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भटकल: आतंक की राजधानी को इंतजार है एक चिंगारी का

इतिहास गवाह है कि पश्चिमी तट की रणनीतिक स्थिति की वजह से सदियों से भटकल पर कई आक्रमणकारियों एवं दूसरी जगह जाकर बसने की चाह रखने वालों की नजर रही है। यह छोटा सा शहर कई हुकूमतों एवं राजवंशों की उन्नति और पतन का गवाह रहा है। विश्व प्रसिद्ध मध्ययुगीन यात्री इब्न बतूता ने अपने वृतांत में भटकल का बड़े प्यार से जिक्र किया है। उन्हें यह शहर बेहद पसंद आया। वर्ष 1291 से लेकर वर्ष 1343 के बीच यह होयसल साम्राज्य का हिस्सा था और बाद में विजयनगर साम्राज्य ने इसे दखल कर लिया।मैं आतंक के पर्याय बने इस शहर में आधी रात में पहुंचा। कोंकण रेलवे की कछुआ चाल पैसेंजर गाड़ी रास्ते में लगातार हो रही मॉनसून की बारिश की वजह से जगह-जगह रोक दी जाती थी। प्लेटफॉर्म पर काले रंग के समुद्र के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा था। हर तरफ सिर से पांव तक काले लबादे में ढकी मुस्लिम महिलाएं और सफेद पोशाक पहने मर्द ही नजर आ रहे थे। मुझे महसूस हुआ जैसे में सउदी अरब आ गया हूं।

तीन तरफ से ऊंची सहयाद्री पर्वत श्रृंखला (इसे पश्चिमी घाट के नाम से भी जाना जाता है) की बेलनाकार पहाडिय़ों और दूसरी तरफ से अरब समुद्र के हल्के नीले पानी से घिरा भटकल है, जो आलीशान आधुनिक महलों एवं भव्य शॉपिंग परिसरों के साथ-साथ पुराने अनूठे मकानों वाला एक समृद्ध शहर है। कर्नाटक के उत्तर कनारा जिले में मंगलूर और करवार के बीच में स्थित, यह शहर एक ताल्लुका मुख्यालय है। अधिसंख्य मुस्लिम आबादी वाले करीब 60 हजार लोगों का यह शहर, आज ‘भारत की आतंक राजधानी’ के नाम से पुकारा जाने लगा है। यह इंडियन मुजाहिद्दीन का गढ़ है।

इतिहास से गहरे प्रभावित एवं बीते युग की भव्यता बयां करते स्मारकों की प्रचुरता के साथ यह फलता-फूलता शहर महज दो दशक पहले शांति, सकून, समृद्धि एवं पवित्रता का प्रतीक था। आनादिकाल से समृद्धि, धर्म में गहरी आस्था और एकता इस शहर की खासियतें थीं। मुसलमान, हिंदू, ईसाई और जैन धर्मावलंबी सदियों से यहां सद्भाव के साथ रहते आए हैं। चहल-पहल वाले इस मनोरम शहर की संस्कृति मूल रूप से गंगा- जमुनी रही है, जिसमें अरबी और स्थानीय, दो महत्वपूर्ण खासियतें मिली हैं। मुस्लिम और हिंदू- दो प्रमुख समुदायों के इस शहर में छिटपुट ईसाई एवं चंद जैन परिवार भी रहते हैं। ये चंद जैन परिवार उन सुखद दिनों की याद दिलाते हैं, जब शहर पर उनकी हुकूमत हुआ करती थी। अब्दुल मलिक मारवान की हुकूमत के दौरान इराक के कुख्यात गवर्नर की तानाशाही से भाग कर अरब व्यापारियों का एक समूह 8वीं सदी के करीब इस छोटी-सी जमीन पर बस गया और उन पर नवायत यानी नवागंतुक होने का ठप्पा लगा। आज भी उनके वंशज अपने
को नवायती मुस्लिम कहते हैं और उनका एक वेबसाइट (डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू.भटकली.कॉम) है, जो उनके अतीत और मौजूदा समय की पूरी दास्तां बयां करता है।नवायती समुद्री रास्तों से कारोबार करने वाला एक समुदाय है, जो इस जगह पर एक हजार वर्ष से भी अधिक समय पहले आया था। आबादी में उनका प्रतिशत ज्यादा है। इलाके की अर्थव्यवस्था की कुंजी भी उन्हीं के हाथ में है। हिंदुओं में नामधारी या एडिगा की बहुतायत है। एक फर्क जो आंखों को साफ नजर आ जाता है, वह यह है कि यहां मुसलमान समृद्ध हैं, हिंदू नहीं। आज यहां कितना ध्रुवीकरण है, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि समृद्ध इलाके में हिंदुओं के घर, नहीं के बराबर हैं, वे घर ही रौशन हैं, जहां मुसलमान रहते हैं। खाड़ी देशों से भेजी गई कमाई के पैसे से शहर में आलीशान बंगले एवं महल बन गए हैं। मैंने वहां तीन दिन गुजारे। उस दौरान मैंने जागीर, किले, लकड़ी के घर, सामंती गढ़, अंग्रेजनुमा काउंटी मकान एवं फ्रांसीसी विला देखे। ये सिर्फ मुसलमानों की मिल्कियत हैं। पूरे देश के अपने भ्रमण में मैंने भव्य मकानों की इतनी प्रचुरता कहीं और नहीं देखी। भटकल किसी वास्तुकार के सपने के शहर जैसा लगता है। जॉली नामक तट पर समुद्र के ठीक सामने ऐसे अनोखे तटीय मकान मिले, जिन्हें देख कर फ्रांसीसी रिवियेरा, लास पलमास और फ्लोरिडा में ऐसे घरों के मालिकों को जलन होने लगे। इतना ही नहीं, सहयाद्रि पर्वतमाला की पहाडिय़ों की ऊंची चोटी पर भी कुछ मकान बने हुए थे। इनकी समृद्धि साफ नजर आती है। हैरत की बात यह है कि इनमें अधिकतर संपत्तियां खाली पड़ी हैं। इनके मालिक या तो विदेश में रहते हैं, या उन्होंने इन भव्य मकानों को बना कर अभी-अभी अपनी हैसियत जताई है। इसके ठीक उलट, हिंदू इलाकों में बेढंगे मकान एवं झोपडिय़ां दिखाई देती हैं। नवायतियों ने भटकल के आस-पास करीब पांच हजार एकड़ जमीन खरीदी हुई है और खाड़ी देशों की बदली हुई स्थितियों की वजह से वहां से भारी संख्या में लोग लौट रहे हैं। जल्दी ही और जमीनें खरीद ली जाएंगी।

इतिहास गवाह है कि पश्चिमी तट की रणनीतिक स्थिति की वजह से सदियों से भटकल पर कई आक्रमणकारियों एवं दूसरी जगह जाकर बसने की चाह रखने वालों की नजर रही है। यह छोटा सा शहर कई हुकूमतों एवं राजवंशों की उन्नति और पतन का गवाह रहा है। विश्व प्रसिद्ध मध्ययुगीन यात्री इब्न बतूता ने अपने वृतांत में भटकल का बड़े प्यार से जिक्र किया है। उन्हें यह शहर बेहद पसंद आया। वर्ष 1291 से लेकर वर्ष 1343 के बीच यह होयसल साम्राज्य का हिस्सा था और बाद में विजयनगर साम्राज्य ने इसे दखल कर लिया। साम्राज्य के बिखरने के बाद हडवली के जैन सलूवा हुक्मरानों ने इस शहर को अपने कब्जे में ले लिया। उन्होंने इस अविध में कई मंदिर बनवाए। उनके अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं। 16वीं सदी के शुरुआती वर्षों में पुर्तगालियों ने इस पर कब्जा जमाया। केलादी हुक्मरानों के हाथों से निकल कर भटकल हैदर अली एवं टीपू सुल्तान की मिल्कियत बना। वर्ष 1799 में उनकी हार के बाद इस पर ब्रितानियों ने कब्जा जमा लिया। टीपू सुल्तान का इस शहर से एक खास रिश्ता था। इसी रिश्ते को यादगार बनाने के लिए उन्होंने शहर के बीच में एक मस्जिद बनवायी थी।

