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विजय का सेहरा किसके सिर ?

हरियाणा भले ही एक छोटा राज्य हो मगर शुरू से ही यह देश की राजनीति को नई दिशा प्रदान करता रहा है। इस राज्य की राजनीति के आयाम उत्तर भारत के अन्य राज्यों से बिल्कुल भिन्न रहे हैं। इस राज्य की राजनीति में उच्च जातियों जैसे ब्राह्मणों और राजपूतों का शुरू से ही महत्व नहीं रहा है। मुगल सम्राज्य के पराभव के बाद पंजाब में सत्ता पर जाटों का जो कब्जा हुआ था, उसे आज तक हरियाणा के जाट नेता थामे हुए हैं। राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, शासन हमेशा जाटों के हाथ में ही रहा है।
हरियाणा में विधानसभा एवं लोकसभा के चुनावों को भले ही अभी कई महीनें बाकी हैं, मगर राज्य में चुनावी गतिविधियां बड़ी तेजी से शुरू हो गई हैं। विभिन्न दलों द्वारा राज्य भर में चुनावी रैलियों का आयोजन किया जा रहा है। इसके साथ ही नए चुनावी समीकरण बनाने के प्रयासों में भी तेजी आई है। इससे इस बात के संकेत मिलते हैं कि राज्य में चुनाव निर्धारित समय से पूर्व भी हो सकते हैं। इससे यह संदेह होना स्वाभाविक ही है कि राज्य में चुनाव समय से पूर्व भी हो सकते हैं।

जहां तक कांग्रेस का संबंध है मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने राज्य में विकास के नाम पर वोट मांगने का अभियान तेज कर दिया है। नई-नई परियोजनाओं के शिलान्यासों का सिलसिला तेज हो गया है। राज्य सरकार द्वारा प्रिंट मीडिया एवं टीवी चैनलों पर सरकारी उपलब्धियों के बारे में धुंआधार प्रचार किया जा रहा है। मगर कांग्रेस को विपक्षी दलों के बजाय कांग्रेस के भीतरघात से ज्यादा खतरा हो सकता है। हाल में ही करनाल में आयोजित एक दलित रैली में केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा ने अपनी ही सरकार पर दलितों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया है। पार्टी के राज्यसभा सदस्य ईश्वर सिंह ने तो यहां तक धमकी दे डाली है कि दलित कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी हैं। यदि उनकी उपेक्षा की गई तो कांग्रेस के लिए पुन: सत्ता में आना कठिन होगा। राज्य के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं अखिल भारतीय कांग्रेस के महामंत्री चौधरी वीरेन्द्र सिंह शुरू से ही मुख्यमंत्री के विरोधी रहे हैं इसलिए वे भी सरकार विरोधी अभियान में जोर शोर से शामिल हैं। मुख्यमंत्री के एक अन्य विरोधी राव अजय सिंह अहीरवाल भी उपेक्षा का राग अलाप रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष फूलचंद मौलाना ने हुड्डा विरोधियों पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में भाग लेने का आरोप लगाते हुए कहा है कि कांग्रेस विरोधी इन रैलियों के आयोजन पर कांग्रेस हाईकमान को तुरंत रोक लगानी चाहिए। मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने भी करनाल में आयोजित एक अन्य समारोह में अपने विरोधियों पर आरोप लगाया है कि वे दिल्ली के एयर कंडीशन कमरों में बैठे हुए हैं और उन्हें इस बात का इल्म ही नहीं है कि राज्य सरकार दलितों और पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए किस तरह से कार्यक्रमों को पूरी ईमानदारी से लागू कर रही है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस हाईकमान हरियाणा कांग्रेस में एकता स्थापित करने में बुरी तरह से विफल रहा है। कांग्रेस की इस भीतरी गुटबंदी की भारी कीमत आने वाले चुनाव में पार्टी को चुकानी पड़ सकती है। इस बात में भी कोई शक नहीं है कि हाल में ही राज्य में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के साथ-साथ दलितों की उत्पीडऩ के घटनाओं में भी तेजी से वृद्धि हुई है। इनमें से अधिसंख्य मामलों में जमींदार वर्ग के युवकों का हाथ था। इसलिए उनको रोकने में प्रशासन और पुलिस उदासीन बनी रही। दलितों की नाराजगी का असर भी आने वाले चुनाव पर पड़ेगा।

