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विश्वासघाती नीतीश?

नीतीश कुमार ने बिहार में अपने गठबंधन के साथी भाजपा को ठिकाने लगाते हुए सत्ता से अलग कर दिया। उपमुख्यमंत्री और सहयोगी रहे अपने पुराने मित्र सुशील कुमार मोदी समेत, भाजपा कोटे के सभी 11 मंत्रियों को उन्होंने हटा दिया। केंद्र में भी वह एनडीए गठबंधन से अलग हो गए। यह सब इसलिए हुआ कि नीतीश कुमार और उनके साथी, ‘सांप्रदायिक’ नरेंद्र मोदी को भाजपा में प्रमुखता दिए जाने को बरदाश्त नहीं कर सके। भाजपा का कसूर इतना था कि उसने जेडीयू की मोदी-विरोध को अनदेखा किया।
यह ऐसे दो दोस्तों (भाजपा और जदयू) की कहानी है, जो विपरीत प्रकृति के बावजूद ‘सत्ता प्रेम’ के कारण 17 साल तक साथ चलते रहे। अब घमंड में चूर और पूर्वाग्रहों से ग्रसित एक दोस्त (जदयू) ने ईष्र्या में जलते हुए दूसरे (भाजपा) को छोडऩे में जरा भी कोताही नहीं बरती है। दोनों के बीच अब यह पूर्वाग्रह की टकराहट का मामला बन गया है। भाजपा ने गर्व से नरेंद्र मोदी को इस युग का नंबर एक नेता घोषित किया, तो जदयू ने बदहवासी में गठबंधन से अलग होने की घोषणा कर दी। भाजपा जानती थी कि नरेंद्र मोदी के प्रति पूर्वाग्रहों के कारण, 17 साल पुराने गठबंधन के साथी के लिए क्या कुछ संभव हो सकता है। हालांकि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की बजाय, चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाने के लिए गोवा घोषणापत्र को सावधानी से तैयार किया गया था। लेकिन इस नामकरण से न तो भाजपा के शीर्ष पदस्थ नेताओं में किसी तरह की गलतफहमी थी, और न और न जेडीयू के नेताओं ने इसे समझने में गलती की।एक के बाद एक, दो रविवारों को भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण
अध्याय लिखे गए। पहला गोवा में और दूसरा पटना में। अगर भाजपा के कार्यकर्ता 9 जून को नमो की धुन पर नाच रहे थे, तो एक हफ्ते बाद 16 जून को भाजपा का यह उत्साह तब भंग हो गया, जब नीतीश कुमार ने बिहार में अपने गठबंधन के साथी भाजपा को ठिकाने लगाते हुए सत्ता से अलग कर दिया। उपमुख्यमंत्री और सहयोगी रहे अपने पुराने मित्र सुशील कुमार मोदी समेत भाजपा कोटे के सभी 11 मंत्रियों को उन्होंने हटा दिया। केंद्र में भी वह एनडीए गठबंधन से अलग हो गए। यह सब इसलिए कि नीतीश कुमार और उनके साथी, ‘संप्रदायिक’ नरेन्द्र मोदी को भाजपा में प्रमुखता दिए जाने को बरदाश्त नहीं कर सके। भाजपा का कसूर इतना था कि उसने जेडीयू के मोदी-विरोध को अनदेखा किया। भाजपा अध्यक्ष का कहना था कि मोदी को राष्ट्रीय नेतृत्व देने का उनका यह कदम न्यायपूर्ण ही था और इसके लिए उन्होंने पर्याप्त इंतजार भी किया था।जेडीयू के लिए यह सीधा संदेश था कि भाजपा अपने गबंधन के साथी के पूर्वाग्रहों के चलते, अपने गौरवशाली और रणनीतिक रुप से महत्वपूर्ण कदम को किसी भी कीमत पर पीछे नहीं खिंचेगी। भले ही यह फैसला उनके लिए कितना भी मंहगा साबित क्यों न हो। भाजपा को यह फैसला लेने में कुछ निष्पक्ष समूहों द्वारा कराए गए चुनाव पूर्व सर्वे और अपने शुभचिंतकों की सलाहों से भी सहायता मिली। सर्वे के अनुसार, बिहार में अगर भाजपा, जेडीयू से अलग होती है और दोनों अपने-अपने तौर पर चुनाव लड़ते हैं तो अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा को काफी लाभ हो सकता है और जेडीयू को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। भाजपा नेताओं को राज्य में सत्ता खोने कीमत पर, मोदी को अपना नेता घोषित करना बेहतर सौदा लगा।
उन्हें विश्वास है कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा जल्द ही विजेता के रूप में उभरेगी। मोदी की छवि के आवरण तले बिहार के नेता जाति के गणित का तालमेल बैठाने लगे हैं। इस संदर्भ में पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का बयान महत्वपूर्ण है। सुशील मोदी ने साफ तौर पर कहा है कि उनकी कुछ चुनावी रणनीतियां नरेंद्र मोदी के ओबीसी होने पर भी आधारित हैं। छोटे मोदी जो कुछ कह रहे थे, उसका तात्पर्य भी समझते थे। उनके लिए जरूरी था, क्योंकि उनके पूर्व सहयोगी और
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार पिछड़ों और अति पिछड़ों को लुभाने में लगे रहे हैं। नई दिल्ली की रायसीना हिल की ओर नीतीश के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए सुशील मोदी 2010 के विधानसभा चुनाव को भी भुलने को तैयार हैं, जब पहली बार लोगों को जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर विकास के नाम पर, भाजपा,जदयू गठबंधन को वोट देने की अपील की थी। तब लोगों ने ऐसा किया भी था। अब एक बार फिर जाति का गणित आगे आ गया है।नीतीश एक सिविल इंजीनियर के रूप में प्रशिक्षित हैं, लेकिन वह अपना पूरा समय सामाजिक इंजीनियरिंग में लगा रहे हैं। उनकी अपनी जाति कुर्मी के लोग आबादी का करीब 3.5 प्रतिशत ही होंगे, लेकिन संख्याबल के हिसाब से वे अपने गठबंधन के छाते के नीचे ऊंची जातियों, यादवों को छोड़कर सभी पिछड़ों, अति पिछड़ों, महादलितों, पसमंदा मुसलमानों सभी को ले आए थे। लेकिन भाजपा से अलग होने के बाद इन सभी जातियों का सामाजिक संघटन टूट की पूरी संभावना है।

