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हरियाणा के तीन लाल

हरियाणा में विकास की आंधी लाने वाले बंसीलाल ‘विकास पुरुष’ कहलाए और भजनलाल जोड़-तोड़ की राजनीति के महानायक। अपनी लोक लुभावन नीतियों के कारण ताऊ देवीलाल ने जन-नायक का दर्जा पाया। हरियाणा के इन लालों की एक खूबी यह रही कि तीनों के ही अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों के विकास पर सबसे ज्यादा जोर दिया और तीनों को ही उनका पुत्र-प्रेम ले डूबा।
देश भर में आजकल जहां एक ओर नरेन्द्र मोदी के गुजरात में हुए विकास कार्यों की चर्चा पूरे जोर-शोर से हो रही है, वहीं दूसरी ओर सारे एफएम रेडियो और कुछ टीवी चैनलों पर ‘नंबर-वन-हरियाणा’ के नारे की गूंज सुनाई देती है। हरियाणा प्रदेश के नंबर-वन होने की यह गूंज सिर्फ हवा-हवाई नहीं है। हरि (भगवान) के प्रदेश को नंबर वन बनाने में आधुनिक हरियाणा के निर्माता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का अच्छा-खासा योगदान है। जनमानस में ‘भूप्पी भाई’ के नाम से लोकप्रिय हुड्डा ने युवा पीढ़ी की नब्ज को पकड़ा है। शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े हरियाणा को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली है। खेल, शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में हरियाणा का नाम रोशन करने के लिए हुड्डा ने अनेक नीतियां बनाई हैं, ताकि प्रदेश के हाली (किसान) और पालियों (पशु-पालकों) के बच्चे खेती-बाड़ी पर ही निर्भर ना रहें।

हुड्डा के प्रयासों से ही पिछले सात सालों के दौरान 21 नए विश्वविद्यालय राज्य में खोले गए। सोनीपत में नया एजुकेशन हब स्थापित किया जा रहा है। यहां पर ‘राजीव गांधी एजुकेशन सिटी’ की स्थापना की जा रही है। इस एजुकेशन सिटी में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जाने माने दस संस्थान अपने कॉलेज और विश्वविद्यालय खोलने जा रहे हैं। यहां दिल्ली आईआईटी का एक्सटेंशन कैंपस भी खोला जाएगा। मजे की बात यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इन संस्थानों में 25 प्रतिशत सीटें हरियाणा के विद्यार्थियों के लिए रिजर्व की गई हैं। प्रदेश के युवतियों की नई पीढ़ी में शिक्षा की अलख जगाने के लिए गोहाना के पास गांव खानपुर कलां में भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। महेन्द्रगढ़ में केन्द्रीय विश्वविद्यालय और गुडग़ांव में भारतीय रक्षा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 28 नए सरकारी कॉलेज खोले गए हैं। प्रदेश के कुल 88 सरकारी कॉलेजों में से 49 कॉलेजों में रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। प्राइवेट कॉलेजों की संख्या हजारों में है।

खेल और खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन देने की अनेक योजनाएं शुरू की गई है। अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में पदक पाने वाले खिलाडिय़ों को नकद पुरस्कार और सरकारी नौकरियां देकर खिलाडिय़ों का हौसला बढ़ाया है। प्रदेश भर में खेल स्टेडियम, खेल नर्सरियां और अकादमियों की स्थापना की जा रही है। यही कारण है कि देश भर में हरियाणा के खिलाड़ी नंबर-वन पर हैं।

देश का ‘नंबर-वन-हरियाणा’ बनने में 46 वर्ष लगे। 1 नवंबर 1966 को पंजाब से अलग करके बनाया गया हरियाणा, देश का एक पिछड़ा राज्य था। राज्य के सामने अनेक चुनौतियां थीं। समृद्ध पंजाब की विकास योजनाओं का लाभ इस क्षेत्र को कभी नहीं मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने हरियाणा को एक अलग राज्य की मान्यता दिलवाई थी।

