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विधानसभा चुनाव और राजनीतिक दल

चारों राज्यों में असली लड़ाई कांग्रेस और भाजपा के ही बीच है। गौरतलब है कि इन चार राज्यों में तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और दिल्ली में मौजूदा सरकारें अपने विकास के दावे के बलबूते पिछले दो या ज्यादा टर्म से शासन में टिकी हैं। हालांकि आगामी चुनाव में विकास के दावे के साथ-साथ इन तीनों में भ्रष्टाचार व एंटी इनकंबेंसी जैसे मुद्दे भी जोर-शोर से उभर रहे हैं। इन चार राज्यों में से जहां मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है, वहीं दिल्ली व राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है।
आने वाले कुछ महीनों में उत्तर भारत के चार राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में विधान सभा चुनाव होने हैं। देश की दोनों बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। आगामी लोकसभा चुनावों से पहले चार राज्यों के ये चुनाव कई मायनों में इन दोनों दलों के लिए सेमीफाइनल या प्री-बोर्ड होने जा रहे हैं, क्योंकि इन चुनावों के जरिए ये दोनों दल न सिर्फ मतदाताओं में अपनी पैठ का आकलन करेंगे, बल्कि इनके नतीजों के आधार पर ही ये दोनों दल आम चुनावों के लिए अपनी भावी रणनीति को अंजाम देंगे। उससे भी बड़ी बात है कि इन चारों राज्यों में असली लड़ाई कांग्रेस और भाजपा के ही बीच है। गौरतलब है कि इन चार राज्यों में तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और दिल्ली में मौजूदा सरकारें अपने विकास के दावे के बलबूते पिछले दो या ज्यादा टर्म से शासन में टिकी हैं। हालांकि आगामी चुनाव में विकास के दावे के साथ-साथ इन तीनों में भ्रष्टाचार व एंटी इनकंबेंसी जैसे मुद्देे भी जोर-शोर से उभर रहे हैं। इन चार राज्यों में से, जहां मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है, वहीं दिल्ली व राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है। आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कोशिश जहां मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भाजपा के मजबूत किले को ध्वस्त करने की रहेगी, वहीं दिल्ली व राजस्थान में अपनी सरकारें बचाने की रहेगी। आगामी चुनाव में कांग्रेस डायरेक्ट कैश ट्रांसफर और खाद्य सुरक्षा बिल को जमकर भुनाएगी। पार्टी का मानना है कि इन दोनों के नाम पर उन्हें जनता का समर्थन मिल सकता है।

मध्य प्रदेश
इन राज्यों में सबसे बड़ा राज्य मध्यप्रदेश है। मध्यप्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें और लोकसभा की 29 सीटें हैं। 10 साल पहले कांग्रेस के दिग्विजय के कुशासन से त्रस्त जनता ने साध्वी उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा को भारी मतों से जीत दिलाई थी। यह बात और है कि तेज-तर्रार भाजपाइयों ने उमा को मध्यप्रदेश से दिल्ली भेज, पहले बाबूलाल गौर और फिर शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनवाया। दूसरी बार में भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और कांग्रेस ने सुरेश पचौरी के नेतृत्व में। पचौरी कांग्रेस की आंतरिक कलह के चलते चुनाव हार गए और शिवराज के सिर पर जीत का सेहरा सज गया। जिस तरह से केंद्र में तमाम नाकामियों, भ्रष्टाचार और विवादों के बावजूद कमजोर और आपसी कलह से जूझती यूपीए सरकार, बीजेपी की वजह से टिकी हुई है, कुछ ऐसा ही हाल मध्य प्रदेश का है। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद आंतरिक कलह और आपसी खींचातान के चलते कांग्रेस वहां जीत का भरोसा नहीं जुटा पा रही है। यही वजह है कि भाजपा इस बार भी मध्य प्रदेश से अपनी पिछली बार की उम्मीद लगाए बैठी है।

