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सोरिएसिस अनुवांशिक बीमारी नहीं: डॉ. अचल दवे

सोरिएसिस अनुवांशिक बीमारी नहीं है। इस बीमारी के कारणों की अभी तक पूरी तरह से जानकारी नहीं मिली है। इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर के किसी भी हिस्से में खुरदुरा दाग हो जाता है। वह दाग अपने आप ही शरीर के अन्य हिस्सों में फैल भी जाता है। शरीर के जिस स्थान पर यह दाग होता है उसी स्थान पर भी यह अधिक फैल सकता है और अन्य स्थानों पर भी यह दाग हो सकता हो सकता।

सोरिएसिस के संबंध में प्रसिद्ध डॉ. अचल दवे का कहना है कि सोरिएसिस का संबंध किसी प्रकार की भोजन शैली से नहीं है। यह किसी पदार्थ से होने वाली एलर्जी भी नहीं है। खान-पान से इसका कोई संबंध नहीं है। इसलिए सोरिएसिस के रोगी के खान-पान पर प्रतिबंध नहीं है। यह एक प्रकार की त्वचा की गंभीर बीमारी है। इसलिए इसका इलाज त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों से कराना चाहिए।

डॉ. अचल दवे के अनुसार यह एक्जिमा जैसा दिखने वाला रोग है। रोगी यदि सोरिएसिस ग्रस्त त्वचा पर खाज करता है तो उसके अन्दर से द्रव्य भी निकल सकता है। अन्यथा यह त्वचा पर सूखा निशान बनाता है। दूर से देखने में यह एक्जिमा ग्रस्त त्वचा का बोध देता है। यह किसी भी प्रकार से संक्रमणकारी नहीं है और सोरिएसिस के रोगी के शारीरिक सम्पर्क में आने के बावजूद स्वस्थ व्यक्ति को यह रोग नहीं होता। इस बात की संभावना है कि इस रोग के होने का मुख्य कारण कोई अज्ञात रोगाणु है।

बढ़ जाती है सर्दी में बीमारी
दिल्ली सरकार के होम्योपैथी प्रणाली दवाओं के बोर्ड के उपाध्यक्ष और गंगाराम अस्पताल होम्योपैथी के विशेषज्ञ डॉ. आदित्य कौशिक के अनुसार सोरिएसिस आम तौर पर त्वचा में होने वाली बीमारी है, लेकिन यह संक्रामक बीमारी नहीं है। इस रोग में त्वचा पर चमकदार पपड़ी जम जाती है। इसके किनारे बने होते हैं। यह बीमारी शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है। इस रोग का शरीर के अन्य हिस्सों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। त्वचा का रोग होने के बावजूद, सोरिएसिस में खुजली की शिकायत आमतौर पर कम होती है। यह रोग प्राय: युवाओं में होता है। कुछ रोगी को यह बीमारी आनुवांशिक रुप से मिलती है। मौसम के हिसाब से सर्दी में यह बीमारी तेजी से बढ़ता है। गर्मी में यह कम हो जाता है। यह सोरिएसिस जिद्दी किस्म का रोग है। यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। कई बार यह रोग जीवन भर बना रहता है। कई बार यह बीमारी बीच में दब जाती है, लेकिन दुबारा फिर से उभर कर सामने आती है। दबने के बाद यह बीमारी अपना कोई निशान या पहचान नहीं छोड़ती। इस रोग की शुरूआत एक छोटे से दाने से होती है। इस दाने की उपरी परत सफेद पपड़ी जैसी होती है। यह पपड़ी धीरे-धीरे इक्कठी होती जाती है और बड़ा आकार ले लेती है। यह बीमारी ज्यादातर कोहनी, घुटने, कमर और खोपड़ी के हिस्सों में होती है। नाखूनों में भी इसके प्रभाव पड़ते हैं और वहां गड्ढ़े हो जाते हैं।
सोरिएसिस के होने का कोई निश्चत कारण न होने से इसका इलाज भी पूरी तरह निश्चित नहीं होता। इसका इलाज करने वाले डॉक्टर रोगी की त्वचा की ऊपरी सतह की खुरचन लेकर उसकी जांच करते हैं और जांच रिपोर्ट के अनुसार रोगी का इलाज होता है। इस रोग के खुरदुरे दाग छोटे भी हो सकते हैं और उनका आकार बढ़ भी सकता है। उनकी प्रकृति छालों जैसी नहीं होती।

इस रोग के परिणामों से सजग करते हुए डॉ. अचल दवे का कहना है कि यह रोग गठिया यानी जोड़ों में दर्द पैदा करता है। इसलिए इसका पता लगाने के लिए शरीर के रोग ग्रस्त हिस्से का एक्स-रे भी कराया जाता है। उस एक्स-रे से गठिया के रोग का निश्चित रूप से पता लग जाता है और उससे सोरिएसिस की गंभीरता की जानकारी भी मिल जाती है। यह ऐसा खुरदुरा दाग है जो किसी भी प्रकार की साधारण मलहम से ठीक नहीं होता है। यदि सोरिएसिस खोपड़ी के किसी हिस्से में हो जाता है तो उससे तेजी से बाल गिरने लगते हैं। इसके अतिरिक्त रोग ग्रस्त खोपड़ी के हिस्से में बाल सफेद भी हो जाते हैं।

डॉ. अचल दवे का कहना है कि सोरिएसिस के रोगी की जांच करने के बाद जनरल फिजिएशन उसके इलाज के लिए रोगी को त्वचा विशेषज्ञ के पास भेज देते हैं।

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