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नाजुक पहाड़ों से न करें खिलवाड़

उत्तराखंड की त्रासदी से आज पूरा देश हिल गया है, लेकिन इस महाविपदा की पूर्व चेतावनी हमें पिछली विपदाओं से मिल गई थी। हैरानी की बात यह है कि हमने अतीत की घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा। आज हम जो इस पहाड़ी राज्य में देख रहे वह दरअसल पिछली आपदाओं का ही विराट रूप है। उत्तराखंड और दूसरे पहाड़ी राज्य पर्यावरण की दृष्टि से बेहद नाजुक और संवेदनशील हैं। बेतरतीब निर्माण कार्यों और अवैध खनन से यहां का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। इन क्षेत्रों में तीर्थस्थलों और हिल स्टेशनों की मौजूदगी से भी मानवीय गतिविधियां बढ़ रही हैं। इन सब का हिमालय के पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। 2010 और 2012 में राज्य में आकस्मिक बाढ़ और भूस्खलनों से काफी नुक्सान हुआ था। इन आपदाओं के अध्ययन से स्पष्ट हो गया था कि मनुष्य का बढ़ता हुआ दखल ही पहाड़ों के मौजूदा संकट के लिए जिम्मेदार है। उत्तराखंड डिसास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल ज्यादातर तबाही भगीरथी नदी के आसपास हुई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अधिकतर निर्माण कार्य गलत जगहों पर है। इमारतें बनाते समय बाढ़ के खतरों को एकदम नजरंदाज किया गया। गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा किए गए इसी तरह के अध्ययन में क्षेत्र की अस्थिरता के लिए मानव हस्तक्षेप को दोषी ठहराया गया है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद और चिपको आन्दोलन के प्रणेता सुन्दरलाल बहुगुणा का भी यही मानना है कि इन पहाड़ी इलाकों में मनुष्य की गतिविधियां आपदाओं को बढ़ावा दे रही हैं। बहुगुणा का कहना है – ”हमें पहाड़ों में बांध बनाना बंदकर देना चाहिए, क्योंकि इससे नदियों का प्रवाह अवरुद्ध होता है। वैसे भी उत्तराखंड के पहाड़ बेहद कमजोर हैं।” उन्होंने पहाड़ों में सड़कों की जगह रोपवे का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया है। पहाड़ों में सड़कें बनाने के लिए चट्टानों को विस्फोटों के जरिए तोडऩा पड़ता है। यह गतिविधि पर्यावरण को खराब करती है। पहाड़ी इलाकों में भवन निर्माण के लिए कड़े मानक निर्धारित करना जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई मकान ताश के पत्तों की तरह ढहता नजर नहीं आए। सभी पहाड़ी राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं को देखते हुए केंद्र को एक पृथक मंत्रालय गठित करना चाहिए।
विपदाओं से निपटने में अक्षम
उत्तराखंड में हुए महाविनाश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्राकृतिक विपदाओं से निपटने में हम कितने अक्षम हैं। हिमालय के पहाड़ भौगोलिक दृष्टि से बेहद नाजुक हैं। वहां जमीन के नीचे टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधि बहुत तीव्र है। पूरे इलाके में आकस्मिक मौसमीय धटनाओं की भी आशंका हमेशा रहती है।

इन वजहों से समूचा क्षेत्र आपदा-संभावित माना जाता है। इनके बावजूद राज्य ने कोई आपदा प्रबंधन योजना नहीं बनाई है। वर्तमान संकट से निपटने में तालमेल का अभाव इसी लापरवाही का नतीजा है। भारत के नियंत्रक और महालेखाकार (कैग) ने गत अप्रैल में ही राज्य के आपदा प्रबंध के खोखलेपन की पोल खोल दी थी। उत्तराखंड में 2007 में राज्य आपदा प्रबंध प्राधिकरण का गठन हुआ था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस निकाय ने कभी अपनी बैठक नहीं की। न ही उसने कोई नियम या दिशा निर्देश निर्धारित किए। विभिन्न आपदाओं से निपटने के लिए कोई कार्य योजना नहीं बनाई गई। पूर्व चेतावनी देने के लिए कोई योजना तैयार नहीं की गई और यह विचित्र सी बात है कि दूर संचार क्रांति के इस युग में भी पूरे इलाके में संचार व्यवस्था अपर्याप्त है।

कैग की रिपोर्ट के अनुसार आपदा प्रबंध प्राधिकरण ने अपने फंड का भी इस्तेमाल नहीं किया, जिसकी वजह से केंद्र ने 2011-12 के लिए कोई फंड ही जारी नहीं किया। फंड के इस्तेमाल की बात तो दूर, राज्य के आपदा प्राधिकरण के पास समुचित कर्मचारी भी नहीं हैं। जिला आपातसेवा प्रकोष्ठों में 44 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। ऐसी स्थिति में आपदा सेे निपटने के लिए त्वरित कार्रवाई कैसे की जा सकती है? आपदाओं की रोकथाम और उनके प्रभावों को कम करने केलिए जिला या गांव स्तर पर कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। अस्पतालों में भी ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं है।

प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान के पिछले इतिहास के बावजूद आपदा प्रबंधन में ढिलाई अक्षम्य है। 2007-08 और 2011-12 के बीच विभिन्न प्राकृतिक विपदाओं में 653 जानें गई थीं। इनमे से करीब 55 प्रतिशत मौतें भूस्खलनों और भारी वर्षा से हुई थीं। इस अवधि में राज्य में भूस्खलन की 27 बड़ी घटनाएं हुई थीं। अकेले 2012 में प्राकृतिक विपदाओं में 176 लोगों ने अपनी जान गवां दी थी।

कैग ने उत्तराखंड सरकार की लापरवाही का एक उदहारण देते हुए बताया है कि भारतीय भौगोलिक सर्वेक्षण ने जून 2008 में 101 गांवों को आपदा झेलने की दृष्टि से बेहद कमजोर बताया था, लेकिन सरकार ने अब तक उनके पुनर्वास के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। राज्य के आपदा कोष में भी कई अनियमिताएं सामने आई हैं।

राज्य सरकार द्वारा प्राकृतिक विपदा की वार्षिक रिपोर्ट भी प्रस्तुत न करने और फंड के समुचित इस्तेमाल के प्रमाण पात्र प्रस्तुत न करने से उसे 2007-2011 में केंद्र से फंड मिलने में 80 से 184 दिनों का विलम्ब हुआ।

उत्तराखंड के संकट का आयाम बहुत बड़ा है, लेकिन यदि सरकार ने पिछली घटनाओं के सन्दर्भ में आपदा प्रबंध की खामियों को दूर किया होता वर्तमान त्रासदी को काफी हद तक कम किया जा सकता था। याम बहुत बड़ा है लेकिन यदि सरकार ने पिछली घटनाओं के सन्दर्भ में आपदा प्रबंध की खामियों को दूर किया होता वर्तमान त्रासदी को काफी हद तक कम किया जा सकता था।

 

मुकुल व्यास

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