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हरियाणा में सैमण गांव का सिद्ध बाबा सद्गुरू का मंदिर

करीब छह शताब्दी पूर्व इस स्थान पर एक बाबा का आगमन हुआ। बाबा हमेशा राम नाम की रट लगाते रहते और दीन-दुखियों का दुख दूर करने में लगे रहते। सिद्ध बाबा सद्गुरू की ख्याति दूर दूर तक फैलने लगी। बाद में बाबा के निर्वाण के बाद इस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण कराया गया, जिसकी ख्याति पूरे देश में फैलती गयी। बताया जाता है कि सिद्ध बाबा सद्गुरू का संबंध माली गांव से था। उनका सांसारिक मोह भंग हो गया, तो वह रामनाम जपते हुए वैराग्य धारण कर गुरू की शरण में चले गए, जहां उन्हें आलौकिक शक्तियां प्राप्त हुईं।दिल्ली-हिसार रोड पर रोहतक जिला की तहसील महम केवल राजनीतिक कारणों से ही नहीं बल्कि सैमण गांव के सिद्ध सद्गुरू बाबा के मंदिर के कारण भी विख्यात है। महम से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित यह पीठ लगभग छह शताब्दी से अधिक पुरानी है। तब से यह स्थान दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। सिद्ध बाबा सद्गुरू को खाटू बाबा श्यामजी का अवतार माना जाता है। इसीलिए इस मंदिर से चढ़ावे का एक हिस्सा खाटू बाबा श्याम जी के दरबार में भी जाता है।

इस पवित्र स्थान की कथा अद्भुत है। करीब छह शताब्दी पूर्व यहां एक बाबा का आगमन हुआ था। बाबा हमेशा राम नाम की रट लगाते रहते और दीन-दुखियों का दुख दूर करने में लगे रहते। सिद्ध बाबा सद्गुरू की ख्याति दूर दूर तक फैलने लगी। बाद में बाबा के निर्वाण के बाद इस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण कराया गया, जिसकी ख्याति पूरे देश में फैलती गयी। बताया जाता है कि सिद्ध बाबा सद्गुरू का संबंध माली गांव से था। उनका सांसारिक मोह भंग हो गया तो वह रामनाम जपते हुए वैराग्य धारण कर गुरू की शरण में चले गए, जहां उन्हें आलौकिक शक्तियां प्राप्त हुईं। इस स्थान पर छह शताब्दी पूर्व घना जंगल था और आज महम चौबीसी के सैमण नाम से यहां पूरा गांव बसा है, जिसके हृदय में बने इस मंदिर में सैंकड़ों वर्ष पुरानी मूल्यवान दुर्लभ मूर्तियां हैं। शहर से लगभग आठ किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में बने इस मंदिर की घंटी गूंजते ही भक्तजन आरती के लिए मंदिर में एकत्र हो जाते हैं और बड़ी ही श्रद्धा के साथ आरती गाते हैं। लगभग एक एकड़ में फैले इस परिसर में मंदिर, रसोई, भोजनालय, अस्पताल आदि बने हैं।

