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अफगानिस्तान से अमेरिका दुम दबाकर भाग रहा है

अफगानिस्तान की आग को बिना बुझाए अमेरिका का अपने घर भागना पूरी दुनिया के लिये एक दु:स्वप्न साबित होगा और भारत के लिये तो यह भारी चिंता की बात है ही क्योंकि तालिबान की नजर भारत के कश्मीर और मुसलमानों पर है जिन्हें अपनी चपेट में लेने की उसकी भरसक कोशिश होगी। भारत खुद आर्थिक और सैनिक तौर पर इतना ताकतवर नहीं है कि अफगानिस्तान में जनतांत्रिक सरकार को सत्तारूढ़ रखने के लिये अपनी सेना और खजाना खोल दे।

24 और 25 जून को भारत और अमेरिका के बीच चौथे दौर की सामरिक बातचीत में अफगानिस्तान का मसला छाया रहा। अफगानिस्तान और तालिबान को लेकर अमेरिका ने अपनी नीति में जो यू टर्न लिया है, वह भारत के लिए एक दु:स्वप्न जैसा है। अफगानिस्तान में एक जनतांत्रिक सरकार का बना रहना भारत के सुरक्षा और सामरिक हितों के लिए काफी अहम है, लेकिन अमेरिका जिस तरह तालिबान की ताकत के सामने आत्मसमर्पण करता हुआ दिख रहा है। वह न केवल भारत, बल्कि पूरे दक्षिण और मध्य एशिया के लिए काफी डरावना लगता है। ऐसा लगता है कि अमेरिका अफगानिस्तान से दुम दबाकर भागना चाहता है। वास्तव में अमेरिका की दुम पाकिस्तान में फंसी है, जहां से छूटने के लिए वह पाकिस्तानी सेना की खुशामद कर रहा है।

भारत नहीं चाहता कि अमेरिका अफगानिस्तान को तालिबान के हवाले छोड़ कर भागे। इसलिए तालिबान से बात करने की अमेरिका ने हाल में जो कोशिशें की हैं, उससे भारत चिंतित है। इसी मसले पर सामरिक वार्ता में भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने अमेरिकी विदेश मंत्री जान केरी से खुल कर बातें की। भारत ने कहा कि अमेरिका यदि तालिबान से इस तरह झुक कर समझौता वार्ता चलाएगा तो इससे काबुल में तालिबान के सत्ता में लौटने का दरवाजा खुल जाएगा और फिर अफगानिस्तान एक बार फिर आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय जेहाद का गढ़ बन जाएगा। कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका ने जिस तरह तालिबान का दफ्तर खोलने के लिए हरी झंडी दिखाई, वह भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

हालांकि जान केरी ने भारत को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि अमेरिका तालिबान से बिना शर्त बात नहीं करुंगा, लेकिन भीतर ही भीतर अमेरिका तालिबान के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण करता हुआ लगता है। जिस तालिबान के सैकड़ों आतंकवादियों को ग्वानटानामा बे स्थित अमेरिकी जेल में एक दशक से कैद किया हुआ है, उन्हें तालिबान द्वारा बंधक बनाए गए महज एक अमेरिकी सैनिक के एवज में छोडऩे पर अमेरिका राजी हुआ लगता है। वास्तव में अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी सुरक्षित वापसी के लिए जिस तरह तालिबान की शर्तें मानने के लिए तैयार हुआ है, वह एक महाशक्ति के लिए शर्मनाक है। अमेरिका का ताजा रवैया साठ के दशक में वियतनाम से अमेरिकी फौज की शर्मनाक वापसी की याद दिलाता है।

अमेरिका ने 9-11 के बाद जब अफगानिस्तान पर हमला बोला था और अल कायदा और तालिबान के आतंकवादियों को वहां से खदेड़ कर भगाया था, तब ऐसा लगा था कि दक्षिण एशिया से आतंकवादी संगठनों और आतंकवाद का अब खात्मा हो कर रहेगा। पाकिस्तान की सेना अपनी औकात में रहेगी और वह अपने यहां आतंकवादी संगठनों को प्रशिक्षण और पनाह देना बंद करेगी। कुछ सालों तक तो पाकिस्तान की सेना डरी और सहमी रही लेकिन उसने तालिबान को इस दौरान इतना ताकतवर बना दिया कि वह अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी अगुवाई वाली नाटो सेना पर भारी पडऩे लगे।

अफगानिस्तान में इस दौरान सैकड़ों अमेरिकी सैनिक मारे गए। तालिबान ने पाकिस्तान की मदद से वहां अमेरिका और नाटो की सवा लाख से अधिक सेना की नाक में दम कर दिया। अमेरिका ने अपनी जान बचाने के लिए पाकिस्तान की चिरौरी करनी शुरू की। पिछले एक दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान को तीस अरब डालर से भी अधिक की मदद दी। पाकिस्तान इसके बावजूद अफगानिस्तान में अमेरिका की जड़ें खोदता रहा। लेकिन महाशक्ति अमेरिका ने अपने को भुलावे में रखा और पाकिस्तान की हरकतों को जानबूझ कर नजरअंदाज करता रहा। यहां तक कि अलकायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में दस साल तक छिपा रहा और अमेरिका से पाकिस्तानी जनरल यही कहते रहे कि वह अफगानिस्तान में ही छिपा है और यदि नहीं तो वह मारा जा चुका है। दो साल पहले
ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका ने कहा कि अलकायदा का अस्तित्व मिट चुका है और अलकायदा से डरने की कोई बात नहीं है।

