ब्रेकिंग न्यूज़ 

भाजपा का मोदी-मोह, आडवाणी का अड़चन

मोदी को लेकर भाजपा और संघ चाहे जितना आश्वस्त हो, एनडीए हिल चुका है। जदयू जैसा उसका पुराना गठबंधन सहयोगी एनडीए से बाहर जा रहा है। आडवाणी कम से कम इससे संतोष कर सकते हैं कि उनकी बात न मानने का संघ को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। संघ की राजनीतिक समझ का एक और दिवालियापन इतिहास में दर्ज हो रहा है।
भारतीय जनता पार्टी के लिए सन 2014 के संसदीय चुनाव की तैयारी कर रहे शीर्ष भगवा-रणनीतिकारों ने पहले ही तय कर लिया था कि इस बार चुनाव में पार्टी का चेहरा लालकृष्ण आडवाणी नहीं होंगे। पिछली बार पार्टी ने उन्हीं की अगुवाई में चुनाव लड़ा। ‘पीएम इन वेटिंग’ का जुमला भाजपा के चुनाव घोषणापत्र से भी ज्यादा चर्चित हुआ पर पार्टी को शिकस्त झेलनी पड़ी। सन 2004 के मुकाबले सन 2009 में कांग्रेस की सीटें बढ़ गईं और यूपीए को दोबारा सत्ता मिली। आडवाणी पहले की तरह संघ की पसंद नहीं थे फिर भी चुनाव में उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर सामने लाया गया था। एनडीए में भी उनके नाम पर सर्वानुमति थी। संघ न चाहते हुए भी तैयार हो गया क्योंकि तब भाजपा में ऐसा कोई नेता नहीं दिख रहा थाए जो एनडीए को मंजूर होता या कम से कम भाजपा की अपनी सीटें बढ़ाने में उपयोगी साबित होता। लेकिन विधानसभा में फिर विजय हासिल करके इस बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भगवा खेमे में अपनी हैसियत बढ़ा चुके थे। इससे पहले से वह बड़े नियोजित तरीके से अपनी नई राजनीतिक छवि का निर्माण करते.कराते रहे। उनके नए चेहरे में ‘उग्र हिन्दुत्व’ के साथ विकास पुरुष की छवि जोड़ी गई। कारपोरेट के बड़े हिस्से ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया। इसकी अभिव्यक्ति कई तरह से देखी गई। मीडिया, खासकर टीवी चैनलों में मोदी लगातार छाए रहे। अगर भाजपा भगवा खेमे को देखें तो उनके पक्ष या विपक्ष में ही सारी चर्चा केंद्रित रही। बीते एक-डेढ़ साल से उनकी इस नई छवि का निर्माण और प्रोजेक्शन चलता रहा।
लालकृष्ण आडवाणी इस मोर्चे पर पहले ही हार चुके थे। मोदी के आगे न वह ठहर सके और न उनके कथित खेमे से कोई दूसरा चेहरा भी नहीं उभर सका। सुषमा, यशवंत, जसवंत के पास न तो संघ की पुरानी पृष्ठभूमि है और न तो मोदी जैसी उग्र हिन्दुत्व वाली छवि। संघ ने पार्टी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह के जरिए मोदी के प्रोजेक्शन को जारी रखा। आज से कई महीने पहले ही राजनाथ ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘पार्टी में बहुत सारे योग्य नेता हैं। पर इसमें कोई दो राय नहीं कि आज की तारीख में नरेंद्र मोदी भाजपा के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं।’ यह राजनाथ की अपनी नहीं, संघ निर्देशित भाजपा की लाइन थी, जिसे वह लगातार मुखरित कर रहे थे। उन्हें साफ कर
दिया गया था कि मोदी की चाहे जितनी सीमाएं और समस्याएं हों, उनके अलावा फिलहाल किसी और नेता को आगे करके भारतीय जनता पार्टी सन 2014 के चुनाव में अपनी सीटें नहीं बढ़ा सकती। पर आडवाणी इस संघ-मंत्र को मानने से इंकार करते रहे। कुछ ही माह पहले उन्होंने नितिन गडकरी की पार्टी अध्यक्षता के मामले में संघ को शिकस्त दी थी, इसलिए शायद उन्हें भरोसा था कि मोदी के मुद्दे पर भी संघ उनके ना-नुकूर के बाद पीछे हट जाएगा। लेकिन इस बार संघ आडवाणी की संभावित मुहिम को लेकर पहले से चौकन्ना था। गोवा में कार्यकारिणी की बैठक से पहले और उसके दौरान यह साफ हो गया कि मोदी की स्वीकार्यता पर सबको अपनी सहमति देनी होगी। राजनाथ से लेकर मनोहर पारीकर और अरुण जेटली से लेकर गडकरी, सबने एक सुर में बोलना शुरू कर दिया। सारा कुछ दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ था पर आडवाणी उसे पढऩे को तैयार नहीं हो रहे थे। वह बीमार पड़ गए और गोवा नहीं गए। पर फैसला नहीं टला और मोदी को पार्टी के चुनाव अभियान का कमांडर घोषित कर दिया गया। योजना के तहत ही उन्हें अभी प्रधानमंत्री पद का पार्टी उम्मीदवार नहीं घोषित किया गया है। लेकिन मोदी को लेकर भाजपा और संघ चाहे जितना आश्वस्त हो, एनडीए हिल चुका है। जदयू जैसा उसका पुराना गठबंधन सहयोगी एनडीए से बाहर जा रहा है। आडवाणी कम से कम इससे संतोष कर सकते हैं कि उनकी बात न मानने का संघ को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। संघ की राजनीतिक समझ का एक और दिवालियापन इतिहास में दर्ज हो रहा है।

