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दरकते पहाड़ और उफनती नदियां

वह आसन्न सोमवार की पूर्व संध्या थी। सोमवार यानी आशुतोष भगवान शिव का प्रिय दिन। 16 जून 2013 यानी रविवार का दिन ठीक ठाक गुजर चुका था। भगवान केदारेश्वर के भजन-पूजन और संध्या-आरती से निवृत्त होकर देश भर से आए श्रद्धालु तीर्थयात्री, केदारपुरी के अपने-अपने ठिकानों पर भोजन-विश्राम की तैयारी कर रहे थे। यात्रा सीजन का चरम काल होने के कारण जून के महीने में प्राय: उत्तराखण्ड के चारों धाम देश-विदेश से आने वाले हजारों तीर्थयात्रियों से गुलजार होते ही हैं। जून की ये तिथियां भी इस दृष्टि से अपवाद नहीं थीं। केदारपुरी के सभी होटल, धर्मशालाएं और अतिथिगृह खचाखच भरे हुए थे। बाजारों में रौनक थी। स्थानीय पुरोहित-पण्डे, दुकानदार सभी प्रसन्नमन अपने-अपने कामों में व्यस्त थे और अगले दिन की तैयारियों में जुटे थे। सबके मन में सोमवार के दर्शन-पूजन का विशेष उत्साह था। हलकी-फुलकी बारिश थी, केदारपुरी और पहाड़ों के लिए कोई असामान्य बात नहीं थी। यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालु अकसर बारिश का इंतजाम भी करके जाते ही हैं। पर उस रात तो अचानक न जाने क्या हुआ कि जोरदार गडग़ड़ाहट के साथ लोगों ने भारी जलप्रवाह अपने आसपास महसूस किया। केदारनाथ मंदिर के पीछे से आकर एक ओर से निकल जाने वाली मन्दाकिनी नदी में सहसा बाढ़ आ गई थी और वह अपने किनारों की सीमाएं तोड़ते हुए बड़ी-बड़ी चट्टानों को अपने साथ नीचे लाने लगी। वह बारिश भी असामान्य थी और बाढ़ भी। लोग घबराकर अपने आवासों की ऊपरी मंजिलों की ओर भागे। कुछ लोग मंदिर की ओर भागे और पूरे केदारपुरी में तबाही के मंजर नजर आने लगे। मलबा और गाद मिले पानी को जहां जगह मिली घुसता चला गया। मकानों, होटलों और धर्मशालाओं में उस भीषण जलप्रवाह के सामने जो भी जान-माल आया, उसे वह अपने साथ बहाकर ले गया।
हड़बड़ाए लोगों की चीख-पुकार बढ़ती गई और हर व्यक्ति खुद को और अपने परिजनों को बचाने के लिए बेचैन हो गया। जिसे जहां सुरक्षित जगह मिली, वह उसी ओर शरण लेने को भागा। रात के अंधेरे में उस क्षेत्र से अपरिचित लोगों को राह दिखाने वाला भी कोई नहीं था, क्योंकि सभी स्वयं को बचाने में लग गए थे। केदारपुरी में आए हजारों लोग, जिनमें बूढ़े-बच्चे, महिलाएं, नौजवान सभी शामिल थे। प्रकृति के इस भयानक प्रकोप से सभी निरुपाय हो गए। कोई पहाड़ों पर चढ़कर सुरक्षित स्थल ढूंढ़ऩे लगा, तो कोई सुरक्षित मैदानी स्थल तलाशने लगा। भारी तबाही के बीच मकानों-दुकानों के बहने का क्रम भी शुरू हो गया और भूतभावन भगवान शिव की नगरी श्मशान में तब्दील होने लगी। बाढ़ की विभीषिका धीरे-धीरे मंदाकिनी के पूरे मार्ग में
पसरने लगी। वह डरावनी रात तो किसी तरह कटी, पर सुबह 6-7 बजे के बीच फिर एक बार बाढ़ के रेलों ने अपने साथ तबाही लानी शुरू कर दी। रात की विभीषिका से डरे हुए लोग अभी सोच भी नहीं पाए थे कि कैसे क्या करें, तभी सुबह की घनघोर बारिश ने एक बार फिर तबाही के पिछले सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए। केदारपुरी में केदार मंदिर के अलावा कुछ भी सुरक्षित नहीं रहा। मंदिर का बाहरी चबूतरा, परिक्रमा पथ, बाहर स्थित नन्दी की प्रतिमा, सीढिय़ां, रेलिंग सहित वहां का पूरा बाजार बाढ़ में बह गया। मंदिर, पुजारियों के घर, पण्डों-पुरोहितों के घर, होटल, धर्मशालाएं और धनी-मानियों के अतिथिगृह सब कुछ जलप्लावन की भेंट चढ़ गया। जो लोग केदारपुरी से भागने में सफल हो सके, वे अपनी जान तो बचाने में सफल रहे, लेकिन चार-चार, पांच-पांच दिनों तक भूखे प्यासे जंगलों-पहाड़ों में रहकर मदद और राहत का इंतजार करते रहे। शेष लोग नदी में बहकर आई चट्टानों और मलबे के नीचे चिरनिद्रा में सो गए या फिर बाढ़ के साथ बह गए।
