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गणितीय आकाश का ध्रुवतारा

श्रीनिवास रामानुजन अपनी मृत्यु के 93 वर्षों के बाद, गणित के क्षेत्र में आज भी ध्रुवतारा के समान चमक रहे हैं। उन्होंने 32 वर्ष 4 मास एवं 4 दिन के छोटे से जीवनकाल में गणित के क्षेत्र में जो कार्य किए, उन्हें सिद्ध करने के लिए दुनिया के गणित के विद्वान अब भी कार्यरत हैं।

रामानुजन ने 13 वर्ष की उम्र से अनुसंधान कार्य शुरु किया था। उन्होंने 15 वर्ष की उम्र से स्वयं से किए हुए कार्यों को नोटबुक में लिखने की शुरुआत की थी। एक प्रकार से कहा जा सकता है कि वह गणित को लेकर ही जन्मे थे और गणित के लिए ही जीवन भर समर्पण भाव से उन्होंने अपना कार्य किया। मृत्युशैया पर पहुंचने तक वह इसी कार्य में जुटे रहे। लन्दन में वह एक बार जब बहुत अधिक बीमार हो गए थे, तब प्रो. हार्डी उनसे मिलने के लिए गए। जाते समय रास्ते में वह सोच रहे थे कि ”रामानुजन का स्वास्थ्य खराब होने के कारण मैं उनसे आज गणित की कोई बात नहीं करुंगा। कुछ हल्की-फुल्की बात करना अच्छा रहेगा।” लेकिन जब वह रामानुजन से मिले तो उन्होंने कहा कि ”मैं जिस टैक्सी से आया उसका नम्बर 1729 था, जो अपशकुन संख्या है।” रामानुजन ने तुरन्त कहा- ”नहीं! नहीं, यह संख्या छोटी से छोटी संख्या है, जिसे दो भिन्न-भिन्न रूपों में दो संख्याओं के घन के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।” इस प्रकार विख्यात गणितज्ञ प्रो. लिटिलवुड का ठीक ही कहना था कि रामानुजन प्रत्येक संख्या के मित्र थे।

बीमारी में भी गणित की साधना
स्वदेश लौटने के बाद भी रामानुजन असाध्य बीमारी की अवस्था में भी गणित की साधना में लगे रहे। उनकी पत्नी जानकी देवी के शब्दों में कहें तो- ”पूरे समय पथारी में रहने के कारण उनकी पीठ एवं पैर में दर्द होता था। लेकिन उस दर्द की परवाह किए बगैर रामानुजन तकिया लगाकर बैठ जाते और स्लेट और पेन लेकर गणित के अनुसंधान कार्य में मग्न हो जाते थे।” मृत्यु के दो मास पूर्व 12 जनवरी 1920 को उन्होंने प्रो. हार्डी को अंतिम पत्र लिखा था। उसमें भी उन्होंने ”मॉक थीटा फंक्शन” पर मिले परिणामों को भेजा था।

रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 के दिन उनके मामा के घर तमिलनाडु के इरोड में हुआ था। उनके पिताजी श्रीनिवास आयंगर तंजाऊर जिले के कुंभकोणम गाँव में कपड़े की दुकान में मुनीम का कार्य करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत सामान्य थी। उनकी माता कोमलताम्मल धार्मिक प्रवृति एवं परम्परावादी महिला थी। परिवार से मिले धार्मिक संस्कारों के कारण रामानुजन भी सुबह पूजा-पाठ करते थे। वह हमेशा धोती पहनते और चोटी रखते थे।

