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भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक मोड़

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार की कमान सौंपे जाने ने भारतीय राजनीति में उथल पुथल मचा दी है। यह भूचाल केवल भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं बल्कि, अन्य राजनीतिक दलों में भी आया हुआ है। मोदी से लगभग सभी हिले हुए दिखाई देते हैं। भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरूष माने जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी की बौखलाहट और बेचैनी से ”बिल्ली के भागों छिंका टूटता देख” ममता, नवीन पटनायक, नीतीश सभी उनकी तरफ लपकने को तैयार दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस ”तेल देखो, तेल की धार देखो” की नीति अपनाए है। सभी अपने पत्ते छाती से चिपकाए छिपाते फिर रहे हैं। वैसे इसे दूर की कौड़ी ही कहा जाएगा, लेकिन तीसरा ही नहीं बल्कि ”संघीय मोर्चा” बना कर आडवाणी के समक्ष ”प्रधानमंत्री पद” की गाजर लटका कर वे उन्हें अपनी ओर खींचने की कोशिश करने पर विचार कर रहे हैं।

”गाजर” लपकने से पहले आडवाणी को उसमें छिपे कांटे की जांच जरूर कर लेनी चाहिए। ‘गाजर’ लटकाने वाले सभी नेता प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में हैं, और इन नेताओं की ओर से यदि कोई प्रस्ताव आता है तो आडवाणी को उस प्रस्ताव के निहितार्थ पर जरूर विचार कर लेना चाहिए, क्योंकि यदि मुलायम-मायावती सहित तीसरे मोर्चे अथवा चौथे मोर्चे के कर्णधार ये नेता आडवाणी की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए आज तैयार दिखाई दे रहे हैं, तो वे सब 2009 में कहां थे, जब आडवाणी ”वेटिंग-इन-प्राइम मिनिस्टर” जैसे 2009 में चुनाव मैदान में उतरे थे।

लंबे समय से एनडीए से निजात पाने की फिराक में बैठे नीतीश कुमार इसे स्वर्णिम अवसर मान कर बिहार में अपनी सरकार बचाने की जुगत में लग गए हैं। नीतीश अर्से से अल्पसंख्यकों को रिझाने के लिए 17साल पहले बनी एनडीए से पीछा छुड़ाने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन बिहार में नीतीश सरकार बीजेपी की बैशाखियों पर चल रही है। नीतीश को नई बैशाखी मिल गई तो वह बीजेपी को झटकने में एक क्षण की देर नहीं लगाएंगे। मोर्चा बनाने की तैयारी में उन्होंने अपने दूत के रूप में जद (यू) के महासचिव के.सी. त्यागी को ममता के पास भेजा है। खुद भी ममता से बात की है। ममता तीसरे मोर्चे की बजाय ”फेडरल फ्रंट” बनाना चाहती हैं। नवीन पटनायक पहले ही ममता का साथ देने का वादा कर चुके हैं। वैसे तीसरे मोर्चे का सपना देखने वाले मुलायम और मायावती अब भी खुद को अलग खड़ा किए हुए हैं।

ताजा घटनाक्रम ने एनडीए के कुनबे का बिखराव पूरी तरह से तय कर दिया है। एनडीए का गठन बेशक भारतीय जनता पार्टी ने किया, लेकिन उसे धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनाने में हमेशा जद (यू) को सर्वेसर्वा बनाए रखा गया। पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस के बाद अब शरद यादव एनडीए के संयोजक हैं। शरद की पार्टी ही जब एनडीए को छोड़ जाएगी तो एनडीए में नए दोस्तों के आने तक तो उसकी तस्वीर क्या रहेगी, अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरूष माने जाने वाले पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ”बीमार” हो कर दिल्ली में ही बने रहे और पार्टी ने संघ से हरी झंडी लेकर गोवा में मोदी की ताजपोशी कर दी। इससे प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा धूमिल होते देख आडवाणी इतने बेचैन हो गए कि उन्होंने पार्टी के राजनीतिक माहौल को देख कर भी अनदेखा करते हुए पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र दे दिया। अपने पिछले अनुभवों को भुला कर शायद उन्हें लगा था कि उनके इस्तीफे से पार्टी में ऐसा भूचाल आ सकता है कि पूरी पार्टी उन्हें मनाने के लिए दौड़ पड़ेगी। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और मोदी के पीछे मजबूती से खड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी देख कर अनदेखा कर दिया। हश्र वही हुआ जो वह खुद जानते थे, लेकिन समझना नहीं चाहते थे।

