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भारत के कृषि क्षेत्र का सामान्य परिदृष्य

भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या गावों में निवास करती है और इसमें लगभग 80 प्रतिशत कृषि पर निर्भर है। भारत प्राकृतिक दृष्टि से कृषि के क्षेत्र में बहुत सौभाग्यशाली है। देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 60 प्रतिशत भाग कृषि के अन्र्तगत है, जबकि एशिया का औसत 40 प्रतिशत और विश्व का औसत लगभग 36 प्रतिशत है। सिंचाई साधनों की दृष्टि से भी भारत की स्थिति बहुत बेहतर है। भारत में सिंचित क्षेत्र का कृषि क्षेत्र से प्रतिशत 45.3 है, जबकि एशिया का प्रतिशत लगभग 40 तथा विश्व का प्रतिशत 36 के आस-पास है।

स्वतंत्रता के पश्चात कृषि क्षेत्र में विस्तार हुआ है। सिंचाई के साधन बढ़े है। खाद व कीटनाशक दवाओं के उपयोग में निरन्तर वृद्धि हुई है। वर्ष 1951-52 में सकल सिंचित क्षेत्र 23.2 मिलियन हेक्टेयर था, जो वर्ष 2008-2009 में बढ़कर 88.4 मिलियन हैक्टेयर हो गया। वर्ष 1980-81 में 55 लाख टन खाद व कीटनाशक दवाओं का उपयोग वर्ष 2008-2009 में बढ़कर 250 लाख टन हो गया। फलस्वरुप कृषि की उत्पादकता व कुल उत्पादन में भी कई गुना वृद्धि हुई है। वर्ष 70-71 में खाद्यान उत्पादन 108.4 मिलियन टन था, जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 257.4 मिलियन टन हो गया।

तुलनात्मक रूप से कृषि आय में निरन्तर गिरावट आ रही है। यह स्थिति भारत के शुद्ध घरेलू उत्पाद में कृषि की गिरती हिस्सेदारी से स्पष्ट हो जाती है। वर्ष 1950-51 में यह हिस्सेदारी 55.4 प्रतिशत थी, जो 2000-2001 में घटकर 27.3 प्रतिशत और 2011-12 में घटकर 13.9 प्रतिशत रह गई। इसके विपरीत उद्योग का शुद्ध घरेलू उत्पाद 16.1 प्रतिशत से बढ़कर 27.1 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र का घरेलू उत्पाद 28.5 प्रतिशत से बढ़कर 59 प्रतिशत हो गया। स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र की आय तुलनात्मक रूप से घट रही है। वस्तुत: किसान की आय में तुलनात्मक रूप से वृद्धि नहीं हो रही है। किसान की गिरती हुई आर्थिक स्थिति का देशहित में विश्लेषण करना आवश्यक है।

इसका एक प्रमुख कारण है, कृषि अर्थ शास्त्र का निरन्तर सिकुडऩा। आज जोतों का बंटवारा तेज गति से हो रहा है। जिन परिवारों के पास आज से 25-30 वर्ष पहले 20 बीघा जमीन थी, आज उनके उत्तराधिकारियों के पास 5-7 बीघा जमीन रह गई है।

हमारी जनसंख्या अबाध गति से बढ़ रही है। परन्तु कृषि की श्रमशक्ति को समाहित करने की क्षमता घट रही है। बड़े कारखानों के उत्पादन के सामने बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा के कारण ग्रामीण उद्योग तथा पुरानी कारीगरी का ह्रास हो रहा है। यही कारण है कि रोजगार की खोज में ग्रामीण क्षेत्र से जनसंख्या का दूर के क्षेत्रों में पलायन हो रहा है। जिससे शहरी जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ रहा है। वर्ष 1950-51 में यह प्रतिशत 17.3 था, जो 2011 में 31.2