पुरातत्व का खजाना
भटकल में पुरातत्व का खजाना है जो इस शहर की समृद्ध विरासत की दास्तां कहता है। केथपय्या नारायण मंदिर वर्ष 1545 में केथा पाई ने बनवाया था। यह मंदिर अपने जमाने का सबसे अलग दिखने वाला वास्तु का नमूना है। मुख्य सड़क पर बना पाश्र्वनाथ जैन मंदिर, भटकल की सबसे पुरानी संरचनाओं में शुमार है। इस शहर में जामिया मस्जिद, खलीफा मस्जिद, सुल्तानी मस्जिद और नूर मस्जिद जैसी सदियों पुरानी भव्य मस्जिदें भी हैं।

इकबाल भटकल
इकबाल भटकल (इंडियन मुजाहिद्दीन के संस्थापकों में से एक) पहला ऐसा व्यक्ति है, जिसका नाम सीबीआई के मोस्ट वांटेड सूची में आया था। वर्ष 1970 में भटकल में जन्मे इकबाल का बचपन वहीं बीता। पढ़ाई में वह बहुत तेज नहीं था। परिवार के मुम्बई चले जाने के बाद, छोटे भाई के साथ उसे भी एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में दाखिल करा दिया गया। बचपन से ही इकबाल की आदत दूसरे लड़कों से पंगा लेने और झगडऩे की थी। वह अगली सीट पर बैठे लड़कों से झगड़ा करने लगता। अध्यापक क्या पढ़ा रहे हैं, इस पर वह जरा भी ध्यान न देता। अपने से छोटों को वह परेशान करता और उनकी पिटाई भी कर देता। 1982 में स्कूल की पढ़ाई पूरी करके, उसने भिवंडी के शाह अदम पॉलिटेकनीक में भवन निर्माण प्रोद्यौगिकी के तीन साल के डिप्लोमा में दाखिला ले लिया।वह कट्टर मजहबी नहीं था, लेकिन उसने दाढ़ी रख ली। उसने शराब और सिगरेट से तौबा कर ली। पढ़ाई में उसका मन बिल्कुल नहीं लगता था। 1992 के अक्तूबर-नवंबर तक वह कॉलेज के इम्तहान में बैठता रहा, लेकिन अपनी 18 कोशिशों में भी वह कामयाब न हो सका। आखिरकार पढ़ाई छोड़कर उसने दक्षिण मुम्बई के मनीश मार्किट में इत्र और सुगंधियां बेचनी शुरू कर दी।

जल्दी ही इकबाल ने यह काम भी छोड़ दिया। वह यूनानी मेडिसिन की पढ़ाई करने लगा। उसने तबलीगी जमात के इस्लामी आंदोलन में भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया। बाद में वह लश्कर-ए-तैयबा की विचारधारा के समर्थक, एक मुस्लिम एनजीओ – ”इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन” के संस्थापक डॉ. जाकिर नाईक के भाषणों में मौजूद रहने लगा। ऐसा लगता है कि डॉ. जाकिर नाईक के भाषणों का इकबाल भटकल पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह हिंसा की तरफ मुड़ गया।

अपनी मजहबी पृष्ठभूमि के कारण 43 वर्षीय इकबाल भटकल ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ का प्रमुख सिद्धांतकार बन गया। उसे मुम्बई रेल धमाकों के साथ-साथ हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए क्रमिक बम धमाकों सहित भारत में हुए कई आतंकवादी हमलों की योजना बनाने के लिए जाना जाता है। इन धमाकों में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। जर्मन बेकरी धमाके की योजना उसी ने बनाई और उसी ने इस काम को अंजाम भी दिया। अहमदाबाद और दिल्ली के बम धमाकों के लिए विस्फोटकों की खेप भेजे जाने का काम उसी की देखरेख में हुआ। उसने इंडियन मुजाहिद्दीन का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया है और भारत के खिलाफ हमलों को अंजाम देने के लिए अपने आतंकवादी संगठन में लोगों की भर्ती कर रहा है।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार इकबाल अपने भाई रियाज से मिलकर ‘कराची प्रोजेक्ट’ चला रहा है। इसमें आईएसआई और लश्कर-ए-तैयबा का भी सहयोग है। रियाज आजकल कराची में ही रह रहा है। इंडियन मुजाहिद्दीन अभी भारत पर ही अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है, लेकिन उसके विचार वैश्विक इस्लामिक हैं। समय बीतने के साथ-साथ उसका ध्यान भारत से बाहर भी जाने लगा। लश्कर-ए-तैयबा और आईएसआई के सहयोग के बिना इंडियन मुजाहिद्दीन इतना मजबूत नहीं हो सकता था। इस तरह भारतीय आतंकवाद आज पाकिस्तानी समस्या के साथ जुड़ा हुआ है। भारत में आतंकवाद का मसला तब तक हल नहीं हो सकता, जब तक जिहाद पाकिस्तानी सुरक्षा नीति का हिस्सा बना रहेगा। पाकिस्तान की नई सरकार इस संगठन के लिए अभिशाप बन सकती है, क्योंकि नवाज शरीफ इस बात के लिए कटिबद्ध हैं कि पाकिस्तान की धरती से भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को बंद कर देंगे।

