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निडर नाडिया और स्टंट फिल्मों का दौर

9 जनवरी, 1910 को पर्थ, आस्ट्रेलिया में जन्मी नाडिया का पूरा नाम मेरी इवांस था। पिता एक हरबर्ट इवान्स वेल्स ब्रिटिश सेना के मुलाजिम थे। ग्रीक मूल की मां मार्गरेट सरकस में ट्रेपीज कलाकार रह चुकी थी। पिता का तबादला होने पर वह भी पांच साल की उम्र में भारत आ गई। जब 1920 के दशक में वे मुम्बई आए तो वहां नाडिया ने बेले नृत्य सीखा। एक अमेरिकी ज्योतिषी के कहने पर उसका नाम नाडिया रख लिया गया था। उसके पिता जब इंग्लैंड वापस गए तब उसकी मां उसे लेकर भारत में ही रह गई।

ध्वनि के आगमन के बाद पौराणिक और फिर सामाजिक विषयों को लेकर बनने वाली फिल्मों के साथ-साथ एक नई धारा की शुरुआत हुई। हॉलीवुड की फिल्मों की तर्ज पर स्टंट फिल्में बड़े पैमाने पर बनने लगीं। इन फिल्मों में राजकुमारों और राजकुमारियों की दुनिया होती थी, जिनके दुश्मन हमेशा उनकी जान लेने की फिराक में रहते थे। ऐसे में कोई बड़ा नायक या नायिका उनकी रक्षा के लिए आ खड़े होते थे। तलवारबाजी और पिस्तौलबाजी के हुनर के ये मास्टर होते थे।

इनमें जो नाम सबसे आगे है, वह है नाडिया उर्फ हंटरवाली का। नाडिया की फिल्मों को वाडिया बंधु बनाते थे। इस वाडिया-नाडिया थ्रिलर देखने के रोमांच को गिरीश कर्नाड इन शब्दों में व्यक्त करते हैं: ”एक भले राजा को उसके षड्यंत्रकारी मंत्री ने कैद कर लिया है। राजा के पक्षधर प्रजा को पकड़ कर बंद कर दिया जाता है। अंत में राजकुमारी खुद स्थिति को सुधारने का संकल्प लेती है और अगले ही क्षण वह एक विशाल देहधारी गोरी औरत काले कपड़े पहनकर और चेहरे पर नकाब लगाकर एक ऐसी औरत में बदल जाती है जो घुड़सवारी, तलवारबाजी, तैराकी और कुश्ती में पारंगत है। चुटकियों में दीवारें फांद जाती है, उल्टी छलांग लगाकर जमीन से छत पर पहुंच सकती है। यही वह क्षण होता था, जिसकी प्रतीक्षा में दर्शक सांस रोके बैठे रहते थे। इस प्रसंग के आरंभ होते ही तीन आने की सीट वाली बैंचों पर बैठे लोगों की कतारें उत्साह से उठकर खड़ी हो ताजी थीं और चार आने की टिकट लेकर पीछे कुर्सियों पर बैठे लोग चिल्लाने लगते, ‘बैठ जा, ओ सुअर, बैठ जा।”

वह सच्चे अर्थों में नाडिया एक विश्व नागरिक थी। नाडिया आस्ट्रेलिया में पैदा हुई थी। उनके पिता अंग्रेज और मां यूनानी थी। पांच साल की उम्र में नाडिया भारत आ गई और 27 साल तक हिंदी सिनेमा पर राज किया। उन्हें लोग आज भी हंटरवाली या तूफान मेल के नाम से याद करते हैं। नाडिया हिंदी सिनेमा की पहली स्टंट क्वीन थीं।

9 जनवरी, 1910 को पर्थ, आस्ट्रेलिया में जन्मी नाडिया का पूरा नाम मेरी इवांस था। पिता हरबर्ट इवान्स वेल्स ब्रिटिश सेना के एक मुलाजिम थे। ग्रीक मूल की मां मार्गरेट सर्कस में ट्रेपीज कलाकार रह चुकी थी। पिता का तबादला होने पर वह भी पांच साल की उम्र में भारत आ गई। जब 1920 के दशक में वे मुम्बई आए तो वहां नाडिया ने बेले नृत्य सीखा। एक अमेरिकी ज्योतिषी के कहने पर उसका नाम नाडिया रख लिया गया था। उसके पिता जब इंग्लैंड वापस गए, तब उसकी मां उसे लेकर भारत में ही रह गई।

