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दैवीय आपदा या मानवीय करतूत

यह सब मान रहे हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में विनाश की यह लीला स्वयं जीवनदायिनी गंगा और उसकी सहयोगी नदियों की देन है। पिछले सालों में इस राज्य में जिस तरह नदियों को रोकने और प्राकृतिक संपदा का दोहन करने का खेल चला, उससे इस क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन ही बिगड़ गया। उसका परिणाम सबके सामने है।

उत्तराखंड में हजारों लोगों की जान लेने वाली और खरबों रूपये की संपत्ति का विनाश करने वाली त्रासदी ईश्वरीय है या मानवीय कारतूतों का नतीजा? यह प्रश्न इन दिनों देश के हर नागरिक की जुबान पर है। एक ओर जहां मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं ऐसी कहानियों की भी बाढ़ आ रही है, जो इस आपदा को ईश्वर से जोड़ रही है। कुछ इसे पर्यावरण के साथ खिलवाड़ का नतीजा मान रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं, जो इसे मानवीय करतूत बता रहे हैं। यह सब मान रहे हैं कि देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में विनाश की यह लीला स्वयं जीवनदायिनी गंगा और उसकी सहयोगी नदियों की देन है। पिछले सालों में इस राज्य में जिस तरह नदियों को रोकने और प्राकृतिक संपदा का दोहन करने का खेल चला, उससे इस क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन ही बिगड़ गया। उसका परिणाम सबके सामने है।

लेकिन साथ ही लोग अलग-अलग कहानियां भी सुना रहे हैं। सबसे पहले वरिष्ठ भाजपा नेत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने इस प्रदेश की आस्था और अस्मिता का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की कुलदेवी मानी जाने वाली ‘धारी देवी’ की प्रतिमा को हटाए जाने के कारण यह आपदा आयी है। धारीदेवी को उनके मूल स्थान से नहीं हटाया जाना चाहिए। लेकिन उनकी बात नहीं मानी गयी और गत 16 जून को धारी देवी को नदी की धार से बचाने के लिए मूल स्थान से हटाकर कुछ मीटर ऊपर प्रतिष्ठित कर दिया गया। तत्काल इसका परिणाम सामने आया। हजारों लोग मरे, लाखों बेघर हैं। आधा राज्य तबाह हो गया है।
जबकि सरकार और मौसम विज्ञानियों का कहना है कि ऊपर पहाड़ों पर भारी बारिश के कारण गांधी सरोवर में ज्यादा पानी आ गया। गांधी सरोवर टूटने के कारण बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आया। सभी नदियों में पानी एक साथ तेजी से बढ़ा। जो कुछ रास्ते में आया, उसे बहा ले गया। उत्तराखंड के कच्चे पहाड़ तेज जल प्रवाह को झेल नहीं पाए। इसी वजह से गांव, शहर, सड़कें व पुल सभी नष्ट हो गए।

लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है, जो इसे पड़ोसी देश की साजिश मान रहा है। इस वर्ग का कहना है कि जब गांधी सरोवर में पानी बढ़ा तो उसे विस्फोट के जरिए उड़ा दिया गया। इसी वजह से देवभूमि में जल प्रलय हुई। यह भी कहा जा रहा है कि पूरे हिमालय क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे, इस पड़ोसी मुल्क ने इतनी सफाई से अपने काम को अंजाम दिया कि उसका सबूत जुटा पाना संभव नहीं है।

लंबे समय से पहाड़ पर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट, इस विनाश के पीछे मनुष्य के लालच को मुख्य वजह बता रहे हैं। पर्यावरण के लिए दशकों से संघर्षरत इन दोनों समाज सेवियों का साफ कहना है कि जिस तरह उत्तराखंड की नदियों को बांधा गया है, और नदियों के ऊपर और किनारों पर निर्माण कार्य हुए हैं और जिस तरह जंगलों का सफाया हुआ है, उसका यह परिणाम तो होना ही था। बिजली बनाने के लिए जिस तरह नदियों पर बांध बनाए गए और बनाए जा रहे हैं, वे राज्य के लिए विनाशकारी साबित हुए हैं। बहुगुणा की राय में बिना सोचे पनबिजली परियोजनाएं शुरू की गयीं और नदियों को मलबे से पाट दिया गया। यह तो सभी मान रहे हैं कि अपनी गंगा के अपमान से शिव नाराज हुए हैं। इसीलिए उन्होंने गंगा और उसकी सखियों के जरिए जल तांडव करके अपने गुस्से का इजहार किया है।
लेकिन इसमें भी यदि किसी साजिश की बात कही जा रही है तो सरकार को गांधी सरोवर की असलियत का पता अवश्य लगाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि इस ओर किसी का ध्यान ही न जाए और फिर ऐसी किसी अगली साजिश को अंजाम दे दिया जाय।

 

अरूण रघुनाथ

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