परिणामत: उन्होंने जब अपने पीछे देखा तो वह अकेले खड़े थे। सख्त भाषा में राजनाथ सिंह को भेजे गए अपने इस्तीफे के बाद उन्हें अपना साया भी साथ खड़ा दिखाई नहीं दिया। उनके सामने केवल दो विकल्प बचे थे। एक तो वह अपने इस्तीफे पर अड़े रह कर पार्टी से बाहर का रास्ता तलाश करते और दूसरा अपना इस्तीफा वापस लेकर पार्टी में मार्गदर्शक के तौर पर किसी तरह भी बने रहते। पार्टी और भारतीय राजनीति के इतिहास से अच्छी तरह परिचित आडवाणी के समक्ष जनसंघ के अध्यक्ष बलराज मधोक सहित अनगिनत उदाहरण थे जिनके परिणाम उनके सामने थे। उन्हें ”ताहि विध रहिए, जेहि विध राखे संघ” के अनुरूप पार्टी में बने रहने के मूल मंत्र-”संघम् शरणम् गच्छामी” को अपनाने में ही उन्हें अपना हित लगा।

पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में भाग लेने के लिए आडवाणी इस बार गोवा तो नहीं गए, लेकिन उस दौरान उन्होंने अपने ब्लॉग में महाभारत के कई प्रसंगों का जिक्र करते हुए पार्टी की उपमा द्रौपदी से, खुद की तुलना भीष्म पितामह से और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को धृतराष्ट्र बताया।

गुजरात के नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी से बुरी तरह खफा पार्टी के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय राजनीति की दीवारों पर लिखी इबारत पढ़े बगैर ही पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र देने में जितनी देर नहीं लगाई, उससे भी जल्दी त्यागपत्र वापस ले लिया। इस पूरे घटनाक्रम में 36 घंटे भी नहीं लगे। लौहपुरूष आडवाणी ने मोदी को कमान सौंपे जाने से बौखला कर जिस उतावलेपन में त्यागपत्र दिया, उससे उनके मन की व्यथा का अनुमान लगाने में जनमानस को भी देर नहीं लगी। उस वक्त उन्हें लेकर एक वर्ग में यह सहानुभूति जरूर पैदा हुई कि जिस ”पौधे” को आडवाणी ने लगा कर सींचा और बड़ा किया, उसी ने उन्हें घायल कर इतना खूनम-खून कर दिया कि उनके पास हाशिए पर खड़े हो कर तमाशा देखने के अतिरिक्त कोई रास्ता बचा ही नहीं।

भारतीय जनता पार्टी को दो सीटों से 180सीटों तक लाने वाले आडवाणी के घाव सबको दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनकी उम्र की मजबूरी और संघ से पिछले आठ सालों से चल रही उनकी अघोषित जंग उनके आड़े आ रही है। जब पार्टी 180सीटों पर पहुंची तो अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए और 2009 में पार्टी चुनाव मैदान में ही हार गई। 84वर्षीय आडवाणी इस बार पार्टी के सत्ता में पहुंचने के लिए आस बंधाए थे, लेकिन इस बार मोदी आगे आ गए।

पार्टी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन और खुद नरेन्द्र मोदी के बयानों ने उनका दिल छलनी-छलनी कर दिया। उनके गोवा न जाने पर शाहनवाज हुसैन ने कह दिया कि ”200-400 लोगों की बैठक में यदि एक-दो लोग नहीं आए तो कोई बड़ी बात नहीं होती।” दूसरी ओर मोदी ने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की तारीफ में कसीदे पढ़ दिए-”दरिया दिली क्या होती है, सीखनी है, यह तो राजनाथ सिंह से सीखो। बाहर बैठने वाले इसे क्या जानें? बड़ा वही होता है जो दिल बड़ा रखता है।”

