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राशिफल 29 जुलाई से 4 अगस्त 2013

मेष
यह सप्ताह विशेष फलदायी होगा। नए प्रयास होंगे। नई दिशाओं में विशेष कार्य होंगे। मेहनत से भरा सप्ताह होगा। परिश्रम के बल पर धन की प्राप्ति होगी। कला आदि में रूचि रहेगी। भाई-बहनों से लाभ होगा। शुभ अंक : 3,6, शुभ दिशा : उत्तर, शुभ रंग : हरा, उपाय : धैर्य और संयम से काम लें।
वृषभ
खर्चे अधिक हो सकते हैं। व्यर्थ की यात्रा करनी पड़ सकती है। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। मित्रों से व्यर्थ में न उलझें। शुभ अंक : 2, शुभ दिशा : इशान, शुभ रंग : नीला, उपाय : स्थिरता और स्थायित्व के लिए ‘श्री: कृष्ण: शरणं मम्’ मंत्र का जाप करें।
मिथुन
धन में वृद्धि होगी। लेकिन खर्चे बने रहेंगे। कार्यों में सफलता मिलेगी। सम्मान मिलने की संभावना है। विवाह योग्य स्त्री, पुरूष के संयोग जुडऩे का समय है। शुभ अंक : 7, शुभ रंग : हरा, शुभ दिशा : पूर्व, उपाय : शांति के लिए इष्टदेव की उपासना एवं गरीब बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करें।
कर्क
यह सप्ताह पूरी तरह व्यस्त रखने वाला है। कार्य की अधिकता रहेगी। लाभ होने की उम्मीद है। विशेष सहयोग और धन मिलने की संभावना है। शुभ अंक : 8, शुभ रंग : लाल, शुभ दिशा : वायव्य, उपाय : महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले 5 मिनट तक सोचें फिर इष्टदेव का नाम लेकर कार्य का शुभारंभ करें।
सिंह
यह सप्ताह महत्वपूर्ण है। प्रसन्नता बनी रहेगी। रुके हुए कार्य पूर्ण होंगे। व्यापार में सफलता मिलेगी। विशेष अवसर या लाभ प्राप्त हो सकते हैं। किसी के सहयोग से समाज में पद या प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी। शुभ अंक : 9, शुभ रंग : पीला, शुभ दिशा : ईशान, उपाय : सूर्य की उपासना करें।
कन्या
अस्वस्थ होने की आशंका है। परिजनों को भी शारीरिक कष्ट हो सकता है। धन की प्राप्ति होगी। रूके हुए कार्य पूर्ण होंगे। शुभ अंक : 2, शुभ रंग : नीला, शुभ दिशा : पश्चिम, उपाय : बड़े-बुजुर्गों को मान-सम्मान दें और उनका आशीर्वाद ग्रहण करें। इससे सुख और समृद्धि की प्राप्ति होगी।
तुला
तुला राशि वालों के लिए यह सप्ताह मिले जुले असर वाला होगा। जीवनसाथी से मनमुटाव खर्च बढ़ेगा। कार्यों में बाधा उत्पन्न हो सकती है। सप्ताह के अंतिम दो दिनों में बाधाओं से मुक्ति मिलेगी और शुभ कार्यों में सफलता मिलेगी। शुभ अंक : 3, शुभ रंग : काला, शुभ दिशा : नैऋव्य, उपाय : मन को शांत रखें।
वृश्चिक
इस सप्ताह थोड़ा संभलकर चलें। परिश्रम से कार्य फलदायी होगा। बिना कारण विवाद या परेशानी में पडऩे की आशंका है। रूके हुए कार्यों को पूरा करने के लिए सहयोग आदि ले सकते है। शुभ अंक : 4, शुभ रंग : सफेद, शुभ दिशा : नायव्य, उपाय : शरीर की क्षमता के अनुसार कार्य करें। विवाद और उलझनों से खुद को दूर रखें।
