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नवाज शरीफ की तीसरी पारी क्या वोट को वोल्टेज में बदलेंगे?

चुनाव नतीजे आने के बाद जब यह साफ हो गया कि सरकार वही बनाएंगे, नवाज शरीफ ने भारत के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने के लिये कई उत्साहजनक बयान दिये जिसे पाकिस्तान में पसंद नहीं किया गया। हालांकि पाकिस्तान के चुनावों में पहली बार यह देखा गया कि भारत के साथ रिश्तों को लेकर कोई वोट की राजनीति नहीं की गई।मियां नवाज शरीफ ने पाकिस्तान में सत्ता की तीसरी पारी सम्भाल ली है और अब सरकार चलाने के लिये उन्हें घरेलू और विदेशी मोर्चों पर कई कटु सच्चाईयों से रूबरू होना होगा। इसके साथ ही उन्हें अपनी सोच के साथ अपने काम करने का तौर तरीका भी बदलना होगा। अपनी पिछली दोनों पारियों में वह भ्रष्ट और कुशासन देने के लिये बदनाम रहे हैं और शरीयत कानून लागू करवा कर वह पाकिस्तान को कट्टरपंथ की ओर धकेलने के लिये भी जाने जाते हैं। इस बार भी चुनाव जीतने के पहले उन्होंने पाकिस्तान तालिबान, सिपाह-ए-साहेबा और लश्कर-ए-झांगवी के साथ सांठ-गांठ कर ली थी । इसीलिए पाकिस्तान में यह पूछा जा रहा है कि क्या वह जनता द्वारा दिए गए वोट को ‘वोल्टेज’ में बदल पाएंगे? पूरा पाकिस्तान बिजली के घोर संकट से गुजर रहा है और उनके सत्ता सम्भालने के तुरंत बाद उनसे सबसे बड़ी यही अपेक्षा की जा रही है कि वह पाकिस्तान में बिजली संकट दूर करने के लिए कुछ ठोस करेंगे। यदि वाकई में उन्हें पाकिस्तान को अंधेरी गली से बाहर निकालने में कामयाब होना है तो उन्हें हर गली और हर घर को रोशन करने के लिये कुछ बड़े फैसले लेने होंगे।पाकिस्तान की पूरी राजनीति पर बिजली गिर चुकी है और अब बिजली ही नवाज शरीफ और पाकिस्तानी कौम की कामयाबी की कुंजी बनती दिख रही है। पाकिस्तान को बिजली से रोशन करने का मतलब है कि पाकिस्तान की आर्थिक और विदेश नीति में भारी बदलाव लाए जाएं। पाकिस्तान में बिजली तभी आएगी जब अरबों रुपये के निवेश से कई बिजली घर लगेंगे और अरबों रुपये लगाने के लिये न तो पाकिस्तान सरकार के पास पैसा है और न ही पाकिस्तान का कोई उद्योगपति इसके लिये तैयार होगा। पाकिस्तान का खजाना खाली हो चुका है और जब अफगानिस्तान से अमेरिकी अगुवाई वाली विदेशी सेना लौट जाएगी तब पाकिस्तान की आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता में उन देशों की सरकारों की भी विशेष रुचि नहीं होगी। पाकिस्तान का हर मौसम का दोस्त कहा जाने वाला चीन पाकिस्तान को परमाणु बम और लड़ाकू विमान व टैंक तो देता है लेकिन विकास के नाम पर पाकिस्तान में अब तक का उसका निवेश नाममात्र का ही रहा है। चीन जो सड़कें पाकिस्तान में बनवा रहा है वह उसके सामरिक हितों की पूर्ति के लिए ही है।
राजनीति या मजबूरी
चुनावी नतीजे सामने आते ही नवाज शरीफ ने भारत के संबंधों को सुधारने की बात कही थी। ‘हमने जहां धागा छोड़ा था वहीं से आगे बढ़ेंगे’ कहकर, उन्होंने 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ शुरू की गयी शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कही थी। अपने शपथ-ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बुलाने की बात कहकर उसका संकेत भी दिया था। तब दोनों देशों की जनता को लगा था कि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के संबंध सुधरेंगे।नवाज शरीफ ने शपथ-ग्रहण तो किया,लेकिन उस मौके पर ना भारतीय प्रधानमंत्री उपस्थित थे और ना ही उनका कहीं जिक्र था। शपथ-ग्रहण के दौरान दिए अपने भाषण में नवाज ने भारत का जिक्र सिर्फ आर्थिक हितों को साधने के लिए ही किया। आतंकवाद और पाकिस्तान में छिपे दाउद इब्राहिम, हाफिज सईद जैसे मोस्ट वांटेड की बात नहीं की। हालांकि नवाज से इसकी बहुत उम्मीद भी नहीं थी। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के मुखिया नवाज शरीफ ने 2013 के चुनाव में कई चरमपंथी संगठनों के साथ गठबंधन कर चुनाव जीता है। ऐसे में उन संगठनों को वे एकदम से नजरअंदाज नहीं कर सकते।नवाज शरीफ के संबंध सुधारने की हवा उनके शपथ ग्रहण और भाषण के तीसरे दिन ही दिन निकल गयी, जब 07 जून को जम्मू और कश्मीर के सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों ने सीज फायर का उल्लंघन कर दिया। पाकिस्तानी सैनिकों ने पूंछ जिले के मंडी इलाके में मोटार्रों से हमले किए। भारत ने भी जवाबी हमला किया। यह पूरी कार्रवाई लगभग तीन घंटे तक चली। पाकिस्तानी सेना के स्नाईपर्स द्वारा चलाई गयी गोली से भारतीय सेना के एक सूबेदार बच्चन सिंह की मौत हो गयी।

