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विनाश को खुद ही दावत दी है, तो रोना क्यों?

राजनीतिक छींटाकसी चलती रही। लेकिन जिस भावना के साथ सेना, वायु सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ के जवानों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर इस विनाश में फंसे लोगों को निकाला और अन्य राहत पहुंचाई, उसके लिए उन्हें उदय इंडिया का सलाम।
दिल्ली का यमुनापार इलाका भूकम्प के अति संवेदनशील क्षेत्रों में आता है। कुछ दिन पहले यमुनापार निवासियों के मोबाइलों पर संदेश मिले थे कि किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा आने की स्थिति में बचाव के लिए क्या किया जाना चाहिए, इसे समझने के लिए वे एसडीएम के कार्यालय में सम्पर्क करें। इस संबंध में आम नागरिकों के लिए बचाव-कार्यक्रम भी बनाए गए थे। बाद में पता चला कि एसडीएम के कार्यालय में पंहुचने वाले लोगों को ‘कुछ’ समझाया गया था कि आपदा आने पर उन्हें तुरन्त क्या करना चाहिए। मुख्य रूप से उन्हें बताया गया था कि भूकम्प के वक्त आम आदमी को अपना बचाव कैसे करना चाहिए। इसी संदर्भ में रेडियो पर भी जनहित में प्रसारित संदेश सुनाई देते रहे। अखबारों में भी आपदा में बचाव की मॉक ड्रिल की सुर्खियां, तस्वीरों के साथ देखने को मिलती रहीं।

यही सब देख-सुन कर दिल को सुकून मिलता था कि सरकार आम आदमी के लिए सजग हो गई है और आपदा प्रबंधन के बारे में बचाव के उपाय समझा रही है। लेकिन साथ ही मन में सवाल उठा करता था कि यदि भूकम्प आ ही जाएगा तो क्या जो कुछ सरकार समझा-सिखा रही है, वह सब वैसे की कुछ किया जा सकेगा। उस वक्त खुद प्रशासन क्या करेगा? यह सवाल भी जेहन में उठता था कि आपदा के वक्त या उसके तुरन्त बाद क्या सरकार के अधिकारी उतने ही सजग होंगे जितना कि वे इन मॉक ड्रिल में दिखाई देते हैं।

इन सवालों के जवाब सरकार या उसके अधिकारियों से दिल्ली में तो नहीं मिल सके, लेकिन इसी महीने एक दिन 16 जून हुए को उत्तराखंड में प्रलयंकारी जल-प्लावन के शिकार लोगों की हालत देख-सुन और जान कर इन सवालों के जवाब जरूर मिल गए। उत्तराखंड में उस दिन केदारनाथ में हुई जल-प्रलय के विनाश की तांडव लीला ने केदारनाथ के मंदिर को छोड़ कर सब कुछ बहा दिया। केदारनाथ में उस दिन मन्दाकिनी ने और उत्तरकाशी में अलकनन्दा ने जो तबाही मचाई, उसकी कल्पना करना मुश्किल है। उत्तरकाशी में पिछले साल आई बाढ़ से मकानों की नींव खोखली होने की जानकारी सरकार, प्रशासन और यहां तक कि आम जनता को मिला कर सब को थी। इस बात की आशंका भी सभी को थी कि तबाही कभी भी हो सकती है, लेकिन ऐसी तबाही होगी, इसका अनुमान किसी को नहीं था।

सरकार रही गाफिल
चार दिन तक तो वहां हुई जल-प्रलय की विनाश लीला की अधिक जानकारी दिल्ली को तो छोडि़ए, राज्य सरकार के सचिवालय तक भी नहीं पहुंची थी। कितने लोग इस विनाश लीला के शिकार हुए, यह कहना 27 जून को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी संभव नहीं था, लेकिन उसका अनुमान इससे जरूर लगाया जा सकता है कि उस दिन केदारनाथ, जोशीमठ, अगस्तमुनि, रूद्र प्रयाग में सामूहिक अन्तिम संस्कार के लिए 822 शव पड़े थे।

मन्दाकिनी और अलकनन्दा की उफनती नदियों से हुए विनाश की जानकारी, राज्य सरकार तक ठीक से न पहुंच पाने की यह एक बानगी है, भारत में आईटी के युग की। भारत के युवा पूरे विश्व में सूचना संचार क्रांति की धूम मचाए हैं, लेकिन अपने ही देश की सरकार, उनकी क्षमताओं का उपयोग करने में असमर्थ है। एक राज्य में भारी विनाश लीला हो जाए और दिल्ली को तो क्या, उस राज्य की सरकार को ही उसकी गहराई का पता नहीं लगे, इसे क्या कहा जाएगा?