कुल देवी ने मनाया मां को
जब रामानुजन को प्रो. हार्डी के माध्यम से इंगलैड जाने का निमंत्रण मिला तो उनकी मां ने स्पष्ट मना कर दिया था, क्योंकि उस समय समुद्र पार जाना अशुभ माना जाता था। रामानुजन की मां अपनी कुलदेवी ‘नामगिरी’ में अत्यंत श्रद्धा रखती थीं। मां को भय था कि उनके बेटे के संस्कार बिगड़ जाएंगे। उन्होंने कहा-”विदेश में लोग मांस, मंदिरा का सेवन करते है….. तो मेरे बच्चे पर भी कुसंस्कार हो जाएगा।” लेकिन बताते हैं कि एक दिन सुबह उनकी मां को कुलदेवी ने स्वप्न में दर्शन दिए। उनकी मां ने सुबह उठ कर कहा कि ”कल रात्रि कुल देवी मेरे स्वप्न में आयीं थीं और उन्होंने रामानुजन को ससम्मान अंग्रेजो के बीच में बैठे देखा। देवी ने उनको आज्ञा दी है कि मैं अपने पुत्र की इच्छा विरूद्ध कुछ न करूं।” रामानुजन ने भी माता को वचन दिया की वह भारतीय परम्परा एवं धर्म का पूर्ण पालन करेंगे और शाकाहारी भोजन ही लेंगे। इसके बाद 17 मार्च 1914 को रामानुजन ने इंग्लैण्ड के लिए प्रस्थान किया।

रामानुजन पढ़ाई में काफी आगे थे। इसलिए विद्यालयीन शिक्षा के समय उन्हें कई पुरस्कार एवं छात्रवृतियाँ भी प्राप्त हुई थी। परंतु गणित में विशेष रुचि के कारण गणित में उनका विशेष ध्यान था। इस कारण वह 11वीं की परीक्षा में अन्य सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हुए थे, परन्तु गणित की उत्तरपुस्तिका देखकर उनके शिक्षक आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने 16 वर्ष की आयु में विख्यात गणितज्ञ जी.एस. कार की पुस्तक में से ज्यामिति एवं बीजगणित के प्रेमय एवं सूत्र हल कर लिए थे। 1902 में त्रिघात एवं चतुर्घात समीकरण हल करने के तरीके खोज निकाल लिए थे। वह गणित में इतने विद्वान थे कि अपने विद्यालय के 1200 छात्रों की समय-सारिणी बनाने का कार्य वही करते थे। इस कार्य में उनके शिक्षकों को बहुत अधिक कठिनाई आती थी। लेकिन रामानुजन ने इस कार्य को पूरा कर अपने वरिष्ठ सुब्बीयर को दिया।

ग्यारहवीं की परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने के बाद परिवार की आवश्यकता के कारण वह ट्यूशन करने लगे। बाद में विवाह हो जाने के बाद कई स्थानों पर वह नौकरी के लिए भटकते रहे। इस कारण से उनका गणित का कार्य भी प्रभावित होता था। परन्तु उन 6 वर्ष के कठिन समय में डिप्टी क्लेकटर रामस्वामी अय्यर, प्रो. पी.वी. शेषु अय्यर, सी.वी राजगोपालचारी, रामचन्द्र राव आदि के सहयोग से नौकरी के साथ- साथ गणित का कार्य भी वह करते रहे।
प्रो. हार्डी की भूमिका

रामानुजन के जीवन में केम्ब्रीज के प्रो. हार्डी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। हार्डी ने जब रामानुजन का गणीतीय शोध कार्य देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने ब्रिटेन के अन्य गणितज्ञों, भारत के अंग्रेज अधिकारियों एवं मद्रास विश्वविद्यालय के विद्वानों से विचार-विमर्श कर रामानुजन को इंग्लैण्ड बुला लिया। उन्होंने रामानुजन को इंग्लैण्ड में केम्ब्रीज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो के रूप में प्रवेश दिला दिया। इतना ही नहीं उन्होंने रामानुजन के अध्ययन, शोध कार्य, छात्रवृति आदि दिलाने में सब प्रकार से सहयोग किया। जिस रामानुजन को अपने देश में 11वीं कक्षा पास करने का प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया, उसी रामनुजन को प्रो. हार्डी ने विश्व का महान गणितशास्त्री बनाने में अपनी महती भूमिका निभायी।
रामानुजन 1914 से 1919 तक इंग्लैण्ड में रहे। उस दरम्यान उनके जीवन में काफी उतार-चढ़ाव भी आए। प्रथम विश्वयुद्ध के कारण गणित में उनके कार्य में रुकावट आई। पूर्ण शाकाहारी होने के कारण उन्हें खान-पान में तो काफी कठिनाई रही। अत्यधिक ठंड के कारण वह बीमारी आदि समस्याओं के बीच भी घिरे रहे।