जहां तक विपक्षी दलों का संबंध है इनेलोद द्वारा राज्य में जो राजनीतिक अभियान चलाया जा रहा था उसे चौधरी ओमप्रकाश चौटाला एवं उनके पुत्र अजय चौटाला को जे.बी. टीचर्स भर्ती घोटाले के सिलसिले में अदालत द्वारा जेल भेजने से गहरा झटका लगा है। इस झटके से उबरने के लिए चौटाला समर्थक अपनी पार्टी के पक्ष में राज्य की जनता में हवा बनाने के लिए यह धुआंधार प्रचार कर रहे हैं कि सीबीआई ने कांग्रेस के इशारे पर चौटाला परिवार को फर्जी आरोपों में फंसा दिया है। इस प्रचार का राज्य की जनता पर कितना असर होता है अभी इसके संबंध में दावे से कुछ कह पाना बेहद मुश्किल है। उच्च न्यायालय द्वारा इलाज के लिए ओम प्रकाश चौटाला को जमानत पर छोड़े जाने के बाद उनके प्रति भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में अचानक सहानुभूति की लहर उमड़ पड़ी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से लेकर राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया तक अस्पताल में चौटाला से मुलाकात कर आए हैं। इससे राजनीतिक क्षेत्रों में इस बात की चर्चा एक बार फिर गर्म हो गई है कि भाजपा लोकसभा में अपनी सीटों में बढ़ोतरी करने के मोह में चौटाला का पुन: हाथ थाम सकती है। प्रर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा में चौटाला के साथ समझौता करने के बारे में गंभीर मतभेद हैं। लोकसभा में विपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज इस बात की घोषणा कर चुकी हैं कि भाजपा का हरियाणा जनहित कांग्रेस से चुनावी गठबंधन जारी रहेगा। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रामविलास शर्मा शुरू से ही चौटाला विरोधी रहे हैं। इसलिए वे खुलकर अपने हाईकमान पर चौटाला से किसी भी प्रकार का समझौता न करने के लिए दबाव डाल रहे हैं।

इन दिनों हरियाणा में भाजपा का चुनावी गठबंधन चौधरी भजन लाल द्वारा स्थापित हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ है। हालांकि हाल में ही राज्य में जो उपचुनाव हुए थे उनमें यह गठबंधन ज्यादा कारगर नजर नहीं आया। हरियाणा में नए राजनीतिक समीकरण कौन सा रूप लेगा, अभी इसके बारे में दावे से कुछ भी कह पाना बेहद कठिन है। मगर यह हकीकत है कि शुरू से हरियाणा में जो गैरकांग्रेसी सरकार बनी वह हमेशा भाजपा के सहयोग से ही बनी।

हरियाणा भले ही एक छोटा राज्य हो, मगर शुरू से ही यह देश की राजनीति को नई दिशा प्रदान करता रहा है। इस राज्य की राजनीति के आयाम उत्तर भारत के अन्य राज्यों से बिल्कुल भिन्न रहे हैं। इस राज्य के राजनीति में ब्राह्मणों और राजपूतों जैसी उच्च जातियों का शुरू से ही महत्व नहीं रहा है। मुगल सम्राज्य के पराभव के बाद पंजाब में सत्ता पर जाटों का जो कब्जा हुआ था, उसे आज तक हरियाणा के जाट नेता थामे हुए हैं। राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, शासन हमेशा जाटों के हाथ में ही रहा है। उच्च जातियों, विशेष रूप से ब्राह्मणों के हाशिए पर रहने के दो ऐतिहासिक कारण हैं। सिख धर्म के उत्थान से ब्राह्मणवाद को गहरा झटका लगा। रही सही कसर आर्य समाज के इस क्षेत्र में बढ़ते हुए प्रभाव ने पूरी कर दी।

इस राज्य में राष्ट्रीय दलों की बजाय क्षेत्रीय दलों का खास महत्व रहा है। यह बात दीगर है कि इन सभी क्षेत्रीय दलों की स्थापना करने वाले पुराने कांग्रेसी थे। उदाहरण के रूप में अहीर नेता राव वीरेन्द्र सिंह ने विशाल हरियाणा पार्टी का गठन करके कांग्रेस से सत्ता छीन ली तो ताऊ देवी लाल ने भी अपना क्षेत्रीय दल बनाया था। हालांकि उसका नाम कम-से-कम तीन बार बदला गया मगर हरियाणा के मतदाताओं पर ताऊ की पकड़ निरंतर मजबूत होती रही। चौधरी देवी लाल और उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला ने राज्य में सत्ता का सुख भोगा। एक अन्य कांग्रेसी मुख्यमंत्री चौधरी बंसी लाल ने भी बगावत करके हरियाणा विकास पार्टी बनाई और दो बार मुख्यमंत्री बने। 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने हालांकि स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया था, मगर कांग्रेस हाईकमान ने उनकी बजाय भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को गद्दी सौंप दी। इससे रूष्ट होकर चौधरी भजन लाल ने एक नया संगठन हरियाणा जनहित कांग्रेस बना डाला। जिसकी बागडोर इन दिनों उनके पुत्र कुलदीप बिश्नोई ने संभाली हुई है।

राज्य की राजनीति की एक विशिष्टता यह भी है कि इस राज्य में कोई भी पार्टी कमिटेड वोट बैंक का दावा नहीं कर सकती। राज्य की जनता राजनीतिक दृष्टि से बेहद जागरूक है। वह अपने वोट हवा का रूख देखकर देती है। हरियाणा की जनता जब किसी पार्टी से नाराज हो जाती है तो वह किसी अन्य पार्टी को सत्ता में ले आती है। मगर जब उससे भी मोहभंग हो जाता है तो वह किसी अन्य विकल्प को सत्ता की बागडोर सौंपने से भी गुरेज नहीं करती। इस बात की पुष्टि हरियाणा से लोकसभा के चुनावों के

