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धर्मगुरूओं की शुरु हुई खींचतान

उत्तराखण्ड में आई भारी आपदा में 30 जुलाई 2013 भी तक 7 हजार से अधिक लोग लापता थे और हजारों शव अलग-अलग स्थानों पर बिखरे पड़े थे। लेकिन अधिसंख्य जीवित व्यक्तियों को निकाल लिए जाने के बाद अब जहां एक ओर बचाव कार्य समापन की ओर है, वहीं दूसरी ओर सबसे बड़ा सवाल उत्तराखण्ड के प्रभावित लोगों के पुनर्वास का हुआ है। इसके अलावा आपदा के कारणों तथा सरकार के रवैये पर भी बहस तेज हो गयी है। साथ ही पूरे मामले में कांग्रेस की अन्दरूनी राजनीति से लेकर कांग्रेस बनाम विपक्ष की खींचतान भी बढ़ गई है।

सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस आपदा में राज्य के सभी 13 जिले प्रभावित हुए हैं और प्रभावित लोगों की संख्या 5 लाख से अधिक है। प्रभावित ग्रामों की संख्या 4200 बतायी गई है। बचाव कार्य में सेना, वायु सेना, आईटीबीपी, एन.डी.आर.एफ., पुलिस व अन्य एजेन्सियों द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गयी। आपदा क्षेत्रों से निकाले गए 1 लाख 10 हजार लोगों में से करीब 18 हजार लोग भारतीय वायु सेना द्वारा निकाले गए। इस कार्य में वायुसेना ने प्रतिदिन 20 से 45 हेलिकॉप्टरों का उपयोग किया। इन हेलिकॉप्टरों ने करीब 2200 उड़ानें भरीं। इसी दौरान वायुसेना का एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना ग्रस्त भी हो गया जिसमें वायुसेना, आईटीबीपी व एनडीआरएफ के 20 जवान शहीद हो गए। एम.आई. 17 हेलिकॉप्टर 25 जून को दुर्घटना ग्रस्त हुआ था। दुर्घटना में शहीद हुए सैनिकों को देहरादून में केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और थलसेना अध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह व अन्य लोगों ने श्रद्धांजलि देकर अंतिम विदाई दी। बचाव कार्य में निजी कम्पनियों के 10 से 15 हेलिकॉप्टर भी जुटे। जैसा कि दावा किया गया है कि इन हेलिकॉप्टरों की मदद से 10 हजार लोग बचाए गए।

वैसे बचाव में निजी हेलिकॉप्टरों के प्रयोग को लेकर कई आरोप भी लग रहे हैं। इनमें एक बड़ा विवाद यह भी है कि अधिसंख्य हेलिकॉप्टर रॉबर्ट वाडरा की कम्पनी के हैं। जो 2 लाख रुपया प्रति व्यक्ति की दर से सरकार से बचाव कार्य के वसूल करेगी। यह प्रकरण फेसबुक पर खूब उछल रहा है। रोचक बात यह भी है कि बचाव कार्य में भुगतान पर मंगाए गए निजी हेलिकॉप्टर तो खूब उड़े, लेकिन राज्य सरकार का अपना
हेलिकॉप्टर सामान्य तौर पर आराम करता रहा। वैसे निजी हेलिकॉप्टरों में नेताओं, अफसरों व उनके खास लोगों ने भी काफी यात्राएं कीं और कई मौकों पर ये बचाव से ज्यादा दिखावे में लगे रहे।
आपदा में बचाव कार्य समापन की ओर देखते हुए राहत शिविर समेटे
जा रहे हैं। हेलिकॉप्टर उड़ानों में कमी आ गई है और स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी काम समाप्त करना शुरु कर दिया है। लेकिन चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है। अभी सबसे बड़ा काम बिखरे हुए शवों को खोजना और उनका अन्तिम संस्कार करना, किसी बीमारी या महामारी को फैलने से रोकना और आपदा से प्रभावित लोगों को, जो गावों, कस्बों या शहरों में बिना भोजन, बिना छत व बिना रोजगार के रह गए हैं, को राहत प्रदान करना है। लेकिन यह सारी व्यवस्था इतनी विशाल और कठिन है कि इसे भी यदि युद्ध स्तर पर नहीं निपटाया गया तो एक और बड़ी आपदा आ खड़ी होगी। इस पर सबसे बड़ी समस्या वर्षा को लेकर है, क्योंकि अभी सही अर्थों में पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा की शुरुआत हुई है और अगले एक-डेढ़ माह तक मानसून ने अपना जलवा दिखाना है। इन सारी समस्याओं के बीच यदि तत्परता से कार्य नहीं हुए तो मुसीबतें और बढ़ सकती हैं।