गौरीकुण्ड से ऊपर और नीचे, जहां से केदारपुरी की पैदल यात्रा शुरू होती है, रुद्रप्रयाग तक नाराज मन्दाकिनी ने ऐसी तबाही मचाई कि पैदल रास्ते का विश्राम-स्थल रामबाड़ा नक्शे से ही गायब हो गया। जहां अनेक विश्राम-स्थल, होटल, रेस्तरां, सुस्ताने के ठौर, रात्रि विश्राम के लिए बने अतिथिगृह हुआ करते थे, वह रामबाड़ा आज है ही नहीं। मन्दाकिनी की बाढ़ उसे अपने साथ बहाकर ले गई। सीतापुर की कार पार्किंग सैकड़ों कारों के साथ बह गई। गौरीकुण्ड का गौरीमंदिर, बाजार और पूरी बस्ती पर बाढ़, मौत और विनाश का साया बनकर मण्डराया है। सोनप्रयाग से रुद्रप्रयाग तक मन्दाकिनी के पूरे रास्त,अब केवल तबाही के मंजर हैं।लेकिन यह त्रासदी अकेले केदारनाथ मार्ग या केदारपुरी में ही नहीं हुई है। चारों धामों में उन्हीं दिनों आई नदियों में भारी उफान और अभूतपूर्व बारिश ने देश के उत्तर में बसे इस नए प्रदेश, उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र में केवल प्रश्न
ही प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सारा उत्तराखण्ड बर्बादी की महागाथा बनकर रह गया है। गढ़वाल की 70 प्रतिशत सड़कें जगह- जगह से खाइयों में बदल चुकी हैं। बद्रीनाथ धाम, हेमकुण्ट साहिब, घांघ्रिया, फूलों की घाटी, गोविंदघाट, श्रीनगर के रास्ते रुकावटों में तब्दील हो चुके हैं। गंगोत्री और यमुनोत्री के मार्ग, उत्तरकाशी, गुप्तकाशी, अगस्त्यमुनि, जोशीमठ, चमोली, कर्णप्रयाग आदि बस्तियों पर भी कहर बरपा है। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि जलप्रलय से उत्पन्न राज्यव्यापी तबाही ने गढ़वाल को तो करीब-करीब नेस्तनाबूद कर दिया है। पूरी बद्री-केदारघाटी प्रकृति के प्रकोप से कांप रही है। जहां तक दृष्टि जाती है, सिर्फ विनाश ही विनाश है।
इस अभूतपूर्व महाविनाश के पीछे गिनाए जाने वाले कारणों में बादलों का फटना, असामयिक वर्षा, केदारनाथ धाम में गांधी ताल का टूटना जैसे कारण गिनाए जा रहे हैं। बरसों पहले कभी इस क्षेत्र में मानसून जून मध्य में आया करता था। पर पिछले 10-12 सालों में यह जुलाई-अगस्त तक खिसक गया था। इस बार आशातीत हुआ और जून के तीसरे हफ्ते में ही बारिश ने कहर ढ़ा दिया। सामान्य से 375 प्रतिशत ज्यादा बारिश ने, प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के मुताबिक, एक हजार से ज्यादा जानें ले ली हैं। वैसे हालात बता रहे हैं कि आंकड़े को बहुत कम करके बताया जा रहा है। वास्तविकता यह है कि मरने वालों की तादाद इससे कई गुना अधिक है। 13 जून को केदारनाथ में दर्शनार्थियों की संख्या 15,142 थी, जो 15-16 यानी शनिवार इतवार में निश्चय ही बढ़ी होगी। यदि दुर्घटना की रात केदारनाथ धाम में 15 हजार लोगों का भी ठिकाना था तो उसमें वहां के पण्डे-पुजारी, दुकानदार, होटल-धर्मशाला वाले लोगों तथा घोड़े, कण्डी, पालकी वालों की संख्या जोड़कर, ये संख्या 20 हजार तक आसानी से पहुंचती है। इतने लोगों ने उस रात और अगले दिन भी जलप्रलय का कहर झेला है। अब उस महाविनाश की त्रासदी में से केदारपुरी के इन 20 हजार में से चौथे दिन पहुंचे हेलीकॉप्टरों से बचाकर देहरादून लाए गए लोगों की संख्या निकाल दी जाए तो भी मृतकों का एक बड़ा आंकड़ा सामने आता है। यह तो केवल केदारपुरी की बात है। गढ़वाल के अन्यत्र धामों में मृतकों की संख्या इस आंकड़े में इजाफा ही करती है।
