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विलुप्त होने के कगार पर राष्ट्रीय पक्षी

अवैध शिकार के अलावा कीटनाशक जनित बीजों को खाना भी इस राष्ट्रीय पक्षी की मौत की बड़ी वजह है। हरियाणा के चौधरी चरण सिंह हिसार कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने इस तथ्य का पता लगाया था। 1999 में महेन्द्रगढ़ के रामपुरा के खेत में मृत पाए गए, एक मोर के परीक्षण में यह खुलासा हुआ कि इस पक्षी की मौत, हाल ही में बोए गए खेत के क्लोरपाइरीफ ोस विषाक्त बीज को खाने से हुयी है।

भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर धीमी मौत मर कर विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। अगर शीघ्र कदम नहीं उठाए गए, तो मोर जल्दी ही अतीत का विषय बन जाएगा। देश भर में मोरों की तेजी से गिरती संख्या का प्रमुख कारण सरकार की लापरवाही है।
देहरादून स्थित देश का एकमात्र वन्यजीव अध्ययन संस्थान ‘वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ ने देश भर में मोरों और मोरनी की कम होती संख्या पर पांच साल पहले सर्वे किया था। 1963 में राष्ट्रीय पक्षी घोषित होने के बाद मोर, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित जीव है।

2004-07 के दौरान किए गए सर्वे की रिपोर्ट को संस्थान ने 2010 में केन्द्रीय पर्यावरण एवं वानिकी मंत्रालय को भेजा था। रिर्पोट में देश भर में मोरों की गणना करने की सिफारिश की गई थी, जिससे मोरों के बारे में सटीक जानकारी हासिल की जा सके। लेकिन यह प्रस्ताव केन्द्रीय पर्यावरण एवं वानिकी मंत्रालय में धूल फांक रहा है। मंत्रालय ने इस प्रस्ताव का न कोई जवाब दिया और न ही सर्वे के लिए कोई कोष जारी किया। संस्थान के वरिष्ठ जीव वैज्ञानिक डॉ. एस. सत्यकुमार की मानें तो लोगों के सामने राष्ट्रीय पक्षी की वास्तविक संख्या सामने आने में काफी समय लग सकता है। मोरों की संख्या का अनुमानित आंकड़ा जुटाने में प्रो. बी.सी. चौधरी के साथ डॉ. सत्यकुमार महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।

रक्तरंजित निशान
नवंबर 2011 : राजस्थान की पीपुल फॉर एनिमल्स संस्था ने अपने सर्वे में खुलासा किया कि बीकानेर, नागौर, सीकर, चित्तौडग़ढ़ और बूंदी जिलों में अकेले नवंबर माह में 250 मोरों का अवैध शिकार किया गया।

सितंबर 2011: वन विभाग के अधिकारियों को थलावैपुरम के नजदीक विरुधनगर में अवैध शिकार में मारे गए चार मोर मिले।

अप्रैल 2013 : जिला वन अधिकारी एस. आर. यादव ने बाड़मेर जिले के जालोर मार्ग पर अटाकोरा गांव में अवैध शिकार के परिणामस्वरुप सात मोरों की मौत की पुष्टि की।

संरक्षित क्षेत्र से बाहर मोरों की घटती संख्या को देखते हुए, इस राष्ट्रीय पक्षी के जल्दी ही विलुप्त होने की आशंका पर शोधकर्ताओं का कहना है : ”भारतीय गांवों, कस्बों, शहरों और देश के विभिन्न हिस्सों में मोर व्यापक रूप से बिखरे हैं। इस प्रजाति को मानवजनित कारणों सहित कई खतरों का सामना करना पड़ता है। खेतों में कीटनाशकों का प्रयोग, गैर-वनाच्छादित क्षेत्रों में भूमि उपयोग के तरीके में बदलाव एवं मोरों के मांस तथा पंखों के लिए, उनका अवैध शिकार किया जाना प्रमुख कारण है। नियमित निगरानी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर यह जानने की जरूरत है कि भारतीय मोरों की संख्या बढ़ रही है, स्थिर है या घट रही है।” 2004 में भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किया गया सर्वे, राज्य सरकार, शौकिया पक्षी प्रेमियों, स्वयंसेवी संस्थाओं, पेशेवर शोध संस्थानों एवं पंचायतों के रिपोर्ट पर आधारित था। रिपोर्ट में इस पक्षी के आवास के निकट मानव बस्तियों और गैर-कानूनी व्यापार के कारण देश भर मंा मोरों की मौत में हो रही वृद्धि के मामले सामने आए थे। मोरों के निवास के कुल 1720 स्थानों के सर्वे में 448 राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों को शामिल किया गया था। संस्थान ने लगभग 300 जिलाधिकारियों से संपर्क किया था।