हो गया है। ग्रामीण शिक्षा की दशा अत्यन्त शोचनीय है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के द्वारा विद्यार्थियों में शारीरिक श्रम के प्रति अरुचि पैदा हो रही और इससे किसी कौशल का विकास भी नहीं हो रहा है। इसलिए आज शिक्षित युवक अन्य क्षेत्रों में रोजगार न पाने पर भी कृषि तथा सम्बन्धित गतिविधियों के लिए इच्छुक नहीं है।

कृषि क्षेत्र के निरन्तर सिकुडऩे के बाद भी परिस्थितिवश किसान अब भी अपने पुराने धन्धे अर्थात कृषि से जुड़े हुए हैं। स्थिति यह हो गई है कि उनकी जोत से इतनी भी आय नहीं होती कि वे 5 सदस्यों के परिवार का भलीभांति भरण-पोषण कर सकें। इनमें कुछ अपवाद हो सकते हैं। बड़े किसानों की श्रेणी, जिसे कुछ आलोचक ‘कुलक’ कहते हैं, वे या तो आज गांव में नहीं हैं, और यदि है भी तो तेजी से समाप्त हो रहे हैं। इसलिए यह जरूरी है कि छोटे और सीमान्त किसानों की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अन्य स्त्रोतों से आय के साधन जुटाए जाएं, ताकि वे अच्छा आर्थिक जीवन जी सकें और उसके साथ खेतिहर मजदूर भी खुशहाल हो सकें।

लघु एवं कुटीर उद्योग
आज आवश्यकता इस बात की है कि सुनियोजित तरीके से गांव-गांव में कृषि आधारित उद्योग-धन्धों एवं अन्य कुटीर उद्योगों का जाल फैलाया जाए, ताकि कम पूंजी पर रोजगार के अधिक से अधिक अवसर सृजित हो सकें। वर्तमान में इस सम्बन्ध में निम्न कठिनाइयां अनुभव की जा रही हैं:
 पूंजी की कमी।
 ढांचागत विकास की कमी।
 उपयुक्त तकनीक का अभाव।
 उपयुक्त मार्गदर्शन का अभाव।
 लाभकारी योजनाओं को बनाने एवं प्रबन्ध करने के लिए समुचित प्रशिक्षण का अभाव।
 कुशल श्रमिकों का अभाव।
 मार्केटिंग की सुविधा का अभाव।
 उद्यमिता प्रवृत्ति का अभाव।
 लाभकारी योजनाओं को प्रारम्भ करने के लिए स्थानीय नेतृत्व की कमी।

गांव के लोग आर्थिक दृष्टि से इतने सम्पन्न नहीं हैं कि उद्योगों का जाल फैला सकें। ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही पूंजी निवेश भी बहुत कम है। अत: पूंजी की कमी है। उद्योगों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर, परिवहन, संचार, बिजली आदि की कमी है। वर्तमान तकनीक एवं प्रौद्योगिकी ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी नहीं है। आज हमें गांवों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऐसी प्रौद्योगिकी की जरूरत है, जिसमें स्थानीय प्रतिभा, स्थानीय कच्चे माल एवं संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके। प्रति इकाई पूंजी से वांछित उत्पादन हो सके तथा अधिकतम रोजगार की व्यवस्था हो सके। ऊर्जा का न्यूनतम उपयोग हो तथा पर्यावरण भी सुरक्षित रह सके। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि गांव के लोगों को इसमें प्रशिक्षित किया जाए। उन्हें वांछित सहायता एवं मार्गदर्शन दिया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग-धन्धों के विकास के लिए मार्केटिंग एक महत्वपूर्ण अवयव है। यदि मार्केटिंग की समुचित व्यवस्था नहीं हुई तो उद्योग-धन्धों के विकास की योजना असफल हो जाएगी। यह भी आवश्यक है कि कारीगरों, विद्यार्थियों को थोड़ा बहुत प्रशिक्षण देकर, उन्हें इस योग्य बनाया जाए कि वे गांव की विभिन्न विकास गतिविधियों में रोजगार पा सकें। प्रशिक्षण के बाद छोटे कारीगर वेल्ंिडग, ऑॅटो इलेक्ट्रिक सिस्टम आदि के कार्य शुरू कर सकते हैं। दोना बनाने की मशीन लगा सकते हैं। गांव के शिक्षित बेरोजगार शहरों में पलायन के बजाए कई गतिविधियां शरू कर सकते हैं। इनमें से कुछ हैं:-

