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नमो नम:

गोवा में पणजी के पांच सितारा होटल मेरियट के मुख्य अहाते में 9 जून की बरसाती दोपहर में जैसे ही एक मेज और कुछ कुर्सियां लगाई जाने लगीं, वैसे ही मोदी के हिमायती और समर्थक पूरे देश में खुशियां मनाने लगे। वे सभी जानते थे कि क्या घोषणा होने वाली है। वे इस इंतजार में थे कि देखें, वह घोषणा होती कैसे है। कुछ ही मिनट पहले राजनाथ सिंह यह घोषणा कर चुके थे, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रमुख जिम्मेदारी देते हुए उन्हें भाजपा के नए युग के नेता के रूप में पहचान दी।

तीन दिन तक चले भाजपा सम्मेलन की मेजबानी करने के बाद सिंह ने दुनिया को अपना यह दबंग फैसला सुना तो दिया, लेकिन यह ऐलान तस्वीर साफ नहीं कर सका। उनकी घोषणा अस्पष्ट थी कि उन्होंने मोदी को आने वाले लोकसभा चुनाव की अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया है या इससे भी अधिक कुछ और बनाने की ओर संकेत किया है। इस बारे में उन्होंने किसी से सवाल-जवाब भी नहीं किए। पार्टी के इतिहास में इस नए अध्याय की शुरुआत होने के उपलक्ष्य में सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकय्या नायडू सहित सिंह के साथ दिखाई देने वाले पार्टी के अन्य नेताओं के चेहरों पर खुशी नहीं झलक रही थी।

इस घोषणा के साथ ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा सम्मेलन के हीरो बन गए और मीटिंग हॉल में ही रुक कर वे अपने प्रशंसकों से बधाइयां प्राप्त कर रहे थे। दूसरी ओर गोवा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से दूरी बनाए रखने वाले पार्टी के वयोवृद्ध लालकृष्ण आडवाणी से मोदी का पद ऊंचा माना जाने लगा। आधिकारिक तौर पर आडवाणी की इस बैठक में अनुपस्थिति की वजह पेट में गड़बड़ी बताई गई। संयोग से आडवाणी के 60 साल के राजनीतिक कैरियर में यह पहली बार हुआ है कि भाजपा के एक वरिष्ठ नेता होते हुए भी वह इस बैठक का हिस्सा नहीं बनें। बैठक में उनकी अनुपस्थिति कई सवाल खड़े कर रही थी, बावजूद इसके सिंह ने आगे बढ़कर ऐसा दबंग फैसला ले लिया। हालांकि गोवा की बैठक में एक भारी बहुमत आडवाणी की नाराजगी की परवाह करने के पक्ष में नहीं था। उनका मानना था कि उनका (वाजपेयी-आडवाणी) युग बीत चुका है।

गोवा मोदी के लिए दूसरी बार भाग्यशाली साबित हुआ है। पहली बार गोधरा दंगों के तुरंत बाद अप्रैल 2002 में जब वह अपनी कुर्सी बचाने में सफल होने के साथ ही बैठक के बाद अधिक शक्तिशाली होकर उभरे थे। दंगों के बाद मोदी की ढाल बनने वाले आडवाणी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कोपभाजन से मोदी को इसी गोवा में बचाया था। उन्होंने मोदी से पहले मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिलवाकर बड़े ही नाटकीय ढंग से उस इस्तीफे को वापस करवा लिया। राज्य विधानसभा का विलय कर दिया गया, चुनावों की घोषणा कर दी गई और मोदी को स्वयं व पार्टी के लिए चुनाव जीतने का काम सौंप दिया गया।

ऐसा ही दूसरा बड़ा अवसर 11 साल बाद अब आया, जब उन्हें आधिकारिक तौर पर चुनाव समिति का अध्यक्ष घोषित किया गया।

दुर्भाग्यवश इस बार, एक समय उनके पथप्रदर्शक रहे, आडवाणी ने इस कदम का विरोध किया, लेकिन पार्टी और संघ ने उनकी अनदेखी कर दी। यह दबाव पार्टी के निचले स्तर से बनाया गया था, जिसने उन्हें अघोषित तौर पर ही सही, पार्टी का नेता बना दिया। बाद में शाम को पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने इस सत्य को दोहराया भी।

पिछले कुछ दिनों के दौरान घटी इन घटनाओं में मोदी के लिए दो सकारात्मक बातें हुईं। पूरे देश में जमीनी स्तर पर काम करने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं से उन्हें अभूतपूर्व समर्थन हासिल हुआ और संघ की ओर से भारी समर्थन भी मिला। पार्टी के अंदर-बाहर सभी मोदी का नमो जाप जप रहे हैं। पार्टी से सहानुभूति रखने वाली बाहरी शक्तियों में मोदी की स्वीकार्यता में अचानक हुई वृद्धि की वजह से वह उगते सूर्य की भांति नजर आ रहे हैं।