गोवा में आडवाणी समर्थक-लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, वैंकया नायडु आदि बैठक में मौजूद होकर भी मुंह पर ताला लगाए रहे और आडवाणी के लिए दबाव नहीं बनाया। इस तरह जब संघ से लेकर पार्टी में उनके ”अपनों” ने भी उन्हें उनके कोपभवन में अकेला छोड़ दिया, तो उनके पास भी बीच का रास्ता तलाशने के अलावा कोई डगर नहीं बची थी। उन्होंने अपना इस्तीफा वापस लेने में ही अपना भला समझा। इस्तीफे से आया भूचाल मोदी की ताजपोशी के फैसले पर मुहर लगा कर निकल गया।

यह वही गोवा था जहां 2002 में गुजरात दंगों के बाद हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी आरोपी की तरह पहुंचे थे। उन पर त्यागपत्र देने के दबाव की तलवार लटकी थी। पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि मोदी त्यागपत्र दें, लेकिन आडवाणी ने मोदी की ढाल बन कर उन्हें बचा लिया था। ग्यारह साल बाद अब 2013 में उसी गोवा में आडवाणी और मोदी के बीच की खाई इतनी बढ़ गई कि आडवाणी ही मोदी को सहन नहीं कर पा रहे। प्रेक्षकों का मानना है कि आडवाणी आज भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को अपने सीने में दबाए हैं और उन्हें इस बात की बेचैनी है कि जिस पार्टी को दो सीटों से बढ़ा कर सत्ता में पहुंचा दिया, वह पार्टी उनके होते हुए किसी अन्य के नेतृत्व में चुनाव में कैसे उतर रही है। वह इस परिवर्तन को सहन नहीं कर पा रहे हैं।

आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा दिया तो लोग ज्यादा नहीं चौंके। भारतीय जनता पार्टी की आन्तरिक राजनीति पर पिछले कुछ वर्षों से नजर रखने वाले लोग तो मान ही रहे थे कि यह फैसला तो होना ही था। यह कब होता और किस तरह से होता, इसे लेकर राय भिन्न हो सकती है, लेकिन ऐसा होना निश्चित था। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति से आडवाणी के इस्तीफे से तूफान केवल इसलिए आया, क्योंकि यह सही तरीके से और सही समय पर नहीं हुआ था।

वैसे यह पहला मौका नहीं था जब आडवाणी ने त्यागपत्र दे कर वापस लिया हो। लेकिन इस बार का परिदृश्य पिछले हालात से अलग रहा। इस बार जिस मुद्दे पर आडवाणी ने त्यागपत्र दिया था, उस मुद्दे पर ही उन्हें स्पष्ट कर दिया गया है कि भविष्य में पार्टी के महत्वपूर्ण मुद्दों पर बेशक उनसे भी सलाह अवश्य ली जाया करेगी, लेकिन गोवा में मोदी की जो ताजपोशी की जा चुकी है, वह निर्णय अन्तिम है, मोदी को दिया गया ताज अब वापस नहीं लिया जाएगा।

वैसे हालात बताते हैं कि आडवाणी इतनी जल्दी हार मानने वाले भी नहीं लगते। यह पार्टी में अब भी तूफान से पूर्व की शान्ति है। अपनी ताकत तोल लेने के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि आडवाणी शान्त बैठने वाले हैं।

आडवाणी ने जब अपना त्यागपत्र दिया तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की बांछें खिल गईं। इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने तो एक सरकारी बैठक के बाद विज्ञान भवन एनेक्सी में इलेक्ट्रानिक चैनल को यह बयान तक दे

डाला कि अभी चुनाव हो जाएं तो कांग्रेस अकेले दम जोरदार बहुमत ला सकती है। कांग्रेस के ही अन्य नेताओं की ओर से बयान आने लगे कि राहुल निर्विवादित नेता हैं और मोदी को तो उन्हीं की पार्टी के शीर्ष नेता ने विवाद में डाल दिया है।