कृषि स्नातकों के लिए
 खाद कीटनाशक दवाओं, बीज तथा कृषि कार्य एवं व्यापार।
 पशुओं की अच्छी नस्ल के लिए कृत्रिम गर्भाधान का कार्य। परन्तु इन कार्यों को प्रारम्भ करने से पूर्व सही प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
नर्सरी का कार्य
 सब्जियों के उत्पादन एवं शोभाकारी पौधों के लिए नर्सरी का कार्य किया जा सकता है। सब्जियों के पौधे कृषकों को बेची जा सकते हैं। शोभाकारी पौधों की नर्सरी को शहर में बेचा जा सकता है।
 अच्छी गुणवत्ता की फलों की नर्सरी उगाई जा सकती है, जिसे फलों के उत्पादन करने के इच्छुक कृषकों को बेचा जा सकता है।

बायो गैस यन्त्रों का कार्य
कुछ संस्थाएं बायोगैस यन्त्रों की स्थापना का कार्य कर रही हैं। इस कार्य को कुछ प्रशिक्षण के पश्चात गांव के नवयुवक अपना सकते हैं।

सामाजिक वानिकी योजनाएं
ऐसी जमीनें, जिन पर सामान्य फसलें नहीं उगाई जा सकतीं, उन पर सामाजिक वानिकी परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं के अन्र्तगत पेड़ लगाने पर तो बहुत जोर है, लेकिन पौधे लगाने के बाद उसकी देखभाल के काम को महत्ता नहीं दी जाती। यह कार्य कृषि स्नातकों को आसानी से दिया जा सकता है।

प्रोसेसिंग उद्योग
गांव की शिक्षित महिलाएं निम्रलिखित कुछ कार्यक्रम अपना सकती हैं। जैसे-
 आचार, मुरब्बे, मंगोड़ी, आलू के चिप्स आदि तैयार करना। यह सामान सीधे शहरों में बेचा जा सकता है।
 समुचित प्रशिक्षण के बाद गांव की महिलाएं रेडीमेड कपड़ों के डिजाईनिंग एवं उत्पादन का काम कर सकती हैं।
मेडिकल स्टोर
विज्ञान के स्नातक ऐसे स्थान पर मेडिकल स्टोर खोल सकते हैं, जहां से वे 3-4 गांवों की जरूरतें पूरी कर सकें।
यान्त्रिक इन्जीनियरिंग सर्टीफिकेट, डिप्लोमा व डिग्रीधारक
 इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के नवयुवक हैंण्डपम्प, पम्प-सेट्स, टे्रक्टर, पाइप फिटिंग्स आदि एवं उनके पुर्जों के टे्रडिंग का कार्य कर सकते हंै।
 पम्पसेट, टैक्ट्रर सुरक्षा उपकरण आदि मरम्मत करने की कार्यशालाएं स्थापित की जा सकती हैं। इसमें स्थानीय कुशल कारीगरों की मदद से कार्य कराया जा सकता है।
 कृषि उपकरण, पावर थ्रेशर, लोहे के दरवाजे व खिड़कियां तथा अल्युमिनियम की चारपाई, पलंग, कुर्सियां आदि बनाने की कार्यशालाएं स्थापित की जा सकती हैं, जिनमें स्थानीय कारीगरों की मदद से कार्य कराया जा सकता है।

