ब्रेकिंग न्यूज़ 

रथयात्रा: एक सांस्कृतिक उत्सव

ओडिशा के पुरी श्रीमंदिर में श्री जगन्नाथजी की कुल 13 यात्राएं होती हैं जिनमें सबसे अन्यतम रथयात्रा है जो प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होती है। कहने के लिए तो यह रथयात्रा मात्र एक दिन की होती है पर धार्मिक आयोजन पूरे दो महीने का होता है 13 मई, को अक्षय तृतीया के दिन से ही जगन्नाथजी के नंदिघोष रथ,उनके बड़े भाई बलभद्रजी के तालध्वज रथ और उनकी लाड़ली बहन सुभद्राजी के रथ देवदलन रथ निर्माण के कार्य का शुभारंभ हुआ। उसी दिन भगवान जगन्नाथ की 21 दिवसीय बाहरी चंदनयात्रा पुरी के नरेंद्र सरोवर में संपन्न हुई। 23 जून को श्रीमंदिर प्रांगण में 21 दिवसीय चंदनयात्रा का देवस्नान पूर्णिमा के रुप में संपन्न हुआ।अत्यधिक स्नान करने के कारण भगवान जगन्नाथ बीमार पड़े और उनको 15 दिनों तक ‘बीमार कक्ष’ अणसरपीण्ड पर रखा गया। उनका आयुर्वेद सम्मत इलाज किया गया। 8 जुलाई को पूरी तरह से स्वस्थ होकर प्रगट हुए।

प्रतिवर्ष तीन नए रथ बनाए जाते हैं और पुराने रथ तोड़ दिये जाते हैं। ऋग्वेद और यजुर्वेद में रथ के उपयोग का वर्णन मिलता है।

रथयात्रा के लिए काठ संग्रह का आरंभ बसंत पंचमी के दिन से आरंभ हो जाता है। लकड़ी ओडिशा के दशपल्ला इलाके से आती है। रथ निर्माण करने वाले को पहले जागीर दी गई थी और ये निशुल्क रथ-निर्माण करते थे। जागीर प्रथा का लोप हो जाने से ये अब पारिश्रमिक लेते हैं। रथ निर्माण कार्य में कुल 205 प्रकार के अलग-अलग सेवायत सहयोग देते हैं। जिस प्रकार पांच तत्वों के योग से मानव शरीर बना है ठीक उसी प्रकार देवविग्रहों के निर्माण में पांच तत्व, काष्ठ, धातु, रंग, परिधान एवं सजावटी सामग्रियों आदि का प्रयोग होता है।

रथ का निर्माण कार्य पुरी के गजपति महाराज के राजमहल के सामने होता है।इस स्थान को रथखला कहा जाता है। रथ निर्माण के बाद आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को मंदिर के सामने है। रथ मंदिर के सामने उत्तर दिशा की ओर मुंह करके खड़े होते हैं। तीनों रथों को सूक्ष्म कोण से अलग बगल खड़ा किया जाता है रथ संचालन के लिए झंडियां हिलाकर निर्देश दिया जाता है कि रथ को किस कोण पर खींचें। रथयात्रा को गुण्डिचा यात्रा भी कहा जाता है।

रथ खींचने के लिए नारियल की जटा से निर्मित मोटे मोटे रस्से व्यवहृत होते हैं, जो रथ के अक्ष से बांधे जाते हैं। हर दो चक्कों के बीच एक अक्ष होता है, जिनका अलग-अलग नाम है। अनेक बढ़ई संचालक रथ के अगले दण्ड पर इन रस्सियों को पकड़े बैठे होते हैं। रथ खींचने के लिए रस्सी दो प्रकार की होती है- सीधी और घुमावदार। हरेक रथ में चार चार रस्सियां लगी होती हैं। इनको विभिन्न चक्कों के अक्ष से विशेष प्रणाली में लपेट कर गांठ डालकर बाधा जाता है।

