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युद्ध सीमा पर नहीं, भीतर होगा

आतंकवाद के मामले पर टालमटोल की नीति अपनाने और एक केंद्रीकृत आतंक विरोधी संस्था न स्थापित करने की देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

युद्ध और लड़ाई के मायने अब बदल रहे हैं। अब तक जंग सीमा पर दुश्मन से हुआ करती थी। पर अब शत्रु घर में ज्यादा और सीमा पर कम वार करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि भविष्य के युद्ध सीमा पर नहीं बल्कि देश के भीतर लड़े जायेंगे। 2001 का संसद पर हमला, 2011 का मुंबई हमला और 2013 का बस्तर हमला इसके सीधे उदाहरण हैं। एक और बात साफ़ है ये हमले न सिफऱ् देश के भीतर होंगे बल्कि नए तौर तरीकों और नए किस्म के हथियारों से होंगे। अमेरिका का 9/11 इसीका एक रूप था। विश्व भर के सुरक्षा विशेषज्ञ चिल्ला चिल्ला कर कह चुके हैं कि भारत से ज्यादा अस्थिर और खतरनाक आस पड़ोस दुनिया के किसी भी देश के पास नहीं हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल विश्व भर में असफल होते हुए देशों की सूची में सबसे आगे आते हैं।

क्या भारत तैयार है?
आज तीन बड़े खतरे देश की आंतरिक सुरक्षा के सामने हैं। जिहादी आतंकवाद, अति वामपंथी लाल आतंकवाद और पूर्वोत्तर का जातीय आतंकवाद। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार देश के 640 में से 254 जिले सीधे सीधे आतंकी प्रभाव और उसके साये में हैं। कई जगह तो आतंकियों का सीधा नियंत्रण देश की धरती पर है और वहां अपना प्रशासन नदारद है। ये जिले विभिन्न प्रदेशों में स्थित हैं और आतंकवादी एक राज्य से दूसरे में बेधड़क आते जाते हैं। उनके अड्डे अलग अलग जगहों पर हैं। जिहादी और लाल आतंकवादी अनेक राज्यों से अपने ऑपरेशन करते हैं। एक राज्य में हमला करके दूसरे में भाग जाते हैं। एक राज्य की पुलिस जब दबाव बनाती हैं तो वे दूसरे प्रदेश में पनाह ले लेते हैं। एक प्रदेश में आतंकवादिओं के नेता हैं, दूसरे में उनका काडर तो तीसरे में उनके हथियार।

जब युद्ध देश के भीतर हो रहा है तो लाजमी है कि हमारे पास उससे लडऩे वाली एक सेना हो जो देश में किसी भी स्थान पर बेरोकटोक जा सके। उसके ऊपर राज्यों की सीमाओं की पाबंदियां ना हो। पर हम तो अभी तक राज्यों की ही नहीं एक ही राज्य के जिलों में भी थानों की सीमाओं में फंसे हैं। उधर सुरक्षा बलों की स्थिति देखिये। आतंकवादी हमला करता हैं और सुरक्षा बल अपनी हदबंदी से बाहर जाकर उसे तलाशने के लिए ऊपर के आदेश की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं।

आतंकवाद के खिलाफ हर पार्टी जोर-जोर से चिल्लाती तो जरूर है मगर आज भी देश में इसके खिलाफ कोई एक नीति नहीं है। जब नीति ही नहीं है तो एक्शन प्लान कहां से होगा? पार्टियां अपने अपने वोट बैंक के नजरिए से आतंकवादी घटनाओं को राजनीतिक रंग देती हैं। चाहे वो दिल्ली का बटाला हाउस मामला हो, गुजरात का इशरत जहांन प्रकरण या फिर बस्तर का आतंकवादी हमला, सिर्फ और सिर्फ सियासी मकसद से इनका इस्तेमाल हो रहा है।

पिछले दिनों जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय आंतकवाद निरोधी केंद्र एन सी टी सी बनाने का प्रस्ताव किया तो उसका विरोध देखकर आतंकवादी संगठनों की बांछे खिल गई होंगी। संक्षेप में देखा जाए तो एन सी टी सी का प्रारूप आतंकवाद के खिलाफ राज्यों और केंद्र के कदमों के बीच तालमेल स्थापित करने वाली एक संस्था के रूप में किया गया है। हो सकता है कि इसके प्रावधानों पर बहस की जरूरत हो। इसमें बदलाव की गुंजाईश भी है। मगर जिस तरह से 13 मुख्यमंत्री दलगत रूप से इसके खिलाफ खड़े हुए उसे देखकर लगा कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता पर राजनीतिक अवसरवाद हावी हो गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा को अपने बीज मंत्र की तरह रटने वाली भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने इसका ये कह कर विरोध किया कि ये संघीय ढांचे के अनुरूप नहीं है। ये विस्मित कर देने वाली बात है। भाजपा कबसे संघीय ढांचे को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखने लगी? बेहतर होता कि भाजपा एक वैकल्पिक व्यवस्था का प्रस्ताव करती या फिर एन सी टी सी को स्वीकार कर उसके प्रारूप में संशोधन की कोशिश करती। परन्तु उसके समूल विरोध का अर्थ है कि इस पार्टी के लिए भी राष्ट्रीय सुरक्षा एक राजनीतिक नारा भर ही है।

वैसे केंद्रीय मंत्री पी चिदम्बरम से हर बात पर सहमत होना मुश्किल है पर इस मामले में उनका ये कहना एकदम सटीक है कि आतंकवाद के मामले पर टालमटोल की नीति अपनाने और एक केंद्रीकृत आतंक विरोधी संस्था न स्थापित करने की देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

 उमेश उपाध्याय

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