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नमोनाइटिस और सेकुलराइटिस

अगर हमें नमोनाइटिस हुई है तो तुम्हें सेकुलराइटिस है। मेरा लारा लप्पा है तो तेरा हड्डी चप्पा। इसका ध्येय है कि इसका प्रत्याशी दिन में दस बार कांग्रेसियों को एसएमएस करे-सेकुलराइटिस।
यह देश इस बात को हमेशा याद रखेगा कि जब पग-पग पर कांटे बिछाना आम बात हो और राजनीतिक विरोधी और कुछ नहीं तो एक अदद केले के छिलके फेंककर ही अगले को बीच बाजार में फिसलने और फिर हंसी का पात्र बनने के लिए मजबूर कर देते हों, तब ऐसे उदार राजनेता भी हैं जो अपनी जगह किसी दूसरे को देश का प्रधानमंत्री बनवाने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। अगर वे महाशय सचमुच प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करने लगे तो यह देश इस उदार राजनेता का सदैव ऋणी रहेगा। माता-बहनें आदर से इस राजनेता का नाम लेंगी और अपने बच्चों को सिखाएंगी कि नालायकों! इस आदमी से सीखों कि उदारता क्या होती है और त्याग क्या होता है। लोग सोनिया गांधी के ऐतिहासिक त्याग को भूल जाएंगे और इस व्यक्ति के त्याग की गाथाएं लिखी जाएंगी। इस आदमी ने अपनी शिखा को तब तक के लिए खोल दिया है, जब तक इसका ध्येय पूरा नहीं होता। एक ऐसी श्रीमती जी भी इस देश में हुई हैं जिन्होंने घोषणा की थी कि विदेशी मूल की कोई महिला यदि प्रधानमंत्री बनी तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगी और जमीन पर सोने लगेंगी। इतना छोटा दिल। इतनी अनुदार। इतना कोलाहल कलह। दूसरी तरफ इस राजनीतिक संत को देखिए। यह अगले को आदर देता है और कोशिश करता है
कि सभा में अगला ही छाये। सभा उसी की लगे और सभा को वही लूट ले जाए। इसलिए वह अपना अध्यक्षीय भाषण उससे पहले पढ़कर बैठ जाता है। लो यह रही सभा, इसे अपनी भाषण कला से लूट लो। क्या जज्बा है! ऐसे लोग अब कहां मिलते हैं? यह तो उस पार्टी का ही कमाल हो सकता है जिसने कूट-कूट कर चरित्र निर्माण किया है। आज का समय इतना बुरा है कि श्रेय लेने के लिए लोग मां-बहन एक कर देते हैं, सरेआम लड़ते और धक्का-मुक्की करते हैं लेकिन यह आदमी क्या है, हीरा है जी हीरा! यह अपने सिर पर अगले को जूतों सहित चढ़ा रहा है और उफ तक नहीं कर रहा है। बस इसका ध्येय पूरा हो जाए और अगला प्रधानमंत्री बन जाए। इसे और कुछ नहीं चाहिए। यह आदमी गजब का मनोवैज्ञानिक भी है और पहुंचा हुआ राजनैतिक डॉक्टर है। इसे कोई भी मर्ज हो, झट दिखाई दे जाता है और चट यह अपना राजनैतिक नुस्खा लेकर हाजिर हो जाता है। इसने कांग्रेसियों और उनके सहयोगियों में एक नई बीमारी ढूंढ निकाली है जिसका नाम है सेकुलराइटिस। इसका कहना है कि जिस तरह से एनसिफलाइटिस (दिमागी बुखार) नाम की बीमारी होती है, उसी तरह से सेकुलराइटिस नाम की एक बीमारी होती है जो कांग्रेस और उसके सहयोगियों में पायी जाती है। यह बीमारी लाइलाज है। इसमें आदमी दूसरे को साम्प्रदायिक समझता है, भले ही खुद उसके अपने जीवन में साम्प्रदायिक तत्व देखे गए हों। जब यह महापुरूष गोवा में खोज कर रहा था, जहां इसके प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी का जयगान होने वाला था तब कुछ लोग जलन के कारण बीमार हो गए थे। विरोधी दल
कांग्रेस के लोगों ने तब कहा था कि इन लोगों को नमोनाइटिस नामक बीमारी हो गई है हालांकि एक बुजुर्ग नेता को तो सचमुच दस्त लग गए थे। ऐसा होता है जिसका हक मारा जाता है, उसे दस्त लगते हैं और जो जल भुन जाते हैं उन्हें नमोनाइटिस सरीखी बीमारी हो जाती है। होता है जी। तब से यह त्यागी महापुरूष सेकुलराइटिस बीमारी की खोज में जुटा है। अगर हमें नमोनाइटिस हुई है तो तुम्हें सेकुलराइटिस है। मेरा लारा लप्पा है तो तेरा हड्डी चप्पा। इसका ध्येय है कि इसका प्रत्याशी दिन में दस बार कांग्रेसियों को एसएमएस करे-सेकुलराइटिस। सेकुलराइटिस। सेकुलराइटिस। इससे उन्हें अपने बारे में ही संदेह पैदा हो जाएगा जैसे किसी कल्पित बीमारी को सोचकर किसी अच्छे खासे आदमी में हो सकता है। सालों की बोलती बंद हो जाएंगी। एक की जबान से भी नमोनाइटिस नहीं निकलेगा। खुदा ना खास्ता इस धुप्पल में इसका प्रत्याशी जीत गया तो वही प्रधानमंत्री बनेगा जो इसे अपना उप-प्रधानमंत्री या गृहमंत्री बनाएगा तब सचमुच इस त्यागमूर्ति के त्याग की कथा बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल हो जाएगी। और अगर किसी ने नमो नमो का अखंड जाप करते हुए टांग अड़ाने की कोशिश की तो यह अपने आप को चुपके से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तुत करेगा। तब उदारता और त्याग काम आएगा। आखिर कोई भी त्याग कब व्यर्थ गया है।

 

मधुसूदन आनंद

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