पर पार्टी के विभिन्न पदों से अपने इस्तीफे को लेकर आडवाणी ने संघ के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उनके सरकारी बंगले पर जाकर राजनाथ सिंह ने एलान किया कि आडवाणी जी मान गए हैं। वह सभी पार्टी पदों पर बने रहेंगे। उधर, मोदी ने भी ट्वीट किया कि लाखों पार्टी कार्यकर्ताओं के सपनों और इच्छाओं का आडवाणी जी ने आदर किया। बयान का राजनीतिक अर्थ बिल्कुल साफ है कि पार्टी कार्यकर्ता आज मोदी के साथ हैं, आडवाणी के साथ नहीं! कई गलतियां करने के बाद अंतत: आडवाणी के पास कोई चारा नहीं था। वह या तो संघ के सामने आत्मसमर्पण करते या बलराज मधोक बनकर पार्टी से बाहर होते। लालकृष्ण आडवाणी से बेहतर और कौन जानेगा कि भारतीय जनता पार्टी में बड़ा से बड़ा नेता भी संघ की नजर में गिरने के बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। दिसम्बर, 1972 में पहली बार जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और विचारक बलराज मधोक के खिलाफ कार्रवाई का ऐलान करना पड़ा था। कई महीने से पार्टी और संघ के अंदरुनी हलकों में मधोक को लेकर नाराजगी चल रही थी। पूर्व पार्टी अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी और नाना जी देशमुख ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक गुरु गोलवलकर भी बलराज मधोक के रवैये से नाराज थे। वाजपेयी-नानाजी-आडवाणी की तिकड़ी मधोक को पार्टी से बाहर करने की पूरी तैयारी कर चुकी थी, लेकिन संघ से इसकी अनुमति जरूरी थी। मौका निकालकर आडवाणी ने एक दिन गोलवलकर से दिल्ली हवाईअड्डे पर गोपनीय मुलाकात की। गोलवलकर कहीं जा रहे थे। आडवाणी ने उनसे समय मांगा तो उन्होंने कहा कि हवाई अड्डे पर ही आ जाइए। आडवाणी ने इसी मुलाकात में मधोक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए संघ का समर्थन हासिल किया। अंतत: सन 1973 के शुरुआत में ही पार्टी के संस्थापक सदस्य और तब के बड़े दिग्गज बलराज मधोक को जनसंघ से बाहर कर दिया गया।

अपनी पार्टी और संघ के इतिहास के अच्छे जानकार होने के नाते आडवाणी ने पहले की तरह इस बार भी कोई गलती नहीं की और तुरंत ‘संघम् शरणम् गच्छामि’ का रास्ता अपना लिया। उन्हें मालूम था कि संघ और पार्टी की अधिकृत लाइन न मानने का क्या हश्र होगा! लेकिन देखना होगा कि संघ-भाजपा की राजनीति का आगे का रास्ता कितना निरापद है! क्या ठिकाना भविष्य आडवाणी को सही साबित करे और भाजपा के इतिहास में संघ के भौड़े हस्तक्षेप का एक और वाकया दर्ज हो।

 

उर्मिलेश

vsemsmart.ruлобановский александр

Leave a Reply

Your email address will not be published.