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विश्व धरोहर बने राजस्थान के 6 किले राजस्थान को मिली अंतर्राष्ट्रीय पहचान

कुंभलगढ़ का किला समुद्रतल से ३,५०० फीट की ऊंचाई पर है। चीन के बाद विश्व में सबसे लंबी दीवार की बात की जाए तो कुंभलगढ़ का ही नाम आता है। इसकी 10.8 कि.मी. दुर्लभ ऐतिहासिक प्राचीर ही इसकी विशेषता है, जिस पर तीन-चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। किले की प्राचीर नियमित अंतराल पर बनी सुदृढ़ बुिर्जयों से सुरक्षित है। इस किले में प्रवेश के लिए कई विशाल द्वार बने हुए हैं।
‘गढ़ तो चित्तौडग़ढ़, बाकी सब गढ़ैया… ‘ वीरता और बलिदान के लिए चित्तौडग़ढ़ पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। त्याग की इस भूमि पर बना चितौडग़ढ़ का किला स्थापत्य कला की दृष्टि से अपने आप में अनूठा है। इस किले के साथ-साथ चारों ओर से मरुस्थल से घिरा जैसलमेर दुर्ग भी स्थापत्य कला का अप्रतिम उदाहरण है। राजस्थान में दुर्ग निर्माण की एक समृद्ध परंपरा रही है। इसी के चलते पूरा राज्य बेजोड़ इमारतों से भरा हुआ है। राजस्थान का हर किला अपने आप में एक विशिष्ट पहचान रखता है। यूनेस्को ने राजस्थान के छह किलों को विश्व धरोहर का दर्जा देकर, इस राज्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। हालांकि इसका अंतिम निर्णय जून में होने वाली मीटिंग में तय होना है।
शौर्य गाथाओं से समृद्ध इतिहास और विशाल राजसी वैभव के साक्ष्यों की वजह से राजस्थान हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र रहा है। इसके आकर्षण में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की पहल ने चार चांद लगा दिए हैं। विश्व धरोहर की इस सूची में चितौडग़ढ़ का किला, सवाई माधोपुर का रणथंभौर किला, राजसमंद का कुंभलगढ़ किला, जैसलमेर का किला, जयपुर का आमेर किला और झालवाड़ का गागरोण किले का नाम है। राजस्थान के ये सभी किले अभेद्य दुर्गों की श्रेणी में आते हैं, जिन्हें सैन्य दुर्ग भी कहा गया है। सैन्य दुर्ग शैली में बने होने और इनके शौर्यपूर्ण इतिहास के कारण ही यूनेस्को ने इन किलों का चयन किया है। वैसे भी दुर्ग का महत्व सेना से जुड़ा हुआ है। युद्ध कला में दक्ष सेना के बिना दुर्ग वैसा ही है, जैसे बिना प्राण का शरीर।कंबोडिया में यूनेस्को और वल्र्ड हैरिटेज काउंसिल की ओर से राजस्थान की इन छह हैरिटेज साइट्स को वल्र्ड हैरिटेज साइट्स में शामिल करने की घोषणा हो गई है। भारत से इस बार राजस्थान के एक साथ छह दुर्गों का चयन हुआ है, जो देश और राज्य दोनों के लिए बड़ी उपलब्धि है। हालांकि वल्र्ड हैरिटेज में शामिल होने से देश और राज्य को किसी भी तरह का फंड या राशि नहीं मिलती है, फिर भी इन धरोहरों की पहचान वैश्विक स्तर बढ़ जाती है। इससे पर्यटन उद्योग को काफी लाभ होता है। इन स्मारकों में जैसलमेर, चित्तौडग़ढ़, रणथंभौर और कुंभलगढ़ इन चार किलों का संरक्षण भारतीय पुरात्व
सर्वेक्षण करता है, जबकि बाकी दो आमेर और गागरोण किलों का संरक्षण राज्य सरकार करती है। ये किले 8वीं सदी से 19वीं सदी के बीच बने हैं, जो राजपूताना शैली को चित्रित करते हैं।23 स्थल हुए विश्व धरोहर
राजस्थान सरकार ने इन किलों में से पांच किले के बारे में विस्तृत विवरण तैयार कर 2011 में ही विश्व विरासत केंद्र को भेजा था, लेकिन यह किले सूची में शामिल नहीं किए गए थे। इस बार जैसलमेर के किले को शामिल कर नए सिरे से किलों के वैभव का विस्तृत विवरण एक बार फिर भेजा गया और अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल परिषद् की सिफारिश पर यूनेस्को ने इन छहों किलों को अपनी सूची में शामिल कर लिया। केन्द्रीय संस्कृति मंत्री चंदे्रश कुमारी कटोच द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, हिमाचल के कुल्लू मनाली स्थित हिमालय नेशनल पार्क को भी यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन यूनेस्को ने इसे स्वीकार नहीं किया था। अगले वर्ष गुजरात के पाटन में स्थित रानी का बाग सहित इसे एक बार फिर यूनेस्को के विश्व धरोहर सूची में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा जाएगा। पिछले वर्ष पश्चिमी घाट को यूनेस्को ने अपनी विरासत सूची में शामिल किया था। अब तक देश के कुल 23 स्थल विश्व विरासत की सूची में शामिल हो चुके हैं, जिनमें से 19 इमारतें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित हैं और शेष प्राकृतिक स्थल हैं।