शहर नामी गिरामी शिक्षा संस्थानों से भरा पड़ा है, जिनका प्रबंधन अंजुमन मुसलमीन के हाथों में है। पूरे समाज में सभी तबकों के बीच शिक्षा की अलख जगाने के लिए एक प्रमुख ट्रस्ट के रूप में वर्ष 1919 में इसकी स्थापना की गई थी। उत्कृष्ट तकनीकी पढ़ाई के लिए अंजुमन इंजीनियरिंग कॉलेज की पूरे देश में शोहरत है। धार्मिक अध्ययन के लिए जामिया इस्लामिया एक जाना माना केंद्र है। वहीं मजलिसे इसलाह वा तंजीम मुस्लिम समुदाय के कल्याण की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। हिंदू प्रबंधन वाले भटकल शिक्षा ट्रस्ट द्वारा संचालित संस्थानों की संख्या बहुत कम है। आज भटकल की त्रासदी यह है कि अंजुमन द्वारा संचालित स्कूलों में हिंदू छात्र नहीं हैं और विद्या भारती व निजी स्कूलों में मुसलमान छात्र नहीं हैं। समुदायों के बीच अलगाव साफ-साफ दिखता है।
हालांकि समुदाय के लोग खुल कर एक दूसरे से मिलते-जुलते नहीं हैं, लेकिन वे एक दूसरे पर आश्रित हैं। मुसलमानों के घरों में 90 प्रतिशत काम करने वाली महिलाएं हिंदू हैं। अधिकतर ऑटो रिक्शा ड्राइवर भी हिंदू हैं। इसके उलट शहर का इस्लामिक बैंक गरीब गैर-मुस्लिमों को भी ब्याज मुक्त कर्ज देता है। होटल कोला के रूम ब्वॉय ने मुझे कहा कि ”उसका नाम शाहरुख खान है।” भोजनालय के वेटर, मोची और अखबार बांटने वालों ने भी ऐसे ही नाम बताए। ऐसा लगा उन्हें इससे आसानी होती है। अपने असली नाम से पुकारा जाना उन्हें पसंद नहीं। दरअसल, मैं जिस किसी से भी मिला, सभी ने मुझे कहा कि मैं उनके नाम का जिक्र न करूं। उन्होंने मुझे अपनी फोटो खींचने की इजाजत भी नहीं दी। इसीलिए इस लेख में अधिकतर नाम उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए बदल दिए गए हैं।
इंडियन मुजाहिद्दीन
दस साल पहले वे लोग कर्नाटक के एक शांत तटीय शहर भटकल में इकट्ठा ये हुए थे। इनमें से ज्यादातर आसपास के संस्थानों के छात्र थे। वे अपनी-अपनी कल्पनाओं में जी रहे थे। उनके साथ धार्मिक छात्र संगठन -‘सिमी’ के सदस्य भी शामिल हो गए। वे ज्यादातर दक्षिण गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के देवबंदी मदरसों में तालीम हासिल कर रहे थे। वर्ष 2004 की गर्मियों में ये लोग भटकल के ‘जॉली बीच’ के पास एक घर में इकट्ठा हुए। दो हफ्तों तक उनकी एक के बाद एक बैठकें होती रहीं। वहां उन्होंने इस्लामी मजहबी भाषण सुने और बिन लादेन के खास वीडियो देखे। इस समूह को हूजी और सिमी के कट्टर जेहादियों द्वारा तालीम दी गई थी। इनकी ब्रेन वॉशिंग करके कोमल हृदय नौजवानों को जेहाद के रास्ते पर चलने के लिए उकसाया गया। उन्हें बम बनाना और रखना सिखाया गया। उन्हें कामचलाऊ हथियार बनाने की तालीम भी दी गई। छोटी बंदूकों और पिस्तौल चलाना सिखाया गया। उन्हें पास के जंगलों में ले जाकर एअर-गन से निशाना लगाना सिखाया गया। लोगों ने धमाकों की आवाजें सुनीं, लेकिन उन्हें लगा कि ये नौजवान लड़के पटाखे छोड़ रहे होंगे। उन्हें नक्शे, कंपास और ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) का इस्तेमाल करना भी सिखाया गया।
भटकल बंधु, रियाज और इकबाल इस जमावड़े के मुख्य आयोजक थे। दूसरे लोगों में सुभान कुरैशी, मुहम्मद सादिक, इसरार शेख और आतिफ अमीन भी शामिल थे। इंडियन मुजाहिद्दीन के जिस नेतृत्व की तरफ पहले संकेत मिले, वह था अब्दुल सुभान उस्मानी। कोड नाम ‘कासिम’ या ‘अल-आबरी’ था। उसी ने वर्ष 2008 के बाद से हुए विभिन्न बम धमाकों से पहले और बाद में भेजे गए ई-मेल घोषणा पत्रों पर दस्तखत किए थे। कुरैशी की पृष्ठभूमि से यह मान्यता खंडित होती है कि इंडियन मुजाहिद्दीन में गरीब तबके और मजहबी मदरसों में पढ़े लड़के ही आते हैं। कुरैशी भायखला (मुम्बई) के एंतोनियो डिसूजा हाई स्कूल में पढ़ा है। वह एक समृद्ध परिवार का है। 1995 में उसने इंडस्ट्रियल इलैक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा लिया और 1996 में सीएमएस इंस्टिट्यूट से सॉफ्टवेअर मेंटिनेंस में विशेषज्ञता का कोर्स किया। इन डिग्रियों को हासिल करने के बाद उसने सॉफ्टवेअर और कंप्यूटर की कई फर्मों में भी काम किया। इसी दौरान कुरैशी कट्टरपंथी विचारों के संपर्क में आया और वर्ष 2001 में उसने नौकरी छोड़ दी। अपने इस्तीफे में उसने लिखा कि ”मैंने तय किया है कि पूरा एक साल मजहबी और रूहानी मामलों को दूंगा।” वह इस कैंप का मुख्य ट्रेनर था।इस कैंप में शामिल लड़कों को एक-दूसरे के नाम तक पता नहीं थे। सभी को उनके दिए हुए नकली नामों से संबोधित किया जाता था। नौजवान लड़के बाहर खूबसूरत किनारों पर खाना पकाते, अरब सागर के पानी में तैरते और नावें चलाते। ‘जॉली बीच’ की यह मीटिंग ही बाद में कई घातक बम धमाकों की पृष्ठभूमि बनी। बाद की गिरफ्तारियों से साबित होता है कि इन लोगों ने भर्तियां करने, बम के हिस्से जुटाने और हमलों की व्यवस्था करने का काम किया। पिछले दशक में इस संगठन ने देश के सबसे घातक आतंकवादी संगठन का रूप ले लिया। इनका एक ही लक्ष्य है, ‘बदला’। इस आतंकवादी संगठन का अपना खास तरीका है कि हमलों के पहले या बाद में ये ई-मेल द्वारा हमले की जिम्मेदारी लेते हैं।

बताया जाता है कि ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ नाम मई 2008 में पाक अधिकृत कश्मीर में हुए एक आतंकवादी सम्मेलन में लश्कर-ए-तैयबा और हरकत-उल-जेहादी इस्लामी (हूजी) के बड़े नेताओं ने रखा था। इंडियन मुजाहिद्दीन का खेल साफ है। लश्कर-ए-तैयबा के साथ अपने जाहिरा रिश्तों और पाकिस्तान में तर्बियत लेने के बावजूद यह अपने आप को भारत स्थित एक आतंकवादी संगठन के रूप में स्थापित करना चाहता है।

जानकार लोगों का मानना है कि सिमी सदस्यों के निचले पाए पर मौजूद लोगों के बहुत से गुटों में से यह एक है। सिमी को नए नाम रखने पड़े, क्योंकि इसके आला नेता गिरफ्तार हो चुके हैं और पूछताछ के दौर से गुजर रहे हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन कोई सुगठित संगठन नहीं है, बल्कि एक ढीला-ढाला इस्लामिक संगठनों का नेटवर्क है। इसमें सिमी, हूजी और आफताब अंसारी के आतंकवादी समूह के लोग शामिल हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन में शामिल होने के कारण लोगों को दिखाने को तो कई होंगे। पहला वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के निजी अनुभव हो सकते हैं। दूसरा कारण, आतंकवाद को पैसा देनेवाले भूमिगत नेटवर्क से ऐसी गतिविधियों के लिए बहुत पैसा आना। उत्तर प्रदेश और बिहार के नौजवान तो इन गतिविधियों में सिर्फ इसलिए शामिल हो गए, क्योंकि उनके पास कोई काम नहीं था, जबकि इस काम में बहुत पैसे मिल रहे थे। आतंकवादी गतिविधियों के लिए ज्यादा पढ़ाई या अंग्रेजी जानने की जरूरत नहीं होती, फिर भी पैसे की कोई कमी नहीं है। इंडियन मुजाहिद्दीन के लोग भले ही अंग्रेजी न जानते हों, लेकिन हिंदी और उर्दू फर्राटे से बोलते हैं।

इस तरह की गतिविधियों में शामिल होने का दूसरा मुख्य कारण है, इंटरनेट पर किसी भी भाषा में कट्टरपंथी इस्लाम की शिक्षा आसानी से मिल जाती है। राजनीति की वजह से भी लोग सांप्रदायिक दृष्टि से बंटने लगे हैं। राजनीतिक पार्टियां वोट हथियाने के लिए लोगों की धार्मिकता की नब्ज पर हाथ रखती हैं। इसका नतीजा होता है, समाज का धु्रवीकरण और अल्पसंख्यक युवाओं को लगता है कि सत्ता तंत्र में सभी समुदायों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है।

थाने में होने वाली मौतों को लेकर मीडिया की कहानियां भी किसी दुरभिसंधि की ओर इशारा करती हैं। भारतीय मुस्लिम बिरादरी को लगता है कि यह तथाकथित इंडियन मुजाहिद्दीन एक ऐसा बनावटी संगठन है, जिसे निहित स्वार्थ वाले लोगों ने खड़ा किया है, ताकि मुस्लिम बिरादरी को बदनाम किया जा सके।

इंडियन मुजाहिद्दीन को लेकर शुरूआती जानकारी सादिक इसरार शेख से मिलती है। वह इस संगठन का संस्थापक है और पुलिस की हिरासत में है। रियाज, इकबाल की तरह ही शेख भी भटकल में ही पैदा हुआ है। उसका परिवार बाद में मुम्बई जाकर बस गया। वर्ष 1996 से उसने अपने घर के नजदीक चीता कैंप इलाके में सिमी की बैठकों में शामिल होना शुरू कर दिया था। हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव के उन दिनों में सिमी दूसरे मुस्लिम नौजवानों को बुलाने लगी थी। पुलिस के अनुसार शेख सिमी के बहस मुबाहिसों के तरीकों से ऊब गया था। वह अपने विचारों को व्यवहार में लाने के अन्य माध्यम को तलाशने में लग गया।