हरियाणा के तीन लाल
वैसे देखा जाए तो पिछले 46 सालों के दौरान हरियाणा की राजनीति में अनेक उतार चढ़ाव आए। थोड़े-थोड़े समय के लिए ही सही पं. भगवत दयाल शर्मा, राव वीरेन्द्र सिंह, लाला बनारसी दास, ओम प्रकाश चौटाला और मास्टर हुकम सिंह जैसे नेताओं ने भी मुख्यमंत्री की कुर्सी की शोभा बढ़ाई है। लेकिन उठापटक और दल-बदल की राजनीति के लिए मशहूर इस प्रदेश की विकास यात्रा में हरियाणा के तीन लालों- बंसी, भजन और देवी लाल का ही बोलबाला रहा। इन तीन लालों में बंसीलाल और देवीलाल जाट नेता थे, वहीं भजनलाल विश्नोई गैर-जाटों के बीच काफी लोकप्रिय थे।

हरियाणा में विकास की आंधी लाने वाले बंसीलाल ‘विकास पुरुष’ कहलाए और भजनलाल जोड़-तोड़ की राजनीति के महानायक। अपनी लोक लुभावन नीतियों के कारण ताऊ देवीलाल ने जन-नायक का दर्जा पाया। हरियाणा के इन लालों की एक खूबी यह रही कि तीनों ने ही अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों के विकास पर सबसे ज्यादा जोर दिया और तीनों को ही उनका पुत्र-प्रेम ले डूबा। प्रदेश की राजनीति में तीनों ने ही अपने खूब परचम लहराए। उनके द्वारा शुरू किए गए विकास कार्यों की बदौलत ही आज हरियाणा नंबर-वन के मुकाम पर पहुंचा है।

चौधरी बंसीलाल : आधुनिक हरियाणा की नींव रखी। भिवानी जिले के गोलागढ़ गांव के सीधे-सादे गामोली (गांव के रहने वाले) लीडर बंसीलाल ने। वैसे तो पं. भगवत दयाल शर्मा प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन अहीर नेता राव वीरेन्द्र सिंह ने दल-बदल का सहारा लिया और अपनी विशाल हरियाणा पार्टी की सरकार बना ली। वह सरकार भी नहीं चली तो मई 1968 में मध्यावधि चुनाव हुए। तब कांग्रेस हाई कमान ने प्रदेश की बागडोर चौधरी बंसीलाल को सौंप दी। तोशाम हल्के का प्रतिनिधित्व करने वाले बंसीलाल पेशे से वकील थे। जिद्दी स्वभाव के बंसी अपनी धुन के पक्के थे। जो बात मन में ठान ली, उसे पूरा करके ही दम लेते थे।

इंदिरा गांधी के वह बहुत चहेते थे और इसीलिए उन्हें काम करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। बंसीलाल ने राज्य के हर गांव में बिजली और हर गांव को पक्की सड़क से जोडऩे का सपना संजोया। उन्होंने इस सपने को पूरा करके ही दम लिया। सूखे से परेशान हरियाणा में नहरों का जाल बिछाया। भिवानी जिले के रेत के टीलों में लिफ्ट इरिगेशन सिस्टम से पानी पहुंचाया। फव्वारा प्रणाली से सूखी धरती की सिंचाई शुरू की तो मक्का और बाजरे की जगह गेहूं और अंगूर की खेती भिवानी व हिसार जिलों में लहलहाने लगी।

हर गांव में सड़क पहुंच जाने से ग्रामीणों की आवाजाही आसान हो गई। हर गांव में रोडवेज की बसें जाने लगीं। बिजली पहुंचने से ट्यूब वेल खेतों में चलने लगे। खेती की पैदावार बढ़ी और हरियाणा में ”हरितक्रांति” आई। बंसीलाल ने ही रोड साइट पर्यटन को बढ़ावा दिया। पूरे प्रदेश में पक्षियों के नाम पर पर्यटन स्थल सड़क किनारे विकसित किए गए।

इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी का छोटी कार बनाने का सपना बंसीलाल ने साकार कर दिखाया। दिल्ली के निकट गुडग़ांव में मारुति कार का कारखाना लगवा दिया। आपातकाल के काले दिनों में इंदिरा गांधी व बंसीलाल काफी नजदीक आए। संजय गांधी के परिवार नियोजन कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में बंसीलाल ने भरपूर सहयोग किया। नंबर-वन गेम के चक्कर में हरियाणा के ज्यादातर बूढ़े और जवानों की नसबंदी करा डाली। जनता पार्टी के राज में बंसीलाल पर अनेक केस चले और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उस वक्त एक नारा पूरे हरियाणा में खूब उछला था ”नसबंदी के तीन दलाल, इंदिरा-संजय और बंसीलाल।” जनता पार्टी का शासन समाप्त होने पर इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में वह रेल और रक्षा मंत्री भी बने।