इस बीच केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग द्वारा एक उच्च स्तरीय टीम भेजी गई है जो पूरी स्थिति का जायजा लेगी। विभाग द्वारा इस बीच चमोली, जोशीमठ, देहरादून आदि स्थानों पर अपनी टीमें लगा दी गई हैं और 10 लाख क्लोरीन की गोलियों का प्रबन्ध कर लिया गया है। इसके अलावा 20 लाख क्लोरीन की अतिरिक्त गोलियां, 10 टन ब्लीचिंग पाउडर और 3 लाख ओ.आर.एस. पैकटों की व्यवस्था भी की जा रही है। राज्य सरकार द्वारा भी इस दशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

इन सारे हालात के बीच यदि सरकार ने सारी स्थितियों को समय रहते नहीं सम्भाला गया तो एक बड़ा खतरा पलायन का भी पैदा हो सकता है। क्योंकि बिना रोटी और बिना छत के कोई कैसे रह पायेगा यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। दूसरी ओर पानी प्रदूषण, संक्रमण, लाशों के सडऩे आदि के चलते यदि कोई बड़ी बीमारी फैल गई तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। स्थिति यह है कि केदारनाथ मन्दिर की सफाई के लिए भेजी जाने वाली टीम के सदस्यों ने वहां जाने से इन्कार कर दिया है।

अब इसे मानवीय स्वभाव कहें अथवा राजनीतिक विकृति, इस भारी आपदा के बीच राजनीति भी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री खेमा आंकड़े कम दर्शा कर और आपदा से निबटने में अपनी उपलब्धियां गिनवा कर दिल्ली दरबार के नजरों में अपनी योग्यता साबित करने में जुटा है, तो कांग्रेस के अन्दर ही मुख्यमंत्री के विरोधी आपदा की आढ़ में मुख्यमंत्री की कुर्सी खिसकाने की कोशिश में लग गए हैं। विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल का यह बयान कि आपदा में 10 हजार लोग मारे गए इसी खेमे बन्दी का परिणाम बताया जा रहा है। कुछ कांग्रेस विधायक भी अपनी सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं। दूसरी ओर आपदा को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच भी तल्खी बढ़ती जा रही है। नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी प्रकरण के बाद अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने आपदा से निबटने में राज्य सरकार को विफल बताते हुए सरकार की बर्खास्तगी की मांग तक कर डाली है। जबकि कांग्रेस ने इस बयान को हास्यास्पद बताया है। वैसे भाजपा के राज्य सभा सांसद तरुण विजय राज्य सरकार को लेकर जरूर नरम हैं।

