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बिना द्वार के घरों का गांव

आज कल कंपूयटाराइज्ड अलार्म सिस्टम का जमाना है। बहुत से लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में एक ऐसा गांव भी हैं, जहां तालों का कोई अस्तित्व नहीं है। आश्चर्य की बात तो यह भी है कि इस गांव में ताले ही नहीं हैं बल्कि किसी भी घर में दरवाजा भी नहीं लगा है। पूरे गांव में एक भी ऐसा घर नहीं है जहां दरवाजा हो। उड़ीसा के केन्द्रपाड़ा जिले में यह छोटा-सा गांव सियालिया है।

यह गांव 120 हेक्टर में बसा है। यहां 150 घर है। यह ‘द्वारहीन गांव’ के नाम से मशहूर है। यहां किसानों और व्यापारियों की आबादी अधिक है।

यहां सारे घर एक से नजर आते हैं। किसी पर भी दरवाजा नहीं है। इस बारे में पूछने पर गांव के श्रीधर साहू ने कहा, द्वार पर गांव की देवी खरखाई ठकुरानी का वास है, इसलिए सियालिया में दरवाजे नहीं हैं। सालों से यह गांव लोगों की जिज्ञासा का केन्द्र है। गांव के अन्य निवासी श्रीधर मल्लिक का कहना है कि ‘हमारे गांव की रक्षा, हमारी देवी करती है इसलिए सियालिया में कभी चोरी नहीं होती। तीस वर्ष पहले शुभ बेहरा ने चोरी की थी। उसकी एक महीने में ही मृत्यु हो गई।’

आसपास के सारे गांवों में चोरियां होती हैं, पर सियालिया में कभी नहीं होती। राजकनिका थाने के इंचार्ज विजय मल्लिक 1956 तक के रजिस्टर चैक करके बताते हैं, ‘पुराने से पुराने रजिस्टरों तक में कहीं भी सियालिया में चोरी का कभी कोई जिक्र तक नहीं है।’

सियालिया के रिटायर्ड स्कूल टीचर शत्रुघ्न प्रधान कहते हैं, ‘कुछ लोग प्राइवेसी के लिए दरवाजे पर मोटा कपड़ा टांग लेते हैं, लेकिन हमारे गांव में डकैती कभी नहीं पड़ी। किसी भी गांव वाले से पूछ लीजिए, इस गांव में कभी कोई डकैती की घटना नहीं हुई। खरखाई ठकुरानी देवी गांव के लोगों की इतनी अच्छी तरह रक्षा करती हैं कि यहां डकैती कभी नहीं होती।’

गांव में 60 वर्ष पुराना स्कूल है। उसमें भी दरवाजे नहीं है। दस वर्ष पहले सरकार ने गांव में सामुदायिक केन्द्र बनवाया गांव की परंपरा का सम्मान करते हुए उसमें भी दरवाजे और किवाड़ नहीं लगाए गए। वयोवृद्ध नित्यानंद स्वैन 40 वर्ष पुरानी घटना बताते हैं ‘सागर साहू ने घर बनवाया तो उसमें दरवाजे लगवाए। कुछ ही महीनों में उसके दो बेटों की रहस्यमय परिस्थियों में मृत्यु हो गई।’

गांव के स्कूल के अध्यापक हरमोहन साहू कहते हैं ‘लकड़ी की कीमतें आज कल आसमान छू रही हैं। ऐसे में बिना किवाड़ के घर बनवाना सस्ता न बनाया पड़ता है।’ एक ग्रामीण शरत साहू ने बताया ‘गांव के अनेक परिवार हर वर्ष तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। परिवार की अनुपस्थिति में कुछ घर सुनसान पड़े रहते हैं। घर में जो कुछ भी मालमत्ता रखा होता है, लौटने पर वह ज्यों का त्यों ही रखा मिलता है। स्थानीय धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गांव में आंगनवाड़ी केन्द्र बनवाया गया है उसमें भी दरवाजे नहीं लगाए गए हैं।’ गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गीता साहू कहती है ‘आंगनवाड़ी केन्द्र के मुख्य प्रवेश द्वार पर कोई ताला नहीं है। चावल, दाल, दवाएं, शिशु आहार और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज अंदर रखे हैं।’

शिक्षिका अनादि साहू कहती हैं ‘केन्द्र में डेस्क, बेंचे, अलमारियां, घडिय़ां, पीतल के घंटे, दोपहर का भोजन बनाने के लिए चावल, दाल, और अन्य बर्तन रखे हैं। गांव की पंरपरा के सम्मान को ध्यान में रख कर केन्द्र में भी कोई किवाड़ नहीं है। हमारे स्कूल में भी चोरी की कोई घटना नहीं हुई।’

21 वीं शताब्दी में धार्मिक विश्वास ने इस गांव को बिना दरवाजों के घरों का गांव बना दिया है। हर वर्ष लोग इस विचित्र गांव को देखने सियालिया आते हैं।

 

 

केन्द्रापाड़ा से आशीष सेनापति

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