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गौहर रंजीत स्टूडियो की हीरोइन ही नहीं, पार्टनर भी थी

टाइपिस्ट गर्ल के बाद चंदूलाल शाह ने गौहर को लेकर गुण सुंदरी (1927) बनाई थी। यह एक आदर्श पत्नी की कहानी है जो दिन भर घर की समस्याओं से जूझती रहती है, सास-ससुर की सेवा करती है और रात को अपनी यही समस्याएं पति के पास भी ले जाती है। पति को यह अच्छा नहीं लगता और वह रात को देर से घर आने लगता है। पत्नी उससे इसका कारण पूछती है, तो वह कह देता है कि पत्नियां पतियों से ऐसे सवाल नहीं पूछतीं।
अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म टाइपिस्ट गर्ल (1926) के लिए चंदूलाल शाह ने गौहर को लिया। सुलोचना के अलावा उस दौर की दूसरी बड़ी अभिनेत्री गौहर मनराजीवाला को भी सिनेमा में वही हैसियत मिल गई थी जो सुलोचना को हासिल थी। गौहर का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था। बचपन से उन्हें सब सुख-सुविधाएं हासिल थीं। वह हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मराठी, और गुजराती, बहुत नफासत के साथ बोल सकती थीं। नाटकों में वह शौकिया काम किया करती थीं। उनके किशोरावस्था तक पहुंचने तक परिवार का व्यवसाय बहुत बुरे दौर में पहुंच गया और उन्हें फिल्मों का रुख करना पड़ा। अपने करिअर की शुरुआत गौहर ने इंपीरियल कंपनी से की। लेकिन सही अर्थों में कोहिनूर फिल्म कंपनी ने गौहर को स्टार की हैसियत दिलाई । हालांकि इससे पहले वह इंपीरियल कंपनी, कृष्णा कंपनी आदि के लिए ‘घर जमाई’, ‘लंकानी लाड़ी’, ‘लाखो बनजारो’, ‘मुमताज महल’, ‘सम्राट शिलादित्य’, ‘सती जसमा’, ‘शीरीं फरहाद’ जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बना चुकी थी।निर्माता-निर्देशक चंदूलाल शाह से उनके बहुत करीबी रिश्ते थे। वह उनकी फिल्मों की नायिका ही नहीं, बल्कि उनके रंजीत स्टूडियो की पार्टनर भी थी। उसे सफलतापूर्वक चलाने में शाह के साथ-साथ गौहर की भी बड़ी भूमिका रही।टाइपिस्ट गर्ल के बाद चंदूलाल शाह ने गौहर को लेकर गुण सुंदरी (1927) बनाई थी। यह एक आदर्श पत्नी की कहानी है, जो दिन भर घर की समस्याओं से जूझती रहती है, सास-ससुर की सेवा करती है और रात को अपनी यही समस्याएं पति के पास भी ले जाती है। पति को यह अच्छा नहीं लगता और वह रात को देर से घर आने लगता है। पत्नी उससे इसका कारण पूछती है, तो वह कह देता है कि ‘पत्नियां पतियों से ऐसे सवाल नहीं पूछतीं’। कुछ दिन बाद पत्नी अपने आप को बदलती है और सजना-संवरना शुरू कर देती है। एक दिन वह ऐसे ही संवर कर घर से निकलती है तो पति उससे पूछता है और वह उसी की भाषा में जवाब देती है, ‘पति ऐसे सवाल पत्नियों से नहीं पूछते’।

इस तरह की फिल्में बनाना उस जमाने में बहुत हिम्मत का काम था। औरत की जगह घर की चारदीवारी के भीतर मानने वाले कुछ थोड़े से, लेकिन ज्यादा मुखर लोग, आखिर उसे ऐसी गुस्ताखी करने कैसे दे सकते थे। फिल्म के रिलीज होने पर कई लोगों की भृकुटियां तनी थीं, लेकिन ज्यादातर लोगों को यह विषय अच्छा लगा। फिल्म सफल रही थी।

उसी जमाने के फिल्मकार जमशेद वाडिया कहते हैं, ‘उस समय की कहानियों में स्त्रियां घरेलू गाय की तरह अपने पतियों की आज्ञा का पालन करती थीं, और इसी में खुद को धन्य समझती थीं। इन स्त्रियों की वीरता तभी दिखाई देती थी, जब कोई खलनायक उनका शीलभंग करने की कोशिश करता था।’

फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा के अनुसार, ‘मदन थिएटर्स की पति परमेश्वर जैसी फिल्मों की नायिकाएं – पेशेंस कूपर और सिन्योरा मिनैली, ऐसी ही हिंदू अबलाओं की भूमिकाएं कर रही थीं।’

गुण सुंदरी
गुण सुंदरी गौहर और चंदूलाल शाह के फिल्मी जीवन में मील का पत्थर साबित हुई। फिल्मों में ध्वनि के आगमन के बाद चंदूलाल शाह ने एक बार फिर गौहर के साथ ‘गुण सुंदरी’ फिल्म बनाई। इस बार उन्होंने यह फिल्म तीन भाषाओं – हिंदी, गुजराती और मराठी में बनाई। तीनों भाषाओं में फिल्म ने अच्छी कामयाबी पाई।

