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आडवाणी की आत्मघाती चूक

ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की प्रसिद्ध उक्ति है-”रहस्यमय गूढ़ प्रश्न में छिपी पहेली।” शीतयुद्ध के दिनों में सोवियत संघ की विदेश नीति के बारे में यह उक्ति कही गई थी। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी के अपने तीनों पदों से इस्तीफा दिया और 36 घंटे में वापस ले कर चर्चिल की इस उक्ति को जैसे पूरी तरह चरितार्थ कर दिया।
मैं आडवाणी को लंबे समय से जानता हूं। एक पत्रकार के नाते मैं पिछले दो दशकों से उन्हें कवर करता रहा हूं। मुझे उनके साथ समय बिताने का अवसर भी मिला है तब मैंने उन्हें बहुत नजदीक से जाना। वह अपने आत्म-सम्मान के प्रति बहुत सजग व्यक्ति हैं। वह आसानी से हार नहीं मानते और कठोर अनुशासन पसंद करते हैं।

उनके इस स्वभाव को देखते हुए केवल राजनीतिक रुप से नौसिखिया ही इस बात पर यकीन करेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की ”सलाह” पर आडवाणी ने अपने इस्तीफे पर दबाव न डालने की बात मान ली। इसी तरह यह मानना भी बहुत भोलापन होगा कि एक आत्म-सम्मान वाला व्यक्ति इस कोरे आश्वासन पर अपने कदम पीछे हटा लेगा और अपने अपमान को पी जाएगा कि भविष्य में दल की गतिविधियों संबंधी उनकी हर चिंता का ध्यान रखा जायेगा।

क्या यह सच है कि आडवाणी को इस्तीफा वापस लेने के बदले में कुछ नहीं मिलाए जैसा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चीख-चीख कर कह रहा है। यह निश्चित है कि 36 घंटे के नाटक में, जो सोमवार की सुबह इस्तीफे से शुरु हुआ और मंगलवार को इस्तीफा वापस लेने तक चलाए इसलिए इसमें कुछ न कुछ ऐसा है, जो आंखों को नजर नहीं आ रहा है।

आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों के संबंध में अगले कुछ सप्ताह में दल कुछ निर्णय लेगा, तब इस दुखद घटना का रहस्य खुलेगा और इससे जुड़े प्रमुख पात्रों के बारे में पता चलेगा। यह कहने की जरुरत नहीं है कि 36 घंटे के इस छोटे से धारावाहिक ने भाजपा को भारी क्षति पहुंचाई है।

यदि आडवाणी के दोनों कदम-इस्तीफा और उसकी वापसी के बाद घटनाक्रम ”पहेली” हैं तो इस पूरे दल के नेतृत्व द्वारा उठाए गए कदम, यदि नरम शब्दों में कहें तो अपर्याप्त और गैर-पेशेवर थे। मुझे आश्चर्य है कि राजनाथ सिंह जैसे सजग व्यक्ति ने यह कैसे कह दिया कि आडवाणी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की सलाह पर इस्तीफा वापस ले लिया।

इस बयान से इस पुराने संदेह की पुष्टि हो गई है कि संघ भाजपा को अपनी शर्तों पर चलाता है। इसकी पुष्टि किसी और ने नहीं, भाजपा के अध्यक्ष ने की है। संभवत: आडवाणी के इस्तीफे के बाद घटी घटनाओं से भाजपा का नेतृत्व बुरी तरह हिल गया था।

यदि इस्तीफा देना आडवाणी के लिए गलत था तो उनका निर्णय पार्टी के अध्यक्ष को लिखे पत्र को मीडिया में जारी करना और भी दुर्भाग्यपूर्ण था। आडवाणी सदैव इस सिद्धांत को मानते रहे हैं कि पार्टी के आंतरिक मामलों को मीडिया में नहीं लाना चाहिए, क्योंकि इससे दल की छवि और विश्वसनीयता को भारी क्षति पहुंचती है। इसलिए अपने पत्र को मीडिया में देना, ऐसा काम है जो आडवाणी के लिए उचित नहीं है। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसका उत्तर आडवाणी और सिर्फ आडवाणी ही दे सकते हैं। यह आसानी से ब्लैकमेलिंग कही जा सकती है, आडवाणी ने इससे पहले कभी ऐसा नहीं किया।

2005 में जिन्ना प्रकरण से लेकर 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में एन.डी.ए. की पराजय तक आडवाणी ने अनेक काम ऐसे किये, जो आडवाणी की छवि से मेल नहीं खाते। जिन्ना प्रकरण ने कट्टर सैद्धांतिक छवि वाले व्यक्ति की धार कुंद कर दी। हाल में उन्होंने मध्य प्रदेश और गुजरात के मुख्यमंत्रियों की तुलना करके कैडर को चौंका दिया। एक दल का हृदय, मस्तिष्क, रीढ़ रहा कोई व्यक्ति इतना पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण कैसे हो सकता है?

हम में से कुछ लोगों को जानकारी है कि भाजपा के अंदर क्या हो रहा है। उन्हें पता है कि नेता के रूप में आडवाणी के पैरों के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है और कैडर उन्हें छोड़ कर जा रहा है। केवल एक या दो लोगों को छोड़कर, जो अपने स्वार्थ और निजी हित के लिए उनके इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं और कोई उनके पास नहीं फटकता। पार्टी के टिकट या चुनाव प्रचार तक के लिए कोई उनके पास नहीं जाता।

यह साफ है कि यह समय मोदी का है, जैसे 1990 में रथयात्रा के दौरान आडवाणी का समय था। ”उस विचार और व्यक्ति को कोई रोक नहीं सकता, जिसका समय आ गया है”- यह पुरानी कहावत है। आडवाणी जैसे अनुभवी और समझदार व्यक्ति को इसे समझना चाहिए। वह छोटे और स्वार्थी लोगों से घिरे हैं। यह उनके लिए और दल के लिए खतरनाक है। ”छोटे मन से कोई बड़ा काम नहीं होता, टूटे दिल से कोई खड़ा नहीं होता”-यह अटलजी का कथन है। यदि वह अपने वरिष्ठ सहयोगी के कथन पर चले होते तो उन्हें आज ये दिन नहीं देखने पड़ते।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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