जाहिर है कि पाकिस्तानी सेना के राजनीतिक वर्चस्व के बीच कट्टरपंथी पार्टियों के सहयोग से सत्ता में आए नवाज शरीफ के लिए शांति का रास्ता अपनाना आसान नहीं है। माना जाता कि है कि नवाज शरीफ का पाकिस्तान सहित अफगानिस्तान के कट्टरपंथी नेताओं से मधुर संबंध हैं। ऐसे में नवाज शरीफ की भारत के प्रति चाहे जो भी मंशा हो, लेकिन इतना सत्य है कि भारत से संबंधों को सुधारने के उनकी कथनी और करनी में फर्क होगा। इस फर्क का कारण चाहे पाकिस्तानी सेना का दबाव हो या कट्टरपंथी सहयोगी दल के नेताओं का, भारत की तरफ बढऩे वाला नवाज शरीफ का रास्ता दुर्गम और कंटीला है।

– सुधीर गहलोत

इसलिए पाकिस्तान को बिजली चाहिए तो या तो उसे भारत की ओर देखना होगा या फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ओर। भारत से बिजली लेने का मतलब है कि राजस्थान और पंजाब के इलाके में बिजली की ट्रांसमिशन लाइनें लगना और मुद्रा कोष से मदद लेने का मतलब है कि उसकी शर्तें मानना। दोनों ही हालत में नवाज शरीफ की सरकार को पाकिस्तान की परम्परागत आर्थिक, विदेश और रक्षा नीति का त्याग करना होगा। भारत को सबसे पसंदीदा देश(एमएफएन) का दर्जा देना होगा और तब भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली ताकतों पर भी अंकुश लगाना होगा।चुनावी नतीजे आने के बाद जब यह साफ हो गया कि सरकार वही बनाएंगे, नवाज शरीफ ने भारत के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए कई उत्साहजनक बयान दिए, जिसे पाकिस्तान में पसंद नहीं किया गया। हालांकि पाकिस्तान के चुनावों में पहली बार यह देखा गया कि भारत के साथ रिश्तों को लेकर वोट की कोई राजनीति नहीं की गई। राजनीतिक समुदाय में यह आम राय थी कि भारत के साथ रिश्ते सुधारने हैं, इसलिए भारत विरोधी जहर भी किसी राजनेता ने नहीं उगले। लेकिन पाकिस्तान की आम जनता क्या सोचती है और क्या चाहती है, उस पर लगाम लगाने के लिए पाकिस्तान के जेहादी संगठन और सेना हमेशा तैयार रहती है।इसीलिए भारत में किसी को हैरानी नहीं हुई, जब नवाज शरीफ को पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल परवेज कयानी ने आगाह किया कि भारत के साथ रिश्तों को लेकर धीरे-धीरे कदम बढ़ाएं।