मध्य प्रदेश के सियासी माहौल को देखकर लगता है कि दमदार जनसर्मथन के होते हुए भी नेतृत्व के बिखराव के चलते कांग्रेस फिर हार का मुंह देख सकती है। दरअसल, केंद्रीय राजनीति में अपना खासा प्रभाव रखने वाले प्रदेश के दिग्गज नेताओं का आपसी टकराव ही वहां कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है। हालंाकि इस बीच कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश के नेताओं को एकता और भाईचारे का पाठ थोड़ा कड़े तेवरों में पढ़ाया है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश की चुनावी तैयारियों के मद्देनजर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेश के केन्द्रीय प्रभारी बी.के. हरिप्रसाद और प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया से कहा कि वह आपसी गुटबाजी और खींचातान को कम करने के लिए तत्काल कुछ करे। इसे देखते हुए राजधानी भोपाल में हुई एक बैठक में प्रदेश के तमाम दिग्गज नेता जुटे। बैठक में आसपी मनमुटाव भुलाकर प्रदेश में जीत के लिए काम करने की बात कही गई। खुद राहुल गांधी लगातार मध्य प्रदेश का दौरा कर नेताओं को एकजुट होकर प्रर्दशन करने की बात कह रहे हैं। दरअसल, राहुल भली-भांति जानते हैं कि मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार से परेशान जनता, कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में देख रही है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस कमलनाथ, सिंधियां, पचौरी और दिग्विजय के बीच बंटी हुई है। सभी मंच पर एक दूसरे का हाथ पकड़कर एक होने का नाटक करते हैं, लेकिन हर जिले में इन नेताओं के स्वार्थ के चलते पार्टी आम जनता का भरोसा जीतने में नाकाम हो रही है। प्रदेश अध्यक्ष भूरिया को कोई भी नेता मानने को तैयार नहीं है। वहां केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही जनकल्याण योजनाओं को राज्य सरकार अपने नाम से चला रही है। इसके साथ ही वह आम जनता में यह बात भी प्रचाारित कर रही है कि केंद्र सरकार भाजपा शासित प्रदेशों को पैसे देने में भेदभाव कर रही है। राहुल के लाख कोशिशों के बाद भी राज्य इकाई में कोई खास बदलाव नजर नहीं आ रहा। अगर टीम राहुल टिकट बंटवारे में जिताऊ उम्मीदवार चुनते हैं या बड़े नेताओं को उनके द्वारा सिफारिश किए गए उम्मीदवारों की जीत की जिम्मेदारी देती है तो मध्य प्रदेश में कुछ बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।

राजस्थान
इन चुनावों में दूसरा बड़ा राज्य है – राजस्थान। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है। राजस्थान में विधानसभा की कुल 172 सीटें और लोकसभा की 25 सीटें हैं। यहां कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती अपने किले को बचाना है। लेकिन यहां के जननेता और पार्टी के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत भाजपा से नहीं, परंतु टीम राहुल के सदस्य और केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी से परेशान हैं। पूरे पांच साल गहलौत के पैरों में जोशी की बेडिय़ां पड़ी रहीं, जिसके चलते गहलौत जिस गवर्नेंस के लिए जाने जाते हैं, वह ठीक से काम नहीं कर पाए। राज्य में काम तो हुए हैं, लेकिन अफसरशाही की मनमानी के चलते भ्रष्टाचार के तमाम आरोप सरकार पर लगते रहे हैं। इसके अलावा, कांग्रेस मंत्रियों से जुड़े विवाद भी कांग्रेस के लिए एक सिरदर्द बन सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस को यहां एक ही उम्मीद दिख रही है कि सामने वह भाजपा है, जिसने वसुंधरा के नेतृत्व में चुनाव लडऩे का ऐलान किया है। गौरतलब है कि वह भी भाजपा में पनप रही गुटबाजी के चलते लडख़ड़ा रही है। इतना ही नहीं, वसुंधरा व संघ के अहसज रिश्तों में भी कांग्रेस अपने लिए जीत की उम्मीद तलाश रही है। गौरतलब है कि संघ और वसुंधरा के बीच हमेशा रिश्ते तनावूपर्ण रहे हैं। राज्य में संघ के कार्यकर्ताओं की नाराजगी ही पिछली बार वसुंधरा के लिए हार का एक सबब बनी थी। माना जा रहा है कि संघ और वसुंधरा के बीच दूरियां अब भी कम नहीं हुई हैं। ऐसे में कांग्रेस भाजपा की आपसी लड़ाई को सामने रखते हुए अपनी सरकार बचाने के लिए लड़ रही है। कांग्रेस यहां बचाव की रणनीति अपनाना चाहती है। पार्टी की कोशिश रहेगी कि वह राज्य में केंद्र व राज्य सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रखकर फिर से सत्ता में आने का रास्ता साफ करे।