दूसरी तरफ धर्म गुरुओं के बीच भी खींचतान शुरु हो गई है। जगत गुरु श्री स्वरूपानंद ने केदारनाथ मन्दिर के मुख्य पुजारी रावल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और रावल जगत गुरु के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। केदारनाथ मन्दिर में पूजा शुरु करने को लेकर शुरु हुये विवाद के बाद जगत गुरु ने रावल को हटाने और मन्दिर समिति को भंग करने की मांग तक कर डाली है। जगत गुरु का कहना है कि पूजा मन्दिर को शुद्ध करने के बाद वहीं होनी चाहिए। लेकिन रावल तात्कालिक तौर पर वैकल्पिक स्थान की बात कर रहे हैं। कुछ धर्म गुरुओं ने मन्दिर समिति के औचित्य पर ही प्रश्न उठा दिए हैं। उनका मानना है कि मन्दिर समिति के स्थान पर माता वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड की तर्ज पर उत्तराखण्ड में भी बोर्ड गठित करना उचित होगा। क्योंकि माता वैष्णो देवी यात्रा को लेकर बोर्ड द्वारा महत्वपूर्ण प्रबन्ध किए जाते हैं, जबकि उत्तराखण्ड की मन्दिर समिति कोई खास जिम्मेदारी नहीं निभाती।

इस बीच इस बात को लेकर यह बहस गर्म हो रही है कि आखिर यह हादसा क्यों हुआ? वाडिया हिमालय भूगर्भ संस्थान के ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. डोभाल का कहना है कि उत्तराखण्ड और हिमालय के विभिन्न भागों में ग्लेशियर, नदियों और वर्षा के कारण आपदाएं आती ही रहती हैं। इस बार स्थिति अपेक्षाकृत अधिक गम्भीर थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस प्रकार की स्थितियों से निबटने के लिए हमारी तैयारी क्या है। मौसम विभाग की मानें तो उनके द्वारा 15 जून को ही अतिवृष्टि की चेतावनी दी गई थी, लेकिन सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। राज्य के मुख्य सचिव सुभाष कुमार का कहना है कि मौसम विभाग ऐसी चेतावनियां कई बार देता रहता है मामला इतना भयावह होगा। इस बात का अनुमान किसी को नहीं था। अब इसे भेडिय़ा आया, भेडिय़ा आया, का मामला माना जाए या संवेदनहीनता का, यह बहस का विषय हो सकता है। कुछ लोग इस आपदा को धारी देवी मन्दिर को अपने स्थान से ऊपर उठाए जाने से जोड़ते हैं तो कुछ इसे धार्मिक स्थलों की पवित्रता को भंग किए जाने से हुए देवकोप का परिणाम बताते हैं। एक विचार यह भी है कि बड़े प्रोजेक्ट बनाए जाने और अंधाधुंध सड़क बनाए जाने से जहां पहाड़ कमजोर हो रहे हैं, वहीं नदियों में लाखों टन मलबा गिरने से नदियों का स्तर भी उठ रहा है। इससे वर्षां से तुरन्त बाढ़ आ जाती है। यह भी कहा जा रहा है कि नदियों के किनारे अतिक्रमण और क्षमता से अधिक यात्रियों का आना भी आपदा के कारणों में शामिल है। एक दूर की कोड़ी पड़ोसी देश की कथित हरकत की चर्चा से जुड़ी है।

इस सबके बीच उत्तराखण्ड गम्भीर रूप से घायल है और सीधे अथवा परोक्ष रूप से यहां के सभी नागरिक कम या अधिक पीडि़त हैं। जिनके परिजन नहीं रहे, घर, खेती, रोजगार के साधन सब नष्ट हो गए हैं उनकी पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। देखना यह है कि सत्ता, सुविधा और पैसे के पीछे दौडऩे वाला प्रभावी तंत्र, इस पीड़ा को कम करने और भविष्य को ध्यान में रखते हुए क्या करता है। यह एक कड़वा सच है कि राज्य बनने के पहले और राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड की व्यवस्था, विकास और कार्य संस्कृति को लेकर कोई स्वरूप निर्धारित नहीं हो सका। उत्तराखण्ड के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व ने पड़ोसी राज्य हिमाचल से भी कुछ नहीं सीखा। नतीजा यह है कि आम आदमी भुगत रहा है और उत्तराखण्ड किधर जाएगा, इसे लेकर कम से कम अब तक कोई गम्भीर चिंतन व उसके अनुसार कार्यान्वयन नहीं हुआ है।

 

डॉ. देवेन्द्र भसीन

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