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खाद्य सुरक्षा अध्यादेश: क्रियान्वयन की चुनौतियां

महर्षि वेदव्यास ने आज से 5 हजार वर्ष पूर्व कहा था कि मनुष्य के प्रत्येक उद्यम के पीछे एक मुठ्ठी अनाज का बल है। नि:सन्देह भूख मनुष्य को सुकर्म या दुष्कर्म, करने के लिए विवश कर देती है। जिस देश के जनजीवन का एक बड़ा हिस्सा गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण जैसी समस्याओं से पीडि़त हो, वहां खाद्य सुरक्षा एक स्वागत योग्य कदम है, परन्तु इसकी सफलता इसके अच्छे और दक्ष क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।

खाद्य सुरक्षा अध्यादेश राष्ट्रपति महोदय की स्वीकृति के बाद दिनांक 05 जुलाई को जारी हो गया। सरकारी सूत्रों ने इसे क्रान्तिकारी कदम बताया है जिससे देश में व्याप्त मुखमरी व कुपोषण की समस्या का निराकरण सम्भव हो सकेगा। विपक्ष ने अध्यादेश में कई तकनीकी व व्यवहारिक खामियां बताई हैं और खाद्यान की उपलब्धता एवं सरकारी खजाने पर पडऩे वाले अत्यधिक वित्तीय भार, लगभग 1.24 लाख करोड़ रू., को लेकर भी आपत्तियां उठाई है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह ने अध्यादेश को किसान विरोधी कहा है। सरकारी सूत्रों ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा है कि योजना के क्रियान्वयन के लिए न तो अनाज की कमी है और धन की। उनके अनुसार योजना के अन्र्तगत 6.12 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी, जबकि पिछले वर्षों में औसतन 6 करोड़ टन अनाज की खरीद पहले से ही हो रही है। अन्तर नगण्य है और इसे बढ़ाने में कोई मुश्किल नही है। यह भी बताया गया है कि वर्ष 2013-14 में 85 हजार करोड़ की खाद्य सब्सिडी का प्रावधान है अत: योजना के क्रियान्वयन पर केवल 23800 करोड़ रू. का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा जो कि कुल बजट का केवल 4 प्रतिशत है। सरकार ने चालू वित्तीय वर्श में 10 हजार करोड़ रू. का प्रावधान पहले से कर रखा है। सरकारी अनुमान के अनुसार योजना से देश के लगभग 81 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे।

महर्षि वेदव्यास ने आज से 5 हजार वर्ष पूर्व कहा था कि मनुष्य के प्रत्येक उद्यम के पीछे एक मुठ्ठी अनाज का बल है। नि:सन्देह भूख मनुष्य के सुकर्म या दुष्कर्म, करने के लिए विवश कर देती है। जिस देश के जनजीवन का एक बड़ा हिस्सा गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण जैसी समस्याओं से पीडि़त हो, वहां खाद्य सुरक्षा एक स्वागत योग्य कदम है। परन्तु इसकी सफलता इसके अच्छे और दक्ष क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यदि क्रियान्वयन ठीक न हो तो उच्च स्तर पर निर्धारित उत्तम से उत्तम कार्यक्रम भी असफल हो जाते हैं या उनके अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। इस परिपे्रक्ष्य में सरकारी मशीनरी का महत्व सामने आ जाता है, क्योंकि कार्यक्रमों को निर्धारित तो चुनी हुई सरकारों के द्वारा किया जाता है, परन्तु उनका सम्पादन सरकारी मशीनरी के द्वारा किया जाता है।

अत: सरकार को इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम की क्रियान्वयन प्रक्रिया निर्धारित करते समय जन कल्याण के मिलते जुलते पूर्व कार्यक्रमों के अनुभवों को भी ध्यान में रखना होगा। दुर्भाग्यवश हमारा पूर्व अनुभव सुखद नही रहा है। वर्ष 1978-79 में एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ जिसका उद्देश्य गांव के गरीब लोगो को सब्सिडी व बैंक के माध्यम से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना था। उसके बाद ग्रामीण युवक स्वयं रोजगार कार्यक्रम महिला व बाल विकास कार्यक्रम ग्रामीण कारीगरों को अच्छे औजारों की आपूर्ति कार्यक्रम व गंगा कल्याण योजना, आरम्भ किये गये। छठी व सातवीं पंचवर्षीय परियोजनाओं में राष्ट्रीय ग्रामीण योजगार कार्यक्रम व ग्रामीण भूमिविहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम शुरू हुए। वर्श 1993 में सुनिश्चित रोजगार स्कीम और 2000-2001 में खाद्य के लिए कार्य कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। वर्ष 1985-86 में ग्रामीण क्षेत्र के अनुसूचित गरीब लोगो के लिए इन्दिरा आवास योजना प्रारम्भ की गई।