गोवा में नरेन्द्र मोदी को चुनाव समिति की कमान सौंपना पार्टी का नई पीढ़ी की ओर बढऩे का एक महत्वपूर्ण कदम है। वैसे मोदी को कमान थमाना पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह का केवल अपना फैसला नहीं था। यह फैसला आम कार्यकर्ताओं की ओर से पडऩे वाले दबाव का था। पार्टी के कार्यकर्ताओं में अधिसंख्य मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी को कमान थमाना सबसे उचित विकल्प है। इसी दबाव के चलते पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में यह फैसला लिया गया।

इस फैसले के बाद लालकृष्ण आडवाणी का इस्तीफा एक तरह की खिन्नता प्रदर्शित करता है। आडवाणी को अपने राजनीतिक अनुभवों से खुद ही इन संकेतों को समझ लेना चाहिए था। उन्हें काफी पहले ही युवा लीडरशिप के लिए जगह छोड़ देनी चाहिए थी। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह जितना पहले होता, उतना पार्टी को फायदा पहुंचता। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी ने इसे लंबे समय तक लटकाए रखा। मोदी को पार्टी की चुनाव प्रचार की कमान सौंपे जाने से पहले ही आडवाणी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त कर चुके थे। वह पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए गोवा भी नहीं गए। उनके समर्थकों ने भी बैठक का बहिष्कार किया। लेकिन उनकी और उनके समर्थकों की परवाह किए बगैर जिस प्रकार से मोदी की ताजपोशी हुई, उससे साफ संदेश गया कि पार्टी मोदी के साथ खड़ी है। संघ ने सुरेश सोनी को गोवा भेज कर राजनाथ सिंह को साफ संदेश दे दिया कि आडवाणी गोवा नहीं आए तो कोई बात नहीं, मोदी की ताजपोशी नहीं रूकनी चाहिए।…और ”किसी” की भी परवाह किए बगैर ही मोदी को कमान मिल गई। उस वक्त तक कोई अनुमान नहीं लगा रहा था कि नाराज आडवाणी इस मुद्दे पर त्यागपत्र देकर पार्टी में भूचाल ला सकते हैं।

मोदी की ताजपोशी हो गई, आडवाणी ने त्यागपत्र दे दिया और वापस भी ले लिया, लेकिन राजनीतिक चिन्तक इस रहस्य को जानने की कोशिश में अब भी लगे हैं कि आडवाणी वास्तव में किस बात से खफा थे जो वह गोवा तो गए नहीं, लेकिन साथ ही अपने इस्तीफे के लिए पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सख्त चिट्ठी लिख कर अपनी नाराजगी प्रकट कर दी। आडवाणी क्या इस बात से खफा थे कि मोदी को चुनाव प्रचार की कमान सौंप दी या फिर इस बात से खफा थे कि इतना बड़ा निर्णय लेने के लिए उनकी उपस्थिति की जरूरत भी नहीं समझी गई। आडवाणी की सबसे निकटस्थ मानी जाने वाली नेता सुषमा स्वराज ने भी गोवा में बैठक के बाद हुई रैली में शामिल न हो कर अपनी नाराजगी प्रकट कर दी।
आडवाणी समर्थक अन्य नेताओं ने भी आडवाणी के साथ खड़े दिखने की कोशिश की।

इस सब के बावजूद राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आडवाणी पार्टी में केवल अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं। पार्टी उनसे नेतृत्व लेने की बजाय उन्हें उस बुजुर्ग की तरह सम्मान देना चाहती है जिसकी बात मानी तो मानी, नहीं मानी तो कोई बात नहीं। हालांकि संघ के मुखिया मोहन भागवत से आडवाणी ने बात की है, लेकिन संघ का रूख भी इससे अलग दिखाई नहीं देता। आडवाणी भी

जानते हैं कि एक सीमा से आगे हठ की तो पार्टी और संघ उन्हें ”बलराज मधोक” बनाने में देर नहीं करेंगे। आडवाणी भी केवल उस हद तक ही रस्सी खींचना चाहते हैं, जहां तक वह टूटे नहीं।

पार्टी ने 2009 का चुनाव उन्हें प्रधानमंत्री घोषित कर के ही लड़ा था, लेकिन तीन बार केन्द्र में सत्ता में आ चुकने वाली भारतीय जनता पार्टी को वह 116 से अधिक सीटें नहीं दिला पाए थे। जबकि सत्ता में पहुंचने का जादुई आंकड़ा लोकसभा की 272सीटों का है, जो 116 से बहुत आगे है।

