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बाढ़ का तांडव तबाह हो गया उत्तराखंड

प्रकृति की छोटी सी करवट मानव के दीर्घकालीन श्रम को मटियामेट करने की क्षमता रखती है। 48 घण्टे में भारी वर्षा से उत्पन्न बाढ़, भूस्खलन, बादल के फटने व चट्टानों के खिसकने से 16 जून 2013 को उत्तराखण्ड में भारी तबाही का दृश्य उपस्थित हो गया है। प्रारम्भिक अनुमान के अनुसार 150 लोगों की जानें जा चुकी हैं। 500 के लगभग सड़कें व 200 के लगभग पुल ध्वस्त हो गए हैं। उत्तराखण्ड को जोडऩे वाले सभी राष्ट्रीय राजमार्गों को भारी नुकसान पहुंचा है। फलस्वरूप उत्तराखण्ड में आवागमन पूरी तरह ठप हो गया है।अनुमान के अनुसार 60 हजार लोग यहां वहां फंसे हुए हैं। इनमें से बड़ी संख्या चारों धाम के दर्शन के लिए गए यात्रियों की है। अनेक घरों व बस्तियों को भारी नुकसान पहुंचा है। पशु जीवन की भी भारी नुकसान हुआ है। यद्यपि अब तक पूरा आकलन नहीं हो सका है लेकिन उत्तराखंड का बड़ा भाग प्रलय के तांडव में तबाह हो गया है। अभी यह विवरण कस्बों व बड़ी बस्तियों को लेकर है। दूरस्थ छोटी बस्तियों और गांवों में कितनी हानि हुई है, कृषि क्षेत्र, उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों को कितना नुकसान हुआ है इसकी अभी जानकारी नही है। निश्चय ही इन क्षेत्रों में भी बहुत नुकसान हुआ है।
उत्तराखंड में आयी बाढ़ की विभीषिका का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बाढ़ में न जाने कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें बह गयीं। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बाढग़्रस्त क्षेत्रों का हवाई दौरा करने के बाद केन्द्र की ओर से 1 हजार करोड़ रूपये आर्थिक सहायता जारी किया है।
बादल फटने, ग्लेशियर टूटने और बाढ़ से प्रसिद्ध तीर्थ स्थल केदारनाथ में मन्दिर के चारों तरफ तबाही हुई है। बताया जाता है कि इस मन्दिर की स्थापना पांडवों द्वारा की गई थी और आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्धार किया था। केदारनाथ धाम तक जाने के लिए गौरी कुण्ड तक निजी वाहन अथवा बस से पहुंचा जा सकता है। केदारनाथ धाम गौरी कुण्ड से लगभग 14 कि.मी. है। यहां से पैदल अथवा घोड़ों पर यात्रा की जाती है। गौरीकुण्ड से लगभग 7 कि.मी. की दूरी पर एक छोटा कस्बा रामबाड़ा है। यहां यात्री विश्राम कर सकते हैं। इस प्राकृतिक आपदा से रामबाड़ा व गौरीकुण्ड में लगभग सब कुछ तबाह हो गया है। रामबाड़ा का नामोनिषान मिट गया है। केदारनाथ में भी मन्दिर के आसपास की बस्ती बाढ़ में डूब गई है। मलबे से मन्दिर को क्षति पहुंची है। उसका एक भाग मलबे में दब गया है। इस क्षेत्र में जानमाल का भी बहुत नुकसान हुआ है, जिसके सही-सही आलकन में समय लगेगा।
इस प्राकृतिक आपदा से गढ़वाल मंडल के रूद्रप्रयाग,चमौली व उत्तरकाशी जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। रूद्रप्रयाग में 40 होटलों सहित 73 इमारतें अलखनन्दा की उफनती धारा में बह गयीं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री की यात्रा को निकले हजारों यात्री रूद्रप्रयाग, चमौली और उत्तरकाशी जिले में फंसे हुए हैं। आपदा प्रबन्धन अधिकारियों द्वारा दी गयी सूचना के अनुसार इनमें से लगभग 27 हजार चमौली में, 25 हजार रूद्रप्रयाग में व 9800 उत्तरकाशी में में फंसे हैं। भारी भूस्खलन, सड़कें व पुल टूटने के कारण चारों धाम की यात्रा फिलहाल रोक दी गई है। अनुमान है कि अगले एक साल में भी यह यात्रा संभव नहीं हो सकेगी। कुमायू मंडल में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चम्पावत और बागेष्वर क्षेत्र में बहुत नुकसान हुआ है। यहां लगभग 150 सड़कें बन्द हैं। कपकोट, धारचुला, डीडीहाट, पिथौरागढ़, मुनस्यारी सहित तमाम इलाकों में भूस्खलन जारी है। कैलाश मानसरोवर के यात्रियों को बूदीं में रोक दिया गया है।