‘जॉली बीच’ पर जमावड़े के एक साल बाद इंडियन मुजाहिद्दीन नेटवर्क में कई टुकडिय़ां बन गयीं। पुलिस के पास मौजूद कागजात से पता चलता है कि आतिफ अमीन की आजमगढ़ इकाई का काम हमलों के लिए लोगों को जुटाना था, जबकि सादिक शेख का काम आजमगढ़ इकाई और मुम्बई स्थित इंडियन मुजाहिद्दीन के वरिष्ठ नेतृत्व के बीच तालमेल बनाना था। इकबाल भटकल का काम विशेषज्ञ कंप्यूटर सर्विस सेल के लिए काम करने वालों को जुटाना था। अब्दुल सुभान कुरैशी का काम देशभर में घूमकर सिमी से सहानुभूति रखने वाले ऐसे लोगों की तलाश करना था, जो इन इकाइयों की मदद कर सकें। तीन ब्रिगेड और मीडिया शाखा बनाई गई और सबके अपने-अपने काम सुनिश्चित किए गए।
 शहाबुद्दीन गौरी ब्रिगेड: इसका मुख्यालय केरल में है। इसका प्रमुख अमीर रजा था। उसका काम दक्षिण भारत में हमलों की योजना बनाना और उन पर अमल करना है।
 मुहम्मद गजनवी ब्रिगेड: इसका काम उत्तर भारत में आतंकवादी हमलों की योजना बनाना और उनको अमल में लाना है।
 शहीद अल जवाहिरी ब्रिगेड: इसका काम देश के प्रमुख राजनीतिक और दूसरे महत्वपूर्ण व्यक्तियों को निशाना बनाना और आत्मघाती हमलों का इंतजाम करना है।
 मीडिया शाखा: इसका मुख्यालय पुणे में था। इस शाखा का काम ई-मेल और अखबारों के जरिए खबरें फैलाना, विस्फोटों से पहले और बाद में प्रेस विज्ञप्तियां और अपना घोषणापत्र जारी करना है। इन्होंने मीडिया घरानों और चैनलों में अपने प्रचार के रास्ते बना लिए थे। इसलिए जानबूझ कर वे अपनी खबरें लीक कर दिया करते थे।

भारत में बहुत से बम धमाकों के लिए जिम्मेवार यह संगठन, लगातार खतरनाक होते जा रहा है। इसके संबंध पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा के साथ घनिष्ठ हो चुके हैं। घातक किस्म के हमलों के अलावा इंडियन मुजाहिद्दीन अपनी मौजूदगी नहीं जताता है। इसके करीब 50 सदस्य हैं और उन सब की तलाश हो रही है। इसके सदस्य गोपनीयता बनाए रखते हैं। फोन से दूर ही रहते हैं। वे कूट भाषा में ई-मेल भेजते हैं। अपनी बैठकों की योजना बनाने के लिए वे जियारत पर सऊदी अरब जाते हैं और उनके सहयोगी पाकिस्तान से वहां आते हैं।

इंडियन मुजाहिद्दीन के पास वर्ष 2008 से आत्मघाती दस्ता है। इसमें 25 से 35 साल की उम्र के बहुत ही अभिप्रेरित नौजवान हैं। उन्होंने इसका नाम अल कायदा नेता अबु मुसाब अल-जवाहिरी के नाम पर रखा है। इस दस्ते को गठित करने का काम आतिफ अमीन ने किया, जिसे बाटला हाउस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस ने मार गिराया। उसके बाद से यह दस्ता निष्क्रिय है।

पुणे में नाकाम किए गए हमलों के लिए गिरफ्तार किए गए मुजाहिद्दीन कार्यकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि वे बौद्ध धर्मस्थल बोध-गया भी गए थे। वे म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर हुई ज्यादतियों के विरोध में वहां पर फिदायीन हमले करना चाहते थे।

वर्ष 2010 में भारत सरकार ने ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ को आतंकवादी संगठन घोषित कर, उस पर रोक लगा दी थी। अक्तूबर 2010 में न्यूजीलैंड ने और इसके बाद वर्ष 2011 में अमेरिका ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। ब्रिटेन ने भी इस आतंकवादी संगठन पर रोक लगा दी, क्योंकि यह संगठन, हिंसा के माध्यम से भारत में शरीयत लागू करके, इस्लामी शासन स्थापित करना चाहता है।

इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकी हमलों से पहले ही मीडिया में ई-मेल संदेश भेजना इनकी खासियत है। बताते हैं कि ई-मेल में वह बाबरी मस्जिद गिराए जाने, मुंबई दंगों, गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हुई विभिन्न ज्यादतियों के विरोध में ये हमले किए जा रहे हैं। इन घटनाओं को वे इस्लामी जेहाद बताते हैं।

आज इंडियन मुजाहिद्दीन सिमी के पुराने लोगों को हटाकर और नई भर्तियां करके अपने संगठन को फिर से खड़ा कर रहा है। इसकी वजह यह है कि सिमी के सभी लोगों की फाइलें पुलिस के पास मौजूद हैं। दूसरी वजह यह है कि सिमी पाकिस्तान और मध्यपूर्व से आदेश लेकर सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे रही है। उनकी एक मीडिया इकाई है, एक दान ग्रहण करने वाली इकाई है, एक वसूली करने वाली इकाई है और एक बहुत मजबूत इंटरनेट इकाई है, जो अपने कामों को सुनियोजित ढ़ंग से अंजाम देती हैं। यह सब लश्कर-ए-तैयबा की खासियत हैं, जहां से इंडियन मुजाहिद्दीन का जन्म हुआ है।

इसमें कोई शक नहीं है कि ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ भारत का सबसे खतरनाक संगठन है। हर राज्य की पुलिस से इस संगठन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कहा गया है। इंटेलिजेंस ब्यूरो की चेतावनी के अनुसार केरल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश और गुजरात सबसे ज्यादा समस्याग्रस्त राज्य हैं। इन्होंने अपना काम करने का तरीका बदल दिया है और अब ई-मेल नहीं भेजते। मुकेश अंबानी के ऑफिस में धमकी भरा पत्र भी ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ ने ही भेजा था कि अगर उन्होंने वक्फ के काम में आ रही जमीन पर बनने वाली इमारत-अंतिला का काम नहीं रोका तो उसे उड़ा दिया जाएगा।

हर मुस्लिम परिवार के कम से कम दो सदस्य अरब दुनिया के देशों में जरूर काम करते हैं। खाड़ी देश जाना हर स्थानीय युवक का सपना है। 18 साल का होते ही हर किसी का पासपोर्ट बनना जरूरी है। उन्हें पासपोर्ट जल्दी से जल्दी मिले, इसे सुनिश्चित करने के लिए वे अपना रिकॉर्ड एकदम बेदाग रखते हैं। यही वजह है कि भटकल में बाल अपराध की दर बहुत कम है। सईद अबू बकर ने कहा- ”भारत में हमारे जैसे धनी और समृद्ध मुसलमान दूसरी जगह बहुत कम हैं। इसकी वजह से ईष्र्या का भाव बहुत है। इसी का फायदा हाशिए पर पड़े संगठन उठा रहे हैं। इस छोटे से शहर में 60 हजार लोग रहते हैं। सिर्फ भटकल शहरी सहकारी बैंक में करीब 25 हजार खाते हैं। इनमें से एक चौथाई अनिवासी लोगों के हैं। अन्य सरकारी एवं निजी बैंकों में भी मोटे बैलेंस वाले खाते हैं।”इतने कम समय की यात्रा में भी जेहन में यह सवाल उठा कि इस तरह का आदर्श शहर अचानक सांप्रदायिक भी में कैसे तब्दील हो गया। निश्चित रूप से यह बदलाव रातों-रात नहीं हुआ। भटकल को आज ‘लघु दुबई’ ‘लघु पाकिस्तान’ ‘आतंक का केंद्र’ ‘बम की फैक्टरी’ आदि तरह-तरह के नामों से पुकारा जाने लगा है। यह देश के सबसे डरावने और खतरनाक आतंकवादी संगठन ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ की जन्मस्थली के रूप में कुख्यात हो गया है।
भटकल को आज भारत के 10 सबसे वांछित आतंकवादियों की शरणस्थली माना जा रहा है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को रियाज और इकबाल के अलावा अहमद सिद्दी बापा उर्फ यासीन, मुहम्मद हुसैन फरहान, आफिक जैलानी, मोहम्मद गुफरान, अब्दुल कादिर सुल्तान, जसीम इकबाल सईदी, अब्दुल माजिद और डॉ. आरिफ मोहतेशाम की तलाश है। इन सब के सिर पर मोटे इनाम घोषित किए गए हैं। इनमें अधिसंख्य के लिए इंटरपोल ने पूरी दुनिया में रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए हुए हैं।
अहमदाबाद, सूरत, हैदराबाद और बंगलूरू में हुए आतंकी धमाकों के मामलों की चार्जशीट में जिन 15 लोगों के नाम हैं,
उनमें से 13 मैंगलूर और भटकल क्षेत्र के हैं। पुणे, अहमदाबाद, सूरत, मुम्बई, बंगलुरू और मैंगलूर की पुलिस टीमों ने इस शहर का दौरा किया है। हाल में कन्नड़ भाषा के एक अखबार ने खबर छापी थी कि भटकल की 10 मस्जिदें बम बनाने की फैक्टरी बन गई हैं। ऐसी खबरें थीं कि वर्ष 2008 के अक्टूबर महीने में भटकल में कर्नाटक पुलिस ने एक स्थान पर छापा मारा और वहां उन्हें तालिबान समर्थक वीडियो मिले। ऐसी अफवाहें थीं कि यहां ओसामा बिन लादेन भी रह चुका है। दरअसल, सीआईए ने भी वर्ष 2010 में गुप्त रूप से यहां खोजबीन की थी।
रियाज भटकल
1993 में मुम्बई के उपनगरीय इलाके नागपाड़ा के साबू सिद्दीक पोलिटेकनीक में सिविल इंजीनियरिंग का सत्रह साल का एक शर्मीला छात्र रियाज शाहबंदरी हमेशा सिर झुकाए रहता था। कॉलेज की किसी तरह की गतिविधि में मुश्किल से ही कभी हिस्सा लेता। लड़कियों को उसका चॉकलेटी चेहरा आकर्षित करता। ग्रेजुएशन के बाद उसे कोई नौकरी नही मिल पाई। हारकर उसे अपने पिता के चमड़े के काम में हाथ बटाना पड़ा।रियाज का जन्म भटकल में 1976 में हुआ। उसका नाम रोशन जमाल रखा गया। उसके पिता इस्माइल शाहबंदरी अच्छे भविष्य की कामना में भटकल छोड़कर मुम्बई आ गए। यहां आकर उन्होंने मुम्बई के कुर्ला इलाके में चर्मशोधन का काम शुरू किया। उनका यह काम अच्छा चल निकला। इसके बाद उन्होंने व्यस्त पाइप रोड की कारदार बिल्डिंग में एक अपार्टमेंट खरीदकर वह सपना पूरा किया, जो मुम्बई आकर बसने वाला हर व्यक्ति देखता है। इस्माइल की समृद्धि से यह तय था कि उनका बेटा रियाज, स्थानीय अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ सकता था। वर्ष 2001 में रियाज को कुर्ला की एक लड़की से प्यार हो गया, लेकिन उसके परिवार को यह सब पसंद नहीं आया और आखिकार वर्ष 2002 में उसकी शादी भटकल के एक व्यवसायी की बेटी ‘नशुआ’ से कर दी गई।