मोदी की ताजपोशी को लौह-पुरूष के युग का अवसान माना जा रहा है। उनकी जगह मोदी ”युग पुरूष” के तौर पर इस वक्त की मुख्य विपक्षी पार्टी का नेतृत्व करने की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं। अब सचमुच सत्ता का यह युद्ध राहुल बनाम मोदी बनता दिखाई दे रहा है। यदि ऐसा हुआ तो इस बात की संभावना भी बहुत अधिक दिखाई नहीं देती कि मोदी के नेतृत्व में आडवाणी लोकसभा का चुनाव लडऩे के लिए मैदान में उतरें।

भारतीय जनता पार्टी अब पूरी तरह से मोदी और संघ के प्रभाव में है। इससे पहले आडवाणी पिछले आठ वर्षों से संघ के साथ एक हारी हुई बाजी लड़ रहे थे। पाकिस्तान की उनकी 2005 की यात्रा के बाद संघ और उनमें एक जंग होती लग रही थी। 2009 के चुनावों में सत्ता में न पहुंचने की असफलता ने उनके आत्मविश्वास को हिला दिया था।

आडवाणी के समक्ष सबसे बड़ी एक दिक्कत यह है कि शायद वह हकीकत को मंजूर नहीं करना चाहते। हर परिवार में मुखिया समय के साथ अपनी जिम्मेदारियां अपने उत्तराधिकारी को सौंप देता है और मागदर्शक बन उसकी सफलता में खुशियां खोजता है। आडवाणी ने पार्टी में अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया। मुश्किल यह है कि बदले हुए यथार्थ को वह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी तरफ मोदी के किसी व्यवहार से ऐसा नहीं लगता कि वह आडवाणी के लिए कोई विशेष आदर भाव रखते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि मोदी के मन में आडवाणी के लिए आदर भाव हो सकता है, लेकिन वह आदर भाव एक सीमा तक ही है। उन्होंने आडवाणी की नाराजगी के बावजूद अपनी ताजपोशी स्वीकार कर ली। आडवाणी के इस्तीफे के बावजूद मोदी ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे लगे कि वह आडवाणी के आशीर्वाद के बगैर एक कदम आगे नहीं चलेंगे।

आडवाणी के सामने दो ही रास्ते थे। एक तो वह पार्टी में जो हो रहा है, उसे मूक दर्शक की तरह देखते रहें। दूसरा कि वे पार्टी को पार्टी के हाल पर छोड़ दें। उन्होंने त्यागपत्र दे दिया, जिससे कुछ देर तो लगा कि शायद पार्टी में भूचाल आ गया, लेकिन संघ, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह अथवा मोदी, आडवाणी के तुष्टिकरण के लिए कुछ करने को तैयार नहीं दिखे। आडवाणी समर्थक नेता भी संघ की खींची लकीर से अधिक नहीं बढ़े और जब सब कुछ सामान्य ही चलता रहा तो आडवाणी को भी समझ आ गया कि अब वह केवल नाम के ही पार्टी के लिए मार्गदर्शक ही बने रहें तो बेहतर है।

आडवाणी के मंच पर न रहने से या रूठ कर अपना इस्तीफा भेजने से कोई खास फर्क पडऩे वाला नहीं। न ही दल के टूटने का खतरा है। यदि विभाजन होता भी है, तो भारतीय जनता पार्टी अधिक चुस्त-दुरूस्त होकर निखरेगी। कांग्रेस, साम्यवादी तथा समाजवादी पार्टियां ही नहीं, द्रविड़ पार्टियां भी विभाजन के बाद अधिक सशक्त हो कर निकली हैं।

आडवाणी आज 84वर्ष के हैं। वह अपनी उम्र के अन्य नेताओं से अधिक चुस्त हैं, लेकिन सवाल मात्र व्यक्ति की आयु का नहीं है। इस घड़ी जिस सच का अहसास आडवाणी को हो रहा है, वह बहुत पहले दीवार पर लिखी इबारत के रूप में सब के सामने जग जाहिर थी। लेकिन यदि आडवाणी ने ही उस इबारत को नहीं पढऩा चाहा तो क्या कहा जा सकता है। वैसे मोदी के आने से कांग्रेस और उसके सभी तेजतर्रार प्रवक्ता अब मोदी के निशाने पर रहेंगे।