सिविल इन्जीनियरिंग क्षेत्र
सिविल इन्जीनियरिंग पृष्ठभूमि के नवयुवकों की सेवाएं, पंचायतों के जरिए हो रहे भवन आदि निर्माण जैसे सिविल कार्यों के ले-आउट लेवलिंग कार्यों में ली जा सकती हैं।

कम्पाउन्डर एवं नर्सों के प्रशिक्षण केन्द्र
गांवों में कई आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथी चिकित्सक कार्य कर रहे हैं। इनके लिए कम्पाउन्डर की सेवाओं की जरूरत पड़ती है। इस कार्य के लिए हाईस्कूल या इन्टरमीडिएट पास युवकों की ट्रेनिंग के लिए प्रशिक्षण केन्द्र खोले जा सकते है।

इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्र में औद्योगीकरण के लिए निम्न सुझाव हैं:
 कृषि की भांति ग्रामीण उद्योगों में केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों के स्तर पर पूंजी निवेश बढ़ाया जाए।
 व्यक्तिगत स्तर पर पूंजी निवेश बढ़ाने के लिए ग्रामीण साख व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण एवं सरलीकरण किया जाए और उस पर सरकारी नियन्त्रण कम किया जाए।
 ग्रामीण क्षेत्र में विकास कार्यों में परिवहन, बिजली, ऑल-वेदर सड़कें, लिन्क रोड बनाने के व्यापक कार्य किए जाएं।
 राज्य स्तर पर ‘ग्रामीण उद्यमिता स्ंस्थान’ स्थापित किए जाएं, जो ग्रामीणों को लाभप्रद योजनाओं के बारे में प्रशिक्षित करें, तकनीकी मार्गदर्शन और उद्योग लगाने के लिए प्रेरित करें। इस संस्थान के केन्द्र विभिन्न जिलों एवं विकास खण्डों में स्थापित किए जाएं।
 राज्य स्तर पर कृषि एवं ग्रामीण उद्योग अनुसन्धान संस्थान की स्थापना की जाए, जो उपयुक्त प्रौद्योगिकी के विकास एवं विस्तार के बारे में कार्यवाही करे। इस कार्य में कृषि विश्वविद्यालय की भी सहायता ली जाए।
 प्रत्येक जिले में एक कृषि एवं ग्रामीण उद्योग केन्द्र खोला जाए, जो कृषकों को उद्योग-धन्धों की स्थापना एवं संचालन में पूंजी, मशीन, रॉ मैटेरियल व तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराने में सहयोग प्रदान करे। इसका यह भी उत्तरदायित्व हो कि यह नवयुवकों व कारीगरों को कुशलता प्रदान करने हेतु स्थापित उद्योगों, पॉलिटेक्निक के जरिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए। इनमें स्केल, कम्पयूटर आदि की टे्रनिंग भी दी जाए।
 ग्रामीण उद्योगों के विस्तार की योजनाएं मार्केटिंग की सुदृढ़ व्यवस्था के अभाव में सफल नहीं हो सकती। इस समस्या के समाधान के लिए विश्वविद्यालयों में ग्रामीण मार्केटिंग सिलेबस को जोड़ा जाए। प्रत्येक जिले में ग्रामीण मार्केटिंग केन्द्र खोले जाएं।
 एक ‘महिला कोष’ की स्थापना की जाए, जो महिलाओं को स्वरोजगार हेतु ऋण उपलब्ध कराए।
 राज्य एवं केन्द्र स्तर पर कृषि आधारित उद्योगों की परिकल्पना करने, स्थापित करने एवं संचालित करने के लिए ऐसी संस्थाओं की स्थापना की जाए, जिसमें कृषक भी शेयर-होल्डर हों, ताकि सम्बन्धित गतिविधियों का उन्हें लाभ मिल सके।

(लेखक ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान हेतु कार्यरत -‘ग्रामीण कल्याण संस्थान’ के अध्यक्ष हैं।

 

इ. कप्तान सिंह

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