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गुरू गुड़, चेला चीनी

बन्धु मैंने तो पहले ही कहा था कि इस आदमी का मारा पानी नहीं मांगता, फिर भी आपने इस अकिंचन की बात नहीं सुनी। कितना समझाया था कि इस आदमी से पंगा मत लो, पर आपने मेरी एक नहीं सुनी। अब रोओ अपने कर्मों को। इस आदमी ने पहले आपके पैर छुए और फिर बिना साबुन-पानी के आपकी हजामत बना दी। आज का समय चाटू समय है। अगला आपको चाटता है तो आप फूल कर कुप्पा हो जाते हैं। वह दिन-रात चुपचाप चाटता रहता है और चाट-चाट कर आपको हड्डी में तब्दील कर देता है। तब चाटना उसका खेल बन जाता है। मर्जी हो तो चाटेगा, नहीं तो मुंह में दबाए रखेगा और बार-बार हड्डी को गिराएगा, पटकेगा, उठाएगा। लोगों को लगेगा कि देखो ये वफादार आदमी आपको कितना चाहता है, चाट-चाटकर अपना प्रेम जतलाता है और जब आप एक सूखी हड्डी में तब्दील हो गए है, तब भी आपको चाटे ही जा रहा है। दरअसल खाने, काटने, चबाने में वह रस है ही नहीं, जो चाटने में है। चाटते वक्त आपकी आत्मा आपकी रसना पर उतर आती है और आपको परम आनन्द की अनुभूति होती है। उसी अनुभूति में आदमी अपने गुरू को इस सत्य से साक्षात्कार कराता है कि गुरू गुड़ ही रह गया और चेला चीनी हो गया। उस समय गुरू की स्थिति गूंगे के गुड़ सरीखी हो जाती है, यह अलग बात है कि उस गुड़ का स्वाद ऐसा असह्य होता है कि गूंगे की वाणी अन्दर की बजाय बाहर की तरफ बहने लगती है और अस्फुट शब्द उभरते हैं नमक-नमक ……। दरअसल तब आपको पता चलता है कि गुड़ में कुछ न कुछ नमक भी होता है। उस नमक का व्यक्त होना स्वाद को कसैला बना देता है।
गुड़ की तुलना में आजकर चीनी की शेल्फ वैल्यू कहीं ज्यादा है। उसकी कीमत भी ज्यादा है और चमक भी। हां सफेद चीनी सेहत के लिए जितनी हानिकारक है, उतना गुड़ नहीं। चीनी का मारा आदमी इस कलिकाल में जितना डायबिटीज को प्राप्त हो रहा है उतना गुड़ का मारा नहीं। गांव का शुद्ध सादा आदमी चार-चार गुड़ के गिंदौड़े खाकर और खेतों में पसीना बहाकर सबकुछ पचा लेता है जबकी शहरी आदमी शुगर फ्री लेकर भी मोटापे और डायबिटीज की आशंका से घिरा रहता है।

गुरू भी कभी न कभी किसी का शिष्य रहा होता है और इस नाते अगर मुहावरे की भाषा का विस्तार करें तो कभी न कभी गुड़ का चीनी में रूपान्तरण भी होता होगा, लेकिन इस कलियुग में अन्तत: हर गुरू वापस गुड़ में तब्दील हो जाता है। यहीं सृष्टि का नियम है जो आजकल राजनीति में सबसे ज्यादा लागू होता है। इस आदमी ने कई केशुओं, मेहताओं, पंडयाओं और तोगडिय़ाओं आदि को पहले ही ठिकाने लगा दिया था। इसने हर उस गन्ने को खेत से उखाड़ फेंका जिसमें रस की सम्भावना और चाह थी। यह युकेलिप्टस के पेड़ की तरह जमीन का सारा पानी और हवा और धूप को सोखकर ऊंचा और ऊंचा होता चला गया। इतना ऊंचा कि लोग इसकी ऊंचाई से डरने लगे जबकि किसी को छाया देना तो इसके स्वभाव में ही नहीं था। इस अकिंचन ने तब भी आपसे कहा था कि इसे रोको जो समस्त पर्यावरण को बर्बाद करता हुआ बढ़ा चला आ रहा है। मगर बन्धु तब तुमने मेरी नहीं सुनी। इस दुनिया में हर आदमी को, हर वस्तु को अपना धर्म निभाना पड़ता है। पेड़ का धर्म फल और छाया देना है तो राजा का धर्म प्रजा को सुरक्षा देना है। युकेलिप्टस का धर्म सब कुछ को अपने लिए सोख लेना है। इस कलिकाल में प्रकृति

तो अपना धर्म फिर भी निभाती है मगर मनुष्य प्राय: गफलत में रहता है। अकड़ में वह राजधर्म नहीं निभाता। उसी के कारण अराजकता फैलती है। मार काट मचती है और बेगुनाह प्राणी मारे जाते हैं। तब कोई गुड़ गुड़ नहीं रहता और कोई चीनी चीनी नहीं रहती। सबका मानो खून-खून हो जाता है। फिर भी आप उस उस जहरीली चीनी की रक्षा में उतरे। तब आपने अपने भीतर के उस नमक की भी उपेक्षा की जो हरेक प्राणी की आत्मा में वास करता है जैसे कि गुड़ में नमक। बन्धु तब उसने आपको चाट चाटकर या तो अंधा बना दिया था या आप ही अपने स्वार्थ में अंधे हो गए थे। उसी क्षण से आपके वापस गुड़ और उसके चीनी होने की प्रक्रिया तेज हुई। फिर भी विडम्बना देखिए कि गुड़ ने चीनी को चुनौती दी और सरेआम हास्य का पात्र बना। अब सब आप पर हंस रहे हैं बन्धु। लोग समझते थे कि गुड़ चीनी का बाप होता होगा पर चीनी तो गुड़ की भी अम्मा निकली।

 

मधुसूदन आनंद

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