भारतीय जनता पार्टी के आन्तरिक युद्ध में विराम लगने के बाद अब उसके मित्र दलों के गठबंधन के अंतर्विरोध सामने आने के हालात लगने लगे हैं। भाजपा के सूत्र बताते हैं कि पार्टी की सक्रिय जिम्मेदारियों से मुक्त करने का सुझाव आडवाणी को दिया जाता रहा है। आडवाणी से अनुरोध किया जाता रहा है कि वह पार्टी के अंदर बुजुर्ग और अनुभवी मार्गदर्शक की भूमिका में खुद को ढाल लें। लेकिन उनके मन से पद की महत्वाकांक्षा नहीं मिट रही थी। सन् 2005 से ही दूसरी पंक्ति के नेताओं और आडवाणी की सोच और काम करने के तरीके में एक पीढ़ीगत अंतर आने लगा था। लेकिन वह इस बात को समझने और स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो पा रहे थे। इसके बाद उनके निकटतम सहयोगियों ने मान लिया था कि उन्हें अब समझाया नहीं जा सकता।

इसे उनके विरोधी भी स्वीकार करते हुए नहीं झिझकते कि पार्टी को एक अखिल भारतीय छवि दिलाने और संगठन को देश भर में पहुंचाने का श्रेय आडवाणी को ही जाता है। उन्होंने ही मुंबई के अधिवेशन में सार्वजनिक तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की थी। उनकी राम रथयात्रा और हिंदुत्ववादी राजनीति ने पार्टी को मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में ला खड़ा किया था।

अगले आम चुनाव की धमक सभी को सुनाई दे रही है। इसके लिए पार्टी और कैडरों में नए जोश और नए उत्साह की जरूरत है। बढ़ती उम्र में यह सब कर पाना लालकृष्ण आडवाणी के लिए कठिन है। लेकिन आडवाणी खुद इससे सहमत नहीं होंगे। कर्नाटक में पार्टी सत्ता खो चुकी है। हार की वजह तलाशने के लिए पार्टी द्वारा कराई गई आंतरिक जांच की रिपोर्ट में हार की सबसे बड़ी वजह में आडवाणी का नाम है।

इसका मतलब यह नहीं कि पार्टी के अंदर उन्हें इज्जत नहीं मिल रही थी। 2005 इस बात का गवाह है कि पार्टी में आडवाणी के सम्मान में कमी नहीं थी। 2005 में पाकिस्तान में मोहम्मद जिन्ना के मामले में आडवाणी ने जो बयान दिया था, वह एक मायने में पार्टी और संघ की विचारधारा के विपरीत था। इसके बावजूद पार्टी के तमाम नेताओं ने उनमें आस्था बनाए रखी। इतना ही नहीं 2009 का आम चुनाव उनको प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश कर के लड़ा गया। वह राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के मुखिया भी रहे। लेकिन उन्हें आगे रख कर चुनाव मैदान में उतरने से पार्टी को कोई बड़ा फायदा नहीं हुआ। इसलिए 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी को बदलाव करना ही था।

वैसे मोदी को चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाने और आडवाणी के इस्तीफे के प्रकरण से पार्टी के नफे-नुकसान पर उंगली उठाने वाले लोग शायद परिवर्तित राजनीतिक परिदृश्य और माहौल को समझ नहीं पा रहे हैं। ऐसी कोई चर्चा नहीं है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़े जाएंगे। यदि वह पार्टी के चुनावी परिदृश्य और पार्टी की योजना में पहले से ही नहीं हैं, तो उनके जाने या न जाने से पार्टी को बहुत ज्यादा फर्क पडऩे वाला नहीं है। भारतीय जनता पार्टी कैडर आधारित पार्टी है। कैडर आधारित पार्टी को कैडर का समर्थन हांसिल करने वाले नेता की अगुवाई में ही चुनाव मैदान उतरना चाहिए। नरेन्द्र मोदी में अपनी तरह का एक करिश्मा है। इसे गुजरात देख ही चुका है। मोदी को कारपोरेट जगत का समर्थन भी हासिल है। वह संसाधनों को जुटा कर उसका बेहतर इस्तेमाल करना भी जानते हैं।