कुछ समय तक मां-बेटी मुम्बई में रहीं और फिर पेशावर चले गए। मेरी जब बड़ी हुई तो मां के काम में हाथ बंटाने के लिए नौसेना के एक स्टोर में सेल्स गर्ल बन गई। इसी दौरान रूसी बैले नर्तकी अस्त्रोवा से मुलाकात हुई और वह उससे बैले सीखने लगी। कुछ दिन तक एक रूसी सर्कस में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। बाद में बैले के प्रदर्शन भी करने लगी। देश भर में घूमकर उसने शो किए। ऐसे ही एक शो में वाडिया मूवीटोन के होमी वाडिया की नजर उस पर पड़ी। वाडिया ने लाहौर में अपने किसी परिचित के माध्यम से नाडिया के सामने फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव भेजा और सहमति मिलने पर स्क्रीन टैस्ट के लिए मुम्बई बुला लिया।

सन् 1934 में नाडिया को दो फिल्मों में काम करने के मौका मिला। एक फिल्म थी ‘देश दीपक’ और दूसरी ‘नूर-ए-यमन’। नीली आंखों वाली इस गोरी हीरोइन को लोगों ने खूब पसंद किया। लेकिन स्टार का दर्जा उसे मिला फिल्म ‘हंटरवाली’ से। उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत में रहने के दिनों में नाडिया ने घुड़सवारी भी सीख ली थी। बैले नर्तकी होने के कारण शरीर में लोच तो थी ही। कुछ समय सर्कस में काम करने के दौरान ट्रैपीज (रस्सियों के सहारे इधर से उधर कूदना) भी सीख ली थी। इन सब के मिश्रण से उसके स्टंट बेजोड़ बन गए थे। उसके बाद नाडिया ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हंटरवाली की सफलता से उत्साहित होकर सन् 1943 में होमी वाडिया ने इसका सीक्वल ‘हंटरवाली की बेटी’ बनाया। इसके बाद तो उसकी हिट फिल्मों की कतार लग गई। ‘टाइग्रेस’, ‘स्टंट क्वीन’, ‘मिस फ्रंटियर मेल’, ‘डायमंड क्वीन’, ‘जंगल प्रिंसेस’, ‘बगदाद का जादू’, ‘खिलाड़ी’ और ‘लेडी रॉबिन हुड’ ने उसे लोकप्रियता के सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। इनमें से ज्यादातर फिल्मों में उनके नायक जॉन कावस होते थे। इन दोनों को जोड़ी उतनी ही लोकप्रिय थी, जितनी बाद के दौर में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की। फर्क सिर्फ इतना था कि नाडिया ने शादी जॉन कावस के साथ नहीं बल्कि अपनी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक होमी वाडिया के साथ की। 1959 में वाडिया से शादी करके नाडिया ने फिल्मों से संन्यास ले लिया। इसके काफी समय बाद 1968 में नाडिया ने फिल्म ‘खिलाड़ी’ में एक छोटी सी भूमिका निभाई थी।

फिल्म इतिहासकार मनमोहन चड्ढा नाडिया की इन फिल्मों के बारे में लिखते हैं: ”इन फिल्मों की खूबी यह थी कि नाडिया सभी स्टंट खुद करती थी। इन स्टंट दृश्यों में — चलती रेलगाड़ी की छत पर एक आदमी को कंधे पर लादकर खड़े होना, शेर के पिंजरे में जाकर उससे खेलना, ढलान पर लुढ़कते रेल के इकलौते डिब्बे पर खड़े होकर लडऩा आदि सब कुछ शामिल था। असली समस्या यह थी कि उस दौरान चेहरे पर वीरता का भाव बनाए रखना भी जरूरी था। नायिका के चेहरे पर उभर हल्का सा भय का भाव कुर्सी के कोने पर बैठे दर्शक का मोहभंग कर सकता था।”

ऐसे ही एक स्टंट दृश्य के बारे ‘सेवंटी इयर्स ऑफ इंडियन सिनेमा’ में खुद नाडिया ने एक इंटरव्यू में बताया, ”बम्बई वाली नाम की एक फिल्म में मुझे एक बछड़ा उठाकर चलना था। आप कल्पना नहीं कर सकते, यह कितना कठिन काम था। बछड़ा बार-बार फिसल जाता था और उसके खुर मेरे शरीर में गड़ गए थे लेकिन यह भी जरूरी था कि चेहरे पर दर्द की परछाई तक न दिखे।” 8 जनवरी 1996 को मुंबई के कंबाला हिल अस्पताल में नाडिया की मौत हो गई।

 

सुरेश उनियाल

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