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जरूर भगवान रूठे होंगे

मीडिया की रिपोर्टों का अनुमान है कि उत्तराखंड में हुई जल प्रलय की विपदा में मरने वालों की संख्या हजारों में होगी। प्रकृति का यह प्रकोप देवताओं का प्रतिशोध है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, दोनों ही हिमालयी राज्यों में समय पूर्व आए मानसून के कारण विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा है। बेहतर होता कि आसन्न विनाश की प्रारंभिक चेतावनियों पर ध्यान दिया जाता।

माना कि भूगर्भीय रूप से हिमालय की यह परवर्ती श्रृंखला बहुत नाजुक किस्म की है। इसकी सीधी ढलानों पर मिट्टी का दरकना और बादलों का फटना आम तौर पर होते रहते हैं। इन क्षेत्रों के मूल निवासी, चाहे वे घुमंतू जनजातियों के हों या छोटे कस्बों में रहने वाले लोग, उन्होंने अपना रहन-सहन प्रकृति के अनुकूल बनाया हुआ था। बाढ़ आती थी, लेकिन इस भयानक पैमाने पर नहीं। जंगल युक्त पहाड़ अपने मजबूत पेड़ों के कारण भूस्खलन को रोक लेते थे। हालांकि उनको महीनों तक बाहर की दुनिया से कटे रहना पड़ता था। इसके वाबजूद स्थानीय लोगों ने मौसम की क्रूरता के बीच जीना सीख लिया था।

इंसानों द्वारा रचे गए कारकों ने विनाश को और ऊंचे पैमाने पर पहुंचा दिया। जल विद्युत परियोजनाओं की बड़ी संख्या, बढ़ते पर्यटन के कारण सड़कों के निर्माण, खासकर धार्मिक पर्यटन के दौरान, गैरपारंपरिक भवन निर्माण की तकनीकों को अपनाना, नदी तटों और बहाव क्षेत्र में बड़े पैमाने पर घुसपैठ, झोपड़पट्टियों के निर्माण आदि ऐसी इंसानी हरकतें हैं, जिनकी कीमत ऐसी त्रासदियों के रूप में ही चुकानी पड़ती है। बेतहाशा भवन निर्माण को आज खंडहरों के रूप में देखा जा सकता है। अगर थोड़ी कोशिश कर ली गई होती, तो इस विनाश को रोका जा सकता था।

हिमालय की बोझ वहन क्षमता का समुचित आकलन किया जाना चाहिए। पहाड़ों को काटकर बनाई गई सड़कों को वाहनों, मशीनों और यातायात का भारी बोझ उठाना पड़ता है, जिससे ये कमजोर पड़ जाते हैं। पहाड़ों का पूरा पर्यावरण बर्बाद कर दिया गया है।

पर्यटन के अबाध और अनियोजित विस्तार की कीमत तो आखिर चुकानी ही होगी। इतनी बड़ी संख्या में फंसे हुए वाहनों, और जो बह गए हैं, उन वाहनों के चित्र देखकर पता चलता है कि इस रास्ते पर कितना यातायात रहा होगा। सड़क के किनारे बने बहुमंजिला होटल और घर जमीन पर आ गए हैं। 300 से ज्यादा तो बह गए। हेलीपैड और सेना के कैंप तक असुरक्षित जगहों पर बनाए गए हैं। आपदा प्रबंधन की कोई योजना बनाई ही नहीं गई। पूरे प्रशासन में घबराहट फैली हुई थी। फंसे हुए 80 हजार लोगों को बचाना बहुत बड़ा काम साबित हो रहा है। ऐसी बहुत सी मौतें भी जरूर हुई होंगी, जिन्हें अन्यथा रोका जा सकता था। सैकड़ों की संख्या में लागों के लापता होने, और उनके परिजनों की अनंत प्रतीक्षा की कल्पना करना भी दिल दहला देने के लिए पर्याप्त है।

इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि इन दो राज्यों की सीमाएं आक्रामक पड़ोसी के साथ लगी हुई हैं। यहां संचार और जरूरी साज-सामान की व्यवस्था बनाए रखने के सामरिक महत्व को समझा जाना चाहिए। इस विपदा के समय प्रशासन की लापरवाही और असहायता एक खतरे की घंटी है। ऐसा लगता है कि किसी तरह की तैयारी ही नहीं थी। विनाश के बाद लंबे अर्से तक तो बुरी तरह से अफरा-तफरी फैली हुई थी।

इस क्षेत्र के मौसमी मिजाज को ध्यान में रखते हुए एक समुचित दीर्घ कालीन योजना बनाकर उसे अमल में लाया जाना चाहिए। मौसम की भविष्यवाणी करने वाले उपयुक्त केंद्र बनाए जाने चाहिएं। आबादी और ढांचागत विकास की बेहिसाब बढ़त पर रोक लगाई जानी चाहिए। हमें स्विट्जरलैंड की सरकार से सीखना चाहिए कि कैसे उन्होंने आल्प्स श्रृंखला में बचाव और क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की हुई है। यही उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य के लिए सीख ले ली जाएगी।

आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला चल निकला है। केंद्र राहत के नाम पर रेवडिय़ां बांटकर वाह-वाही बटोरने लगा है। वह राज्य सरकारों को दोषी नहीं ठहरा सकते, क्योंकि दोनों जगहों पर कांग्रेस ही सत्ता में है।

आने वाले सालों में इस क्षेत्र में भारी पैमाने पर पुनर्निर्माण और विकास का काम होगा। इस बार कम से कम यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि योजनाबद्ध और इन स्थानों के लिए उपयुक्त तरीकों को ही प्रयोग में लाया जाए।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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