छत्तीसगढ़
हालिया नक्सली हमले ने प्रदेश में कांग्रेस की कमर बुरी तरह तोड़ी है। प्रदेश में उसके शीर्ष नेतृत्व को बड़ा झटका लगा है। प्रद्रेश में विधान सभा की कुल 172 सीटें और लोक सभा की 11 सीटें हैं। फिलहाल वहां भाजपा की सरकार है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ में अजीत जोगी के कुशासन और अहंकार से वहां की जनता इतनी नाराज थी कि उन्होंने भाजपा के रमण सिंह को लगातार दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया। इतना ही नहीं, 10 जनपथ का जोगी प्रेम राज्य के संगठन को भुगतना पड़ा। तमाम जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को बांधे रखने के लिए पार्टी को खासी मेहनत करनी पड़ रही है। दरअसल, रमण सिंह का शासन कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बना है। वहां रमण सरकार के विकास कार्यों ने बीजेपी को मजबूती दी है। रमण सिंह ने अपने खेमे में आपसी गुटबाजी पर काफी हद तक लगाम लगा रखी है। रमण सिंह की खासियत है कि उन्होंने दिल्ली के भाजपा के केंद्रीय व नागपुर स्थित संघ को भी साधे रखा है। हालांकि मौजूदा सरकार के भ्रष्टाचार से जनता परेशान तो है, लेकिन आपसी कलह से जूझती कांग्रेस वहां विकल्प देने में खुद को नाकाम पा रही है। जोगी के विद्रोही तेवर प्रदेश कांग्रेस से लेकर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व तक के लिए सिरदर्द साबित हो रहे हैं।

इसके अलावा, वहां पहले से ही अपने जीत के लिए जूझ रही कांग्रेस पर पिछले दिनों हुए नक्सली हमलों ने पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाया है। हमले में मारे गए पार्टी के नेता महेंद्र कर्मा और नंद कुमार पटेल के जाने से जो शून्य बना, उसे भरना मुश्किल होगा। हमले में घायल विद्याचरण शुक्ल भले ही बूढे हो चुके थे, लेकिन राज्य की जनता में उनकी जबरदस्त पकड़ थी। उन्हें पता था कि कांग्रेस के वापस आने के बाद भी उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। फिर भी 85 साल की उम्र में वह राज्य का दौरा कर रहे थे। नक्सली हमले में घायल होने के बाद, अस्पताल में उनकी मौत हो गयी। ऐसे में फिलहाल कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को फिर से खड़ा करना और अपने लोगों में आत्मविश्वास को जगाए रखना है। इस घटना के बाद वहां आम कांग्रेसी कार्यकर्ता का मनोबल बुरी तरह टूटा है। वहां पार्टी के सामने एक बड़ा संकट सामने आकर लडऩे वाले लोगों की कमी का खड़ा हो रहा है। इसके अलावा, जिस तरह से हालिया हमले की जांच की दिशा की सुई कांग्रेस के आपसी कलह की तरफ जा रही है, उससे भी कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ऐसे में कांग्रेस को वापस सत्ता में आने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा।

दिल्ली
दिल्ली में सरकार भले ही आधी हो, उसके पास ज्यादा अधिकार न हो, लेकिन देश की राजधानी होने के नाते यहां सत्ता में आना हर बड़ी पार्टी का मकसद होता है। प्रद्रेश में विधानसभा की कुल 70 सीटें और लोक सभा की 7 सीटें हैं। कांग्रेेस के पास शीला दीक्षित नाम का एक ऐसा पत्ता हाथ में हैं, जो लगातार तीन बार पार्टी को सत्ता में ले आया। हालंाकि इस समय भाजपा ने काफी आक्रामक रुख अपनाया है, लेकिन जिस गुटबाजी से कांग्रेस परेशान है, वह रोग भाजपा में भी फैल चुका है। कमजोर केंद्रीय नेतृत्व के चलते दिल्ली में उसका इलाज हो पाएगा, यह कहना मुश्किल है। गौरतलब है कि इस चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी शरीक हो रही है। देखना यह है कि केजरीवाल किसको ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं- भाजपा को या कांग्रेस को। गुजरात में जैसा कि लग रहा था कि केशुभाई पटेल का विद्रोह सिर्फ भाजपा को नुकसान पहुंचाएगा, लेकिन सौराष्ट्र में केशुभाई ने कांग्रेस को भी निपटाया। भ्रष्टाचार, महंगाई व एंटी इंकंबेंसी अगर कांग्रेस के खिलाफ जा रही है तो केंद्र सरकार के प्रति लोगों का गुस्सा शीला के खिलाफ माहौल को और हवा दे रहा है। गैंग रेप मामला, कॉमन वेल्थ गेम्स घोटाले, महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अब लोगों के मन में कांग्रेस सरकार के प्रति आक्रोश है। हालांकि शीला सरकार ने कई अनियमित कॉलोनियों को नियमित कर, कैश ट्रांसफर योजना को लागू कर व गैस सब्सिडी वाले सिलेंडरों की तादाद बढ़ाकर, आम लोगों का भरोसा जीतने की कवायद तो शुरू की है, लेकिन इसका कितना फायदा उनको मिलेगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। अगर केंद्र सरकार केंद्रीय कर्मचारियों के रिटायरमेंट की उम्र 60 से 62 करती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा कांग्रेस को दिल्ली में होगा। आपसी कलह में उलझी भाजपा के सामने शीला अगर चौथी बार जीतती हैं तो इतिहास बनाएंगी और भाजपा के लिए सबसे बड़ी किरकिरी साबित होगी।