धनु
शिक्षा और मंत्र उपासना के लिए अनुकूल समय है। संतान के स्वास्थ्य को लेकर चिन्ता हो सकती है। यदि किसी प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे हैं तो जीत की संभावना प्रबल है। मुकदमे आदि में विजय होगी। शुभ अंक :5, शुभ रंग : संतरी, शुभ दिशा : पूर्व, उपाय : धर्म के मार्ग पर चलें। भावनाओं में ना बहें।
मकर
जमीन जायदाद में वृद्धि होगी। घर का निर्माण कार्य शुरू हो सकता है। किसी परिजन के स्वास्थ्य को लेकर तनाव हो सकता है। घर पर ज्यादा देर रहना कलह का कारण हो सकता है। जीवनसाथी से विवाद होने की आशंका है। शुभ अंक : 6, शुभ रंग : गुलाबी, शुभ दिशा : दक्षिण, उपाय : गरीब एवं अपंग लोगों को भोजन कराएं।
कुंभ
शुभ समय है। निवेश के लिए उचित समय है। लेखन में विशेष रूचि रहेगी। सृजनात्मक कार्यों के कारण लाभ होगा। शिक्षा में नए विषयों की तरफ झुकाव होगा। भाई-बहनों में आपसी विवाद हो सकता है। धन का लाभ होगा। शुभ अंक : 7, शुभ रंग : नीला, शुभ दिशा : नैरव्य, उपाय : अपनी एकाग्रता को बढ़ाने के लिए मौन का सहारा लें।
मीन
समय अनुकूल नहीं है। सोच समझ कर बोलें। गलत भाषा का प्रयोग न करें। दूसरे जीवों को न सताएं। परिवार में कोई अप्रिय घटना घट सकती है। धन की हानि हो सकती है। कार्य संपादन के लिए उधार लेना पड़ सकता है। शुभ अंक : 8, शुभ रंग : नीला, शुभ दिशा : दक्षिण, उपाय : मौन व्रत रखें और एक समय भोजन करें।
ज्योतिष प्रतिष्ठित हो रहा है: आचार्य विशाल अरोड़ा
परिचय
बचपन में अपनी बुआ से ज्योतिष का आरम्भिक ज्ञान प्राप्त कर, आचार्य विशाल अरोड़ा ने भविष्यवाणी करना शुरू कर दिया था। अपने ज्योतिष ज्ञान को अधिक गहरा करने के लिए उन्होंने 1990 में विश्व ज्योतिष गुरू के.एन. राव के निर्देशन में भारतीय विद्या भवन ज्योतिष संस्थान से ज्योतिष की शिक्षा ग्रहण करनी शुरू की। आचार्य की उपाधि प्राप्त करने के बाद, आचार्य विशाल अरोड़ा ने ज्योतिष में शोध करना शुरू किया और सन् 2000 में वह इसी ज्योतिष संस्थान में शिक्षक हो गए। उन्होंने व्यवसाय और समृद्धि में भविष्यवाणी करने और मार्गदर्शन करने का मार्ग अपनाया। वह कीमती पत्थरों, माणिकों, मोतियों और अन्य नगों के विशेषज्ञ हैं।मनुष्य आज जिस युग में जी रहा है, वह मशीनों और मशीनों के चमत्कारों का युग है। विज्ञान के चमत्कारों के कारण आज हर विषय के जानकार उसे विज्ञान कहने को मजबूर हो रहे हैं, ताकि वो पिछड़ न जाएं। ज्योतिषी भी ज्योतिष को आज विज्ञान कह रहे हैं और टी.वी. चर्चाओं में शामिल हो रहे हैं कि ज्योतिष विज्ञान है या नहीं।