बादल के फटने से लेकर भारी वर्षा होना, जल की ही नहीं बल्कि भारी पत्थरों की भी बरसात हो जाना, ग्लेशियर का टूटना आदि प्रलय के लिए जो कुछ भी कल्पना की जा सकती है, वह सब उन दिनों वहां हुआ। भगवान शिव ने केवल अपने मंदिर की रक्षा की और बाकी सब काल कलवित कर दिया। केवल केदारनाथ ही क्यों, प्रकृति की इस विनाश लीला ने लगभग पूरे उत्तराखंड को ही चपेट में ले लिया था। लेकिन उत्तराखंड और केन्द्र-दोनों जगहों पर सरकारें इस विनाशलीला से पूरी तरह गाफिल हो कर चैन की बंसी बजाती रहीं।

इस सब को टेलीविजन पर देख कर और अखबारों में पढ़ कर इस तथ्य पर अब ज्यादा आश्चर्य नहीं होता कि 1962 में चीन के आक्रमण की सूचना सरकार को अपने तन्त्र से नहीं बल्कि भारतीय सेना को एक गड़ेरिए से मिली थी। उस वक्त तो सूचना एवं संचार तन्त्र इतना तेज नहीं हुआ था और तकनीक ने पूरे विश्व को एक छोटे से गांव में तब्दील नहीं किया था। अब तो बात कुछ अलग ही है।

यह पहला मौका नहीं था जब प्रकृति ने हमें इस प्रकार झंझोड़ा हो। छोटी-मोटी प्राकृतिक आपदाएं तो इतने बड़े देश में कहीं न कहीं आती ही रहती हैं, लेकिन बड़ी आपदाएं भी कम नहीं आईं। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब सुनामी ने अपना तांडव मचाया था। उस वक्त यदि हमने सीख ली होती तो शायद उत्तराखंड की इस भयानक त्रासदी में भी काफी कुछ बचाया जा सकता था। इस त्रासदी ने एक बार फिर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की सजगता की पोल खोल दी है कि सारी योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रहती हैं। राज्य के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की एक भी बैठक न होना किस ओर संकेत करता है, यह लिखने की आवश्यकता नहीं है। आपदा प्रबंधन पर मिला पैसा खर्च न होना क्या बताता है, इसके बारे में कुछ भी कहने की क्या अब भी कोई जरूरत है?

बदल गया है प्रकृति का पूरा चक्र
यदि गौर करें और प्राकृतिक आपदाएं आने के कारणों में जाएं तो उसके लिए विशेष चिंतन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा तो आम हो चुकी है। अब छोटा सा बच्चा भी जान गया है कि असंतुलित विकास ने प्रकृति के पूरे चक्र को ही बदल दिया है। इंसान के लालच ने, न जंगल छोड़े हैं और न ही पहाड़ों को बख्शा है। नदियों को अवरूद्ध कर उनकी शक्ति को चुनौती दे डाली है। नदियों के मार्ग बदल कर उन्हें उत्तेजित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। नदियों पर बड़े-बड़े बांध बना कर उनकी संरचना बिगाड़ दी है। औद्योगिकीकरण के लिए जंगल के जंगल काट डाले हैं। उनके स्थान पर पर्याप्त मात्रा में पेड़ नहीं लगाए गए हैं। ओजोन कवर में छिद्र होने के दुष्परिणामों की बात सभी करते हैं, लेकिन उसे बढऩे से रोकने के लिए जो समुचित उपाय किए जाने चाहिएं, उनके लिए विकास की गति को कोई नहीं रोकना चाहता। बेशक उसके परिणाम उत्तराखंड की विनाश लीला के रूप में सामने आएं या फिर सुनामी के तौर पर।

उत्तराखंड में पिछले साल ही 3 अगस्त 2012 को आई बाढ़ ने यहां की इमारतों की नींव खोखली कर दी थी। इस विनाश लीला ने इमारतों को भरभराकर गिराने और उन्हें अपने साथ बहा ले जाने की केवल औपचारिकता पूरी की है।

आशंका सबको थी
इस प्रकार की प्राकृतिक विपदा के आने की आशंका सब को थी, लेकिन सभी केवल किसी और के आने की जैसे इंतजार करते रहे कि कोई कहीं से आएगा और उनके लिए आपदा प्रबंधन के लिए जादू से कुछ कर देगा। वे सुरक्षित हो जाएंगे।