मियां नवाज शरीफ सत्ता की सबसे ऊंची सीढ़ी पर दो बार चढ़ कर गिरा दिए गए थे और अब उनकी यह तीसरी पारी पाकिस्तान में काफी उम्मीदें लेकर आई है, क्योंकि नवाज शरीफ को अब पिछले अनुभवों से सीख लेने वाला राजनीतिज्ञ कहा जाने लगा है और यह भी कि नवाज शरीफ काफी बदल गए हैं। यह वही नवाज शरीफ हैं, जिन्होंने 1997-99 के अपने पिछले शासन काल में पाकिस्तान में शरीयत कानून लागू करवाया था और उनके शासन काल में ही पाक सेना ने करगिल पर चढ़ाई की थी। नवाज शरीफ ने आज तक यह साफ नहीं किया है कि जनरल मुशर्रफ ने उन्हें अंधेरे में रखकर करगिल में कैसे और क्यों घुसपैठ करवाई। हालांकि बाद में वह इस फैसले का विरोध करते नजर आए, लेकिन आगे भी किसी सैन्य जनरल के दबाव में वह भारत के खिलाफ इसी तरह का कोई बड़ा कदम नहीं उठने देंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है।

नवाज के विरोधी इमरान खान ने चुनाव प्रचार के दौरान ‘नया पाकिस्तान’ का नारा देकर लोगों को लुभाने की कोशिश की थी, लेकिन अब नवाज शरीफ से ही पाकिस्तान के लोगा यह उम्मीद पालने लगे हैं कि वही ‘नया पाकिस्तान’ बनाएंगे। नवाज शरीफ का पिछले दो बार का रिकॉर्ड ऐसा नहीं रहा है कि निष्पक्ष राजनयिक पर्यवेक्षकों में बहुत उम्मीदें पैदा करे। नब्बे के दशक के शुरुआत में अपनी पहली पारी वह पूरी नहीं खेल पाए थे और भ्रष्टाचार के आरोपों में उन्हें हटना पड़ा था। लेकिन बदले में बेनजीर-जरदारी दम्पत्ति ने भी पाकिस्तान को भ्रष्ट शासन ही दिया और एक बार फिर सेना के सहयोग से नवाज 1997 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। दूसरी बार में उन्होंने पाकिस्तान को गरीबी, बेरोजगारी और आतंकवाद की अंधेरी गलियों से निकालने के लिए भारत के साथ रिश्ते सुधारने की ठानी। मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों
के जवाब में पांच परमाणु परीक्षण करवाने वाले नवाज शरीफ ने दस महीने के भीतर ही भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इस पेशकश को मंजूर कर लिया कि वह बस से लाहौर जा कर भारत-पाक रिश्तों का माहौल बदलेंगे। लेकिन वह मुशर्रफ की चाल के आगे ढ़ेर हो गए।क्या अब तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नवाज शरीफ पाकिस्तान की सेना पर अंकुश रख पाएंगे? पाकिस्तान की सेना पर हाथ डालने का मतलब है मधुमक्खी के छत्ते पर हाथ डालना। इसलिए नवाज शरीफ को पहले छत्ता जलाने की ही कोशिश करनी होगी। हालांकि 1999 में पाक सेना के प्रमुख जनरल मुशर्रफ की वजह से ड्ढवह मौत के मुंह में जा सकते थे लेकिन बदले हुए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में उन्हें देश छोड़ कर निर्वासन में सात साल सऊदी अरब में रहना पड़ा। इसलिए इस बार उनकी यह मंशा जरूरी है कि वह सेना को रावलपिंडी मुख्यालय से बाहर नहीं निकलने दें। नई कैबिनेट में विदेश और रक्षा मंत्रालयों का भार अपने पास रखकर