सन् 1982 के चुनाव में कांग्रेस को 36 सीटें और विपक्षी लोकदल व भाजपा गठजोड़ को भी 36 सीटें मिली। जोड़-तोड़ में माहिर भजनलाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जा बैठे और दल-बदल कराकर विधायकों की संख्या 63 तक कर डाली। भजनलाल के राज में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। किसानों की बिजली काटकर कारखानों को दी जाती थी।

राजीव लोंगोंवाल समझौते के खिलाफ देवीलाल के जन आंदोलन से कांग्रेस घबरा गई और एक बार फिर बंसीलाल को प्रदेश की बागडोर सौंप दी गई। लेकिन 1987 के चुनाव में बंसीलाल के विकास का जादू नहीं चला और बंसीलाल अपने गढ़ तोशाम में युवा नेता धर्मवीर से चुनाव हार गए।

बंसीलाल ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र सुरेन्द्र सिंह को सौंपी। लेकिन बाद में एक विमान दुर्घटना में राज्य के प्रसिद्ध उद्योगपति ओम प्रकाश व सुरेन्द्र सिंह मारे गए। बंसीलाल इस सदमे से उभर नहीं पाए। बंसीलाल ने राज्य में शराबबंदी का नारा दिया। कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी के बैनर तले उनकी पार्टी ने चुनाव लड़ा। प्रदेश की महिलाओं ने उन्हें व्यापक जनसमर्थन दिया और राज्य में कांग्रेस को हटाकर उनकी पार्टी ने सरकार बना ली।

शराबबंदी का जादू ज्यादा दिन नहीं चल सका, क्योंकि राज्य के विकास के लिए सबसे ज्यादा राजस्व आबकारी विभाग से ही आता था। राज्य में विकास के कार्य रुक गए। हारकर बंसीलाल को राज्य में शराब की बिक्री शुरू करानी पड़ी। बंसीलाल को पहले नसबंदी कराने और बाद में नशाबंदी कराने पर कुर्सी छोडऩी पड़ी। आज बंसीलाल की विरासत को स्व. सुरेन्द्र सिंह की पत्नी किरण चौधरी और उनकी बेटी संभाले हुए हैं।

चौधरी भजनलाल : मोहम्मदपुर रोही गांव के भजनलाल विश्नोई आदमपुर मंडी (हिसार) में आढ़त का काम करते थे। उन्होंने विधानसभा का चुनाव हमेशा आदमपुर से लड़ा। 1987 में देवीलाल की आंधी में भी आदमपुर से कांग्रेस की टिकट पर उनकी पत्नी जस्मा देवी ही चुनाव में विजयी हुई थी। भजनलाल राजनीतिक जोड़-तोड़ के जादूगर थे। वह दूर से ही राजनीति की हवा का रुख पहचान लेते थे और सदा सत्तारुढ़ दल के साथ मधुर संबंध बनाकर रखते थे। वह स्वयं को ‘राजपूत’ कहते थे। वह कहा करते थे – ‘जिसका राज, उसी का पूत बन जाओ।’ वह मृदुभाषी और अवसरवादी थे। जनता पार्टी के राज में वह अपने पूरे मंत्रिमंडल और कांग्रेसी विधायकों के साथ स्वर्गीय जगजीवन राम के माध्यम से जनता पार्टी में जा मिले थे और मजे की बात यह है कि जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद, जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में केन्द्र में सरकार बनी तो वह दल-बल सहित इंदिरा के दरबार में हाजिर हो गए और प्रदेश में दल बदलकर कांग्रेस की सरकार बना ली थी।

महम – जो कभी एक गांव था
किसी जमाने में महम एक गांव था, जो कि रोहतक-हिसार रोड पर स्थित है। विश्व में यह गांव उस वक्त विख्यात हुआ, जब चौधरी देवीलाल ने यहां से पहली बार विधान सभा का चुनाव लड़ा। जाट बहुल्य इस क्षेत्र के चौबीस गांवों की एक पंचायत है, जो समय-समय पर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जन जागरण करती है। चौबीस पंचायत का हर चुनाव में एकमत से अपना उम्मीदवार किसी भी पार्टी का हो सकता है। सर्वसम्मति से निर्णय होने पर वह ‘महम चौबीसी’ का उम्मीदवार कहलाता है।