नीतीश अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव के नक्शे-कदम पर चलते हुए सामाजिक इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करना अब बेहतर समझने लगे हैं। लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोकने और उन्हें गिरफ्तार करने के बाद लालू एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण बनाकर रातों-रात मुसलमानों के मसीहा बन गए थे। तब विकास से कोसों दूर रहने और राज्य को अराजकता में झोंकने के बावजूद, लालू ने 15 साल तक बिहार में राज किया था। अब नीतीश मोदी के रास्ते में रुकावट डालने की पहल करके राष्ट्रीय धरातल पर 17 प्रतिशत मुसमानों के दिलों को जीतने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह जोखिम भरा कदम हो सकता है। उनके समर्थकों का कहना है कि यह उनका सैद्धांतिक कदम है, जबकि दूसरे लोग इसे अवसरवादिता कह सकते हैं।

नीतीश 1994 में अपने लंबे समय के दोस्त और सहयोगी, लालू प्रसाद यादव से अलग हो गए और पटना में एक कुर्मी चेतना रैली करके उन्होंने अपनी ताकत का प्रदर्शन भी कर दिया। समता पार्टी बनाकर वह पुराने समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस के चेले बन गए। 1995 में आडवाणी और वाजपेयी से अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए नीतीश मुम्बई भी गए। तब से उन्होंने अपने सभी विधानसभा और लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़े। समता पार्टी को दरकिनार कर ज्यादा बड़े आधारवाली जनता दल युनाइटेड बनाई और भारतीय राजनीति में एक क्षेत्रीय नेता के रुप में अपनी जगह को मजबूत किया। इस बार जब वे भाजपा से अलग हुए तो लगता है जैसे और ज्यादा ख्याति पाने के लिए वह इतिहास को ही दोहरा रहे हैं।

लेकिन दोनों स्थितियों में फर्क है। उस समय लालू अपना प्रभाव खो रहे थे। पिछड़ावाद को बढ़ावा देने की उनकी संस्कृति विकासहीनता पर टिकी थी, जो निरर्थक हो गई थी। मुस्लिम-यादव गठबंधन जबानी जमाखर्च तक सीमित रह गया था। रोजगार की दिशा में कुछ नहीं हो रहा था।

नीतीश ने इस बार खुद को नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा किया है, जिनकी ताकत लगातार बढ़ रही है। अगड़े मोदी से प्यार करते हैं, जो तब से भाजपा के साथ हैं, जब कांग्रेस राज्य की राजनीति में अपना प्रभाव खोने लगी थी। नीतीश चाहते हैं कि लोग यह मानें कि केंद्र से श्विशेष राज्य’ का दर्जा मिलना ही विकास की धुरी है। लेकिन मोदी का राज्य गुजरात दिखा रहा है कि केंद्र के अमैत्रीपूर्ण व्यवहार के बावजूद ऐसा विकास हो सकता है। नीतीश की तरह मोदी भी पिछड़े वर्ग से हैं, लेकिन उन्होंने अब तक अपने पिछड़े होने का सहारा कभी नहीं लिया। आनेवाले समय में मोदी बिहार में कदम रखेंगे, तो इस पर होने वाली चर्चा नीतीश की अपील को कमजोर कर देगी।