खाटू श्याम जी
बाबा सतीशदास जी के अनुसार बाबा सद्गुरू का यह मंदिर खाटू श्याम जी का हिस्सा है। खाटू श्याम जी के मंदिर में शीश है, तो यहां उनका धड़ है। इस मंदिर में चढऩे वाले चढ़ावे का एक हिस्सा खाटू बाबा श्याम जी को जाता है। सैमण के बाबा सिद्ध सद्गुरू के इस मंदिर में दर्शन मात्र से ऐसे रोगों का इलाज हो जाता है, जिन पर दवा का असर नहीं होता। केवल आस-पास के गांव या हरियाणा के अन्य जिलों के ही नहीं बल्कि दूर-दराज के प्रदेशों से भी श्रद्धालु इस मंदिर में आकर अपने कष्टों को दूर करते हैं और मन की मुराद पाते हैं। यहां तक कि हरियाणा के हर राजनीतिक दल के नेता चुनावों से पूर्व श्रद्धा सुमन के साथ अपनी विजय की लालसा लिए यहां मत्था टेकने आते हैं।
मंदिर का विस्तार
इसे श्रद्धालुओं की आस्था ही कहा जाएगा, जो इस मंदिर को दिनों दिन भव्य और विशाल बना रही है। छह शताब्दी पहले बने इस छोटे से मंदिर ने यहां विशाल रूप ले लिया है। समाधि पर 51फुट ऊंचा गुम्बद है। ठाकुर जी की मूर्ति चार सौ साल से अधिक पुरानी है। तत्कालीन गद्दीनशीन बाबा मुनिदासजी ने 1976 में मंदिर के विस्तार की नींव रखी। अब यहां राहगीरों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए 25 वातानुकूलित कमरों की व्यवस्था है। प्रतिदिन यहां भंडारा चलता है। ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं भी चलाई जाती हैं। इसी क्रम में मंदिर परिसर में ही एक अस्पताल का निर्माण भी किया गया है। गांव के निवासी श्री ईश्वर कौशिक बताते हैं कि इस मंदिर में अस्पताल का निर्माण होने से पूर्व किसी ग्रामीण के बीमार पडऩे पर सात किलोमीटर दूर महम ले जाना पड़ता था। उस वक्त वहां जाने के लिए केवल बैलगाड़ी की व्यवस्था होती थी और वह भी गांव में सब के पास उपलब्ध नहीं थी। ऐसी हालत में कई बार बीमार ग्रामीण की रास्ते में ही मौत हो जाती थी। गर्भवती महिलाओं को अधिक परेशानी हुआ करती थी। 16 कमरों वाले इस अस्पताल में एक चिकित्सक और दवा देने वाले तीन कम्पाउंडर हैं। डॉक्टरों के रहने के लिए भी रसोई-बाथरूम सहित दो कमरों का सैट है। इस अस्पताल में प्रतिदिन सवा सौ से डेढ़ सौ मरीजों को दवा दी जाती है।
द्वादशी का मेला
मंदिर में प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की चांदनी की द्वादशी मनाई जाती है। फाल्गुन वाली द्वादशी को बड़ा मेला लगता है। इस मेले में कलकत्ता, मुंबई, हैदराबाद, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, जयपुर, लखनऊ, रदौली, गुनयाना मंडी, बंगलुरू, आदि प्रदेशों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्तजन यहां अपने बच्चों के पवित्र मुंडन संस्कार कराते हैं। दूध का चढ़ावा होता है।