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मोदी ने डाला नवीन को उलझन में

नीतीश कुमार के बाद अब ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को ‘मोदी फोबिया’ हो गया है। नवीन आजकल बहुत परेशान चल रहे हैं। परेशानी का कारण गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। मोदी ने भुवनेश्वर में भगवान जगन्नाथ की रथ-यात्रा में भाग लेने की योजना बनाई है। इस रथ-यात्रा का कार्यक्रम दस दिन चलता है जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा के पास रहने जाते हैं। इस मौके पर हजारों की तादाद में भक्तजन भगवान जगन्नाथ का रथ खींचने के लिए एकत्र होते हैं। हजारों भक्तजनों को खुद से जोडऩे का इससे अच्छा मौका और कौन सा हो सकता है। मोदी तो हिन्दू सम्राट माने ही जाते हैं, लेकिन मुस्लिम वोटों की खातिर नवीन पटनायक खुद को धर्म निरपेक्ष की श्रेणी में रख कर भाजपा से दूरी बनाए रखने में अपना हित समझते हैं। ओडिसा आने के लिए वीजा की कोई शर्त न होने से वह मोदी को अपने राज्य में आने से रोकने की हिम्मत नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त नवीन पटनायक की परेशानी यह भी है कि मोदी के रथ यात्रा में शामिल होने पर मीडिया के लिए आकर्षण का केन्द्र भी मोदी ही रहेंगे। खैर अभी तो नवीन इस उलझन में हैं कि मोदी के हेलिकाप्टर को भुवनेश्वर में उतरने की अनुमति पर ब्रेक कैसे लगाएं। वैसे चर्चा यह भी है कि नवीन इस से भी बड़ी उलझन में हैं। वह सोच रहे हैं कि मोदी यदि रथ यात्रा में आ गए तो कहीं उनकी अपनी (नवीन पटनायक की) मीडिया कवरेज शून्य न हो जाए। इस समस्या को हल करने के लिए वह रथ यात्रा के दौरान मोदी का साथ देने के बारे में भी विचार करने लगे हैं। लेकिन इससे नवीन पटनायक की धर्मनिरपेक्ष छवि का क्या होगा? वैसे वोट बैंक राजनीति जो न करा दे थोड़ा है।
रिवॉल्वर चौधरी
रिवॉल्वर चौधरी यानी आंध्र की कांग्रेस पार्टी की सबसे फायर ब्रांड नेता रेणुका चौधरी को (राज्य में उन्हें इस नाम से भी जाना जाता है।) वर्तमान में राज्य सभा की सदस्य हैं और आए दिन पत्रकारों से बात करते हुए वह इस बात को बताना नहीं भूलतीं कि 2014 में वह लोक सभा चुनाव लडऩा चाहती हैं। वह अकसर अपने लोकसभा क्षेत्र खम्मम की बातें छेड़ती रहती हैं। इतना ही नहीं, जब चुनाव क्षेत्र से कोई कार्यकर्ता उनसे मिलने आता है तो वह यह कहना भी नहीं भूलतीं कि कुछ दिनों की बात है, फिर तो मैं ही आपकी सांसद बनूंगी और सारे काम करवा दूंगी। वैसे आंध्र में कांग्रेस के जो हालात हैं, उसे देखने के बाद अगर कोई कांग्रेसी लोकसभा चुनाव लडऩे की चाह रखता है तो उसे दंबग ही कहा जा सकता है, क्योंकि जगन रेड्डी और तेलंगाना मसले ने वहां कांग्रेस की हालत बहुत पतली की हुई है।
ब्लू स्टार
अमृतसर में गोल्डन टैंपल परिसर में छिपे खालिस्तान समर्थकों को बाहर निकालने के लिए सरकार ने सैन्य अभियान चलाया था, जिसे ऑपरेशन ब्लूस्टार नाम दिया गया था। इस ऑपरेशन में भिंडरावाले की मौत हुई थी और इसके बाद देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और देश के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वैद्य की भी अलगाववादियों ने हत्या कर दी थी। इस सैन्य कार्यवाही को ऑपरेशन ब्लूस्टार नाम क्यों दिया गया, यह एक पहेली बनी रही। कई लोग इसके अलग-अलग कारण बताते हैं, लेकिन 29 साल के बाद यह पहेली सुलझी है। इन ऑपरेशन के कत्र्ताधर्ता ले.जनरल वी. के. नायर, ने हाल ही में एक किताब लिखी है। जिसमें उन्होंने लिखा कि इस ऑपरेशन की कार्य योजनाओं पर हम लोग कार से कहीं जाते हुए बात कर रहे थे। इतने में लाल बत्ती पर गाड़ी रुकी और मैंने सामने देखा कि एक इमारत पर ब्लूस्टार रेफ्रिजरेशन के विज्ञापन का बड़ा सा बोर्ड लगा था। बस वहीं से हमने इस ऑपरेशन का नाम ब्लूस्टार रखा। प्रख्यात अंग्रेजी लेखक शेक्सपियर ने ठीक ही लिखा है- ‘नाम में क्या रखा है’?