गोवा बैठक में आए ज्वार-भाटे के दरम्यान उनके आलोचकों को भी उनमें संभावनाएं दिखाई देने लगी। वह मोदी के मार्ग में अवरोध खड़े करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आडवाणी पर बरसे। मोदी का आभामंडल काम करता प्रतीत होने लगा। हाल के उपचुनावों के परिणाम भी मोदी के समर्थकों का मनोबल बढ़ाने वाले थे। अब तक हिंदुत्व के पोस्टर ब्वाय और विकास के दूत कहलाने वाले मोदी ने ओबीसी के नेता के रूप में एक नया अवतार लिया है। राज्य में अपेक्षाकृत कम संख्या में मौजूद इस समुदाय के पहले प्रभावशाली नेता के रूप में मोदी सामने आए हैं। मोदी की यह छवि गोबर पट्टी में अच्छी पकड़ बना सकती है।

इस प्रचार और उत्साह के तले कड़वी सच्चाई यह है

कि पार्टी का संगठनात्मक स्वास्थ्य खस्ताहाल हो चला है। उन्हें पार्टी के ऐसे जिद्दी बुजुर्ग से निपटना पड़ेगा, जो किसी भी तरह केशुभाई पटेल बनने को तैयार नहीं हैं। मोदी, राजनाथ सिंह और उनके समर्थकों का दल अभी गोवा में ही डटा हुआ था। आडवाणी संगठन में अचानक किए जा रहे उनके हाशिएकरण से निपटने पर विचार कर रहे थे।

विडंबना यह है कि सन् 2002 के बाद पूरे एक दशक के दौरान भाजपा के एक अंदरूनी खेमे और बड़ी संख्या में बाहरी तबके द्वारा लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना इसलिए होती रही है क्योंकि वह मोदी के संरक्षक और उत्साह बढ़ाने वालों में से थे। शुरूआत में मोदी को मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने और पार्टी के अंदर-बाहर उन पर होने वाले प्रहारोंं को झेलने के लिए आडवाणी के संबल की जरूरत पड़ती रही। इसके बाद मोदी ने तरीके से गुजरात में पार्टी और संघ परिवार में मौजूद अपने प्रतिद्वंद्वियों का सफाया कर दिया। उस समय भाजपा के संगठनात्मक मामलों में आडवाणी की तूती बोलती थी।

2005 में जिन्ना-विवाद के बाद आडवाणी को मोदी के समर्थन की उससे ज्यादा जरूरत पड़ी, जितनी मोदी को आडवाणी के समर्थन की थी। भाजपा के इस शिखर पुरूष ने मोदी को एक नेता, दृष्टा और कुशल प्रशासक के रूप में प्रतिष्ठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने सपने को साकार करने के लिए उन्हें मोदी की जरूरत थी। इस दौरान मोदी उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में उभरे। मोदी के प्रति जबरदस्त झुकाव के लिए तब आडवाणी की काफी आलोचना हुई। जबकि 2013 की गर्मियों में मोदी के राष्ट्रीय स्तर पर उभरने में बाधक बनने के लिए आडवाणी को खलनायक करार देकर उनकी आलोचना की गई। यहां तक कि अपमानित भी किया गया। उन्हें अपने घर के बाहर प्रदर्शनकारियों का भी सामना करना पड़ा। एक समय पार्टी के निर्माता कहलाने वाले आडवाणी, अचानक
ही भाजपा के ऐसे नेता बन गए, जिन्हें आज पार्टी की हर खामी के लिए उत्तरदायी ठहराया जा रहा है। फिर चाहे वह कनार्टक की हार हो या मोदी का उत्थान या फिर कोई और मामला।

पिछले एक सप्ताह के दौरान भाजपा के इस बुजुर्ग के पास बहुत कम विकल्प बचे थे-शायद कुल मिलाकर तीन विकल्प-अपनी स्थिति में चुपचाप घुटते रहें, नामोनिशां छोड़े बिना गुम हो जाएं या राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दें। या फिर जबरदस्त झटका देते हुए दूसरों को यह अहसास करा दें कि चाहे वह 86 वर्ष के क्यों न हो गए हों उनके साथ इस तरह का व्यवहार नहीं किया जा सकता है। वह अस्त तो होंगे, लेकिन अपनी शर्तों पर। ताकि शेष निर्णय इतिहास कर सके। उनके बारे में हालांकि मत भिन्नता तो हो सकती है, फिर भी उनकी छवि खुशामद पसंद बुजुर्ग की नहीं है। पार्टी के दिग्गज महारथी रणनीतिकार और घायल शेर बने हुए आडवाणी ने अपनी ही पार्टी को झटका देने का निर्णय लिया।