महम गांव के जोहड़ के पास एक चबूतरा है। यह चबूतरा ‘चौबीसी पंचायत’ के चबूतरे के रूप में प्रसिद्ध है। पंचायत में हर तपे का तपेदार हिस्सा लेता है। वह अपनी राय व्यक्त करता है। अंतिम निर्णय पूरी पंचायत मिल बैठ कर करती है। देवीलाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद महम का बहुत विकास हुआ। महम में चीनी मिल बनी। किसान भवन और आई. टी.आई. का निर्माण हुआ। जोहड़ के किनारे पर्यटन स्थल भी बनाया गया, लेकिन घाटा बढ़ जाने पर उसे बंद कर दिया गया।

देवीलाल के उप प्रधानमंत्री बन जाने पर उनके पुत्र ने महम से उपचुनाव लडऩे की जिद्द पकड़ ली। महम चौबीसी ने उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं बनाया तो वह आग बबूला हो गया।

महम चौबीसी ने मदीना गांव के चौधरी आनन्द सिंह दांगी को अपना उम्मीदवार घोषित किया। चौटाला ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उस उपचुनाव में एक ओर हरियाणा की पूरी सरकार थी और दूसरी ओर महम चौबीसी की पंचायत। 27 फरवरी 1990 को हुए मतदान में पूरे महम क्षेत्र को पुलिस छावनी में बदल दिया गया था।

चौटाला की ग्रीन ब्रिगेड के मुकाबले दांगी के समर्थकों ने ‘जैली ब्रिगेड’ का गठन कर लिया था। ब्रिगेड के हर कार्यकर्ता के हाथ खेती के काम आने वाली जैली थी। मतदान के दौरान हुई गड़बड़ी के कारण 28 फरवरी को कुछ मतदान केन्द्रों पर पुन: मतदान के आदेश हुए तो महम में हिंसा भड़क उठी और महम के अनेक लोग पुलिस व चौटाला समर्थकों की गोलियों का शिकार हुए थे।

महम की जनता के लिए न्याय मांगने के लिए आनन्द सिंह दांगी ने महम से दिल्ली तक पद यात्रा की थी। कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने इस घटना के बाद महम का दौरा करके दांगी के समर्थकों की सहानुभूति हासिल की।

सत्ता के नशे में चूर चौटाला ने दांगी पर अनेक केस बनाकर और महम में आंतक का माहौल बना दिया था। आज आनन्द सिंह दांगी कांग्रेस में हैं और महम की जनता का नेतृत्व करते हैं।

भजनलाल यारों के यार थे। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव का उन्होंने जोरदार समर्थन किया। कांग्रेस में व्यापक विरोध के बावजूद नरसिंह राव के कहने पर सूरजकुंड में कांग्रेस का महा अधिवेशन करा डाला। वहां आदमपुर के हलवाईयों द्वारा बनाया गया देशी घी का हलवा काफी चर्चित हुआ था। केन्द्र में नरसिंह राव की सरकार को बचाने के लिए तन मन धन से नरसिंह राव का साथ दिया।

वह् अपने गृह जिले हिसार को राज्य की राजधानी बनाने का सपना देखते थे। उनके राज में हिसार में बहुत सारे विकास के कार्य हुए। हिसार मे उनके पुत्रों के कई कारखाने हैं। हिसार में बनी उनकी कोठी काफी विख्यात है। भजनलाल के राज में भ्रष्टाचार खूब फला- फूला। कोई भी काम कुछ ‘लिए-दिए’ नहीं होता था। हर काम का रेट तय होता था। नए गुडग़ांव का विकास उनके ही कार्यकाल में हुआ। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने दफ्तर उनके कार्यकाल के दौरान ही यहां बनाने का फैसला किया था।

उन्होंने अपने पुत्र चंद्रमोहन को राजनीति में उतारा, जो हुड्डा सरकार में उपमुख्यमंत्री भी बने। जबकि भजनलाल तब तक कांग्रेस से त्यागपत्र देकर अपनी नई पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस बना चुके थे। उन्होंने अपने दूसरे बेटे कुलदीप विश्नोई को भी राजनीति में उतारा। चन्द्रमोहन ने भजनलाल का नाम खराब किया और एक सुन्दरी के मोहपाश में फंसकर धर्म परिवर्तन कर चांद मोहम्मद बन बैठे। वह अलग बात है कि बाद उस सुंदरी से उनका मोहभंग हो गया और सुंदरी ने पंचकूला की अपनी कोठी में आत्महत्या कर ली।