कुदरत के इस कहर से निपटने के लिए राज्य सरकार तथा केन्द्र सरकार ने तेजी से प्रयास आरम्भ कर दिये हैं। राहत और बचाव के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों के 10 हजार जवान व 18 हेलीकॉप्टर लगाए गए हैं। राहत सामग्री पहुंचाने के लिए वायुसेना के मालवाहक विमान भी लगाए गए हैं। सरकारी सूचना के अनुसार लगभग 10 हजार लोगों को प्रभावी क्षेत्र से निकाला जा चुका है और राहत शिविरों में भोजन व कपड़े उपलब्ध कराए जा रहे हैं। परन्तु लोग इन प्रयासों को पर्याप्त नहीं मान रहे हैं। लोग जगह-जगह पर खाना व अन्य मदद न मिलने की शिकायत कर रहे हैं।
मैदानी इलाकों में भी असर
बाढ़ के प्रकोप का असर मैदानी क्षेत्रों में भी आना प्रारम्भ हो गया है। दिल्ली में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। यमुना का जल स्तर खतरे के निशान 204.83 को पार कर 207 मी. पर पहुंच गया। पूर्वी दिल्ली के निचले इलाकों में पानी भर गया है। सोनिया विहार में पानी भर गया है। निचले स्थानों से लोगों को निकाल कर राहत शिवरों में पहुंचाया जा रहा है। शामली इलाके मे भी बाढ़ का असर दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश में भी बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो रहा है। जलभरण क्षेत्रों में व्यापक वर्षा तथा बांधों से पानी छोडऩे के कारण शारदा, घाघरा, राप्ती, बूढ़ी राप्ती, रोहिन तथा कवानों नदियों का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। लखीमपुर जिले में सुहेली नदी का जल स्तर बढ़ जाने से दुधवा नेशनल पार्क को बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। पलिया-मीरा के मध्य रेलवे टै्रक व सड़क मार्ग पर 2 फीट से अधिक पानी बहने पर रेल और सड़क पर आवागमन बन्द हो गया है। बनबसा, शारदा व गिरजा बैराज से छोड़े पानी से पीलीभीत, लखीमपुर खीरी और तराई के इलाकों में भारी तबाही मचाई है।इस तबाही में प्राकृतिक आपदा के साथ-साथ मानव के अपने कर्मों का भी योगदान है। पहाड़ों पर स्वार्थी तत्वों द्वारा, भूसंरचना की परवाह न करते हुए, होटलों तथा अन्य इमारतों का निर्माण किया गया है। फलस्वरूप भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि हुई है। शहरीकरण हेतु अन्धाधुन्ध पेड़ों का कटान हुआ है। पेड़ों की जड़ें जल को रोकने तथा उसे भूजल में पहुंचाने का महत्वपूर्ण स्रोत है। पेड़ों के न होने से यह जल भूस्तर पर नुकसान पहुंचाने का जरिया बनता है। शहरीकरण के कारण प्राकृतिक नालों में अवरोध उत्पन्न हुए हैं। जिससे जल भराव व बाढ़ की समस्याएं बढ़ जाती हैं। स्वार्थी तत्वों के जाने या अनजाने नदियों में प्रदूषण करने से नदियों की जल प्रवहण क्षमता को प्रभावित किया है। जिससे बाढ़ आने की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। निसन्देह उत्तराखण्ड में आयी तबाही में प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य का भी योगदान है।