शादी से कुछ महीने पहले उसका संपर्क सिमी की कुर्ला इकाई से हुआ और वह इस संगठन का सदस्य बन गया। तब तक सिमी दो धड़ों में बंट चुका था। एक धड़ा अतिवादी और उदारवादी था। रियाज ने अतिवादियों में शामिल होना बेहतर समझा। संगठन पर रोक लगा दी गई और इसके सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। वह पुलिस के हाथों से बच निकलने में कामयाब हो गया। जल्दी ही वह भूमिगत होकर, लोगों को सिमी की विचारधारा के बारे में समझाने लगा। वह संगठन का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया था। इसी समय रियाज स्थानीय जरायमपेशा लोगों के संपर्क में आया और उनकी सहायता से अपने कामों के लिए व्यापारियों से वसूली करने लगा।

गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा को देखकर गुस्से से भरे रियाज ने अपने परिजनों की सोच से कहीं अलग इंडियन मुजाहिदीन बना डाला। आज वह रिजाय भटकल नाम से सुर्खियां बटोर रहा है। वह एक ऐसा संदिग्ध आतंकवादी है जिसने दाऊद इब्राहीम या फांसी पर चढ़ाए गए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब से भी से भी ज्यादा लोगों को मारा है। 15 बम धमाकों में 344 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। वह आज भी छुट्टा घूम रहा है और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन का भयावह चेहरा बना हुआ है। वह इंडियन मुजाहिदीन के तीन बड़े कमांडरों में से है।

2008 में जब एटीएस के लोग उसकी तलाश में भटकल में घूम रहे थे वह बांग्ला देश होता हुआ दुबई भाग गया। जब भारतीय एजेंसियों ने उसका वहां पता लगाया तो उसने आईएसआई के आग्रह पर अपना ठिकाना पाकिस्तान में बना लिया। आज रियाज कराची के सुरक्षित डिफेंस एन्क्लेव में रह रहा है और आईएसआई उसे सुरक्षा दिए हुए है।

2005 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस पर हमला करने के बाद बंगलूरू के संयुक्त पुलिस आयुक्त कार्यालय ने उसे पकड़़ लिया और करीब दो घंटे तक कड़ी पूछताछ के बाद छोड़ दिया। मार्च 2010 में रियाज कोलंबो गया और वहां यासिन भटकल, मोहसिन चौधरी मिर्जा हिदायत बेग से मिलकर पुणे जर्मन बेकरी धमाके की योजना बनाई। 2008 के बंगलूरु धमाकों को लेकर जुलाई 2011 में रियाज के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया। जुलाई 2011 में मुम्बई के तिहरे बम धमाकों की चार्जशीट में कहा गया है कि ”पूरा आपराधिक षड्यंत्र रियाज और यासिन भटकल का रचा हुआ था, ” जो ”आतंकी इंडियन मुजाहिदीन के प्रमुख खिलाड़ी हैं।” वही हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली के सीरियल बम धमाकों की योजना बनाने, उस पर अमल करने और उसके लिए पैसा जुटाने के पीछे उसी का दिमाग काम कर रहा था।

मई 2008 में रियाज भटकल ने मंसूर पीरभाई को अपने जाल में लिया जो उस समय याहू में कंप्यूटर विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहा था। रियाज चाहता था कि वह मीडिया के लिए एक घोषणापत्र तैयार करे जिसमें मीडिया को बताए कि जल्द ही सूरत और अहमदाबाद में होनेवाले बम धमाकों के पीछे उनका मकसद क्या है। रियाज की हिदायतों के अनुसार मुम्बई के वाई-फाई नेटवर्क मे सेंध लगाकर मीडिया को तीन ई-मेल भेजे गये थे।

मार्च 2012 को महाराष्ट्र एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए इंडियन मुजाहिदीन के मुहम्मद अबरार ने पूछताछ के दौरान बताया कि रियाज ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की हत्या करने के मंसूबे के लिए पैसा इकट्ठा करने की योजना बनाई थी। एनआईए ने उसे पकड़वाने पर दस लाख रुपए के इनाम की घोषणा की है।