भजनलाल की राजनीतिक विरासत अब कुलदीप के हाथ में है। उन्होंने आगामी चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी से समझौता कर लिया है। अगले साल होने वाले चुनाव में भाजपा और हरियाणा जनहित कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेंगे और ढ़ाई-ढ़ाई साल बारी-बारी से दोनों पार्टियों का नेता मुख्यमंत्री बनेगा।

चौधरी देवीलाल : जन नायक देवीलाल किसान नेता थे। वह सर छोटूराम को अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे। सिरसा जिले के चौटाला गांव में जन्मे देवीलाल के चार पुत्र हैं, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत ओम प्रकाश चौटाला को सौंपी। सन 1982 में भी उनकी पार्टी के गठबंधन की सरकार बन सकती थी, लेकिन राज्यपाल जी.डी. तपासे ने उन्हें झांसे में रखा और भजनलाल को शपथ दिलवा दी थी। बताते हैं कि देवीलाल ने गुस्से में राज्यपाल तपासे को बहुत बुरा भला कहा था।

24 जुलाई 1985 को हुए राजीव-लोंगोवाल समझौते के तहत हुई हरियाणा के हितों की अनदेखी के लिए देवीलाल ने ऐसा ‘न्याय युद्ध’ छेड़ा कि सभी कांग्रेस विरोधी नेता एक मंच पर एकत्र हो गए। उन्होंने एक संघर्ष समिति का गठन किया। लगभग डेढ़-दो साल चले इस न्याय युद्ध ने रंग जमाया और विधानसभा की 90 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ पांच पर ही जीत सकी। कांग्रेस के दिग्गज नेता बंसीलाल तक चुनाव हार गए।

न्याय युद्ध के दौरान देवीलाल ने नारा दिया ‘लोक राज… लोक लाज’ से चलता है। लेकिन कांग्रेस को लोकलाज की चिंता नहीं है। देवीलाल धरती से जुड़े नेता थे। बिजली, पानी की कमी और भ्रष्टाचार से परेशान जनता का मन मोहने के लिए उन्होंने वादा किया कि यदि वह सत्ता में आए तो बिजली पानी का प्रबंध और भ्रष्टाचार बंद होगा। न्याय युद्ध के विजय रथ पर सवार देवीलाल ने किसानों के कर्जे माफ करने का भरोसा दिया और गांव के बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन देने का ऐसा वादा किया कि उसका जादू सिर चढ़कर बोला। आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव भी चुनावी कुरूक्षेत्र के उस मैदान में अपने चेतन्य रथ में पधारे थे और ‘कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ’ का नारा दिया था। शिक्षित बेरोजगारों को सौ रुपया मासिक भत्ता देने की देवीलाल ने घोषणा की तो युवा उनके साथ आ जुटे।

देवीलाल हर बार रोहतक जिले के महम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ते थे। मध्य चौबीसी की पंचायत हर बार उन्हें अपना उम्मीदवार बनाती थी और वह हर बार विजयी होते थे। बाद में देवीलाल तो केन्द्र की वी.पी. सिंह सरकार में उप-प्रधानमंत्री बन गए। उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला ने महम से ही उप-चुनाव लडऩे की ठानी। महम चौबीसी की पंचायत को उनकी यह मनमानी रास नहीं आई और उन्होंने देवीलाल के परमभक्त आनंद सिंह दांगी को चौबीसी के उम्मीदवार के रुप में मैदान में उतार दिया। महम में खून की होली खेली गई। चौटाला के समर्थकों व पुलिस की गोली से महम के अनेक लोग शहीद हुए। चौटाला की ग्रीन ब्रिगेड के मुकाबले में दांगी की जैली (कृषि यंत्र) ब्रिगेड मैदान में आ जमी थी। चौटाला ने देवीलाल के ‘लोकराज’ को ‘लठराज’ में बदल दिया। बाद में चौटाला ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। उनके शासन काल में हुए प्राथमिक शिक्षक भर्ती घोटाले में कोर्ट ने चौटाला व उनके ज्येष्ठ पुत्र अजय चौटाला को दोषी माना और उन्हें सजा सुनाई। चौटाला के जेल जाने से चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल को काफी गहरा झटका लगा है।