आपदा का भयानक दौर निकल गया है, लेकिन अपने पीछे विनाश के ऐसे चिह्न छोड़ गया है, जिन्हें भरने में अभी लंबा समय लगेगा। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि हम नहीं सुधरे तो उसे पुन: आने में देर नहीं लगेगी। वास्तव में इस विनाश को हमने ही दावत दी थी, और उसने दावत कुबूल कर ली। धार्मिक स्थलों को पिकनिक स्थल बना लेना, सभी नियमों को ताक पर रख कर नदियों के मार्गों का अतिक्रमण करना, जंगलों के जंगल काट कर पहाड़ों का नंगा कर देना, केवल कागजों में ही वृक्षारोपण करना विनाश को दावत देना नहीं है, तो और क्या है? पुराणों के अनुसार चार धाम की यात्रा जीवन के उस मोड़ पर की जाती है, जब व्यक्ति अपनी सभी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका हो। यानी जब जीवन के चार में से तीन पड़ाव-बाल आश्रम, ब्रह्मचर्य आश्रम और गृहस्थ आश्रम पार कर लिए हों और वह अपनी विरासत अपनी सन्तान को सौंपने की तैयारी में हो। उसे संन्यास आश्रम कहते हैं। लेकिन प्रकृति की विनाश लीला से बच कर लौटने वालों और बाढ़ में बह जाने वालों में बच्चे भी शामिल हैं।

असल में हमने आधुनिकता के रंग में रंग कर पवित्र धार्मिक स्थलों को पिकनिक स्थलों में बदल डाला है। जिन पवित्र धामों में कुटिया डले आश्रम बने होते थे, अब वहां बड़ी इमारतें हैं। यात्रियों से अधिक पैसा वसूलने के चक्कर में नदी का स्थान छोड़ा ही नहीं और रिवर व्यू देने के लिए सभी नियमों को ताक पर रख कर नदी के पाट पर ही गैस्ट हाउस, होटल और अन्य व्यावसायिक इमारतें बना डाली हैं। अधिकारियों को घूस देकर तो अपना काम निकाल लिया लेकिन प्रकृति तो घूस लेती नहीं है। इन पवित्र स्थानों पर मांसाहार और शराब का खुल्लमखुल्ला सेवन होता है। हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वतमाला है। उस पर सड़कों का निर्माण जबर्दस्त विस्फोट करके किया जाता है। उससे पूरा पहाड़ दरक जाता है। विकास की अवैज्ञानिक गतिविधियों के परिणाम सामने हैं।

नेताओं का आलम भी अलग रहा। इस कयामत में भी उन्होंने राजनीतिक रोटियां सेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राजनीतिक छींटाकसी चलती रही। लेकिन जिस भावना के साथ सेना, वायु सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ के जवानों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर इस विनाश में फंसे लोगों को निकाला और अन्य राहत पहुंचाई, उसके लिए उन्हें उदय इंडिया का सलाम। ‘सूर्य होपÓ में राहत और बचाव कार्यों के दौरान मौसम इन जवानों के मार्ग में जितनी रूकावट डाल सकता था, उतनी रूकावट डालने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कि बचाव कार्य में लगा वायु सेना का एक हेलिकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त भी हो गया और नौ अधिकारियों को अपनी जान न्यौछावर करनी पड़ी।

चिन्ता करें स्थानीय लोगों की
इस विनाश लीला के बाद पुनर्निर्माण का समय आ गया है। राहत कार्यों के बाद और सभी फंसे हुए यात्रियों को निकाल लेने के बाद जो कुछ बच गया है, उस पर पुनर्निर्माण होना है। राज्य का विकास बहुत पीछे चला गया है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि विकास की अंधी दौड़ में आगे निकलने के लिए अगली विनाश लीला को दावत दी जाए। स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी की चिन्ता और उनके लिए पुनर्वास की जरूरत है। हालात वहां महामारी को भी दावत दे सकते हैं। पुनर्निर्माण की दिशा में आगे बढऩे से पूर्व पूरी सावधानी बरतने की जरूरत है। इसके लिए स्थानीय आवश्यकताओं और जरूरी पैरामीटर्स के दायरों को ध्यान में रख कर ही सभी कदम उठाए जाने चाहिएं। तुरन्त की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर उठाए जाने वाले कदमों के अतिरिक्त दीर्घावधि की योजनाओं में भी पूरी सावधानियां रखी जानी चाहिएं। क्योंकि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी यदि हम ने अब कोई सबक नहीं सीखा, तो कब सीखेंगे? फिर तो भगवान भी हमारा कल्याण नहीं कर सकता।

 

श्रीकान्त शर्मा

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