहले से हो रहा है। फिलहाल प्रयोगशाला में उत्पन्न किया जा रहा बायोडीजल बहुत अल्प मात्रा में है। लेकिन वैज्ञानिकों को भरोसा है कि इस विधि के व्यावसायिक उपयोग का रास्ता शीघ्र निकल आएगा।

 

मुकुल व्यास

 

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