छह शताब्दी पूर्व, इस विशाल जंगल में आए सिद्ध गुरू झोंपड़ी बना कर रहा करते थे। निकट के भैणी चन्द्रपाल और भैणी सुरजन गांवों तथा अन्य आसपास के गांव के लोग उनके पास आकर धर्म चर्चा किया करते थे। कभी-कभी वे चौपड़ भी खेल लिया करते थे। एक बार कुछ ग्रामीण बाबा सिद्ध गुरू के साथ चौपड़ खेल रहे थे। चौपड़ पर पासा फेंकने की बारी बाबा की थी। लेकिन काफी देर तक उन्होंने पासा नहीं फेंका तो लोगों ने समझा कि बाबा कोई टोटका कर रहे हैं। लोगों द्वारा आग्रह करने के बावजूद बाबा ने पासा नहीं फेंका। उस वक्त बाबा आंखें बंद किए हाथों को पीछे करके उन्हें मसल रहे थे। ग्रामीणों को लगा कि बाबा यूंही खेल में पासे को मसल रहे हैं। लेकिन थोड़ी देर बाद जैसे बाबा नींद से जागे और अपने हाथों को आगे कर दिया। लेकिन बाबा ने पासे फेंकने का कोई उपक्रम नहीं किया।
चितिंत लोगों ने बाबा से पूछा-‘क्या हुआ, बाबा?’ बाबा ने पहले तो कुछ जवाब नहीं दिया, लेकिन लोगों के प्रेमवश दबाव को देखकर बाबा ने अपनी दोनों हथेलियां आगे कर दीं। जलकर काली पड़ी हुई दोनों हथेलियों को देखकर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। लोंगों ने बाबा से उनकी हथेलियां जलने का राज पूछा तो बाबा निर्विकार भाव से मंद मंद मुस्कुराते रहे। चितिंत लोगों के बार बार सवालों को सुनकर, बाबा ने बताया कि ”लखनऊ में उनके भक्त सेठ घनश्याम दास और धर्मदास के कपास के गोदाम में आग लग गई थी और मैं उस आग को बुझा कर आ रहा हूं। आग को बुझाने से ही मेरे हाथ की हथेलियां जल कर काली हो गई हैं।’
ग्रामीणों को बाबा की बात का विश्वास नहीं हुआ। लोगों ने सोचा कि बाबा उनके सामने से हिले नहीं और कह रहे हैं कि वहां से लखनऊ जाकर वह आग बुझाकर आए हैं। इतनी जल्दी बाबा लखनऊ जा कर वापस कैसे आ सकते हैं। लोगों के मन की परेशानी देख कर बाबा मंद-मंद मुस्कुराते रहे। लेकिन लोगों से नहीं रहा गया। उन्होंने बाबा पर कटाक्ष करते हुए कहा-”आप संन्यासी हो कर झूठ बोल रहे हैं?..लखनऊ जा कर इतनी जल्दी कोई कैसे वापस आ सकता है?..आप तो यहां से हिले भी नहीं हैं? ” बाबा ने कहा-”अपने मन का संशय दूर करने के लिए आप लोग लखनऊ में सेठ धर्मदास और सेठ घनश्याम दास के गोदाम पर होकर आओ..मैं तो यहीं रहता हूं..आप को यहीं मिलूंगा.. ”लोगों ने बाबा की बात की सच्चाई जानने के लिए लखनऊ जाने का कार्यक्रम बनाया। कुछ लोग
लखनऊ गए। वहां जाकर उन्होंने सेठ धर्मदास और सेठ घनश्याम दास से मुलाकात की और सच्चाई जानने की कोशिश की। सेठ घनश्याम दास और सेठ धर्मदास ने लोगों को बताया- ”कुछ दिन पहले हमारे रूई के गोदाम में जबर्दस्त आग लग गई थी। आग देख कर हम घबरा गए। हमें कुछ सूझा नहीं तो हमने बाबा सद्गुरू को याद किया और उनसे आग बुझाने के लिए प्रार्थना की।”सेठों ने बताया-”जैसे ही बाबा से हमने आग बुझाने की अरदास की, वैसे ही क्षणों में आग बुझ गई।..हमारी बात बाबा ने सुन ली और हमें बचा लिया.. ” सेठों से मिलने आए ग्रामीणों ने उन्हें बताया-”जिन बाबा सद्गुरू की बात आप कर रहे हैं..वे तो हमारे गांव में ही हैं।”