वर्ष 1980 के दशक में भटकल सोने की तस्करी का बड़ा केंद्र था। हवाला के धंधे पर नजर रखने के लिए खुफिया ब्यूरो ने बाजाप्ता यहां एक पूरा दफ्तर खोला हुआ था। फिर भी उनके लिए पैठ बनाना और हवाला के संचालन का खुलासा करना कठिन है। नवायती परस्पर करीब से जुड़ा एवं बेहद चौकस समुदाय है। उनकी भाषा भी अजीब है। यह फारसी, कोंकणी, कन्नड़ और मराठी का सम्मिश्रण है।आज यहां जो गहरी सांप्रदायिक दरार दिख रही है, वह हाल के कुछ वर्षों की देन है। शहर की 90 प्रतिशत आबादी नवायतियों की है। अधिकतर जमीन पर इन्हीं की मिल्कियत है और हिंदुओं की पिछड़ी जाति नामधारी, उनकी जमीनों पर काम करते हैं, उन्हें साइब्रू, जिसका मोटे तौर पर मतलब ‘सर’ (महाशय) होता है, कह कर बुलाते हैं। रामनवमी के दौरान निकाली जाने वाली एक स्थानीय रथयात्रा ‘हब्बा’ के मौके पर सम्मान जताने के तौर पर मुस्लिम शबंदरी परिवार के मकान से रथ का चलना शुरु होता है। 100 साल पुरानी इस परंपरा के तहत हिंदू बुजुर्गों का एक समूह मुस्लिम धर्म गुरू के घर जाकर मुस्लिम बहुल गलियों से होकर रथ यात्रा निकालने की इजाजत मांगते हैं।
पहली बार दंगे की वजह
वर्ष 1991 से यहां सांप्रदायिक सद्भाव छीजने लगा। उस समय की तेज तर्रार भाजपा नेता उमा भारती ने एक मस्जिद के सामने भाषण दिए, जो पहली बार वहां दंगे की वजह बना। बाद में हुए चुनावों में भाजपा वहां अपनी पैठ बनाने में सफल रही और उसका उम्मीदवार चितरंजन अपनी जमानत बचा पाया। इतना ही नहीं उसे 141, 647 वोट भी मिले।अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद भटकल के भीतर और उसके आस-पास दंगे भड़क उठे। वर्ष 1993 में रथ यात्रा के दौरान कुछ गड़बड़ी फैलाने वालों ने रथ पर एक पत्थर फेंक दिया, नतीजतन दंगा भड़क उठा। इस दंगे में 17 लोगों की जानें गईं।
कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली ने शांति की अपील तो की थी, लेकिन भाजपा और हिंदू जागरण वेदिके जैसे दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों को इस दंगे को भड़काने का दोषी भी करार दे दिया था। साथ ही यह भी कह दिया कि दंगे फैलाने में मुसलमानों का कोई दोष नहीं था। शहर में 6 महीने से अधिक समय तक कफ्र्यू लगा रहा था। कश्मीर के बाहर ऐसा कहीं पहली बार हुआ था। भाजपा के लिए एक और धक्का लगाने का मौका बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद आया, जब चितरंजन ने 50 प्रतिशत मतों के सीधे अंतर से वर्ष 1994 के चुनाव में जीत हासिल कर ली। इन चुनावों में कोई मुसलमान उम्मीदवार खड़ा ही नहीं हुआ था।वर्ष 1996 में चितरंजन की हत्या हो गई और दक्षिणपंथी हिंदू तत्वों ने इसके लिए मुसलमानों को दोषी ठहराने में जरा भी वक्त नहीं गंवाया। तब से लेकर अब तक सीबीआई की नौ टीमें कोशिश कर चुकी हैं, लेकिन दोषियों को नहीं पकड़ पाई है। इस हत्या ने,जो कई सालों तक छिटपुट दंगों, घृणा फैलाने वाले भाषणों, राजनीतिक हत्याओं और छोटी-मोटी झड़पों की वजह बनती रही, दोनों समुदायों के मन में दुराव पैदा कर दिया। उस स्थिति ने दोनों तरफ के चरमपंथियों को मौके का फायदा उठाने में मदद पहुंचाई। शक-सुबहे की गिरफ्त में यह फंसा शहर, अब चरमपंथियों का गढ़ बन गया है। किसी गैर मुस्लिम से जुड़ी एक छोटी से छोटी घटना हो जाए, 5 मिनट के भीतर कई सौ मुसलमान वहां जमा हो जाते हैं। किसी घटना से मुसलमान जुड़ा हो तो हिंदू भी वैसे ही जमा हो जाते हैं। दंगों के दौरान जिला पुलिस में मुसलमानों का बेहद कम प्रतिनिधित्व (सिर्फ 2 प्रतिशत) एक बड़ी समस्या बन जाता है।
विदेश जाने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए अब पासपोर्ट मिलना पहले की तरह आसान नहीं रहा। भटकल में रहने वालों के सत्यापन की प्रक्रिया में 10 गुना वृद्धि हो गई है। इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। सब बेचारगी के भाव के साथ जी रहे हैं। इसे एक पंक्ति में कहें तो, यहां घिर कर बेबस बन जाने की मानसिकता बन गई है।शहर श्रीराम सेने, बजरंग दल, करावली हिंदू समिति और हिंदू रक्षा वेदिके जैसे दक्षिण पंथी हिंदू संगठनों की सक्रिय स्थली बन गया है। सही बात यह है कि इन हिंदू संगठनों को छोटे से छोटे मौके का इंतजार रहता है। कोई मौका मिलते ही वे झट सक्रिय हो जाते हैं। वर्ष 2004 में थिमापा नाइक नामक एक स्थानीय नेता की भटकल में हत्या हो गई। चितरंजन की हत्या
की तरह ही यह मामला भी अब तक पुलिस सुलझा नहीं पाई है।आईएम ने वर्ष 2008 में पहली बार देश में अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाया। शहर पर आतंक का ठप्पा तब लगा, जब कई राज्यों की पुलिस और आतंकरोधी दस्तों ने वर्ष 2008 से शुरु हुए कई धमाकों में रियाज और इकबाल शाहबंदरी एवं शहर से संबंध रखने वाले मोहम्मद अहमद सिद्दी बप्पा उर्फ यासिन की तरफ शक की सुई उठाई और उनकी पहचान आईएम के सह संस्थापक के रूप में की।

‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ के इन संचालकों के वास्तविक नाम रियाज शाहबंदरी, इकबाल शाहबंदरी और यासीन सिद्दी बप्पा हैं, लेकिन मीडिया और पुलिस हलकों में उन्हें ‘भटकल’ के उपनाम से ही जाना जाता है। पुलिस ने जान-बूझ कर उन्हें उनके शहर के नाम से पुकारना शुरू किया, क्योंकि इससे उनका रिकॉर्ड रखना आसान हो गया है।

स्थानीय पुलिस यह नहीं मानती है कि उन्होंने सोच समझ कर भटकल की यह छवि बनाई है। वह इस बात से भी इनकार करते हैं कि भटकल ‘इस्लामिक आतंकवाद’ की जन्मस्थली है। आईएम के संस्थापक यहां कभी रहे भी नहीं। वे मुम्बई में रहे। इस छोटे से शहर में पुलिस की भारी उपस्थिति रहा करती है। खुफिया एजेंसियां इस पर लगातार नजर रखती हैं। रियाज, इकबाल और यासीन के अलावा बंगलुरू पुलिस मुख्यालय में किसी बड़ी आपराधिक गतिविधि से जुड़े होने के रूप में भटकल के सिर्फ एक आदमी का नाम दर्ज है। वह है – मोहम्मद शब्बीर हुसैन गंगवाली, इसे नकली नोट रखने के कथित जुर्म में महाराष्ट्र में गिरफ्तार किया गया। बाद में उसे आईएम का सदस्य बताया गया। उस पर जेहादी साहित्य सप्लाई करने का आरोप भी लगा।

एक स्थानीय ऑनलाइन प्रकाशन ‘साहिल ऑनलाइन’ के संपादक इनाउतल्ला गवई कहते हैं – ”महाराष्ट्र एटीएस ने जो कुछ बताया उसके आधार पर भटकल की छवि खराब हुई है। कई वर्षों बाद आप पहले पत्रकार हैं, जिन्होंने यहां का दौरा किया है। दूसरे सिर्फ वही लिखते हैं, जो उन्हें बताया जाता है।”

यासिन भटकल
यासिन भटकल का जन्म 1973 में भटकल में हुआ था। नाम था – अहमद जफर सिद्दिबापा। उसने अपने बहुत से नाम रखे – इनमें शाहरुख खान, शिवानंद और डॉ. इमरान आदि शामिल हैं। वह हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, बांग्ला और कन्नड़ फर्राटे से बोल सकता है। अपने शहर में इस आदमी को लेकर कई किस्से हैं। पहले उसे लोग यासिन के नाम से जानते थे। बाद में उसने अपना नाम जफर अहमद रख लिया और इसी नाम से स्थानीय मदरसा अंजुमन हामी-ए-मुसलमीन में पढ़ाई की। उसने एक स्थानीय संस्थान से इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन की और पुणे चला गया। अपने पिता के धंधे में कुछ मदद कर सके, इसके लिए बाद में वह दो साल के लिए दुबई चला गया। लेकिन पिता के साथ अनबन होने के कारण वह दुबई छोड़कर भारत चला अया। माना जाता है कि यह अनबन उसके कट्टरपंथी विचारों के कारण हुई। पिता उसके इन विचारों का समर्थन नहीं करते थे।अपने शुरुआती सालों में वह सिमी का सक्रिय सदस्य रहा। उसने विस्फोटक बनाने की कला में महारत हासिल की। बाद में वह इंडियन मुजाहिद्दीन के सदस्यों को यह काम सिखाने लगा। यासिन इंडियन मुजाहिद्दीन को उत्तर प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल तक ले गया और वहां लोगों की भर्ती करने लगा। पश्चिम बंगाल में उसने जाली नोटों का एक रैकेट भी चलाया। दिसंबर 2009 में यासिन को कोलकाता पुलिस ने चोरी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। उसकी शिकायत धवन सेठ नाम के एक आदमी ने की थी। 29 दिसंबर 2009 को वह कोलकाता के शेक्सपीयर सरिणी पुलिस थाने से बाहर आने में सफल हो गया। उसने अफसरों को यकीन दिला दिया था कि वह नं. 9 नॉर्थ रेंज, कोलकाता-17 निवासी कार्तिक मलिक का बेटा बुल्ला मलिक है। इसके बाद वह कभी पुलिस के हाथ नहीं आया।