रथयात्रा में मुसलमानों की श्रद्धा
सीआरपीएफ समूह केन्द्र भुवनेश्वर में पिछले तीन सालों से रथयात्रा का आयोजन हो रहा है। सी आर पी एफ समूह केन्द्र में मुसलमान भाइयों के लिए तीस लाख की लागत से मस्जिद बनवाई गई हैं, जहां पर सर्वधर्म प्रार्थना स्थल है। डी आई जी श्री एस के मिश्रा ने यह जानकारी दी कि मुसलमान भाई भी रथयात्रा में स्वेच्छापूर्वक हिस्सा लेते हैं और भगवान जगन्नाथजी के अनन्य भक्त सालबेग को याद करते हैं। शेख वजीर ने बताया कि उनको और उनके मुसलमान साथियों को रथयात्रा में हिस्सा लेने में आनंद आता है जिस से आपसी मेल मिलाप की भावना सुदृढ़ होती है।
मूर्तियों के रथ पर विराजमान होने के बाद पुरी के गजपति महाराज पारंपरिक रीति से पालकी में बैठकर आते है और रथ पर चढ़कर एक सोने की मूठ वाली झाडू से रथ की सफाई करते है और चंदन मिश्रित जल छिड़कते हैं। इसे ‘छेरा पहंरा’ कहा जाता है। इस से स्पष्ट होता है कि राजा जगन्नाथ जी के अन्यतम सेवक है। मंदिर सिंहद्वार से गुण्डिचा मंदिर 3 किलोमीटर दूर है। लेकिन रथ को वहां तक पहुंचने में छह घण्टे से लेकर 24 घण्टे तक का समय लग जाता है।अक्षय तृतीया से जगन्नाथजी की चंदन यात्रा भी शुरु होती है। यह यात्रा 21 दिनों तक चलती है। इस यात्रा हेतु प्रतिदिन जगन्नाथजी की विजय प्रतिमा मदनमोहन, रामकृष्ण, लक्ष्मी, सरस्वती, बलराम और पंच पाण्डव, लोकनाथ, मार्कण्डेय, नीलकण्ठ, कपालमोचन और जम्बेश्वर को प्रतिदिन अपराह्न में पालकी-विमान में बिठाकर परंपरागत बनाटी खेल, तलवार चालन, पाईक नृत्य और भजन-कीर्तन के मध्य नरेंद्र तालाब लाया जाता है और उन्हें नाव में बिठाकर एक छोर से दूसरे छोर तक नौका विहार कराया जाता है।बाद में देव-देवियों को तालाब के बीच अवस्थित चंदन घर में ले जाकर वहां सुवासित जल में कुछ समय तक रखा जाता है। अंतिम दिन यह औपचारिकता दिन में एक बार तथा रात में 21 बार पूरी की जाती है।
स्नानपूर्णिमा को देवस्नान यात्रा भी कहते है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन श्रीमंदिर में महास्नान उत्सव मनाया जाता है। उस दिन रत्नवेदी से सुदर्शनजी, बलभद्रजी, सुभद्राजी और जगन्नाथजी को पहण्डी विजय के साथ स्नानमण्डप पर लाया जाता है और श्रीमंदिर के समस्त विधि-विधानों की औपचारिकता के पूर्ण होने के उपरांत जगन्नाथजी के प्रथम सेवक पुरी के नरेश श्री दिव्य सिंह देवजी छेरापंहरा करते हैं और श्रीमंदिर के उत्तर महाद्वार के पास के शीतला माता के स्वर्ण कुएं से 108 कलश जल से देव विग्रहों का महास्नान कराया जाता है। उस के बाद महाप्रभु को गजवेश के रुप में सजाया जाता है।तालध्वज रथ
सबसे पहले भक्त तालध्वज रथ को खीचते हैं।यह रथ महाप्रभु जगन्नाथ के बड़े भाई बलभद्र का है। इसे बहजध्वज भी कहते है। इसकी ऊंचाई 44 फीट है। इसमें 14 चक्के होते हैं। इसमें 763 काष्ठ खण्डों का प्रयोग किया जाता है। इस रथ के सारथी का नाम मातली तथा रक्षक का नाम- वासुदेव है। इस पर लगे पताका का नाम उन्नानी है। इस रथ के नवीन परिधान का रंग लाल-हरा होता है। इसके घोड़ों का नाम- तीव्र, घोर, दीर्घाश्रम और स्वर्णनाभ है। घोड़ों का रंग काला होता है। रस्से का नाम बासुकी है। पाश्र्व देवों के नाम-गणेश, कार्तिकेय, सर्वमंगला, प्रलंबरी, हतयुधा, मृत्युंजय, नतंभरा, मुक्तेश्वर और शेषादेव है।
d
देवदलन रथ
यह रथ देवी सुभद्रा का है। देवदलन को दर्पदलन या पद्मध्वज भी कहते है। इसकी ऊंचाई 43 फीट होती है। इसमें 593 काष्ठ खण्डों का प्रयोग किया जाता है। इस में लगे नवीन परिधान का रंग लाल-काला होता है। इसमें 12 चक्के होते है। इसके सारथि का नाम अर्जुन तथा रक्षक का नाम जयदुर्गा है। इस पर लगी पताका का नाम नदम्बिका है। इसके चार घोड़ों के नाम- रोचिका, मोचिका, जीत और अपराजिता है। घोड़ों का रंग भूरा होता है। इसके रस्से का नाम स्वर्णचूड़ है। इसकी नौ पाश्र्व देवियां होती है- चंडी, चमुंडी, उग्रतारा, शुलीदुर्गा, वराही श्यामाकाली, मंगला और विमला है। नन्दिघोष रथ
यह महाप्रभु जगन्नाथ का रथ है। इसकी ऊंचाई 45 फीट है। इसमें 16 चक्के होते है। इसके निर्माण में 832 काष्ठ खण्ड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। रथ पर लाल-पीला नवीन परिधान होता है। इस पर लगी पताका का नाम त्रैलोक्यमोहिनी है। इसके सारथि है- दारुक तथा रक्षक है- गरुण। इसमें चार घोड़े- शंख, बलाहक, सुस्वेत और हरिदाशंव होते है। घोड़ों का रंग सफेद होता है।ऐसा बताया जाता है कि इस रथ को इन्द्र ने उपहार स्वरुप प्रदान किया था। इसके रस्से का नाम शंखचूड़ है। इसके पाश्र्व देवों के नाम- वाराह, गोबर्धन, कृष्ण, गोपीकृष्ण, नरसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान और रुद्र है।
 

पुरी से अशोक पाण्डेय

лобановский александркарандашная техника

Leave a Reply

Your email address will not be published.