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आंतरिक सुरक्षा के लिए जरुरी है नेशनल काउंटर टेररिज्म सेन्टर

देश की आंतरिक सुरक्षा पर लगातार बढ़ रहे खतरों को देखते हुए केन्द्र सरकार द्वारा की जा रही कोशिशों को एक बार फिर झटका लगा है। 5 जून को विज्ञान भवन में हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक में नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर (एनसीटीसी) पर कोई फैसला नहीं हो पाया। गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने एनसीटीसी के गठन के लिए प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। केन्द्र सरकार द्वारा वांछित बदलाव के बाद भी राज्य सरकारें उससे सहमत होती नजर नहीं आ रही हैं।
एनसीटीसी पर बात करने से पहले देश के आंतरिक हालात पर एक नजर डालना जरुरी है। इस समय देश आतंकवाद, उग्रवाद, नक्सलवाद और जेहादी तथा नस्लीय आतंकवाद से जूझ रहा है। गत 25 मई को छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलियों ने कांग्रेस के काफिले पर जिस तरह हमला किया और बड़े नेताओं को मौत के घाट उतारा, उसने आंतरिक सुरक्षी पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

खुद गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अपने भाषण में आंतरिक सुरक्षा को लेकर बढ़ रहे खतरों का जिक्र किया। शिंदे ने साफ-साफ पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया। गृहमंत्री ने यह भी माना कि हमारे सभी पड़ोसी देश हमारे साथ नहीं हैं। उन्होंने नाम लेकर कहा कि कैसे पाकिस्तान इन देशों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रहा है। गृहमंत्री ने साफ-साफ कहा कि आतंक से निपटने के लिए हमें एक एजेंसी की जरुरत है, जो पेशेवर हो और अंतर-राष्ट्रीय मापदंडों के अनुसार काम कर सके।

उन्होंने यह भी साफ किया कि केन्द्र सरकार एनसीटीसी पर राज्य सरकारों के सुझाव मानने को तैयार है। सुझावों के मद्देनजरए एनसीटीसी के प्रस्तावित प्रारुप में बदलाव किए गए हैं। उन प्रावधानों को हटा दिया गया है, जिन पर राज्यों को आपत्ति है।

लेकिन गैर-कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने न तो गृहमंत्री की सुनी और न ही संशोधनों पर विचार किया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विरोध की शुरूआत की। उन्होंने कहा कि एनसीटीसी की जरुरत नहीं। केन्द्र सरकार बड़े भाई जैसा व्यवहार कर रही है। वैचारिक रुप से भले ही मोदी से सहमत न हो, लेकिन ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता उनके साथ खड़े नजर आए।

जबकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब पहले से ही मोदी के साथ खड़े थे। आश्चर्य की बात यह है कि कुछ कांग्रेस शासित राज्यों (महाराष्ट्र-कर्नाटक) के मुख्यमंत्रियों ने एनसीटीसी पर सवाल उठाए। दरअसल समस्या यह है कि राज्य सरकारें अपने अधिकारों की तो बात कर रही हैं लेकिन आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर अपनी सीमाओं को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। संघीय ढ़ांचें में मिले अधिकारों पर अतिक्रमण की बात तो सभी कर रहे हैं, लेकिन मदद के लिए केन्द्र सरकार का ही मुंह देखते हैं।

मुंबई हमले के बाद देश को यह अहसास हुआ था कि बाहरी खतरा सीमाओं पर ही नहीं बल्कि घर के अंदर भी है। तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने 2009 में एनसीटीसी के गठन का ऐलान किया था। उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन की तर्ज पर एक एजेंसी बनाने की बात कही थी, जो किसी भी तरह के आतंक से निपटने में सक्षम हो। चिदंबरम ने एक मार्च 2012 से एनसीटीसी के गठन का ऐलान भी किया था।

लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। ओडिशा और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों ने जो विरोध शुरू किया, वह देश के करीब आधा दर्जन राज्यों तक फैल गया। पिछले दिनों में केन्द्र सरकार की ओर से सहमति बनाने की कई कोशिशें की गयी। गृहमंत्री ने खुद मुख्यमंत्रियों से बात की। उनके सुझाव भी माने।