हमारे शास्त्रों के अनुसार विज्ञान का अर्थ है – विशुद्ध ज्ञान अर्थात ऐसा ज्ञान जो हमें यह ज्ञात कराए कि आत्मा/ब्रह्म सत्य है, बाकी सब कुछ मिथ्या अर्थात्त आत्म-अनुसंधान का ज्ञान।

आज साइंस, जिसे हम विज्ञान समझते हैं, उसका अर्थ है- विज्ञान सीखने की वह शाखा या विषय, जो आंतरिक या प्राकृतिक क्षमता के बजाय, व्यवस्थित सिद्धांतों पर आधारित होता है।

दोनों विज्ञानों में एक समानता अवश्य है। वह समानता है, दोनों ही मनुष्य को सुख प्रदान करते हैं, एक आंतरिक तो दूसरा बाह्य। वैसे तो हमारे सभी शास्त्र आंतरिक बोध की प्राप्ति के लिए निर्मित किए गए हैं, लेकिन बाह्य जगत की वस्तुओं का बोध भी इसके माध्यम से आसानी से किया जा सकता है।

आधुनिक विज्ञान की परिभाषा के आधार पर भी ज्योतिष पूरी तरह खरी उतरती है। ज्योतिष की गणना के अपने गणितीय सिद्धांत हैं, जो नियमों पर आधारित है ।

यूं तो ज्योतिष को विज्ञान के रूप में स्थापित तो कर दिया गया है, लेकिन कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति इस बात को खुलेआम स्वीकार नहीं कर पाता है कि वह ज्योतिषी से सलाह लेता है। जबकि स्वास्थ्य के लिए वह डॉक्टर से, घर के लिए इंजिनियर से अथवा अन्य चीजों के लिए किसी से सलाह लेने की बात कहते हुए झिझकता नहीं है। तो फिर ज्योतिषी चोरी-छिपे क्यों? कारण सामने आते हैं-

 अनपढ़ और गरीब ब्राह्मणों द्वारा ज्योतिष किया जाना।
 स्वांग रचकर ज्योतिष करना (भिन्न-भिन्न वस्त्र, तिलक आदि रूपों को बनाकर ज्योतिष करना)।
 पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित वर्ग का ज्योतिष का न पढ़ पाना।
 ज्योतिषियों के द्वारा आम लोगों को ठगना।
आदरणीय गुरू श्री के. एन. राव जी और भारतीय विद्या भवन के अथक प्रयासों से आज ज्योतिष प्रतिष्ठित हो रहा है। पढ़े-लिखे समाज में ज्योतिष जिस तरह अपना वर्चस्व बना रहा है, आने वाले समय में हर व्यक्ति इसे विज्ञान के रूप में स्वीकार करेगा।

उसे यह अहसास हो जाएगा कि ज्योतिषी से सलाह लेकर उसने निर्णय लिया है क्योंकि वह ज्योतिषी को सामाजिक, शैक्षिक और आध्यात्मिक रुप से अपने से ऊंचा पाएगा।

