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ऐसी कहानियां ज्यादा नहीं

मार्गरेट हार्कनेश के उपन्यास ‘सिटी गर्ल’ पर विचार करते हुए एंगेल्स ने लिखा था कि ”यथार्थवाद, ब्योरे की सगाई के अलावा विशेष परिवेश में, विशेष चरित्रों का सगा चित्रण (भी) होता है।’ हाल ही छपी ज्ञानरंजन की ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ पढ़ते हुए एंगेल्स की यह बात अक्सर जेहन में उभरती रही है। ज्ञानरंजन की तीन कहानियां- ‘मृत्यु’, ‘अमरूद का पेड़’ तथा ‘चुप्पियां’ के तीन परिवेश और तीन चरित्र साम बहादुर, मां और मिन्नो देर तक और दूर तक हमारा पीछा करते हैं। वे हिंदुस्तान के आम चरित्र हैं और उनका परिवेश भी आम ही है। हमारा जाना-बूझा, देखा-समझा, चिर-परिचित परिवेश, जैसे ‘मृत्यु’ कहानी में बहुत एकांत और अनाकर्षक तिराहे की भूरी-सी गंजी टेकरी है, जहां से एक सड़क महोबे की तरफ जाती है और दूसरी छतरपुर की तरफ। यहां की किसी वस्तु के पीछे कोई चमकता इतिहास नहीं है। लेकिन उस भूरी टेकरी के नीचे, ठीक कोने में लटके हुए जीवन का एक लघुकालिक इतिहास है, छोटे-से व्यापार की तड़प और फिर सर्दी में ठिठुरती हुई मौत। नेपाल के टोलागंज का साम बहादुर, कर्ज के बोझ तले दबकर अपने खेत गंवाने के बाद, अपनी औरत को नेपाल में ही छोड़कर हिंदुस्तान भाग आया और मेरठ छावनी में सिपाही हो गया। घबराकर वहां से भागा तो फिर दृष्टा पात्र के साथ दिल्ली में पचकुइयां रोड पर डबल रोटी और लेमनचूस बेचकर पापी पेट को तसल्ली देने की कोशिश की। पर मामला वहां भी नहीं जमा। दिल्ली से उखड़कर वे दोनों सतना आदि शहरों में कुलीगीरी करते रहे और फिर तिराहे पर आ गए। गुमटी बनायी और छोटी-सी दुकान के जरिए स्थायित्व पाने की जी-तोड़ कोशिश करते रहे। कोशिश करते-करते वहीं साम बहादुर की मृत्यु हो गयी।

ज्ञानरंजन की यह कहानी साम बहादुर की मानवीयता और जिजीविषा को सामने रखकर अविस्मरणीय कहानी का दर्जा हासिल करती है। बिल्कुल भीष्म साहनी की ‘वांग्चू’ की तरह।

ज्ञानरंजन की कहानी ‘अमरूद का पेड़’ तथा ‘चुप्पियां’ की मां और मिन्नो की करुणा और पीड़ा को आसानी से नहीं भुलाया जा सकता। इनके मन में अंदर ही अंदर उमड़ती-घुमड़ती तकलीफ, प्रभावशाली भाषा और शिल्प में अभिव्यक्त हुई है। ज्ञानरंजन की भाषा और शिल्प में मोहक आयाम हैं, जो विशिष्ट ही नहीं, अति विशिष्ट हैं। अपनी संपूर्ण कहानियों में से ज्ञानरंजन ने जिन दस कहानियों को चुना है, उनमें ‘अमरूद का पेड़’ के अलावा ‘फेंस के इधर और उधर’, ‘पिता’, ‘घंटा’, ‘यात्रा’, ‘संबंध’, ‘छलांग’ तथा ‘शेष होते हुए’ के अलावा ‘बहिर्गमन’ आदि को शामिल किया है।

ज्ञानरंजन की कहानी ‘मृत्यु’ खुद ज्ञान की कहानियों में अपनी शृंखला नहीं बना पायी, वैसे ही जैसे असगर वजाहत अपनी कहानी ‘केक’ की नहीं बना पाए। समकालीन हिंदी कहानी की कडिय़ां ज्ञानरंजन की कहानी ‘मृत्यु’ से तो जुड़ती हैं, लेकिन उन्हीं की कहानी ‘गोपनीयता’ या ‘अनुभव’ से नहीं। जबकि ज्ञानरंजन के ‘अनुभव’ का प्रेत कभी-कभी युवा कथाकारों पर यदा-कदा आगे-पीछे से हमला करते देखा गया है।

कोई चार बरस पहले ज्ञानरंजन ने नब्बे अंकों के बाद ‘पहल’ का प्रकाशन स्थगित किया तो हिंदी जगत में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं। नामवर सिंह जैसे खांटी प्रगतिशील आलोचक से लेकर कृष्ण बलदेव वैद जैसे धुर कलावादी सर्जक तक ने एक स्वर में कहा था कि ‘पहल’ ने साहित्य के लिए कुछ खास नहीं किया। जबकि ज्यादातर लोगों का मानना है कि भारत जैसे देश के वैज्ञानिक, विकास के लिए ‘पहल’ ने काफी महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित की, जिसे देश भर के प्रबुद्ध पाठक पढ़ते और सराहते रहे। चार साल बाद ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ का प्रकाशन फिर शुरू किया तो फिर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं पढऩे-सुनने को मिल रही हैं।

 

बलराम

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