उपलब्धियां, नियुक्तियां और 37 शोध
उन्होंने 37 शोध-पत्र प्रस्तुत किए। उन्हें 19 मार्च 1916 को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि दी गई। 6 दिसम्बर 1917 को ”फैलो ऑॅफ लंदन मेथेमेटीकल सोसायटी” के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। फरवरी 1918 में वह केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सदस्य के रूप में नियुक्त हुए। उन्हें मई 1918 में प्रथम भारतीय के रूप में ”फैलो ऑफ रॉयल सोसायटी” बनने का सम्मान प्राप्त हुआ। 13 अक्टूबर 1918 को वह ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो चुने गए। इस घटना से रामानुजन को अपना जीवन सार्थक लगने लगा। ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो बन कर वह खुद को धन्य मानने लगे, क्योंकि उनके गुरू के समान, प्रो. हार्डी भी इसी पद पर ट्रिनिटी कॉलेज में ही कार्यरत थे।

छू लिया गणित का आसमां
श्रीनिवास रामानुजन ने 32 वर्ष की छोटी आयु में जीवनभर संघर्षरत रहकर गणित के क्षेत्र में सारी ऊंचाईयों को छू लिया था। उनके किए हुए शोध कार्य का पार्टिकल फिजिक्स, कम्प्यूटर साईंस, क्रायप्टोग्राफी, पोलिमर केमिस्ट्री, परमाणु भट्टी, दूरसंचार, कम्यूनिकेशन नेटवर्क, घात, न्यूकिलयर फिजिक्स, चिकित्सा विज्ञान आदि क्षेत्रों में अनुप्रयोग किए जा रहे हैं। उनकी तीन हस्तलिखित नोट बुक ‘टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ फंडामेन्टल रिसर्च’ ने प्रकाशित की थीं। इंगलैंड में अन्तिम दिनों में किए गए उनके कार्यों के 140 पृष्ठ अप्रैल 1976 में अमेरिका की ‘विस्कोन्सीन यूनिवर्सिटीÓ में विजीटिंग प्रोफेसर के रूप मे कार्य करने वाले प्रो. जोर्ज एन्ड्रयुज को ट्रिनिटी कॉलेज की पुस्तकालय में से अचानक मिल गए। प्रो. एन्ड्रयूज ने वे सारे पेपर ”रामानुजन की गुम नोटबुक” (द लॉस्ट नोटबुक ऑफ रामानुजन) नाम से प्रकाशित किए, जिस पर आज भी दुनिया के महान गणितज्ञ कार्य कर रहे है। अभी कुछ दिन पूर्व अमेरिका के गणितशास्त्री ने रामानुजन के अन्तिम पत्र में भेजे फॉम्र्यूले को सिद्ध करने का दावा किया है।

हंगेरियन गणितज्ञ की दिलचस्प घटना
इसी प्रकार 1921 में प्रसिद्ध हंगेरियन गणितज्ञ ज्योर्ज पोल्या ने प्रो. हार्डी से रामानुजन की नोटबुक का अध्ययन करने के लिए अनुमति ली थी। लेकिन कुछ दिन के बाद उन्होंने प्रो. हार्डी को वह नोटबुक वापस कर दी। प्रो. हार्डी के पूछने पर उन्होंने उत्तर दिया कि-”अगर मैं इसके परिणामों को सिद्ध करने के मायाजाल में फंस गया तो मेरा समग्र जीवन इसी में बीत जाएगा और मेरे लिए स्वतंत्र शोध कार्य करना संभव ही नहीं होगा।”

