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साम्राज्योत्थान के लिए नहीं सेवा

Deepak Kumar Rath

By दीपक कुमार रथ

जो दिखे, वही सच। इसका एहसास भारत के घने जंगलों, ग्रामीण इलाकों और पहाड़ी क्षेत्रों में हमें शब्दश: हो सकता है। मुझे उन पादरियों के प्रति दया आती है, जो सेवा और शिक्षा मुहैया कराने के नाम पर हमारे गरीब, खासकर आदिवासी भाइयों का शोषण करते हैं। भारत के लोग सरल, विनम्र, आस्थावान हैं और दूसरे धर्मों के प्रति आदर भाव रखते हैं। इसी वजह से भारतीय लोग धर्म-परिवर्तन के भी आसान शिकार बन जाते हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि सनातन धर्म ही एकमात्र ऐसा है जो पूरी धरती को एक कुटुंब मानता है। हिंदू समाज में विभाजन के बीज तथाकथित धर्म के गद्दारों ने षड्यंत्र के साथ बोए हैं। ऐसे लोग भगवान और धर्म के नाम पर समाज में दुविधा पैदा करते हैं। वे अपने कारनामों में कुछ हद तक कामयाब भी हैं। मिशनरियों पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की ताजा टिप्पणी में कोई नई बात नहीं है और भारतीयता में यकीन करने वाले पूरे समाज को उसका समर्थन करना चाहिए।

”जब कोई दूसरे धर्म का मिशनरी उन तक पहुंचता है तो वह भौतिक सुख-सुविधाओं का विक्रेता बनकर जाता है। उसके पास कोई ऐसी आध्यात्मिक शक्ति नहीं होती जो उसे उन लोगों से अलग करे जिनके पास वह गया है। हालांकि वह भौतिक सुख-साधनों से लैश होता है, जो वह अपने साथ चलने वालों को मुहैया कराने का वादा करता है।’’

(हरिजन, 3 अप्रैल 1937)
”अचानक एक दिन कोई मिशनरी सूखाग्रस्त इलाके में जेब में पैसा भरकर पहुंचता है, सूखा पीडि़तों में पैसा बांटता है, उन्हें अपने धर्म में परिवर्तित करता है, उनके मंदिरों को लेकर तोड़ देता है। यह निंदनीय कृत्य है।’’

(हरिजन, 5 नवंबर 1937)
”मेरा मानना है कि मानवीय सेवा के बहाने धर्म परिवर्तन कराना अशुभ कार्य है। यहां के लोग इसका सबसे ज्यादा विरोध करते हैं। आखिरकार धर्म बेहद निजी मामला होता है। उसका रिश्ता हृदय से होता है। मैं अपना धर्म सिर्फ इसलिए क्यों बदलूंगा कि कोई डॉक्टर ईसाई है और उसने मेरी किसी बीमारी का इलाज किया है या डॉक्टर को मुझसे ऐसे परिवर्तन की उम्मीद क्यों करनी चाहिए?’’

(यंग इंडिया, 23 अप्रैल 1931)
भारत में हिंदू समाज अनजाने में ही एक ऐसी लड़ाई में झोंक दिया गया है जो उसके लिए जीवन-मरण का सवाल है। यह लड़ाई हिंदू समाज पर थोप दी गई है। इस लड़ाई में हिंदू समाज के हर वर्ग को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। असल में यह ऐसी लड़ाई है जिसे अपने अस्तित्व के लिए लड़कर जीतना बेहद जरूरी है। भारत में रहने वाला हरेक मुसलमान और ईसाई मूल रूप से हिंदू रहा है। वह जबरन या बहकावे में धर्म परिवर्तन को मजबूर हुआ।

मौलवियों, मिशनरियों और भारत के वामपंथियों में एक गजब की समानता है कि जब उनकी ही दवा उन्हें दी जाने लगती है, तो वे चीखने-चिल्लाने लगते हैं। वे विचार, आस्था, अभिव्यक्ति और विवेक की स्वतंत्रता के नाम पर अपनी करतूतें चलाते रहते हैं। ये सभी एकतरफा रिश्ते में ही यकीन करते हैं।