अरविंद मायाराम
वित्त मंत्रालय में चर्चा है कि अरविंद मायाराम भी रिजर्व बैंक के गवर्नर बनने के लिए अपना जुगाड़ ढूंढ रहे हैं। रिजर्व बैंक के मौजूदा गवर्नर डी सुब्बाराव का कार्यकाल कुछ दिनों में खत्म हो रहा है। अन्य दावेदारों का कहना है कि अरविंद मायाराम के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में एक जमीन विवाद का केस चल रहा है, ऐसे में उनका गवर्नर बनना मुश्किल है। लेकिन वे लोग इस बात को भूल गए कि जब पिछली बार उनका प्रमोशन होना था, तब भी इस केस का जिक्र हुआ था, लेकिन अरविंद वित्त मंत्रालय में सेक्रेटरी बन ही गए। दरअसल, अरविंद के कांग्रेस पार्टी से बड़े नजदीकी संबंध हैं। अरविंद की मां इंदिरा मायाराम राजस्थान में कांग्रेस सरकार में मंत्री थीं। अरविंद के ‘इंडिया बुल्स’ से भी अच्छे संबंध होने की खबरे हैं। ‘इंडिया बुल्स’ का मतलब है कि देश के कई बड़े नेताओं से नजदीकियां। इन बातों को देखते हुए लगता है कि अरविंद का पलड़ा बाकी दावेदारों से भारी है।
राजनीतिक बेरोजगार
जब बड़े नेता राजनीतिक रूप से बेरोजागर होते हैं तो कई बार वह ऐसे काम करते हैं, जिसे ऊटपटांग ही कहा जा सकता है। हाल ही में ऐसे ही राजनीतिक बेरोजगार पूर्व केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुरेश पचौरी एक ज्ञापन ले कर देश के राष्ट्रपति के पास पहुंचे। पचौरी ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई कि उत्तराखंड त्रासदी में मरने वालों का अंतिम संस्कार वैदिक पद्धति से ही होना चाहिए। राष्ट्रपति को ज्ञापन देते हुए फोटो भी खिंचवाई। राष्ट्रपति भवन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बात की चर्चा करते हुए कहा कि हमारे नेताओं की संवेदना को क्या हुआ है। जब उत्तराखंड में हजारों यात्री फंसे हुए हैं और सारा देश उन जिंदा लोगों की सुरक्षित वापसी की दुआ कर रहा हो तो कोई बड़ा नेता उस स्थिति में मरे हुए लोगों का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए, इस बात पर देश के राष्ट्रपति से मिले तो सिर शर्म से झुक जाता है।
दुखी हैं शिंदे से
कई आईआरएस अधिकारी देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को कोस रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब आईआरएस अधिकारी का पाला वित्त मंत्री से पड़ता है तो फिर शिंदे कहां से बीच में आ गए। दरअसल, मसला कुछ आईआरएस अधिकारी के प्रमोशन का है। बड़ी मुश्किल से जब उनके प्रमोशन की फाइल बनी तो पहले उनके अपने विभाग में एक वरिष्ठ महिला अधिकारी के चलते वह आलमारी में पड़ी रही। अधिकारियों ने जुगाड़ लगाकर उस फाइल को वहां से चलवा दिया। फिर वित्त मंत्री की निजी और कार्यालयी व्यस्तता के चलते अधिकारियों को लंबा इंतजार करना पड़ा। अब फाइल वित्त मंत्री के पास से गृह मंत्री के पास पहुंची। उस फाइल पर गृह मंत्री को भी हस्ताक्षर करने होते हैं। यहां से फाइल प्रधानमंत्री के यहां जाएगी और वहां से आगे बढऩे के बाद ही उन्हें प्रमोशन का पत्र मिल सकता है। लेकिन उत्तराखंड और कई मसलो के चलते शिंदे के पास फाइल देखने का समय नहीं है। अधिकारी रोज गृह मंत्रालय में अपने जुगाड़ से पूछते हैं कि फाइल क्लियर हुई या नहीं। जब जवाब न में मिलता है तो अधिकारी शुरू हो जाते हैं की देश के गृह मंत्री कितनी ढिलाई से काम करते हैं।

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