उन्होंने यह संकेत दिया है कि वह देश की बागडोर पूरी तरह सम्भालने को कटिबद्ध हैं। लेकिन, लश्कर-ए-झांगवी, सिपाह-ए-साहबा और तालिबान जैसी जेहादी ताकतों को वह कैसे समझाएंगे कि पाकिस्तान को घरेलू आर्थिक संकट से उबारने के लिए भारत के साथ न सिर्फ खुला व्यापार को बढ़ाना होगा बल्कि रिश्तों को भी सुधारना होगा? बेलगाम हो चुके पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी, आईएसआई को कैसे निर्देश देंगे पाकिस्तान की धरती से भारत विरोधी आतंकवादी हरकतों को बढ़ावा नहीं दो? अगले साल अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज हटने के बाद तालिबान पाकिस्तानी सेना से मदद मांगेगा और नहीं मिलने पर वे ताकतें नवाज शरीफ को ही अपना निशाना बनाएंगी। पाक सेना चाहेगी कि सामरिक बढ़त के लिए अफगानिस्तान में पाक समर्थक तालिबानी ताकतों को सत्ता मिले। ऐसे में नवाज शरीफ ने फिर पुरानी सामरिक नीति दुहराई तो न सिर्फ भारत बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय नवाज से नाराज होगा।
यानी नवाज की राह में कई तरह के रोड़े हैं। सबसे बड़ी बात देखने की यह होगी कि क्या खुद नवाज शरीफ अफगानिस्तान और तालिबान समर्थक नीतियों को अपनी कामयाबी में रोड़ा मानते हैं या पाकिस्तान के लिए एक नया सामरिक मौका। ऐसी स्थिति का लाभ उठाने के लिए पाक सेना और पाक जेहादी ताकतों का उन पर भारी दबाव रहेगा। पाक सेना द्वारा पाले-पोसे गए पाक के सामरिक चिंतकों और विशेषज्ञों की भी उन्हें यही सलाह होगी कि अफगानिस्तान में मुल्ला उमर को लौटने में मदद दी जाए, तभी पाकिस्तान अपने सामरिक हितों की पूर्ति कर सकेगा।लेकिन नवाज इस नीति पर चलते रहे तो पूरे पाकिस्तान में सेना और आतंकवादी संगठनों का बोलबाला बना रहेगा और नवाज की भारत से दोस्ती की बातें केवल खोखली ही साबित होंगी। भारत से कश्मीर लेने की बात तो बहुत दूर, नवाज को पहले पाकिस्तान के घरेलू हालात को सुधारना है तो भारत से वे सभी उत्पाद सस्ते में आयात करने होंगे, जो पाकिस्तान दूसरे देशों से महंगे में आयात करता है। घरेलू माहौल ऐसा बनाना होगा कि रोज रोज होने वाले आतंकवादी हमले बंद हों, तभी विदेशी निवेशक वहां जाने की सोचेंगे। वास्तव में पाकिस्तान के घरेलू निवेशक ही अपनी पूंजी पाकिस्तान में नहीं लगा रहे हैं।
नवाज शरीफ अभी 63 साल के हैं और निश्चय ही वह पाकिस्तान की राजनीति में कम से कम दो दशक लम्बी पारी और खेलने का इरादा रखते होंगे। हिंद महाद्वीप में इतनी उम्र का राजनेता बूढ़ा नहीं माना जाता है। एक परिपक्व नवाज ने अब जरूर यह समझ लिया होगा कि भारत के साथ दुश्मनी का भाव रख कर पाकिस्तान को बदहाली से नहीं उबारा जा सकता है। इसलिए भारत के साथ बेहतर रिश्तों की बातें तो वह करते रहेंगे लेकिन उनके हर बयान और हर कदम को भारत को नाप तोल कर ही परखना होगा।

रण जीत

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