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व्यावहारिकता पर प्रश्न उठाती कविताएं

मुकंद लाठ की कविताओं में आधुनिक समय के सामाजिक सरोकारों को यथार्थपरक दृष्टि से आंकते हुए यह कहने का प्रयास किया गया है कि मनुष्य इस तरह की परिस्थितियों में फंसकर नितांत अकेला पड़ गया है, जिनसे छुटकारा पाना असंभव-सा है। लेकिन इन स्थितियों और परिस्थितियों के अंतर्विरोध में जीवन और जगत का सौंदर्य निहित है।
‘अनरहनी रहने दो’ की कविताएं स्थितियों और त्रासदी की मौन साक्षी न बनकर उन पर अपनी प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त करती हैं। जिंदगी रूपी पहेली को सुलझाते-सुलझाते मनुष्य किस तरह से अपने ही बुने जाल में फंस कर उन्माद में बहने लगता है। ‘बुलावा’ नामक कविता में लोक-परलोक के संबंध को उजागर करते हुए मानव-मन की भावना का मार्मिक वर्णन किया है। ‘तोते सवेरे-सवेरे’ कविता में प्रकृति के दृश्य का वर्णन करते हुए कवि ने संसार की व्यावहारिकता पर गहरे ढंग से प्रकाश डाला है। अर्थात आज जो आपके निमित्त है वह कल आपको दुनिया की भीड़ का एक हिस्सा समझने लगता है। यह समय का चक्र सदैव चलायमान है वह कभी भी रुकने का नाम नहीं लेता। लेकिन संवेदनशील और सुहदय मनुष्य अपनी प्रवृत्ति कभी नहीं छोड़ते। वे उसी तरह से दूसरों के प्रति उदार और निश्छल रहते हुए कल्याणकारी कार्य करते रहते हैं। कवि ने संसार की व्यावहारिकता को तोते से उपमा दी है कि तोते प्रात: काल दाना चुगते हैं और गंतव्य के लिए उड़ जाते हैं। उसी प्रकार मनुष्य भी अपना समय आने पर अपना रास्ता अलग अख्तियार कर लेता है। और यही प्रकृति का नियम भी है।
लाठ जी की कविताएं अंतर्मुखी हैं और प्रकृति में घटित होने वाली अनदेखी-सी क्रिया को भी देखती हैं, उसके भीतर उतरती हैं। और उसको कहीं भीतर तक ले जाती हैं। इन कविताओं में दार्शनिक किस्म की जिज्ञासा भी देखने को मिलती है। इनमें अंतर्विरोध हैं, जो बड़े खूबसूरत हैं जैसे बबूल नामक कविता में यह दृश्य देखा जा सकता है-
सबेरे सबेरे लगता है
रात की चांदनी में
छिटक आई है धूप
शरद आ गई है
और उधर
सूने से खेत में
बसंत भी है
अनहोना
बड़े-बड़े कांटों में
नरम-नरम केसर के
फूल लिये
औघड़ बबूल
ये अंतर्विरोध प्रकृति में ही नहीं, मनुष्य में भी हैं और चराचर जगत में भी हैं लेकिन बड़े प्रिय हैं।
इसके अलावा लाठ जी की कविताओं में आध्यात्मिक किस्म की जिज्ञासा भी है- यह जिज्ञासा ‘गोरख की पगडंडी’ शीर्षक कविता में देखी जा सकती है-
‘पीछा
करता हूं किसी का मैं’
लगा मुझे अकस्मात्।
अगला मुहूर्त तभी
पिछले से भटक गया
कहां हूं मैं?
अपनी धुन सोचता था
चलता हूं स्वगत चाल।
कैसा संकेत बात बदल गया?
कवि की मनुष्य के अंतद्र्वंदों पर दृष्टि है पर उन अंतद्वंदों की अनिवार्यता का स्वीकार भी है। इन कविताओं में प्रकृति के प्रति प्रेम भी है। कुछ कविताओं में तो प्रकृति के बेहद सुंदर चित्र खींचे गये हैं- जैसे ‘गली का पेड़’ कविता में- इन्हीं दो-चार पत्तों को लिये
ठंडी हवा में कांपते
नुक्कड़ खड़े
कब तक रहोगे?
ठिठुरता सूरज सिहर।
हां, फिर खिलेंगे फूल
होंगे पके गेहूं से सुनहले दिन
सहोगे चोट कब तक?
मुकंद जी की कवितओं में तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग बड़ी ही सहजता के साथ किया गया है। यही नहीं इनमें शब्द और बिम्ब के प्रयोग की उपयोगिता भी समझी गई है।
 बबिता कुमारी

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