अगले साल होने वाले चुनाव में हरियाणा के नेताओं की अगली पीढ़ी क्या रंग जमाती है, यह देखने लायक होगा। चौटाला के दोनों पुत्र अजय और अभय चौटाला, भजनलाल के पुत्र कुलदीप विश्नोई, बंसीलाल के पुत्र स्व. सुरेन्द्र सिंह की पत्नी किरण चौधरी और संभव है भूपेन्द्र सिंह हुड्डा भी मुलायम सिंह की तरह अपने पुत्र दीपेन्द्र हुड्डा को अपनी विरासत सौंपकर केन्द्र की राजनीति में सक्रिय हो जाएं। अहीरवाल के नेता राव वीरेन्द्र सिंह के पुत्र राव इन्द्रजीत वैसे तो पुराने कांग्रेसी हैं, लेकिन भूपेन्द्र सिंह से उनका छत्तीस का आंकड़ा है।

हरियाणा का क्या-क्या प्रसिद्ध है
• कुरूक्षेत्र का महाभारत
• महाभारत में कृष्ण भगवान का गीता उपदेश
• गुरू द्रोणाचार्य का गुरूग्राम, जिसे हम अब गुडग़ांव के नाम से जानते हैं।
• गुडग़ांव में स्थित मल्टी नेशनल कम्पनियों के दफ्तर
• गुडग़ांव व मानेसर की मारूति कारें
• बाबल में लगा हर्ले डेविडसन मोटर बाइक्स का कारखाने
• हीरो और होंडा बाइक के गुडग़ांव में बने कारखाने
• हिसार की मुर्रा भैंसे, जो बहुत ज्यादा दूध देती हैं।
• पानीपत का हैंडलूम
• झंसी के पेड़े
• रोहतक की खस्ता गजक और रेवडिय़ा
• सोनीपत की बालूशाही व घेवर
• बहादुर गढ़ के चटपटे पकौड़े
• रिवाड़ी की खोया बर्फी व गाजर पाक
• अम्बाला के वैज्ञानिक उपकरण
• फरीदाबाद के ट्रैक्टर और जे.सी.बी. मशीनें
• हिसार का कृषि विश्वविद्यालय
• पिंजौर का यादवेन्द्र गार्डन

आया राम, गया राम
दल बदल करने के मामले में भी हरियाणा नंब-वन है। ‘आया राम और गया राम’ की कहावत हरियाणा की ही देन है। हरियाणा के राज्यपाल तपासे ने कहा था कि जिस तरह हम दिन में कई बार कपड़े बदलते हैं, वैसे ही यहां के विधायक दल बदलते हैं। भजनलाल स्वयं को दल-बदल का पी.एच.डी. बताते थे। वह भय व लालच दिलाकर पहले नेताजी का दिल बदलते थे और बाद में उसका दल बदलवा देते थे।

फरीदाबाद जिले के एक विधायक थे, जिनका नाम था, गयालाल। उन्होंने एक दिन के भीतर अनेक बार दल बदलकर रिकॉर्ड बना दिया था। उन्हीं के नाम पर ‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा बन गया। कभी वे देवीलाल के साथ जाते, तो अगले ही क्षण भजनलाल के पाले में जा बैठते थे। राज्यपाल तपासे ने देवीलाल को दो दिन बाद अपने समर्थक विधायकों की परेड कराने का फरमान जारी किया। देवीलाल ने कुछ निर्दलीय व कांग्रेस के विधायकों को पटाकर बहुमत सिद्ध करने की तैयारी कर ली थी। दोनों ओर विधायकों का आंकड़ा 36 ही था।

इसी बीच भजनलाल ने इंदिरा गांधी की शरण ली और तपासे पर दबाव डलवाकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर ली और देवीलाल मुंह देखते रह गए। भजनलाल ने 1980 के लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में जनता पार्टी का सफाया होने पर पूरी की पूरी जनता पार्टी की प्रदेश सरकार को, कांग्रेस सरकार बनाकर इंदिरा गांधी को दिखा दिया था कि वह वास्तव में दल-बदल के जादूगर हैं।

हरियाणा ने पूरे देश को दल-बदल का रास्ता दिखाया। इसीलिए केन्द्र्र सरकार को दल-बदल विरोधी कानून बनाना पड़ा था। क्रिकेट खिलाड़ी कपिलदेव ने तब कहा था- ‘भजनलाल तो मुझ से भी बेहतर खिलाड़ी हैं। मैं तो सिर्फ छक्के मारता हूं, वे तो अट्ठे भी मारते हैं।’

राजेन्द्र भारद्वाज

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