पहले एनसीटीसी को इंटेलिजेंस ब्यूरो के तहत रखने का प्रस्ताव था। मुख्यमंत्रियों के सुझाव पर इस बदला गया। नए प्रस्ताव के मुताबिक एनसीटीसी अब सीधे गृहमंत्रालय के अधीन होगी। एक महानिदेशक स्तर का अधिकारी इसका मुखिया होगा। इसका मूल स्टाफ सीधे नियुक्त किया जाएगा। इसमें देश में कार्यरत सभी एजेंसियों से अधिकारी डेपुटेशन पर लिए जाएंगे। राज्यों को सबसे ज्यादा आपत्ति इसके सीधे कार्रवाई करने के अधिकार पर थी। अब इस प्रावधान को भी बदल दिया गया है। आतंक से जुड़ी सूचनाओं पर एनसीटीसी अब राज्यों की मदद से ही कार्रवाई करेगी। उसके अभियानों में राज्य पुलिस शामिल होगी।
इन प्रावधानों में भी केन्द्र सरकार ने बदलाव किए हैं। लेकिन राज्य उन्हें मानने के लिए तैयार नहीं हैं। राज्यों का विरोध अपनी जगह लेकिन अगर देश की जरुरत की दृष्टि से देखें तो आज एनसीटीसी की सख्त जरुरत है। आज देश का हर राज्य आंतरिक खतरों से जूझ रहा है। 23 राज्यों में नक्सलवाद है। पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद है। जम्मू-कश्मीर और पंजाब में आतंकवाद है। जो अन्य राज्य हैं, उनमें इन सबसे जुड़े तत्व मौजूद हैं। यह सच है कि ये सभी अराजक तत्व एक-दूसरे के संपर्क में हैं। इनमें आपसी गठजोड़ भी हुआ है। इससे इनकी ताकत कई गुणा बढ़ गयी है। फिर सीमा पार से इन्हें समर्थन मिल ही रहा है। राज्यों में आपसी तालमेल की कमी के चलते समस्या और गंभीर हो गयी है। ऐसे में एक ऐसी एजेंसी की सख्त जरुरत है, जो पूरे देश में एकसाथ पेशेवर ढ़ंग से काम कर सके। एनसीटीसी इस काम को बेहतर ढ़ंग से कर सकती है। नए प्रावधानों ने उसके पुराने स्वरुप को बदला है। इसलिए राज्यों को ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। अगर चिंता करनी थी तो उसय यह समय करना था, जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का गठन किया गया था। जिस अधिकार के हनन की बात राज्य कर रहे हैं, वह एनआईए के पास पहले से ही है।

हां, जहां तक इन एजेंसियों के राजनैतिक दुरूपयोग की बात है, उसे केन्द्र सरकार को आश्वस्त करना होगा। इस मामले में केन्द्र सरकार की छवि काफी खराब है। सीबीआई से लेकर ईडी तक के दुरुपयोग के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे में खुद सरकार को यह विश्वास दिलाना होगा और प्रमाणित करना होगा कि राजनैतिक दुरूपयोग नहीं होगा। दरअसल एनसीटीसी के विरोध की मुख्य वजह केन्द्र सरकार की छवि ही है।

जरुरत केन्द्र सरकार को अपनी छवि बदलने की है। शायद वह इतनी जल्दी संभव नहीं है, लेकिन इतना साफ है कि देश को आज एनसीटीसी की जरुरत है। अगर इसे ईमानदारी से लागू नहीं किया गया तो इसका खामियाजा देश की जनता को भुगतना होगा। नेताओं को नहीं, क्योंकि हमले में मरती तो देश की आम जनता है। पहली बार नेता मरे तो सब तरफ से निंदा हो रही है। प्रजातांत्रिक ढ़ांचें पर हमला मान लिया गया, लेकिन इस हमले का जवाब सिर्फ बातों और प्रस्तावों से नहीं कानून से देना होगा।

 

अरुण रघुनाथ

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