कष्ट निवारण के सरल उपाय: एस. गणेश
परिचय
गत पच्चीस वर्षों से ज्योतिष विज्ञान की सेवा में लगे श्री एस. गणेश वैदिक ज्योतिष के अति सम्माननीय व सुप्रसिद्ध दैवेज्ञ हैं। परम्परावादी दक्षिण भारतीय हिन्दू परिवार के श्री एस. गणेश भारतीय विद्या भवन ज्योतिष संस्थान में अध्यापन का कार्य भी करते हैं। जगद्गुरू शंकराचार्य इनके गुरू हैं। इनके पिता श्री ए.आर. शंकर नारायणन मद्रासी वैदिक ब्राह्मण एसोसिएशन के सचिव थे। विश्व प्रसिद्ध ज्योतिष गुरू श्री के.एन. राव के सान्निध्य में इन्होंने ज्योतिष के अनेक पारम्परिक पहलुओं एवं मान्यताओं पर प्रकाश डाला है ज्योतिष की अनेक पुस्तकों व शोध-पत्रों के भी वह लेखक हैं।शनि की साढ़े साती या ढैय्या, जन्म राशि और जन्म राशि से चतुर्थ भाव पर गुरू का संचरण आपत्तिजनक गोचर अवस्थाएं मानी गई हैं। ऐसे में दान-दक्षिणा, व्रत, कवच पहनना उपयोगी होना है। दशाएं यदि थोड़ी कष्टदायक हों तो मणि, रत्न, धातु का बना छल्ला या धातु के बने यन्त्र शरीर में धारण कर उनका निवारण कर सकते हैं। कुंडली में कोणों में दोष हों तो उन दोषों का निवारण पूजा-पाठ, व्रत, दान-दक्षिणा आदि से कर सकते हैं। कुंडली में केन्द्र सुख-सुविधा दर्शाते हैं, तो वहां हम नगों और मणि आदि को धारण करके दोषों का उपाय कर सकते हैं। हमारे तन्त्र शास्त्र कहते हैं कि पितृ दोष उपायों से दूर हो जाते हैं। लेकिन यह तीन पीढिय़ों की कुंडिलयों में दिखते हैं। इसलिए जातक को आने वाली पीढिय़ों को इस संबंध में अवगत करा देना चाहिए कि आपने उन दोषों के उपाय करा दिए हैं। अपने पितृों के दोष गयाजी, इलाहाबाद, रामेश्वरम, बदरी-केदार, हरद्वार, प्रयाग, तीर्थ स्थलों पर और नासिक (महाराष्ट्र) जाकर पितृ दोष का निवारण करा लेना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि हम ही अपने परिवार में पुन: जन्म लेते हैं। इसीलिए हम ही अपने कर्मों का आधार भी हैं और निवारण भी हैं। कुंडली के दोषों का निवारण करने से आने वाले पीढिय़ों में यश कीर्ति, समृद्धि और सुख पूर्ण रूप में रहता है।

पितृ तीन प्रकार के रूप में विद्यमान हैं-पिता, पितामह, प्रपितामह। पिता का रूप है-वसु, पितामह का रूप रूद्र और प्रपितामह का आदित्य। उनके ऊपर भी चार पितृगण हैं। इन्हें मिला कर कुल सात का वर्णन हमारे शास्त्रों में है। पितृ वसु के रूप में यश, कीर्ति, धन प्रदान करने की क्षमता रखते हैं, जबकि रूद्र के रूप में पितामह हमें खुशियां, आरोग्य, यश और कीर्ति प्रदान करते हैं। आदित्य के रूप में प्रपितामह सभी प्रकार के सौभाग्य-यश और कीर्ति देने की सामथ्र्य रखते हैं।

सर्प दोष कई प्रकार के हैं- जिनका वर्णन हमारे शास्त्रों और तन्त्र शास्त्रों में आता है। सामान्य तौर पर सर्प दोष स्त्री कुंडलियों में ही पाए जाते हैं। स्त्री की कुंडली में पितृ दोष नहीं होता। पुरूष की कुंडली में ही पितृ दोष होता है। स्त्री जननी है, इसलिए ब्रह्मा का रूप है। इस दोष से मुक्त रहने से आने वाली पीढिय़ां सुखों को प्राप्त करने में सक्षम होती हैं।

काल सर्प दोष केवल 32साल तक की आयु तक ही प्रभावी माना जाता है। 32 वर्ष की आयु के बाद यह दोष जातक को अधिक प्रभावित नहीं करता। उसके बाद जातक अपने प्रयास और व्यक्तिगत क्षमताओं से जीवन में कीर्ति प्राप्त करता है। इसलिए इसे अधिक बड़ा दोष नहीं माना जाता है, जिस कारण कहा जाता है कि इस दोष के निवारण के लिए अधिक परेशान होने की जरूरत नहीं होती। सामान्यतौर पर इसके लिए मंगलवार को केतु का और शनिवार को राहू की पूजा करनी चाहिए। इससे जातक कालसर्प के भय से मुक्त रहता है।

 आचार्य विशाल अरोड़ा

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