1928 में गौहर और चंदूलाल शाह की जोड़ी ने कोहिनूर फिल्म कंपनी छोड़ दी और जगदीश फिल्म कंपनी के लिए चार फिल्में – विश्व मोहिनी, गृह लक्ष्मी, चंद्रमुखी और राज लक्ष्मी बनाईं।

गौहर का पूरा नाम गौहर-ए-कय्यूम मनराजीवाला था। वह 1910 में लाहौर में पैदा हुई थी। गौहर को पहली बार पर्दे पर लाने का श्रेय होमी मास्टर को है, जो निर्देशक तो थे ही, अभिनेता भी बहुत अच्छे थे। वह कोहिनूर फिल्म कंपनी के लिए फिल्में बनाया करते थे। मोहनलाल दवे उन दिनों के फिल्मों के सफल लेखकों में से थे। एक बार होमी मास्टर उनकी एक कहानी पर फिल्म बना रहे थे। वह नहीं चाहते थे कि गौहर उस फिल्म में काम करें। उस प्रकरण के बारे में अपनी मृत्यु से पहले गिरीश करनाड को दिए एक इंटरव्यू में गौहर बताती हैं, ‘होमी मास्टर कोहिनूर के लिए फिल्म का निर्देशन कर रहे थे। फिल्म की कहानी मोहनलाल दवे ने लिखी थी। दवे, यूं समझिए कि अपने जमाने के सलीम-जावेद की तरह थे। दवे ही तय करते थे कि उनकी फिल्म में कौन अभिनेता काम करेगा। वह नहीं चाहते थे कि मैं इस फिल्म में काम करूं लेकिन होमी मास्टर ने मुझे बुला लिया था। मैं मेकअप करने के बाद शॉट देने के लिए कैमरे के सामने खड़ी थी, तो

मोहनलाल दवे एक ओर खड़े मुझे गुस्से से घूर रहे थे। फिल्म में दृश्य भी रोने का था। कैमरा शुरू होते ही मैं रोने लगी और बहुत देर तक रोती रही।’ 1929 में गौहर और चंदूलाल शाह ने अपने मित्र वि_ल दास ठाकुर के साथ मिलकर रणजीत फिल्म कंपनी की स्थापना की। शाह और गौहर की यह भागीदारी अगले 35 साल तक चलती रही।

रणजीत फिल्म कंपनी फिल्म निर्माण में हॉलीवुड का मुकाबला करती थी। हॉलीवुड की तरह एक चुस्त स्टूडियो प्रणाली के अनुसार ही उनके यहां काम होता था। रणजीत फिल्म स्टूडियो अगले कई साल तक मुम्बई का गौरव बना रहा। गौहर इस बारे में अपने इंटरव्यू में बताती हैं: ‘हमारे स्टूडियो में शूटिंग के तीन मंच थे और हर कार्य दिवस में तीनों में साथ-साथ काम चलता था… स्टूडियो का प्रबंध चंदूलाल के भाई दयाराम शाह देखते थे। उस समय छह सौ लोग हमारे स्टाफ में थे जिनमें एक्सट्रा से लेकर स्टार तक सभी शामिल थे… रणजीत में हम दो तरह की फिल्में बनाते थे, सामाजिक और स्टंट फिल्में। स्टंट फिल्मों का बजट सामाजिक फिल्मों से ज्यादा होता था, क्योंकि उनमें घोड़ों, राजकुमारों और राजकुमारियों की पोशाकों पर काफी खर्च होता था। स्टंट कलाकारों की भी जरूरत पड़ती थी।’

उनके पास अपने निर्देशक और अपनी नायिकाएं थीं, जिन्हें महीने की तनख्वाह मिला करती थी। रणजीत फिल्म कंपनी ने 1929 से 1932 तक तीन सालों में हर साल 12 फिल्म की रफ्तार से 36 फिल्में बनाईं। इसका एक कारण यह था कि फिल्मों में ध्वनि के आगमन के बाद मूक फिल्मों की पूरी तकनीक और उपकरण आउटडेटिड होते जा रहे थे, इसलिए इनका पूरा उपयोग करने की कोशिश की गई थी। कंपनी के पास नायिकाओं में गौहर के अलावा सुलोचना, शांता कुमारी, सुल्ताना और जुबैदा जैसी अभिनेत्रियां थीं जो उस जमाने की स्टार मानी जाती थीं। यह भी निश्चित नहीं था कि पारसी मूल की ये अभिनेत्रियां हिंदी संवाद ठीक से बोल भी पाएंगी या नहीं। निर्देशकों में नंदलाल जसवंतलाल, नानू भाई वकील, जयंत देसाई और नगेंद्र मजुमदार थे। ये सब लोग दिन-रात फिल्में बनाने में जुटे रहते थे।

 

सुरेश उनियाल

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