जब भी उनके धर्म से किसी के जाने की घटना होती है, वे चीखने-चिल्लाने लगते हैं और उसे विचारों की स्वतंत्रता पर हमला करार देते हैं। मौजूदा संदर्भों में यह मसला सामाजिक और राजनैतिक दोनों तरह का है। इस्लाम और ईसाईयत से कुछ मुट्ठी भर लोगों की हिंदू धर्म में वापसी (इसे सही ही घर वापसी कहा गया) की कुछेक घटनाएं हुईं तो चर्च और उसके गुर्गे हल्ला मचाने लगे। आरएसएस ने यह साबित करके कि यह खेल दोनों तरफ से हो सकता है, इस मसले को बहस के केंद्र में लाने में कामयाब रहा है। संख्या भले मामूली हो पर इसका सांकेतिक मूल्य बड़ा है।

घर वापसी के मामले में मोहन भागवत ने कहा है कि हिंदू समाज अपने खोए सदस्यों की वापसी का जायज दावा कर रहा है जिन्हें जबरन, धोखे से और बहला-फुसलाकर दूर ले जाया गया है। उनकी टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया इसलिए हुई क्योंकि वे धर्म परिवर्तन कराने वालों की नींद उड़ा रही थी।

मुस्लिम और ईसाई धर्म में गए लोगों को अपने पुश्तैनी धर्म में वापसी वैसी नहीं है जैसी मिशनरियां धर्म परिवर्तन कराती हैं। दोनों की आधार भूमि एकदम अलग है। दोनों के दो एजेंडे हैं और समाज तथा राज्य के लिए उनकी अहमियत अलग-अलग है।

चर्च का दावा है कि उसे धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार है, जिससे उसे दूसरों का धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार है और दूसरों को नहीं। वह यह भूल जाता है कि अगर मिशनरीज को धर्म प्रचार का अधिकार है तो हिंदुओं को भी अपने धर्म की रक्षा का अधिकार है।

ईसाई और इस्लाम दोनों ही धर्म की भाषा बोलते हैं, लेकिन उनका मकसद विशुद्ध राजनैतिक है। उनका लक्ष्य दूसरे की परंपराओं को छोटा करके, लोगों को अपने धर्म में दीक्षित करके इलाकों को दखल करना और दुनिया को जीतना है। इस मायने में एक व्यक्ति का धर्म परिवर्तन भी घातक असर पैदा करता है। उसका परिवार बंट जाता है और उसके समुदाय में तनाव पैदा हो जाता है। धर्म परिवर्तन के बाद  और कई बार उसके दौरान मिशनरियां लोगों से वह सब करने को कहती हैं जो उनके मूल धर्म को बेहद अपमानित करता है। उससे मूर्ति पूजा और सामाजिक रस्मो-रिवाजों को छोडऩे को कहा जाता है और वर्जनाओं को तोडऩे, जैसे गोमांस भक्षण, का दबाव बनाया जाता है।

धर्म परिवर्तन विरोधी कड़े कानून से भी कुछ ही मदद मिलेगी। उसके अमल पर ही सब कुछ निर्भर करेगा। और अमल तभी हो पाएगा, जब राजनैतिक इच्छा हो। केंद्र सरकार को धर्म परिवर्तनों से राष्ट्रीय सुरक्षा को होने वाले खतरों का एहसास होना चाहिए, उस पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए और उस पर प्रतिबंध लगना चाहिए। उसे चर्च या इस्लामी गुटों से जुड़े संगठनों के लिए विदेशी धन के प्रवाह को रोकना चाहिए। ऐसे ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ प्रचारकों को वीसा देने से इनकार करना चाहिए। ऐसे फंड और उससे जुड़े लोगों के देश में प्रवेश पर रोक लगनी चाहिए।

धर्म परिवर्तन धीमे मगर घातक जहर की तरह हिंदू धर्म का खून खींच रहा है। हिंदू धर्म चाहे जितना महान और सुंदर क्यों न हो, अगर हिंदुओं की उसमें प्रबल आस्था नहीं होगी तो वह संग्रहालयों की वस्तु बन जाएगा और दुनिया के बाकी प्राचीन धर्मों की तरह विलुप्त हो जाएगा। इसके पहले कि हम मानवता के समुद्र में खो जाएं और भारत एक प्राचीन सभ्यता बन जाए, हमें चेत जाना चाहिए।

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