प्रति वर्ष देश के जनजीवन को बाढ़ की त्रासदी से गुजरना पड़ता है जिसका सबसे अधिक नुकसान प्रभावित क्षेत्र के किसानों व मजदूरों को उठाना पड़ता है। किसानों की फसलों को नुकसान होता है और कृषि मजदूरों की रोजी रोटी छिन जाती है। यह विडम्बना ही है कि स्वतन्त्रता के 65 वर्ष बाद भी देश बाढ़ की समस्या का समुचित निदान नहीं कर पाया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि बाढ़ का सबसे अधिक प्रभाव उत्तर भारत के क्षेत्र को वहन करना पड़ता है। वास्तव में मानसून के कारण भारी वर्षा से गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र आदि नदियों के अत्यधिक जल प्रवाह के कारण आसपास के क्षेत्र बाढग़्रस्त हो जाते हैं। मध्य भारत भारी वर्षा तथा तत्कालिक बाढ़ से प्रभावित होता है। भारत के प्रमुख बाढ़ प्रभावी क्षेत्र रावी, यमुना, साहिबी, गंडक, सतलुज, गंगा, घाघरा, कोसी, तीस्ता, ब्रम्हपुत्र, महानदी, महानन्दा, दामोदर, मयूराक्षी, साबरमती तथा उनकी सहायक नदियों के किनारों व डेल्टा क्षेत्र के आसपास हैं।
गंगा बेसिन में उत्पन्न बाढ़ का प्रभाव मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार, प. बंगाल राज्यों में होता है। इसके अलावा शारदा, राप्ती, गंडक, घाघरा पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाढ़ उत्पन्न करती है। बिहार में प्रति वर्ष बरही, बागमती, गंडक, कमला, कोशी तथा अन्य छोटी-छोटी नदियों से भयंकर बाढ़ आती है। यमुना के कारण दिल्ली व हरियाणा में बाढ़ आती है। प. बंगाल में महानन्दा, भागीरथी, दामोदर व अन्य नदियां बाढ़ का तांडव मचाती हैं।ब्रह्मपुत्र व बराक बेसिन में ब्रहमपुत्र व बराक नदियों के द्वारा बाढ आती है। ये तथा इनकी सहायक नदियां पूर्वोत्तर राज्य असम तथा प. बंगाल को प्रभावित करती हैं। जलदखा, तीस्ता व तोरसो नदियों से प. बंगाल तथा मणिपुर का क्षेत्र प्रभावित होता है।
मध्य व दक्षिण भारत रिवर बेसिन क्षेत्र में महानदी, वैतरणी, ब्रह्मणी भारी नुकसान पहुंचाती हैं। दक्षिण व मध्य भारत में नर्मदा, गोदावरी, वापी, कृष्णा बाढ़ के लिए जिम्मेदार हैं।बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करने के निरन्तर प्रयास किए जाते हैं। परन्तु सरकार अब तक लगभग 54 प्रतिशत क्षेत्र को सुरक्षा प्रदान कर पाई है। देश में अब भी 154.17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा है, जिसको बाढ़ से बचाने के लिए सरकार कोई कदम नहीं उठा पाई है।
यह जल बाढ़ का प्रमुख कारण बनता है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि एक तरफ मानसून का 60 प्रतिशत जल व्यर्थ जाता है और दूसरी तरफ देश के अनेक क्षेत्रों में अधिक उपयोग के कारण भूजल स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। अत: देशहित में एकीकृत नियोजन कर इस जल का इस प्रकार उपयोग करने की आवष्यकता है कि भूजल स्तर की गिरावट को रोका जा सके, इसके लिए जगह-जगह पर बांधों के निर्माण व जल रिचार्ज योजनाओं को बनाकर सुनियोजित तरीके से लागू करने की आवश्यकता है। इससे भूजल स्तर में गिरावट रूकेगी और बाढ़ की समस्या में भी कमी आएगी। नदियों को उपयुक्त और वैज्ञानिक ढ़ंग से जोड़ा जाना भी इसका स्थायी हल हो सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस दिशा में कदम उठाए थे, लेकिन जल राज्य की विषय होने के कारण
वाजपेयी सरकार के प्रयासों के परिणाम शून्य ही रहे।भूमि के जल सोखने की क्षमता
शहरीकरण के कारण जहां प्राकृतिक ड्रेनेज व्यवस्था छिन्न भिन्न हुई है वहां अत्यधिक पेड़ कटने से भूमि की जल सोखने की क्षमता कम हुई है इस कारण से भी बाढ़ की घटनाओं में वृद्वि हुई है। अत: यह आवश्यक है कि शहरीकरण के समय प्राकृतिक ड्रेनेज व्यवस्था को छिन्न-भिन्न होने से रोका जाए या वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जाए। वनों के नियोजित विस्तार की भी आवश्यकता है। शहरीकरण व औद्योगिकरण के कारण नदियों में प्रदूषण बढ़ रहा है। प्रदूषण से नदियों का भूस्तर ऊपर आया है। रिसाव में कमी आयी है और जलप्रवाहन क्षमता घटी है। फलस्वरूप बाढ़ में तीव्रता आयी है। इस समस्या के स्थायी समाधान के प्रयास करने होंगे।
बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए तीन चरणों में व्यवस्था व तैयारी करने की आवश्यकता है। इनमें मानसून से पूर्व तैयारी, मानसून के सक्रिय काल में कार्यवाही और मानसून समाप्त होने के बाद की गतिविधियां पर ध्यान देना होगा। मानसून से पूर्व यह आवश्यक है कि बाढ़ सुरक्षा कार्यों तथा ड्रेन्स की आवश्यक मरम्मत करा ली जाए। जल भराव की समस्या का सामना करने के लिए जल निकासी पम्प की समुचित व्यवस्था कर ली जाए। बाढ़ सम्भावित क्षेत्रों में आवश्यक मानवीय शक्ति, साधनों व समन्वय की सुविचारित व्यवस्था कर ली जाए। सूचनातन्त्र को व्यापक व प्रभावी बना लिया जाए ताकि प्रभावित जनजीवन को समय रहते सही सूचना प्राप्त हो सके।
कतिपय नदियां कई राज्यों के क्षेत्र को प्रभावित करती हैं। इन राज्यों में समन्वय की प्रभावी व्यवस्था की जाए। आम जनता में विश्वास बनाए रखने के लिए बाढ़ से निपटने सम्बन्धी तैयारियों के बारे में समय पर अवगत कराया जाए ।मानसून की सक्रिय काल में वर्षा तथा बाढ़ सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान के लिए विकास खण्ड स्तर से राज्य स्तर तक बाढ़ नियन्त्रण केन्द्र स्थापित कर सूचनाओं का प्रसार किया जाए। यह सूचना प्रभावी ग्रामों के स्तर तक पहुंचाना आवश्यक है। इसके लिए आधुनिक संचार साधनों का उपयोग करना उपयुक्त होगा।

बाढ़ के बाद संगठित एवं समन्वित रूप से बाढ़ पीडि़तों को आवश्यक सहायता पहुंचाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। परन्तु इसमें हमारी सरकारी मशीनरी के विरूद्व लगातार शिकायतें मिलती रही हैं। उपयुक्त होगा कि जो भी विभाग सहायता कार्यों के लिए उत्तरदायी है, उनमें से प्रत्येक में हर स्तर पर एक बाढ़ आपदा प्रबन्धन इकाई हो, जो आपस में समन्वय कर आवश्यक कार्यवाही करे।

जल प्रबंधन राष्ट्रीय सूची में शामिल हो
देश में अधिकांश नदियां कई राज्यों से होकर बहती हैं। अत: बाढ़ एक राश्ट्रीय समस्या है, जिसका निदान सभी राज्यों व केन्द्रीय सरकार को सम्मिलित व समन्वित प्रयासों से सम्भव है। परन्तु इस समय जल प्रबन्धन केन्द्रीय सूची के बजाय राज्य सूची में आता है। परिणामस्वरूप राज्यों के समन्वित प्रयास प्रभावी तरीके से नहीं हो पाते। विपरीत इसके नदियों के जल की बंटवारे पर कई राज्यों में विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। बहुत समय पहले कैप्टन दस्तूर ने देश की नदियों को जोडऩे का प्रस्ताव दिया था। तत्कालीन सिंचाई मंत्री डा.के. एल. राव भी इसको आगे बढ़ाना चाहते थे। माननीय अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व में भी इस पर टास्क फोर्स बनाकर कार्यवाही प्रारम्भ की गई थी। परन्तु विभिन्न कारणों से इस प्रस्ताव पर कार्यवाही नहीं हो सकी। अन्तर-राजकीय विवादों के समाधान व नदियों के सम्यक जल प्रबन्धन के लिए यह उपयुक्त होगा कि जल प्रबन्धन को राष्ट्रीय सूची का विषय बनाया जाए।

(लेखक ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान हेतु कार्यरत -‘ग्रामीण कल्याण संस्थान’ के अध्यक्ष हैं। वह उत्तर प्रदेश परियोजना निगम के प्रबन्ध निदेशक के पद से सेवा निवृत्त हुए हैं और उन्होंने अपने सेवा काल में सिंचाई एवं जल प्रबन्धन की अनेक योजनाओं का संपादन किया है।)

इ. कप्तान सिंह

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