मोदी के समक्ष चुनौतियां
मोदी की राह इतनी आसान नहीं है। गुजरात के करिश्मे के बावजूद उन्हें पार्टी में खुद को स्वीकार्य बनाने के साथ ही राजनाथ सिंह की मदद से एनडीए के बिखरते कुनबे को संभालना होगा। पुराने साथियों को जाने से रोकने के साथ ही नए साथी तलाशने होंगे। भाजपा का खिसकता जनाधार भी संभालना होगा। विधानसभा चुनावों में भाजपा कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अपनी सत्ता खो चुकी है। पूर्वोत्तर राज्यों में पार्टी का अभी कोई नामलेवा नहीं है। अन्य राज्यों में से आन्ध्र प्रदेश (42), पश्चिम बंगाल (42), तमिलनाडु (39), ओडिशा (21), केरल (20) और हरियाणा (10) में पार्टी की उपस्थिति नहीं है। किसी भी पार्टी को यदि सत्ता में आना है तो वह जादुई 272 के आंकड़े को छूने के लिए इन 174 सीटों को नजर अंदाज नहीं कर सकती। देश के तीन बड़े राज्यों – मध्य प्रदेश (29), कर्नाटक (28) और झारखंड (14) में 41सीटों के आंकड़े को और अधिक ऊपर ले जाना होगा। उत्तर प्रदेश में तो बीजेपी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। लेकिन इस बार राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह पार्टी प्रमुख होने के नाते उत्तर प्रदेश में कितना करिश्मा दिखा पाते हैं, यह गौर करने की बात है।

मोदी करिश्माई नेता
सबसे बड़ी बात यह है कि पार्टी का आम कार्यकर्ता मोदी को बड़ी उम्मीद की नजर से देख रहा है। पार्टी कैडरों का ऐसा समर्थन और भरोसा किसी दूसरे नेता को नहीं मिला है। आडवाणी को बड़ी सहजता से इसे स्वीकार कर अपनी भूमिका खुद तय कर लेनी चाहिए। इससे उनका कद बढ़ेगा ही, कम नहीं होगा।

आडवाणी के समर्थकों ने पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं का हाल देखा ही है। आडवाणी समर्थकों का भविष्य पार्टी से जुड़ कर ही है, इसे वह अच्छी तरह जानते हैं। आडवाणी के लिए वे आर-पार की लड़ाई का जौहर करने की हिम्मत नहीं कर सकते।

वैसे आडवाणी को अपने पक्ष में एनडीए के खड़े होने की बड़ी उम्मीद थी। लेकिन एनडीए पहले ही बदहाल है। उसमें भी नीतीश की जद (यू) को छोड़ कर कोई अन्य पार्टी इसकी अन्दरूनी हालत में रूचि नहीं रखती। उनकी मजबूरी है कि राज्य में वह कांग्रेस के खिलाफ खड़ी होती हैं तो भारतीय जनता पार्टी का उन्हें साथ चाहिए है। मोदी को पूरी कोशिश करनी होगी कि एनडीए में नए साथी जुड़ सकें। ओडिशा के नवीन पटनायक ने तो मोदी की आलोचना कर उनके खिलाफ रहने के संकेत दे दिए हैं, लेकिन तमिलनाडु से मोदी के लिए अच्छी खबर हो सकती हैं। दक्षिण के इस सुदूर प्रदेश से अन्नाद्रमुक की जयललिता इस बारे में विचार कर एनडीए में मोदी के साथ आ जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं है। फिलहाल एनडीए में शिवसेना, अकाली दल और जेडी (यू) ही हैं। नीतीश कुमार को मोदी से एलर्जी है। इसलिए जेडी (यू) एनडीए से बाहर होने के लिए तड़प रहा है। एनडीए के टूटने की खबर कभी भी आ सकती है। वैसे केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का अनुमान है कि अन्नाद्रमुक की जयललिता और समाजवादी पार्टी के मुखिया पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह एनडीए में आ सकते हैं। वर्मा ने टिप्पणी की कि आडवाणी संघ को निपटा रहे हैं और संघ आडवाणी को निपटा रहा है।