सीखने के लिए और कितनी विनाशलीला
सोनल गुप्ता
उत्तराखंड की त्रासदी एक ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, जिसमें पर्यावरण, धन और जान की बड़े पैमाने पर क्षति हुई है। इस विपदा में न सिर्फ अरबों रुपये का नुकसान हुआ, बल्कि हजारों लोगों की जानें भी चली गईं। यह सिर्फ आकलन है। प्रलयकारी आपदा को देखते हुए इससे कहीं ज्यादा क्षति की आशंका है। ऐसे नरसंहार वाली प्राकृतिक आपदा का आभास शायद ही किसी को होगा कि केदारनाथ का मंदिर छोड़ सब ही खत्म हो जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि यह त्रासदी हुई क्यों? इसके पीछे कई कारण गिनाए जा सकते है। इसमें कुछ प्राकृतिक कारण हैं, तो अनेक मानव-निर्मित कारण भी।इस विपदा के आने के तुरंत बाद, युद्धस्तर पर बचाव कार्य नहीं शुरू किए गए। जब तक सेना और वायुसेना ने अपने काम शुरू नहीं किए, तब तक केन्द्र सरकार और राज्य सरकार से लेकर स्थानीय प्रशासन तक मूकदर्शक और लाचार नजर आए। स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार केन्द्र के अगले निर्देश की प्रतीक्षा करती रही। यदि बचाव कार्यों को सही समय पर शुरू किया गया होता, तो सैकड़ों लोगों की जानें बचाई जा सकती थीं।

कमजोर यादाश्त क्षमता के लिए हम कुख्यात हैं। वर्ना सुनामी से हम बहुत कुछ सीख सकते थे। भारत के पूर्वी तटों पर कुछ साल पहले आया सुनामी, तब हमारे लिए एक अनजान समस्या जरुर थी, लेकिन भविष्य को आगाह करने वाली भी थी। दूरदर्शिता की कमी और भावी समस्याओं को आकलित करने अक्षमता ने उस सुनामी में हजारों लोगों को निगल लिया और लाखों लोगों को सड़कों पर ला दिया था। तब बड़े पैमाने पर सरकार की कार्यशैली और नीतियों की आलोचना हुई थी। उस विपदा में हुए नुकसान का सही आकलन आज तक नहीं हो पाया। सुनामी से हुए नुकसान की भरपाई के लिए कई कॉरपोरेट घरानों और फिल्मी हस्तियों ने गांवों को गोद लिया था। हालांकि उस भयावह अनुभव के बाद, ऐसी आपदाओं से निबटने के लिए सरकार ने एक तंत्र बनाने का आश्वासन जरूर दिया था। स्थानीय स्तर पर प्रशासन द्वारा तुरंत कार्रवाई किए जाने को लेकर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समिति ने प्लान तैयार करने का बीड़ा उठाया था। सुनामी के तांडव के कई सालों बाद, उत्तराखंड की आपदा वैसे ही मुंह चिढ़ा रही है। लेकिन, हम जहां तब खड़े थे, वहीं आज भी खड़े हैं।

ऐसे प्राकृतिक आपदाओं से निबटने के लिए पंचायतों को और सशक्त करने की जरुरत है। खासकर तटीय और पहाड़ी इलाकों वाली पंचायतों को। जहां भूस्खलन और भूकंप जैसी समस्याएं, छोटे पैमाने पर ही सही, लेकिन अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रहती हैं। ऐसे में इस तरह की दुर्घटनाओं से निपटने में पंचायतों का सशक्त होना, रुपए के नुकसान को कम कर सकता है। विकास के लिए जारी परियोजनाओं को पर्यावरण के अनुकुल बनाया जाना चाहिए, ताकि पर्यावरण पर किसी तरह का दबाव नहीं बन सके। पर्यावरण का नुकसान, विकास का नहीं, बल्कि विनाश का बुलावा है। उत्तराखंड इसका साक्षात उदाहरण है, जहां सड़कें, इमारतें, सुरंगें और बांध बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पर्यावरण के साथ विनाशलीला का खेल खेला गया।