जब भी यूनेस्को को अपनी साइट के बारे में ब्यौरा दिया जाता है, उसमें इमारत का असाधारण वैश्विक महत्व बताना होता है। मिसाल के तौर पर आमेर किले का असाधारण महत्व उसका जल प्रबंधन है। वहीं चित्तौडग़ढ़ किले में अलग-अलग भवनों का समूह उसकी एक खासियत है। इन दुर्गों के सूचीकरण में जयपुर की इतिहासकार व पुरातत्वविद् रीमा हूजा भी शामिल हैं। उन्होंने सरकारी नुमाइंदों और कंजर्वेटर आर्किटेक्ट के साथ इन इमारतों की रिपोर्ट लिखी है। उनका कहना है कि ये सभी किले अपने आप में परिपूर्ण हैं। बतौर एक श्रृंखला, यूनेस्को में शामिल करने के बाद इन किलों की खूबसूरती दुनिया के सामने और उभरकर आएगी।
जब किसी ऐतिहासिक स्मारक को यूनेस्को की वल्र्ड हैरिटेज इमारत का दर्जा दिलवाना होता है, उसकी रिपोर्ट में ओयूवी लिखना होता है, जो उस इमारत का यूनिक प्वॉइंट है। इस यूनिक प्वॉइंट से यूनेस्को यह सुनिश्चित करता है कि ऐसी खूबी वाली कोई दूसरी इमारत नहीं है। जंतर-मंतर का ओयूवी प्वॉइंट इसकी सटीक गणना है, जिसे देखकर आज भी समय का सहज अंदाजा हो जाता है। इसी तरह हर किले का भी ओयूवी तय किया जाता है।विश्व धरोहर किलों की विशेषताएं: चित्तौड़ के गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम स्थल के पास एक विशाल पर्वत पर यह किला बना हुआ है। सुदृढ़ और घुमावदार प्राचीर, विशाल बुर्जें, सात वृहद् प्रवेशद्वारों ने इसे अभेद्य दुर्ग की पहचान दी है। इस किले के अंदर अनेक महल, भव्य मंदिर, कीर्ति स्तंभ, जलाशय, शस्त्रागार और कई गुप्त सुरंगें हैं। यही विशेषताएं इस किले को दूसरे किलों से ‘खास’ बनाती है।जैसलमेर का दुर्ग त्रिकूट आकृति का है, जिसमें 99 बुर्ज हैं। इसे रेगिस्तान की बालू रेत से मिलते-जुलते गहरे पीले रंग के पत्थरों को बिना चूने की सहायता के आश्चर्यजनक ढंग से जोड़कर बनाया गया है। यह अपने आप में मौलिक और अनूठी विशेषता है। यह किला चारों ओर से मरुस्थल से घिरा हुआ है।
रणथंभौर का किला बीहड़ वनों और दुर्गम घाटियों के बीच बना है, जो अपनी विशेषताओं के कारण अजेय समझा जाता था। यह विषम आकृति वाली ऊंची-नीची सात पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ है, जिनके बीच-बीच में गहरी खाइयां और नाले हैं। इसकी ऐसी विषमता ही इसकी विशेषता है, जो कहीं और देखने को नहीं मिलती।गागरोण दुर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था। झालवाड़ा में बने इस दुर्ग के निर्माण में भौगोलिक
स्थितियों का पूरा ध्यान रखा गया है। इसकी बनावट पहाड़ी की बनावट के अनुरूप ही रखी गई है, जिसके कारण दूर से यह आसानी से दिखाई नहीं देता। बनावट की यही व्यवस्था इसकी विशेषता बनी हुई है। यह किला तीन तरफ से आहू और कालीसिंध नदियों से घिरा हुआ है।कुंभलगढ़ का किला समुद्रतल से साढ़े तीन हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। चीन के बाद विश्व में सबसे लंबी दीवार की बात यदि की जाए तो कुंभलगढ़ का ही नाम आता है। इसकी 10.8 कि.मी. ऐतिहासिक प्राचीर ही इसकी विशेषता है, जिस पर तीन-चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। किले की प्राचीर नियमित अंतराल पर बनी सुदृढ़ बुर्जों से सुरक्षित है। इस किले में प्रवेश के लिए कई विशाल द्वार बने हुए हैं।आमेर के दुर्ग में राजमहल इस तरह से बने हैं कि इन महलों को ही दुर्ग का रूप दे दिया गया है। जबकि अन्य सभी दुर्गों में महल प्राचीर के भीतर समतल जमीन पर बने हुए हैं। इस दुर्ग के नीचे मावठा तालाब और दिलाराम बाग इसके सौंदर्य को और बढ़ाते हैं। आमेर वैसे तो सुंदर महलों के लिए ही प्रसिद्ध है, लेकिन इन महलों की दुर्ग के रूप में बनावट विस्मयकारी है। इस दुर्ग का जल-प्रबंधन एक मिसाल है।

प्रीति जोशी

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