एक समय यह पक्षी हिमालय और उत्तर-पूर्व को छोड़कर संपूर्ण भारत में पाया जाता था। मोरों की घटती आबादी की मुख्य वजह है – बड़े पैमाने पर अवैध शिकार, खेतों में कीटनाशकों का प्रयोग, फसलों को बचाने के लिए किसानों द्वारा मोरों की हत्या। मोरों को उनके पंख और मांस के लिए मारा जाता है। बड़े पैमाने पर शहरीकरण और हरित क्षेत्र में कमी के कारण मोरों के निवास स्थानों पर खतरा मंडरा रहा है। गिरे हुए मोरपंखों के संग्रहण की अनुमति कानून द्वारा दिए जाने के कारण, शिकारी मोरों की हत्या करते हैं।

अवैध शिकार
जुलाई 2003 : नोएडा में 6 दिनों में 20 मोरों की मौत ने संदेह पैदा किया था। मोरों के हत्यारे सुरेश कुमार की गिरफ्तारी के बाद खुलासा हुआ कि वह मोरों का मांस खाने का आदी था। सुरेश ने बताया: ”मोर के मांस की लत लगने की वजह, उसका रसीला स्वाद और सुपाच्यता है। यह मुर्गे के मांस से ज्यादा ताकतवर होता है और खून को ज्यादा गर्म रखता है।”

फरवरी 2004 : दो वन्यजीव संरक्षक गुनराज सिंह और सुखदीप सिंह बाजवा ने पठानकोट के एसडीएम परणीत गोयल को होशियारपुर के जंगल में मोर, खरगोश और तीतर का शिकार करते हुए रंगे हाथ पकड़ा था। तीन साल की कैद और 10 हजार रुपये हर्जाने वाले इस गैर-जमानती अपराध में एसडीएम जमानत हासिल करने में सफल रहा था। भारतीय वन्यजीव संस्थान ने अपनी जांच में यह खुलासा किया था कि पक्षियों की मौत गोली लगने से हुई थी।

सर्वे का परिणाम भारत के 345 जिलों में मोरों की उपस्थिति की पुष्टि करता है। 174 जिलों में उनकी उपस्थिति की संभावना भी बताता है। विश्व वन्यजीव परिसंघ ने 1991 में भारत में मोरों के आकलन के लिए बड़े पैमाने पर सर्वे किया था। इस सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि 1947 में विभाजन के समय भारत में उपलब्ध कुल मोरों की संख्या का सिर्फ आधा रह गया है। वह समय दूर नहीं, जब विलुप्तता की श्रेणी में शामिल मोर भी शीघ्र ही पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे।

दिलचस्प बात है कि मुगलकाल से ही मोरों के रक्षा का रिवाज रहा है। मोर के मांस के शौकीन राजपरिवारों को छोड़कर, आम लोग इस पक्षी की हत्या करना पाप समझते थे।

उत्तराखंड वन्यजीव विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, मोरों की सबसे ज्यादा हत्या उनके समागम के समय होती है। उस समय शिकारी नृत्य करते मोरों की हत्या आसानी से कर देते हैं। इसके अलावा हर रात एक ही वृक्ष के नीचे मोरों के सोने की प्रवृत्ति, उनके पकड़े और हत्या किए जाने को और आसान बना देती है। मोरों को शिकारी बहुत बेरहमी से मारते हैं। पहले वे मोरों का सिर काटते हैं, उसके बाद ऊपर से चीरकर उनके पंखों को अलग कर लेते हैं। कुछ शिकारी इससे भी ज्यादा क्रूर होते हैं। पंखों को खून में गंदा होने से बचाने के लिए वे मोरों को पकडऩे के बाद उनके दोनों पैरों को तोड़ देते हैं। फि र उनके पंखों को नोचने के बाद हत्या कर देते हैं।

अवैध शिकार के अलावा कीटनाशक जनित बीजों को खाना भी इस राष्ट्रीय पक्षी की मौत की बड़ी वजह है। हरियाणा के चौधरी चरण सिंह हिसार कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने इस तथ्य का पता लगाया था। 1999 में महेन्द्रगढ़ के रामपुरा के खेत में मृत पाए गए, एक मोर के परीक्षण में यह खुलासा हुआ कि इस मोर की मौत, हाल ही में बोए खेत के क्लोरपाइरीफोस विषाक्त बीज को खाने से हुई है। मृत मोर के शरीर में क्लोरपाइरीफोस की मात्रा 0.7575 पीपीएम पायी गयी थी, जो निर्धारित सीमा से तीन गुना ज्यादा थी।

 

 

परविंदर संधू

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