क्षेत्र की दुर्गमता, हजार से अधिक सड़कों का जगह-जगह से बुरी तरह क्षतिग्रस्त होना, फंसे हुए यात्रियों के पास खाने की सामग्री तो दूर पीने के पानी तक का अभाव होना आदि कारणों में राहत कार्यों में हुए विलम्ब ने आग में घी का काम किया है। भारतीय थल सेना, वायुसेना, इण्डो-तिब्बत बॉर्डर फोर्स आदि राहत कार्यों के लिए आगे नहीं आते तो अकेली उत्तराखण्ड सरकार की निरुपायता तो निस्संदेह मृतक और आपदाग्रस्तों की संख्या में डरावनी बढ़ोत्तरी कर देती। इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी हेलीकॉप्टर की मदद पहुंचे में चार दिन का समय लग जाना खेद और दुखद आश्चर्य का विषय है। इस सन्दर्भ में प्रदेश के आपदा नियंत्रण बोर्ड की सुस्ती, उसका नाकारापन और नितांत अदूरदर्शिता ही कारण है। उक्त इकाई के गठन के बावजूद उसकी अब तक एक भी बैठक न होना, उस विभाग के पास आपदा निवारण का कोई ब्लूप्रिंट न होना, उत्तराखण्ड की सरकारों के निकम्मेपन और नेतृत्व क्षमता के अभाव को ही उजागर करता है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा केन्द्र सरकार की ओर से शुरू में ही एक हजार करोड़ रूपए के मदद का आश्वासन, केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के प्रभारी मंत्री जयराम रमेश द्वारा 350 करोड़ की मदद की घोषणा के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक आदि राज्यों द्वारा मदद की घोषणा ने उत्तराखण्ड सरकार को ढांढ़स तो बंधाया है, लेकिन प्रदेश की अपनी ही मशीनरी के सक्रिय होने में विलम्ब के लिए दोषियों को ढूंढ़ा जाना अब भी शेष है।
इस सिलसिले में अब दो बातों की ओर तत्परता से ध्यान दिए जाने की सख्त जरूरत है। चार धाम यात्रा के पारम्परिक ढर्रे में सुधार और वर्तमान महाविनाश के मृतकों के परिजनों को कानूनी पचड़ों से राहत दिलाना शामिल है। हाल ही में 50 साल पहले के केदारनाथ धाम का चित्र सामने आया है! उसे देखने पर स्वयंमेव सिद्ध होता है कि केदारनाथ धाम में हुए अस्त व्यस्त और अनियंत्रित निर्माण पर चिंतन करना जरूरी हो गया है। अब जबकि नियति ने ही केदारपुरी को नए सिरे से बसाने के हालात पैदा कर दिए हैं तो मंदिर समिति और सरकार को इस सन्दर्भ में सुविचारित निर्माण की चिंता भी करनी होगी। यात्रा पथ की असुविधाओं के बारे में भी चिंता का यह उचित समय है। बरसों पुरानी एक परम्परा को भी शुरू करने की आवश्यकता अब लोग शिद्दत से महसूस कर रहे हैं! बरसों पहले चारों धाम की यात्रा से पूर्व यात्री को टीका लगवाना और पर्चा कटवाना जरूरी था। इससे यह जानकारी मिल जाती थी कि जो यात्री चारधाम की यात्रा पर गया है, उसका अता-पता और परिचय क्या है। त्रासदियों के वक्त यह रेकॉर्ड कई कानूनी गुत्थियां सुलझाकर अनेक प्रश्नों के उत्तर देने में मदद करता है। यात्री हित में यह परम्परा दुबारा शुरू की जानी चाहिए। मरणोपरान्त सरकारी कार्यालयों में, बीमा और अन्य दावों के लिए जिन दस्तावेजों की जरूरत होती है, उन्हें प्राप्त करने में मृतकों के परिजन, महीनों यहां-वहां धक्के खाते न फिरें, यह मानवीय दृष्टि से आवश्यक है और इसका हल भी सरकार को ही निकालना होगा।चलते चलते एक बात और… उत्तराखण्ड की इस महात्रासदी में मानवीय और अमानवीय, दोनों पक्ष उजागर हुए हैं। आपदाग्रस्त लोगों से स्थानीय दुकानदारों द्वारा पानी, खाद्य सामग्री आदि के लिए मनमाने दाम वसूलना, दुत्कारने जैसा व्यवहार करना, लाशों से गहने और नकदी बटोरना आदि अनेक घटनाएं जहां त्रासदियों का अमानवीय चेहरा उजागर करती है, वहीं अपनी जान पर खेलकर आपदाग्रस्त लोगों की जान बचाने वाली सेना और उन्हें हर तरह की मदद देने वाली विभिन्न संस्थाएं, और व्यक्तियों के नि:स्वार्थ कार्य, मानवता के चेहरे को अधिक उज्ज्वल भी करते हैं।
 

डॉ. कमलकांत बुधकर

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