अब अमेरिका का मनोबल इतना टूट चुका है कि वह किसी तरह अफगानिस्तान से भागना चाहता है, लेकिन पाकिस्तान की मदद के बिना वह अफगानिस्तान से नहीं भाग सकता। अफगानिस्तान में पिछले एक दशक के दौरान अमेरिका ने अपने अत्याधुनिक और महंगे सैन्य साज-सामान तैनात कर दिए थे जिन्हें वह पाकिस्तान की जमीन से ही होकर स्वदेश ले जा सकता है। इसलिए अमेरिका की कोशिश है कि अफगानिस्तान से सुरक्षित लौटने के लिए वह पाकिस्तान को नाराज न करे।

अमेरिका के इस रवैये से पाकिस्तान की समर नीति काफी कामयाब होती लगती है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को हमेशा एक सामरिक महत्व वाला देश माना है, जहां से वह भारत के खिलाफ लड़ाई में अपने सैनिक हमलों को अंजाम दे सके। एक दशक तक जिस धैर्य से पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हामिद करजाई सरकार के खिलाफ तालिबान की ताकत मजबूत की, उसकी नीति अब कामयाब होती लगती है। दूसरी ओर अफगानिस्तान में भारत ने पिछले एक दशक में दो अरब डालर से अधिक के निवेश किए हैं। वहां स्कूल खोले हैं, अस्पताल चलाए हैं, सड़कें बनाई हैं, राजधानी काबुल के लिए बिजली सप्लाई की सुविधा बहाल की है, काबुल में अफगानिस्तान की जनतांत्रिक सरकार की असेम्बली की इमारत बनाई है और अन्य कई तरह की विकास की गतिविधियां चलाई हैं, ताकि अफगानिस्तान अपने पैरों पर खड़ा हो सके। लेकिन अब लगता है कि अगले साल जब अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज लौट जाएगी, तब तालिबान का हामिद करजाई सरकार पर हमला और तेज होगा, जिसे करजाई सरकार की सेना झेल नहीं पाएगी। यदि ऐसा हुआ तो अफगानिस्तान की सेना और सरकार बिखरने लगेगी और तालिबान का मुल्ला उमर फिर से अफगानिस्तान पर इस्लामी अमीरात की स्थापना कर सकेगा।

लेकिन ऐसा नहीं है कि मुल्ला उमर बेधड़क अफगानिस्तान पर शासन कर सकेगा। उसे शासन में बने रहने के लिए पाकिस्तान की सेना की मदद की जरूरत होगी और मुल्ला उमर की विरोधी ताकतें मुल्ला उमर को चैन से नहीं बैठने देंगी। मुल्ला उमर की सरकार को बचाने के लिए पाकिस्तानी सेना को अपनी ताकत झोंकनी पड़ेगी। इस तरह अफगानिस्तान फिर से उग्रवादी हिंसा के नए दौर में प्रवेश करेगा। इसका असर दक्षिण एशिया, खासकर भारत पर तो पड़ेगा ही, मध्य एशिया के मुस्लिम देशों पर भी पड़ेगा। पिछले एक दशक से मध्य एशिया में शांति का माहौल है, लेकिन अफगानिस्तान में कट्टरपंथी ताकतों के फिर सत्ता में आने के बाद वे अपना प्रभाव मध्य एशिया में फैलाने की कोशिश करेंगी और इस तरह मध्य एशिया फिर कट्टरपंथ की आग में झुलसने लगेगा।

अफगानिस्तान से अपना मकसद पूरा किए बिना अमेरिकी फौज का हटना इस तरह पूरे दक्षिण और पश्चिम एशिया को फिर अशांत कर देगा। अमेरिका को यदि यह गलतफहमी है कि उसे अब पश्चिम एशिया के तेल एवं गैस की जरूरत नहीं है, और वह भौगोलिक तौर पर एशिया से काफी दूर है, तो वह अपने को भुलावे में रख रहा है। इस्लामी कट्टरपंथ बनाम पश्चिम के संघर्ष की आग एशिया के अलावा यूरोप और अमेरिका को भी अपनी लपेट में लेगी । अमेरिका और यूरोप में कट्टरपंथी विचारों वाले मुसलमानों की कमी नहीं है, जो इस आग में पेट्रोल बनेंगे और अमेरिकी समाज को विस्फोटकों से रौंद देंगे।

अफगानिस्तान की आग को बिना बुझाए अमेरिका का अपने घर भागना, पूरी दुनिया के लिए एक दु:स्वप्न साबित होगा और भारत के लिए तो यह भारी चिंता की बात है ही, क्योंकि तालिबान की नजर भारत के कश्मीर और मुसलमानों पर है, जिन्हें अपनी चपेट में लेने की उसकी भरसक कोशिश होगी। भारत खुद आर्थिक और सैनिक तौर पर इतना ताकतवर नहीं है कि अफगानिस्तान में जनतांत्रिक सरकार को सत्तारूढ़ रखने के लिए अपनी सेना और खजाना खोल दे। अफगानिस्तान में मौजूदा संविधान के तहत किसी सरकार का चलते रहना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित में भी उतना ही है, जितना भारत के हित में।

रण जीत

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