ब्रेकिंग न्यूज़ 

छिपा खजाना मिल गया

डॉ. रामविलास शर्मा और राजेन्द्र यादव की तरह ही नामवर सिंह ने भी अपने साहित्यिक जीवन की शुरूआत कविता से की थी। उनकी प्रकृति संबंधी कविताएं ऊंचे दर्जे की हैं। कभी जब याद आ जाते, सुनहरी विहान, सांझ जा रही, नभ के नीले सूनेपन में, हरित फौव्वारों सरीखे धान, फागुनी शाम, पारदर्शी नील जल में आदि अनेक कविताएं, पुष्ट कवि कर्म की परिचायक हैं। ‘तिर रही धान की लहरों पर’ उनकी प्रतिनिधि कविता कही जा सकती है। उर्दू के एक प्रसिद्ध आलोचक ने मजाज के बारे मं कहा था कि उर्दू में एक कीट्स पैदा हो रहा था कि उसे प्रगतिशील भेडिय़े उठा ले गये। यही बात नामवर सिंह के लिए कही जा सकती है कि हिन्दी में एक अदभुत कवि जन्म ले रहा था कि उसे आलोचना के भेडिय़े ने उठा लिया। इस पुस्तक में एक कहानी भी संकलित है। नामवर सिंह कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, व्यंग्य आदि सब कुछ लिखते थे। कम उम्र से ही उनकी लेखनी इतनी परिपक्व थी, यह देखकर आश्चर्य होता है। ‘संस्कृति का तात्पर्य’, ‘हिन्दी कविता के पिछले दस वर्ष’ साधारण निबंध नहीं है। ‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ जैसे कालजयी आलोचनात्मक निबंध लिखकर नामवर सिंह ने अपनी अदभुत आलोचनात्मक क्षमता को प्रमाणित किया। ‘शुक्ल जी भारतीय पुनरूत्थान युग की उन परिस्थितयों की उपज थे, जिन्होंने राजनीति में महात्मा गांधी, कविता में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जयशंकर प्रसाद आदि को उत्पन्न किया।’ शुक्ल जी के सुनहरे पक्षों के साथ लेखक उनकी सीमाओं पर भी सही उगुंली रखता है। अपने युग से बाहर शुक्ल जी नहीं जा सकते थे। वर्णाश्रम में आस्था उनकी बहुत बड़ी सीमा है, इसीलिए वह महाकाव्य को आदर्श मानते हैं और रामकथा को सर्वश्रेष्ठ आख्यान। शुक्ल जी स्वच्छंदवाद को पसंद नहीं करते, इसीलिये वह न छायावाद को समझ पाये न सूरदास के साथ न्याय कर पाये और न मुक्त कविता को। प्रबंध काव्य शुक्ल जी की दृष्टि और समय की सीमा है।

वह विचार और व्यंग्य प्रधान कवि कबीर के साथ भी न्याय नहीं कर सकते थे। कहना न होगा कि अपने प्रारंभिक दौर में ही नामवर सिंह आचार्य शुक्ल का स्वस्थ और तर्कसंगत आकलन करते हैं। शुक्ल जी पर हिन्दी में अनेक पुस्तकें और लेख लिखे गये हैं। पर यह आकलन महत्वपूर्ण है कि वह अपने समय को नहीं समझ पाये, उनके आदर्श और मानदंड अतीत में ही थे।

रम्य रचना में ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे’ भी अद्भुत है। ‘महादेवी वर्मा : काव्य कला और जीवन दर्शन’ और ‘दूसरा सप्तकÓ जैसी समीक्षाएं आज भी ताजगी देती हैं। लेखक की प्रतिभा का विस्फोट ‘बलकम खुद’ में हुआ है। लेखक बेहद पुस्तक प्रेमी है। अनेक निबंधों में उसका पुस्तक-प्रेम तरह-तरह से प्रगट हुआ है। लेखक की पहली पुस्तक ‘बकलम खुद’ ही कालजयी महत्व की है। ‘के कर कमलो में, भूमिका, पोथी पढि़ पढि़ जग मुआ, गपशप, बकलम खुद, जब मेरी पुस्तक ने मुझ से कहा’ ऐसे निबंध हैं, जिन पर हिन्दी को गर्व होना चाहिए।

‘कागद का राज’ और ‘नई चाल का चेक’ जैसी अमर रचनाएं बताती हैं कि प्रतिभा के लिए विषय की और मौलिकता की कोई सीमा नहीं होती। भारत यायावर ने अभी तक गड़े पड़े खजाने को उजागर करके हिन्दी की महत्वपूर्ण सेवा की है। उनकी लिखी भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

 रवीन्द्र प्रसाद

дать объявление в интернете бесплатноооо полигон

Leave a Reply

Your email address will not be published.