यासिन भटकल इंडियन मुजाहिद्दीन के सबसे चालाक लोगों में से है। पुलिस लगातार उसके पीछे है। वह ईल मछली की तरह चिकना है और पुलिस को कई बार चकमा दे चुका है। वह टैक्नॉलॉजी के खिलाफ है, लेकिन वेश बदलने में माहिर है। वह अपने मोबाइल फोन पर एक बार में कुछ ही सेकंड के लिए बात करता है और ई-मेल का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करता। वह कुछ ही लोगों के संपर्क में रहता है। वह थोड़े-थोड़े दिनों में अपना ठिकाना बदल लेता है। शहरी चकाचौंध वाले इलाकों के बजाय, वह दूर किसी अंधेरी कोठरी में रहना पसंद करता है। उसका मानना है कि शहरी इलाके हमेशा नजर में रहते हैं।

वह अपने पीछे इतने कम सूत्र छोड़ता है कि उनके सहारे उस तक पहुंचना असंभव होता है। सात साल से देश भर में उसकी तलाश हो रही है, लेकिन उसका कहीं पता नहीं चल रहा है। उसे ऐसे ‘भूत’ के रूप में जाना जाता है, ‘जो धमाके करता है’। वह लोगों को भर्ती करता है, उन्हें अभिप्रेरित करता है, साज-सामान का इंतजाम करता है, बम बनाता है और अब इंडियन मुजाहिद्दीन का नेता है। यासिन भटकल भारत की ‘मोस्ट वांटेड लिस्ट’ में है। एनआईए ने इसके सिर पर 15 लाख रुपए का इनाम रखा है। खुफिया दस्ते के जो लोग यासिन भटकल की गतिविधियों पर नजर रखते रहे हैं, उनका दावा है कि वह अपना ठिकाना पहले ही बदल लेता है।

छानबीन करने वाली संस्थाओं को लगता है कि यासिन एक बम पुणे में लगा चुका है। हैदराबाद में हुए दोहरे बम विस्फोट से दस दिन पहले मुम्बई पुलिस ने यासिन भटकल की खबर देने वाले को 10 लाख रुपए के इनाम देने की घोषणा की थी। उसने इंडियन मुजाहिद्दीन के कई बम धमाकों पर काम कर, यह साबित कर दिया है कि वह जहां चाहे, वहां बम लगा सकता है। कई लोगों का कहना है कि वह बांग्लादेश, कराची और सऊदी अरब भाग चुका है, लेकिन जांचकर्ताओं का मानना है कि भले ही उसके भाई रियाज और इकबाल भारत छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन वह अभी भी भारत में ही है।

यासिन के शीर्ष पर आने से ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ का पुनर्जन्म हो गया है। यासिन और रियाज का काम करने का तरीका एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। रियाज आक्रामक ढंग से काम करता है, जबकि यासिन काम को धीमी गति से करने में विश्वास रखता है।

उसके भाई जब भारत छोड़कर भाग गए, तो उसने ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ को संभाल लिया। वह इस बात की तसल्ली कर लेता है कि काम करने वाले व्यक्ति परदे के पीछे रहे और उनके पीछे एक मजबूत नेटवर्क काम करता रहे। वह उस तरह की बहादुरी दिखाने में यकीन नहीं करता, जैसा ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ के आतंकवादी पहले करते रहे हैं। वह हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए ई-मेल नहीं भेजता। यासिन का मानना है कि हमले नियमित अंतराल पर होते रहने चाहिए और जो भी संदेश हैं, वह हमलों के जरिए ही देना चाहिए।

गवई एक स्थानीय दैनिक छापते हैं। वह ऑनलाइन साइट को अपडेट करते रहते हैं। बस स्टैंड के पास उनके आफिस में मैं उनसे मिला। वे पूरी शिद्दत से कहते हैं – ”समुदायों के बीच कतई कोई दुश्मनी नहीं है। ये बाहरी लोग और खुफिया एजेंसियां हैं, जो यहां माहौल को भड़काते रहते हैं। आप यहां एक सप्ताह रहें, आपको पूरी स्थिति का एहसास हो जाएगा। हम अमन पसंद लोग हैं। शहर और यहां के मुसलमानों के बारे तमाम तरह की वाहियात बातें लिखी जाती हैं। हमें आतंक का अड्डा बताया जाता है, जबकि असलियत यह है कि हमारे दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं और हमारी मस्जिदों में कोई दरवाजे नहीं हैं।”लौटते हुए मैंगलूर एयरपोर्ट पर मेरी मुलाकात एक अनिवासी भारतीय (एनआरआई) से हुई। बातचीत के दौरान उन्होंने इस बात की निंदा की – ”भाइयों की वजह से पूरे शहर को बदनाम कर दिया गया है।” उन्होंने समझाया कि नवायती मुसलमान दक्षिण भारत के आम चलन की तरह ही परिवार के नाम ज्यादा पसंद करते हैं। या फिर शहबंदरी, रुकुनुद्दीन, मोहतेसामी या इकेरी जैसे उपनाम का प्रयोग करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो ‘भटकल’ उपनाम रखते हों।”

खाड़ी देशों में काम करने वाले यहां के स्थानीय लोग जब भी किसी एयरपोर्ट पर उतरते हैं तो उन्हें यहां का निवासी होने का खामियाजा भुगतना पड़ता है। जिस किसी भी व्यक्ति के पासपोर्ट में गृह शहर के तौर पर भटकल लिखा होता है, उसकी पूरी गहराई से छानबीन होती है। वह कहते हैं – ”दूसरों के पासपोर्ट की सुरक्षा जांच फटाफट हो जाती है, लेकिन हम भटकल वासियों के लिए तो यह अंतहीन इतंजार की तरह होता है।” सभी हवाई अड्डों पर इसके लिए अलग जांच प्रकोष्ठ बनाए हुए हैं, ताकि दूसरों को उससे कोई खलल नहीं पहुंचे। हमें इससे बड़ी शर्मिंदगी होती है। फरहान नामक एक युवक दुबई से नौकरी से लौटा था। उसे एयरपोर्ट पर घंटों रोके रखा गया और भटकल पुलिस द्वारा क्लीन चिट मिलने के बाद ही उसे जाने दिया गया। ऐसा अक्सर होता रहता है।
खुफिया एजेंसियां मानती हैं कि बम विस्फोटों में शामिल शहबंदरी भाइयों एवं अन्य के लिए भटकल आधार स्थली था। वे बताते हैं कि भटकल समुद्र के किनारे है, जिससे लोगों के लिए समुद्र तक पहुंचना ज्यादा आसान हो जाता है। जिस दिन मैं वहां था, सभी नावें काफी ऊपर लाकर बांध दी गईं। अरब सागर पूरे उफान और तेवर में था। खुफिया एजेंसियों ने समुद्र के सामने बने मकानों में से कुछ में अपने अड्डे स्थापित किए हुए हैं, ताकि वे वहां हो रही गतिविधियों पर नजर रख सकें।

भटकल के निवासियों को आज अपने शहर के नाम से जूझने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। भटकल के किसी निवासी से अपनी लडकियों की शादी करने में तो लोग कतराते ही हैं, लेकिन सबसे बड़ी चिंता नौकरी के बाजार को लेकर है, जिस पर बड़ी मार पड़ी है। नौकरी के बाजार पर लंबे समय तक इस बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था कि आईएम के आतंकवादी भटकल से आते हैं। 13/7 के बाद मीडिया की सुर्खियों में हर जगह भटकल का नाम छा गया, जिसने स्थिति बिगाड़ दी है। काम से लौटने वालों के लिए अपने अनुबंध का नवीनीकरण करना बेहद कठिन हो गया है।

भटकल-बिरयानी
एक दूसरे शहरी ने बताया – ”यह शहर अपनी भटकल बिरयानी के लिए प्रसिद्ध था। यह उन डिशों में शुमार किया जाता है, जिसे किसी भी आदमी को मरने के पहले जरूर चखना चाहिए। भटकल से होकर गुजरने वाली सभी बसें, केवल बिरयानी के लिए वहां रुकती थीं। अब वह सब खत्म हो गया है।”