इसी घटनाक्रम में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का नाम भी बार बार चर्चा में आ रहा है। कहा जा रहा है कि मोदी को आगे रख कर चुनाव में उतरना राजनाथ सिंह की कार्ययोजना का हिस्सा है। इस बात की चर्चा है कि राजनाथ सिंह की इस कार्ययोजना का पहला चरण तो जरूर मोदी के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरना है, लेकिन दूसरे हिस्से में यह है कि यदि एनडीए घटक मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार नहीं करते हैं तो उन्हें खुद (राजनाथ सिंह) को इस बात का मौका मिल सकता है कि वह आमराय से प्रधानमंत्री पद के स्वीकार्य उम्मीदवार हो सकते हैं। उस हालत में मोदी को भी उन्हें ”वफादारी” का इनाम देते हुए स्वीकार करना होगा। हालांकि 2014 के चुनावों की धमक साफ सुनाई दे रही है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की अन्तरकलह के परिणामों का उन चुनावों पर होने वाले असर का आकलन करने में अभी काफी समय है। लेकिन कांग्रेस अभी से कहने लगी है कि जो मोदी अपनी पार्टी को एक रख कर नहीं चल पाए, वह पूरे देश को एक रख कर कैसे चलेंगे। वैसे भी तर्क दिया जा रहा है कि एक राज्य चलाने में और केन्द्र में शासन करने में काफी अन्तर है। कुल मिला कर यूपीए के हाथ बटेर लग गई है। इसे बड़ा मुद्दा बना कर कांग्रेस अपना चुनावी खेल जीतने की कोशिश करेगी। वह अभी से तीसरी बार फिर सत्ता पर काबिज होने के सपने देखने लगी है। राजनाथ सिंह और मोदी के जरिए संघ इस बार पूरा जोर लगाने की तैयारी कर रहा है कि पार्टी हर हालत में सत्ता में पहुंच जाए। संघ इसकी योजना काफी समय से तैयार कर रहा है।

मोदी पर बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। आडवाणी और वाजपेयी के युग में दोनों अनुभवी और मंजे हुए नेता एक दूसरे के पूरक थे। लोग आज भी याद करते हैं जब आडवाणी के लेम्ब्रेटा स्कूटर के पीछे वाजपेयी बैठा करते थे। मोदी को नई जिम्मेदारियां मिलने से पार्टी में ध्रुवीकरण होने की संभावना अधिक तो नहीं हैं, लेकिन देश में अल्पसंख्यक जरूर पूरी तरह से पार्टी से छिटक जाएंगे। वैसे अन्दरखाने पार्टी के नेता तो पहले से ही मानते रहे हैं कि अल्पसंख्यक तो पहले ही भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं देते। 2002 के गुजरात के दंगों ने अभी मोदी का पीछा नहीं छोड़ा है। गुजरात के दंगे गाहे-बगाहे मोदी को घेर ही लेते हैं। वैसे मोदी इसे अपनी ताकत मानते हैं। लेकिन केन्द्रीय राजनीति में इनका क्या असर होगा, यह देखने वाली बात होगी। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश में अल्पसंख्यकों की भारी आबादी है। मोदी का असर वहां क्या प्रभाव छोड़ेगा, यह देखना भी दिलचस्प होगा।

अगला चुनाव मोदी बनाम राहुल बनने से मुख्य मुद्दा धर्मनिरपेक्षता हो सकता है। मोदी और राजनाथ सिंह की जोड़ी की कोशिश इन चुनावों को भ्रष्टाचार, घोटाले और मंहगाई की धुरी पर ही बांधने की होगी। इसमें कौन सफल हो पाएगा, वह गौर करने की बात है। क्योंकि यदि कांग्रेस चुनावों में धर्मनिरपेक्षता को मुख्य मुद्दा बना पाई तो मोदी को विकास पुरूष की छवि का लाभ नहीं मिल पाएगा।

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