ग्रामीणों की बात सुन कर दोनों सेठ बाबा के दर्शन करने के लिए ग्रामीणों के साथ उन जंगलों में आए। बाबा को उन सेठों के आने का पता लगा तो वे अन्तध्र्यान हो गए। सेठों को बाबा के दर्शन नहीं हुए। सेठों के वहां से चले जाने के बाद बाबा फिर अपने स्थान पर लौट आए। लोगों ने उनसे अन्तध्र्यान होने का कारण पूछा तो बाबा ने उसका कारण तो नहीं बताया, लेकिन ग्रामीणों से कहा कि ”यदि सेठ पुन: यहां आएं तो उनसे कहना कि वे इस स्थान पर मेरा मन्दिर बनवा दें।”

इतना कह कर बाबा ने उसी स्थान पर समाधि ले ली। इस घटना से सिद्ध बाबा सद्गुरू के अन्दर छिपी अलौकिक शक्तियों की जानकारी आम लोगों को मिलीं। श्रद्धालु आज भी उस घटना की चर्चा बड़ी श्रद्धा और रूचि के साथ करते हैं।

सेठों को जब बाबा की इच्छा की जानकारी मिली तो उन्होंने उस स्थान पर सिद्ध गुरू बाबा की समाधि पर मन्दिर का निर्माण करवाया। कालान्तर में वह स्थान जंगलों से ग्राम में तब्दील हो गया और यह अब सैमण गांव के नाम से प्रसिद्ध है। इसी के बीच सिद्ध बाबा सद्गुरू का मंदिर है जिसके संचालन का कार्य सन् 1992 से युवा शिक्षित महन्त सतीश दास जी कर रहे हैं। दुखियों की सेवा और समाज की प्रगति का सिद्ध बाबा सद्गुरू का संदेश आगे बढ़ाने वाले महंत सतीशदास जी स्नातक हैं, जिनके कार्यों और उनके विचारों, आम जनता की सेवा के प्रति उनके प्रयासों के कारण लोगों की वही श्रद्धा महंत सतीश दास जी में है जो सैंकड़ों वर्ष पूर्व लोगों की श्रद्धा सिद्ध बाबा सद्गुरू में थी। इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। इसके संबंध में आस्था है कि बाबा की समाधि के दर्शन मात्र से लोगों के कष्ट दूर हो जाते हैं। मन्नतें पूरी होती हैं। बाबा सद्गुरू अपने भक्तों के कष्ट अपने ऊपर ले लेते हैं। हजारों-सैंकड़ों दूर बैठे भक्तों के कष्ट भी सद्गुरू बाबा हर लेते हैं। गद्दीनशीन बाबा सतीशदास जी ने बताया कि उनसे पूर्व बाबा सीताराम, रघुबीर दास, बाबा नारायण दास (बाबा कालिया), बाबा रिसालदास, बाबा मुनिदास जैसे अनेक संत गद्दीनशीन हो चुके हैं, जिन्होंने मंदिर के जरिए समाज की भरपूर सेवा की है। उन्होंने धर्म को समाज से जोडऩे के हर सद् प्रयास किए। बाबा मुनिदासजी से पहले इस मंदिर की गद्दी वैरागियों की थी। बाबा रिसाल दास वैरागी थे। बाबा मुनिदास इस मंदिर में रसोइया और भगत के तौर पर रहते थे। वह ब्राहम्ण के घर में जन्मे थे, लेकिन अनपढ़ थे। बाबा रिसालदास का शरीर पूरा हुआ तो गांववालों ने बाबा मुनिदासजी को गद्दीनशीन कर दिया। उस वक्त यह मंदिर पुराना था। 1976 में बाबा मुनिदास जी ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, जिसका सौन्दर्यीकरण आज बाबा सतीशदास जी कर रहे हैं। बाबा मुनिदासजी ने धर्म को समाज से जोडऩे और महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम आगे बढ़ाने के लिए गांव में कन्या पाठशाला बनवाई।

आजादी के बाद दंगों से गांव वालों की रक्षा का दायित्व मंदिर के गद्दीनशीन बाबा कालिया ने ले लिया था। उनके पास एक घोड़ी थी, जिस पर चढ़कर वह गांव के चक्कर लगाया करते थे। कोई भी संकट होता तो वह मंदिर में जा कर नगाड़े की थाप से गांव वालों को सचेत कर दिया करते थे। दंगाइयों से निपटने के लिए एकत्र किए गए हथियार बाद में मंदिर में ही गाड़ दिए गए थे, लेकिन गांव के लुहार की बनाई तोप की नाल और विशाल नगाड़े का ढोल आज भी मंदिर परिसर में देखा जा सकता है।

सैमाणी फोड़ा
बाबा मुनिदास के आशीर्वाद से सैमण गांव में जन्मा कोई भी व्यक्ति ऐसे फोड़े का इलाज कर सकता है, जो मनुष्य के शरीर में ऐसे स्थान पर निकला होता है जो फोड़ाग्रस्त व्यक्ति को खुद दिखाई नहीं देता। ऐसे फोड़े का मुंह भी नहीं होता। इसे सैमणी फोड़ा कहते हैं। इसके लिए इस गांव में जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्ति किसी लोहे की वस्तु से फोड़े को छू कर जमीन से छू देता है। ऐसा सात बार और लगातार सात दिन तक किया जाता है। इसे झाड़ा लगाना कहते हैं। इसमें सावधानी यह बरती जाती है कि जिस व्यक्ति के फोड़ा निकलता है, वह खुद या उसके परिवार का कोई व्यक्ति इस गांव का यदि पानी भी पीएगा, या कुछ खाएगा अथवा नहाने-धोने या कोई और सेवा के लिए इस गांव की किसी भी वस्तु या स्थान का उपयोग करेगा तो उसे उस सेवा के बदले ‘कुछ’ भी देना होगा।

 

वरूण कौशिक

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