नतीजों के विश्लेषण से भी होती है। 1980 में लोकसभा की 10 सीटों में से 5 सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं,जबकि चार सीटें चौधरी देवीलाल की पार्टी जनता दल समाजवादी ने प्राप्त की और एक सीट जनता पार्टी को मिली। 1984 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में कांग्रेस को लोकसभा की दस की दस सीटें दिला दी और विपक्षी दलों का सफाया हो गया। 1979 में कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस ने चार सीटें जीती, जबकि जनता दल को 6 सीटें मिली। मगर राज्य का राजनीतिक वातावरण जल्दी ही बदल गया। 1991 के चुनाव में कांग्रेस के हाथ 9 और हरियाणा विकास पार्टी के हाथ एक सीट लगी। मगर 1996 में भाजपा और हरियाणा विकास पार्टी के गठजोड़ के कारण हवा फिर बदली। भाजपा को 4, हरियाणा विकास पार्टी को 3, कांग्रेस को 2 सीटें प्राप्त हुई जबकि एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहा। 1998 के चुनाव में देवी लाल की पार्टी ने 4, हरियाणा विकास पार्टी ने 1, बीजेपी ने 1, बसपा ने 1 और कांग्रेस ने 3 सीटें जीतीं। 1999 में इनेलोद और भाजपा के गठबंधन ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। इन दोनों पार्टियों को 5-5 सीटों पर विजय मिली। 2004 में सभी पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, जिसके कारण विपक्षी दलों का सफाया हो गया और कांग्रेस को 9 और भाजपा को 1 सीट पर विजय मिली। 2009 में भी कांग्रेस ने 9 सीटें जीती और एक सीट हरियाणा जनहित कांग्रेस के हाथ लगी।

इस संदर्भ में एक अन्य बात का उल्लेख करना भी बेहद रोचक होगा। 2009 के चुनाव में भले ही कांग्रेस को भारी सफलता मिली हो मगर उसके दो महीने बाद हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस बहुमत प्राप्त करने में भी विफल रही। उसे सिर्फ 40 सीटें ही प्राप्त हुई। सरकार बनाने के लिए उसे 5 निर्दलियों और 5 हरियाणा विकास कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करना पड़ा।

हरियाणा की राजनीति में पंजाबी भाषियों की भारी संख्या है। ये लोग पाकिस्तान से उजड़ कर आए थे। इनकी संख्या का अनुपात 25 प्रतिशत बताया जाता है। हालांकि शिक्षा व्यापार और सरकारी नौकरियों में इनका काफी असर है। मगर राजनीति में यह वर्ग शुरू से ही उपेक्षित रहा है। कभी यह जनसंघ का वोट बैंक हुआ करता था। मगर जब जनसंघ के हाईकमान ने इस वर्ग की उपेक्षा करके नेतृत्व जाटों एवं अन्य स्थानीय नेताओं को सौंप दिया तो यह रूष्ट होकर कांग्रेस में चला गया, मगर कांग्रेस में भी उसे आज तक न्याय प्राप्त नहीं हुआ। आज यह वर्ग अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए नए ठौर की तलाश कर रहा है।

हरियाणा की राजनीति का एक अनोखा पक्ष यह है कि जब केंद्र में राम मंदिर की लहर चल रही थी, तो हरियाणा उससे अछूता रहा। यही स्थिति मंडल आयोग के कारण उत्पन्न तूफान में भी रही। राज्य में हालांकि दलितों की संख्या 25 प्रतिशत बताई जाती है, मगर कांशी राम और मायावती की पार्टी बसपा यहां पर कदम जमाने में सर्वथा विफल रही है। उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह बैकवर्ड जातियों का जन उभार भी इस राज्य की राजनीति को प्रभावित नहीं कर पाया। वामदल इस राज्य में कदम जमाने में आज तक सफल नहीं हो सके हैं। हाल में ही तृणमूल कांग्रेस ने इस राज्य में पैर पसारने का जो प्रयास शुरू किया था, वह भी विफल रहा है। राज्य की जनता की किसी पार्टी से प्रतिबद्धता नहीं है, इसलिए इस राज्य के नेता अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए शुरू से ही दल बदलते रहे हैं। इस कारण भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की कहानी प्रचलित हुई। पलवल के एक विधायक गया राम एक ही दिन के भीतर सात बार पार्टियां बदल कर इस कहावत को जन्म दिया। दल बदलने का यह सिलसिला आज भी जारी है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के तीन तरफ हरियाणा की सीमाएं लगती हैं, इसलिए दिल्ली की आबादी में हो रही भारी वृद्धि का प्रभाव भी हरियाणा पर पड़ा है। दिल्ली के सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी तेजी से शहरीकरण हुआ। बिल्डरों ने किसानों से मुंह मांगे दामों पर जमीन खरीदकर उन्हें करोड़पति और अरबपति बना दिया। दौलत की रेल-पेल ने इस क्षेत्र में अपराधी माफिया गिरोहों को भी जन्म दिया। आज हरियाणा की राजनीति धन-बल और बाहुबल से मुक्ति पाने के लिए छटपटा रही है।

 

मनमोहन शर्मा

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