कर्नाटक में अपनी गतिविधियों के लिए कुख्यात श्रीराम सेने की भटकल पर पैनी निगाह रहती है। मैं पहले गोवा में इसके प्रमुख प्रमोद मुतालिक से मिल चुका हूं। उन्होंने मुझे कहा था – ”मुझे उस दिन का इंतजार है, जब भटकल हिंदुओं के दबदबे वाला शहर हो जाएगा। हम अपनी पुलिस से कहते आ रहे हैं कि भटकल एक लघु पाकिस्तान है और उस शहर में इतनी मात्रा में आरडीएक्स है कि उससे उस शहर को कई बार उड़ाया जा सकता है।”

यहां के संवेदनशून्य प्रशासन ने एक पुलिस बीट शुरू की जिसे मुसलमान ‘सांप्रदायिक रूपरेखा’ का नाम देते हैं। इसके पीछे पुलिस और समुदाय के साझे प्रयास से सुरक्षा बढ़ाने की मंशा थी, लेकिन उसकी आड़ लेकर पुलिस एक मुस्लिम घर से दूसरे मुस्लिम घर में जाकर परिवार के सदस्यों, उनकी आमदनियों, पासपोर्ट और वाहनों के नंबर आदि के ब्यौरे जुटाने लगी है। दूसरी तरफ, जिन थोड़े हिंदुओं से मैं मिला उनका कहना था कि खुफिया एजेंसियां आतंकवादियों की जगह उन्हें निशाना बनाती हैं। यहां सक्रिय कुछ हिंदू संगठनों पर लगातार नजर रखी जाती है और परेशान किए जाने के डर से उनके कार्यकर्ता बाहर निकलने एवं कुछ बोलने से परहेज करते हैं। श्रीराम सेने के संयोजक जयंत नायक बताते हैं – ”मेरे खिलाफ कई मामले चल रहे हैं। मेरे कार्यकर्ता गो-वध का विरोध करते हैं, इसकी वजह से जिला प्रशासन से ठनती रहती है। मुझे अक्सर जेल में डाल दिया जाता है। थोड़ी-सी भी बात इधर-उधर हुई कि मुझे एहतियात के नाम पर पुलिस हिरासत में ले लिया जाता है।”

प्रशासन का आरोप है कि तटीय कर्नाटक को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने के लिए आरएसएस उसे कलंकित करने का अभियान चला रहा है। मैं भटकल में आरएसएस के एक मात्र पदाधिकारी से मिला, जिन्होंने मुझे बताया कि ”वह अब शाखा नहीं लगाते हैं, क्योंकि लोग अब नहीं आते हैं। ‘सेवा वाहिनी’ के सुरेंद्र शानबाग मध्यम मार्ग अपनाते हैं। वह राजनीतिक पार्टियों के तत्वों एवं मीडिया को दोषी ठहराते हुए कहते हैं – ”यही दोनों समुदायों के बीच दरार पैदा करते हैं। उनकी सेवा वाहिनी सद्भाव फैलाने का काम करती है। भटकल की खोई छवि को वापस दिलाने के लिए, मुसलमानों के एक स्वयंसेवी संगठन ‘रबीटा’ से अपने को जोड़ा हुआ है।”

ऊपर से देखने पर शहर में कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं दिखता। दरअसल, यहां आतंक का एक भी मामला दर्ज नहीं है। भाजपा को अच्छा-खासा समर्थन प्राप्त है। पिछला चुनाव हिंदुत्व रुझान वाले एक निर्दलीय प्रत्याशी ने जीता था। पुलिस प्रमुख मोटरसाइकिल पर बिना किसी सुरक्षा के घूमते हैं। उनके घर में सिर्फ एक सुरक्षा गार्ड है। परियों की कहानी जैसे पास के ‘बीच-रिजार्ट’ (तटीय होटल) मर्देश्वर में दुनिया की सबसे ऊंची शिव की मूर्ति है। इस ‘धार्मिक सह-टूरिस्ट रिजॉर्ट’ में हर साल 20 लाख से अधिक पर्यटक आते हैं। मैं एक वकील से मिला, जिन्होंने मुझे बताया कि भटकल के प्रथम श्रेणी न्यायिक कोर्ट में सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ा एक भी मामला बचा हुआ नहीं है।
मुझे भटकल एक छोटा, आरामतलब, गर्मजोशी से भरा और आतिथ्य करने वाला शहर लगा। यह धरती का भगवान से वरदान पाया एक टुकड़ा है, जिसके समुद्र तट के किनारे ताड़ के पेड़ लगे हैं। मॉनसून के दौरान वर्षा की बूंदों एवं गर्मी में सूरज का चुम्बन पाने वाला है यह शहर। इस शहर के दिन सोने की तरह दमकते हैं। इसके अलावा पुराने शहर में गलियों-गलियारों का भूल-भुलैय्या है। यहां लगभग हर आदमी एक-दूसरे को जानता है। यह एक ऐसा शहर है, जहां नमाज के वक्त हर काम लगभग ठप हो जाता है। कोई हरकत नहीं। फोन बजते रहें, कोई जबाव नहीं देता। अनेक दुकानें एवं कारोबार स्थल खाली हो जाते हैं। यहां 50 से अधिक मस्जिदें हैं और कई बन रही हैं। पर्दे की प्रथा इतनी कड़ी है कि जब तक मैं वहां रहा, एक भी महिला का चेहरा नहीं देखा। शादियां कड़ाई से समुदाय के भीतर ही होती है। दहेज पर पूर्ण बंदिश है।

मुझे समद नामक एक युवक से मिलाया गया। वह अपने पारिवारिक कारोबार के लिए नियमित रूप से दुबई जाया करता था। पुलिस को पहचान की गलतफहमी की बात समझ में आती, उसके पहले ही उसे उठा लिया गया। पुलिस हिरासत में उसे 40 दिन तक रखा गया। उसे थर्ड डिग्री प्रताडऩा दी गई। गृह मंत्री ने बाद में समद की गिरफ्तारी को लेकर माफी मांगी, लेकिन यह युवक अंदर से बुरी तरह से टूट गया है और अब शहर में बाहर निकलना तक नहीं चाहता।

गुत्थी और उलझ गई
मैं शहर के पुराने इलाके के मदीना कॉलोनी स्थित रियाज और इकबाल के घर गया। दोनों भाइयों के माता-पिता शाहिदा और इस्माइल शाहबंदरी अपने सात पोते-पोतियों और दो बहुओं के साथ रहते हैं। वे आरोप लगाते हैं कि ”पुलिस ने अपनी नाकामी ढंकने के लिए उनके बेटों को फंसा दिया है।” उन्होंने कहा कि ”उन्होंने अपने लड़कों को अच्छी तालीम दी है। वे बम विस्फोटों के दोषी कतई नहीं हो सकते।” परिवार ने इन दोनों को वर्षों से नहीं देखा है। पुलिस उन्हें मार देगी, इस डर से वे भागे-भागे फिर रहे हैं। रियाज के पिता कहते हैं – ”हम मुम्बई से वापस आए, क्योंकि भटकल हमारा गृह शहर है, लेकिन अब यही हमारा घर हमारे लिए जेल बन गया है।”

भटकल में अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान जिन लोगों से मैं मिला, उनमें से अधिकतर ने मेरे सवालों का जबाव देने से इनकार कर दिया। मैं यहां इस आशा से गया था कि मुझे कुछ ऐसे तत्व मिलेंगे, जो आतंकवादी बनने की कठोर वजह बताएंगे। वापस लौट कर मैं और अधिक चकरा गया।

जेहन में कई ऐसे सवाल उभरे, जिनका जबाव, मुझे नहीं मिला। बाहर से देखने पर कुछ भी गलत नहीं लगा, लेकिन वहां रहते हुए मैंने अंदर तक गहरी उथल-पुथल जरूर महसूस की। ऐसा लगा कि शहर ज्वलनशील पदार्थ की किसी डिब्बी-सा बना है। बस, शहर एक चिंगारी का इंतजार कर रहा है।

मेरी कामना है कि इनाउतुल्लाह गवई और उनके जैसे लोगों का भाग्य, उनका साथ दे। वे ऐसे लोग हैं, जो भटकल को उसकी पुरानी ख्याति वापस दिला सकते हैं। वे सामान्य स्थिति के झीने आवरण के नीचे मौजूद नफरत और अविश्वास की गहरी खाई को पाट सकते हैं।

 भटकल से अनिल धीर

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