ब्रेकिंग न्यूज़ 

संवेदनाओं की मौत

वैसे यहां मैं क्रिकेटर शिखर धवन की तारीफ करना चाहूंगा कि उन्होंने अपना गोल्डनबैट पुरस्कार हादसे के शिकार तीर्थयात्रियों को समर्पित किया! धन्यवाद शिखर! तुमने अभी उम्मीदों को जिंदा रखा है!

महेन्द्र सिंह धोनी ने रविवार को इंग्लैण्ड के एजबेस्टन में चैम्पियन ट्रॉफी लेते वक्त उत्तराखंड की भीषण त्रासदी के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला। हालांकि उनका पैतृक गांव उत्तराखंड के अल्मोड़ा में ही है। न ही इतने बड़े हादसे के बाद भारतीय टीम ने मैच के दौरान मृत तीर्थयात्रियों से संवेदना व्यक्त करने के लिए कोई काली पट्टी बांधी। सोचिये, अगर मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में कोई छोटा-मोटा भी हादसा हुआ होता तो किस तरह सारे खिलाड़ी और बीसीसीआई शोक मना रहे होते!

ऐसा नहीं कि इस भयानक त्रासदी के प्रति संवेदनहीनता सिर्फ क्रिकेटरों तक सीमित है। राहुल गांधी को त्रासदी के आठ दिन बाद हादसे की सुध आई, क्योंकि उससे पहले वह विदेश में अपना जन्मदिन मनाने में व्यस्त थे। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पहले तो हादसे के तुरंत बाद दिल्ली आ गए और फिर उनकी स्विट्जरलैंड यात्रा की कहानियां चलती रहीं।

आज ही मैंने फेसबुक पर एक बड़ी मल्टी नेशनल विज्ञापन एजेंसी के अधिकारी की टिप्पणी पढ़ी कि अगर उत्तराखंड के दुकानदारों ने मुसीबत में पड़े तीर्थयात्रियों से एक रोटी के 250 रूपये और पानी की बोतल के 300 रुपये मांग भी लिए, तो क्या बुरा किया। यह तो मांग और पूत्र्ति का नियम है। उसके माल की मांग ज्यादा थी, सो उसने ज्यादा कीमत वसूली!!

और तो और छोटी-मोटी घटनाओं को इवेंट बना कर बेचने वाले टीवी चैनलों के बड़े-बड़े एंकर-एडिटर, जो कि हर जगह ‘घटना-स्थल से लाइव’ करने खुद पहुंचते रहे हैं, त्रासदी के हफ्ते भर बाद भी अपने स्टूडियो तक सीमित हैं, क्योंकि देश के गांव-गांव से आए हुए इन तीर्थ यात्रिओं की न तो कोई एक आवाज है और न ये टीआरपी बढ़ाने वाले हैं। इसलिए इस हादसे की विभीषिका कितनी भी तीव्र क्यों न हो, मरने वालों का आंकड़ा कई हजारों में क्यों न पहुंच जाए, लोगों की तकलीफें कितनी गहरी क्यों न हों – जब तक ये बाजार में बेचने लायक नहीं हैं, तब तक इसका कोई मोल नहीं है।

सारी दिक्कत यही है। पिछले दो दशकों में देश में हर चीज का बाजारीकरण हो गया है। हमारे रिश्ते-नाते, भावनाएं, व्यवहार, हादसे, उत्सव – सब जैसे अब नफा-नुकसान की तराजू में तोले जाते हैं। सब ‘प्रोफेशनल’ हो गया है – किसका, किससे कितना फायदा और किसका, किससे कितना काम? अब इस विशुद्ध धंधेबाजी के दौर में ये तीर्थयात्री न तो किसी के बाजार हैं और न ही वोट बैंक। तो फिर इनके लिए कौन बेवजह परेशान हो?

यही अगर किसी एक वोट-बैंक के साथ हुआ होता, तो दुनिया देखती कि किस तरह हर पार्टी अपने झंडे लगाकर गांव-गांव में ‘सेवा कार्य’ में जुटी होती? किस तरह पार्टियों ने अपने संसाधन झोंक दिए होते। बड़े-बड़े नेता किस तरह तम्बू गाड़ कर बैठ जाते। यह कम त्रासदी नहीं है कि हादसे के पहले कुछ दिनों में उत्तराखंड में राहत और बचाव कार्यों के लिए हेलिकॉप्टरों की कमी थी। अगर देश के बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा उन हेलिकॉप्टरों और छोटे विमानों को ही, जिनमें उनके नेता घूमते रहते हैं, प्रदेश में भेज देते तो कई जानें बचाई जा सकती थी।
आजादी के बाद देश में आई बड़ी और भयानक प्राकृतिक विपदाओं में से एक है, उत्तराखंड की यह विपदा। इसका घाव और भी गहरा है, क्योंकि देश के तकरीबन हर राज्य से कोई न कोई इसका शिकार जरूर हुआ है। मरने वालों की संख्या हजारों में हो सकती है। संपत्ति के नुकसान का अंदाजा लगाने में बहुत समय लगेगा। अगर यह राष्ट्रीय विपदा नहीं है तो क्या है? पर विचित्र बात यह है कि देश का सत्ता-प्रतिष्ठान सिर्फ सेना और अफसरों के हाथ बचाव और राहत कार्य छोड़ कर बैठा है। उसकी अपनी संवेदनाएं जैसे मर गई हैं।

वैसे यहां मैं क्रिकेटर शिखर धवन की तारीफ करना चाहूंगा कि उन्होंने अपना ‘गोल्डन बैट’ पुरस्कार हादसे के शिकार तीर्थयात्रियों को समर्पित किया! धन्यवाद शिखर! तुमने अभी उम्मीदों को जिंदा रखा है!

 

उमेश उपाध्याय

никас кухнялобановский класс

Leave a Reply

Your email address will not be published.