राहुल गांधी
बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात की हार के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ता अपने युवराज राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर नाउम्मीद से होने लगे थे। मीडिया भी राहुल की कार्यशैली को लेकर अपनी-अपनी तरह समीक्षा करने में जुटा था। हालंकि राहुल गांधी इन सबसे दूर अपने संगठन को मजबूत करने में लगे थे। उनका देश भ्रमण चल रहा था। जिन प्रदेशों में वह हार गए, वहां की समीक्षा करने में लगे थे। नेताओं से बेबाक राय मांग रहे थे। इसी दौरान उत्तराखंड और हिमाचल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा से सत्ता छीन ली। पंजाब की हार से राहुल को यह बात समझ में आई कि आपसी फूट के चलते जीता हुआ चुनाव कैसे हार में तब्दील हो जाता है। हालंकि गुजरात में राहुल गांधी ने परदे के पीछे से रहकर कुछ रणनीतिक प्रयोग किए, जिसका नतीजा हुआ कि कांग्रेस ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन जैसा कि होता है कि अंत में लोग किसी भी व्यक्ति या संगठन का आकलन उसकी सफलता या असफलता से करते हैं, उसके पैमानों के आकंड़ों से नहीं, इसलिए राहुल की कोशिश नेपथ्य में ही रह गई।

इसके बाद दक्षिण के बड़े राज्य कर्नाटक में चुनाव का ऐलान हुआ। भाजपा पहली बार दक्षिण में सत्ता में आई थी। वापस सत्ता में आना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न था। राहुल के पार्टी उपाध्यक्ष बनने के बाद हो रहे पहले चुनावों में उनकी साख पहली बार खुलकर दाव पर लगी। इस बार भाजपा की अंतर्कलह का फायदा उठाते हुए पूरी योजना के साथ टीम राहुल ने कर्नाटक में चुनाव लड़ा। टिकट बंटवारे से लेकर नेता चुनने तक का सारा काम टीम राहुल ने संभाला और कर्नाटक में कांग्रेस भारी बहुमत से जीती। कर्नाटक चुनाव के पहले पार्टी द्वारा जयपुर में आयोजित मंथन शिविर में राहुल को पार्टी का उपाध्यक्ष नियुक्त किए जाने के दौरान राहुल ने जो भाषण दिया था, उससे लग रहा था कि पार्टी का युवा नेतृत्व पार्टी में सफाई चाहता है। आयाराम गयाराम, गणेश परिक्रमा करने वाले, भाई भतीजावाद की पैरवी करने वाले और चाटुकारों को अब पार्टी में जगह नहीं मिलेगी। लेकिन उसके बाद जिस तरह से कर्नाटक में टिकट बंटवारे में धनकुबेरों की चली, भाई भतीजावाद पनपा, जमीन से जुड़े कांग्रेस के कार्यकर्ता जमीन पर ही पड़े रहे, उससे राहुल की सोच को एक बड़ा झटका माना गया। फिर जब मुख्यमंत्री पद की बात आई तो कई घाटों का पानी पीकर कांग्रेस का दामन पकडऩे वाले सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया। उससे एक बात तो स्पष्ट हुई कि राहुल गांधी की बातें फिलहाल पार्टी सैद्धांतिक तौर पर ही देख रही है। चुनाव जीतने के लिए राहुल ने उन तमाम बातों से समझौता किया, जिसे वह बुराई के रूप में देख रहे थे। हालांकि बावजूद इसके, राहुल ने हिम्मत नहीं हारी है। वह लगातार एक तरफ अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संगठन की मजबूती और एकजुटता का पाठ पढ़ा रहे हैं तो दूसरी तरफ अनुशासन का सख्ती से पालन करने का संकेत अपने कड़े रुख के जरिए दे रहे हैं। पिछली हार और जीत के बाद राहुल फिलहाल आपसी कलह से जूझ रही अपने प्रदेश इकाइयों को एक ही पाठ पढ़ाने में जुटे हैं – अगर आपस में लड़कर लड़ोगे तो पंजाब होगा और आपस में मिलकर लड़ोगे तो हिमाचल और कर्नाटक।

 

 

अशोक वानखड़े

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