प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं दार्शनिक बट्रेड रसेल ने कहा कि-”प्रो. हार्डी एवं प्रो. लिटिलवुड ने ‘एक हिन्दू क्लर्क’ में ‘दूसरे न्यूटन’ को खोज निकाला”। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा कि-”भारत ही नहीं पूरे विश्व के गणितज्ञों के लिए रामानुजन निरंतर प्ररेणास्त्रोत बने हुए हैं।” प्रो. हार्डी ने कहा कि-”उन्होंने मेरे जीवन को समृद्ध बनाया है, मैं उनको कभी भूलना नहीं चाहता।” प्रो. हार्डी ने भारत के इस अद्भुत गणितज्ञ रामानुजन की तुलना विश्व के अन्य समकालीन विख्यात गणितज्ञों से करने के लिए गणित के तत्कालिकन विद्वानों को 100 में से अंक दिये थे, जिसमें स्वयं को 25, लिटिलवुड को 30, जर्मन गणितज्ञ हिलवर्ड को 80 और रामानुजन को 100 अंक दिए थे।

विनम्रता और सादगी
रामानुजन ने केम्ब्रिज यूनिवसिर्टी में इतने सम्मान प्राप्त किए, परन्तु उनके जीवन की सरलता, सादगी और भारतीयता को उन्होंने जीवन में यथावत बनाए रखा था। प्रो. के आनन्दराव रामानुजन के समय में ही किंग्स कॉलेज में थे। उनके अनुसार इतनी प्रसिद्धी मिलने के बाद भी रामानुजन स्वभाव से विनम्र थे। उनका रहन-सहन सादा और सुरूचिपूर्ण था। रामानुजन विदेश में भी अपने लिए स्वयं ही भोजन बनाते थे। वह कहते थे,-”यदि कोई गणितीय समीकरण अथवा सूत्र, किसी भागवत विचार से मुझे नहीं भर देता, तो वह मेरे लिए निरर्थक है।” उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। लिखते समय कागज खत्म हो जाता था तो वह लिखे हुए कागज पर लाल स्याही की मदद से सूत्र लिखने लगते थे। नौकरी के समय में पोर्ट ट्रस्ट के रास्ते से कागज इकट्ठा करके उपयोग करते थे। चैन्नई विश्वविद्यालय से जब उनकी 250 रूपए की छात्रवृति स्वीकार हुई, तब उन्होंने रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर कहा-”इसमें से मेरे घर का खर्च निकलने के बाद, जो बच जाए वह गरीब विद्यार्थियों के सहायता कोष में जमा करा दें।”

125वां जन्मदिवस साल: गणित वर्ष
सरकार ने श्रीनिवास रामानुजन के 125वें वर्ष को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया है। 22 दिसम्बर को गणित दिवस मनाया जा रहा है। लेकिनु भारत में श्रीनिवास रामानुजन के कार्य पर विशेष अनुसंधान नहीं किया जा रहा। केन्द्र एवं राज्यों की सरकारों तथा देश में गणित पर कार्य करने वाले विद्वानों एवं विश्वविद्यालयों को इस पर चिंतन करके कुछ ठोस कार्य करने के बारे में विचार करना चाहिए। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने देशभर में गणित वर्ष के निमित्त विभिन्न गतिविधियां चलाने की योजना बनाई है। उन्हें आगे भी जारी रखने का निश्चय किया गया है। रामानुजन के जीवन पर एक किताब भी प्रकाशित होने जा रही है।

श्रीनिवास रामानुजन का जीवन एवं कार्य मात्र भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के गणितज्ञों, शिक्षकों एवं छात्रों के लिए प्रेरणादायी है। आईए, श्रीनिवास रामानुजन के जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर, उनके कार्यों को आगे बढ़ाने एवं छात्रों को गणित के भय से मुक्त करने का संकल्प करें। यही श्रीनिवास रामानुजन को सच्ची श्रद्धांजली होगी।

 

अतुल कोठारी

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