उन्होंने भाजपा में अपने निकटस्थ सहयोगियों से भी अपने जवाब के बारे में चर्चा नहीं की और मोदी के उत्थान के 20 घंटे से भी कम समय में आडवाणी के निजी सचिव दीपक चोपड़ा ने पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह को पार्टी मुख्यालय में उनका हस्ताक्षरित पत्र प्रेषित किया। आडवाणी ने क्या खोया या पाया? यह बहस जारी रहेगी। लेकिन उनके इस्तीफे के बाद की घटनाओं ने पार्टी के उत्साह पर पानी फेर दिया। आडवाणी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत की सलाह पर अपना इस्तीफा तो वापस ले लिया, लेकिन भाजपा के आंदरूनी मतभेद जगजाहिर हो गए। इससे बाहर यह स्पष्ट संदेश गया कि मोदी अब तक पार्टी के निर्विरोध नेता नहीं बन सके हैं। उनके सामने अभी बहुत सी चुनौतियां हैं, और उन्हें पार्टी और संघ परिवार के भीतर कई प्रभावशाली खेमों से निपटना होगा।

यहां तक इस प्रकरण ने पार्टी से वैचारिक समभाव रखने वाले सहयोगी दलों-शिव सेना और अकाली दल के उत्साह पर भी पानी फेर दिया है। हाल यह है कि अब एनडीए गठजोड़ की बात कोई नहीं कर रहा, बल्कि एनडीए घटकों के अलग होने की ही चर्चा हो रही है। भाजपा में उत्पन्न इस 30 घंटे के संकट के दौरान सिर्फ एक ही व्यक्ति को सबसे ज्यादा लाभ हुआ। पार्टी के मुख्य वैचारिक अगुआ और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत। दुर्भाग्यवश आडवाणी ने हमेशा ही भाजपा पर संघ के नियंत्रण का विरोध किया, विशेष तौर पर 2005 के जिन्ना-प्रकरण के बाद आरएसएस द्वारा भाजपा को अपने तरीके से नियंत्रित करने के प्रयास का।

ठीक जिस समय मोदी नर्मदा पर लौह पुरुष सरदार पटेल की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी प्रतिमा का अनावरण करने की योजना बनाकर अपनी छवि सुधारने के प्रयास कर रहे थे, उन्हें एक और झटका लगा। इस बार यह झटका आशानुरूप जनता दल (यू) की ओर से था। इस बात की उम्मीद तो की जा रही थी, लेकिन यह विरोध इतनी जल्दी सामने आएगा, इसकी उम्मीद बिहार के भाजपाइयों तक को नहीं थी। एनडीए की टूट और इसके सबसे मूल्यवान साथी जद (यू) का अलग होना, एक और राज्य बिहार से हाथ धोने के समान है। नितीश कुमार 16 जून के बाद कभी भी जद (यू) के अलग होने की घोषणा कर सकते हैं।

एक वरिष्ठ जद (यू) नेता का कहना है कि भाजपा से अलग होने का निर्णय पहले ही लिया जा चुका है। अब केवल औपचारिक रूप से इसकी घोषणा होनी शेष है। हमें यह कह कर मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है कि मोदी को सिर्फ 2014 के चुनावों के लिए चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। सच यही है कि यह अप्रत्यक्ष रूप से उनकी ताजपोशी ही है। आडवाणी जी का इस्तीफा और उसके बाद के घटनाक्रम हमारे इस मत को और पुष्ट ही करते हैं। हम सभी उनकी एक नेता और एनडीए के संस्थापक के तौर पर सम्मान करते हैं। हमारे लिए एनडीए में बने रहने का कोई कारण नहीं है। हमारा निर्णय नीति के अनुरूप ही है, जिसके अनुसार अगर नरेन्द्र मोदी भाजपा के मुखिया बनते हैं तो उनके साथ नहीं जुड़े रह सकते। इस समय हमारी मंशा अपनी नीति पर अटल रहने की है, चाहे हमारी राज्य सरकार रहे या न रहे। ऐसे बहुत से लोग हैं जो सिद्धांत के मामले में हमारा समर्थन करेंगे।

बिहार भाजपा के नेता हालांकि इस दावे को खारिज करते हुए कह रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में ‘मोदी-मेनियाÓ पूरे राज्य को अपने प्रभाव में ले लेगा, लेकिन सच यही है कि अगर जद (यू) भाजपा से अलग होता है तो उन्हें एक श्रंृखला में पांचवे राज्य से भी हाथ धोना पड़ेगा। गठजोड़ की राजनीति के इस दौर में 17 साल पुराने एक साथी को खोना, कोई अच्छा लक्षण नहीं है।

मोदी के समर्थकों के हौंसले फिर भी बुलंद हैं। उनका विश्वास है कि गोवा में उत्पन्न ज्वार-भाटे से उभर कर वह नई दिल्ली के रायसीना हिल्स तक के अपने सफर में बीच की सभी बाधाओं को दूर करने में सफल होंगे। आखिर पहली बार कोई नेता निचले स्तर के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के दबाव के चलते उठ कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा है, न कि किसी अदालती आदेश या दोस्ताना सहयोग के।

 

दीपक कुमार रथ

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