महाराजगंज उपचुनावों के नतीजे इस परिदृश्य में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के व्यक्तित्व का प्रभाव इस उपचुनाव पर नहीं पडऩा चाहिए था। वह न तो राज्य में गए, न इस उपचुनाव के संबंध में कोई बात कही थी। राज्य में कोई गुजराती उपस्थिति भी नहीं है और न ही इस इलाके की बड़ी संख्या गुजरात में जाकर काम करने वाली है। लेकिन उनके नाम ने इस उपचुनाव में बड़ी भूमिका निभाई। जिसके नतीजे में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल को तो जीत मिली लेकिन जेडीयू या एनडीए का उम्मीदवार हार गया।

इस अकेले उपचुनाव के नतीजे से यह समझा जा सकता है कि यहां मोदी घटक काम कर रहा था। यहां जेडीयू की पराजय 2700 वोटों के छोटे से अंतर से बढ़कर 1.37 लाख के बड़े अंतर की हो गई। कारण यह भी है कि नीतीश, एक अन्य पिछड़े नेता नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने की राह में रोड़े अटका रहे थे। जनता दल के उम्मीदवार पीके शाही की भूमिहार जाति समेत अगड़ी जातियों के काफी लोग नीतीश के मोदी विरोधी रवैये से नाराज हो गए थे और उन्होंने नीतीश के सामने खतरे की घंटी बजा दी। मुसलमानों ने भी ज्यादातर जेडीयू के मुकाबले आरजेडी का पक्ष लेना बेहतर समझा।

जेडीयू के नेता दावा करते हैं कि भाजपा वाले अगर यह सोच रहे हैं कि महाराजगंज, राज्य में आने वाले चुनावों की तस्वीर सामने ला रहा है तो वे बेवकूफ हैं। लेकिन जनता दल (यू) का यह घमंड उन्हीं नेताओं की सोच है, जिनमें से ज्यादातर वे 20 लोकसभा सांसद हैं, जो भाजपा के समर्थन से जीते हैं। अब उनके लिए संसद में पहुंचना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि उनमें भाजपा से अलग होने के बाद वह उत्साह नहीं है, जो शिवानंद तिवारी, के.सी. त्यागी, अली अनवर और साबिर अली जैसे उनके राज्यसभा के सहयोगियों में नजर आता है।

भाजपा अपना यह संदेश देने में सफल हुई है कि बिहार के लोगों ने अगर गठबंधन की दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों को ऐतिहासिक फैसला दिया है तो वह उन दोनों के सामाजिक संघटन के आधार पर दिया है और अलग होकर उन्होंने जनता के विश्वास को तोड़ा है। दूसरा पक्ष यह है कि इस गठबंधन से ज्यादा फायदा नीतीश कुमार को ही हुआ है। पहला केंद्र में एनडीए सरकार में कृषि और रेलमंत्री के रूप में छह साल तक रहे और फिर सात साल तक बिहार के मुख्यमंत्री बनकर रहे। एनडीए के साथ 17 साल के गठबंधन में वह 13 साल तक तो सता में ही रहे। गठबंधन का कोई दूसरा नेता केंद्र या राज्य में इस स्तर पर सत्ता में नहीं रहा। जब भी विधानसभा या लोकसभा के चुनाव हुए, भाजपा चुनावों का प्रबंधन करती रही या चुनावों के दौरान उसने ही सभी दूसरी जिम्मेवारियां संभालीं।

नीतीश कुमार और उनके समर्थक भले ही इस बारे में अब तक बात न कर रहे हों, लेकिन जनता दल (यू) के बहुत से नेता महसूस करने लगे हैं कि एनडीए से पूरी तरह से अलग होने से पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री संघीय मोर्चे या तीसरे मोर्चे की बात कहकर अपने को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने लगे थे। वे भाजपा को सिर्फ बिहार के एक क्षेत्रीय खिलाड़ी के रूप में ठिकाने नहीं लगा रहे हैं, बल्कि उनकी महत्वाकांक्षाएं और बड़ी हैं। वह नरेंद्र मोदी के साथ एक ज्यादा जोरदार लड़ाई के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।

तीसरा मोर्चा या संघीय मोर्चा, जैसा ममता बैनर्जी ने इसे नाम दिया है, फिलहाल तो आगे बढ़ता नहीं दिख रहा हैए लेकिन यह आज की राजनीति के लिए बहुत अनुकूल है। वह अपने आप को या अपने मोर्चे को नरेंद्र मोदी के आगे के रास्ते को चुनौती देने वाले या उसका विकल्प देने वाले के रूप में पेश कर रहे हैं।

कांग्रेस उन्हें अपना एक जबर्दस्त साथी समझती है। उन्होंने जनता दल (यू) को एक समान सोच वाली पार्टी कहकर उसके सामने चारा डाल दिया है। कांग्रेस के सहयोगी एनसीपी ने इसके सामने यूपीए में शामिल होने का प्रस्ताव भेजा है। फिलहाल अपने इस सहयोगी को खोने का भाजपा को कोई अफसोस नहीं है। पार्टी के नेता नमो मंत्र का जाप करने में लगे हैं इस उम्मीद में कि वह उन्हें सत्ता के केंद्र तक पहुंचा देगा

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