इन कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीबी दूर करना, गांव के युवकों व कारीगरों को स्वयं रोजगार हेतु प्रशिक्षित करना, आवश्यकता के समय रोजगार उपलब्ध कराना, तथा स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप आर्थिक व सामाजिक संसाधनों का सृजन करना था। परन्तु सरकारी मशीनरी की गैर जवाबदेही और भ्रष्टाचार के कारण कार्यक्रम अपने उद्देश्य में सफल न हो सके। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने तो यह मत व्यक्त किया था कि ऐसे कार्यक्रमों का मात्र 15 प्रतिशत भाग ही लाभार्थियों को पहुंच रहा है।

पूर्व योजनाओं की कमियों पर विचार कर भारत सरकार ने वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना आरम्भ की गई जिसे 2 अक्टूबर 2009 को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नाम दे दिया गया। इस योजना के मुख्य उद्देष्य है, 1. गांव के गरीब की क्रय क्षमता में वृद्धि कराना। 2. ग्रामीण भारत में प्रवस्थापना सुविधाओं का सृजन ताकि गांव से लोगों का शहर की ओर पलायन कम हो सके। 3. सामाजिक असमानता एवं नारी-पुरूष असमानता दूर करने के लक्ष्य की ओर अग्रसर होना। परन्तु इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का सम्पादन भी ठीक प्रकार से नहीं हुआ।

कार्यक्रम के अन्र्तगत लक्ष्य के अनुरूप मकानों, सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों व अन्य स्थायी परिसम्पत्तियों का निर्माण नहीं हुआ। योजना के अन्र्तगत कार्य कर रहें श्रमिको की शिकायत रही है कि उन्हें रोजगार प्राप्त करने के लिए रिश्वत देनी पड़ी और उन्हे पूरा वेतन भी नही मिला। कार्यक्रम के अन्र्तगत निर्मित इमारतों की गुणवत्ता भी अपेक्षित स्तर की नहीं रही। भारत सरकार के आडिटर जनरल ने आडिट में योजना के क्रियान्वयन में बड़ी कमियां पाई। यह कार्यक्रम भी भ्रष्टाचार और निजी स्वार्थो की भेंट चढ़ गया। वस्तुत: इस देष में सरकारी मशीनरी, ठेकेदार व भ्रष्ट स्थानीय तत्वों के गठजोड़ बन गयें हैं जो वास्तविक जरूरत मन्द को लाभ पहुंचाने के बजाय योजनाओं का स्वयं लाभ उठा रहें है।

अत: खाद्य सुरक्षा कायक्रम का सही क्रियान्वयन भी एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए क्रियान्वयन के निम्न तत्वों पर गम्भीरता से विचार कर प्रभावी व पारदर्शी कार्यनीति तय करनी होगी।

 सही लाभार्थी का चयन
 लाभ का उस तक पहुचाना
 लाभार्थी द्वारा लाभांश का सद्पयोग
 भ्रष्टाचार पर अंकुश
 कार्यक्रम को नुकसान पहुचाने वालों के विरूद्ध सामायिक व प्रभावी कार्यवाही
 कार्यक्रम के अनुश्रवण की व्यवस्था।

यह सुनिश्चित कराना होगा कि लाभार्थी का सही चयन हो तथा स्वार्थी तत्व उसका स्थान न ले सके। तत्पश्चात यह भी देखना होगा कि लाभार्थी तक निश्चित लाभ पहुंच सके। यह अनुश्रवण भी करना होगा कि लाभार्थी लाभांश का सद्पयोग करें क्योंकि कभी कभी लाभार्थी भी अपने तत्कालिक स्वार्थ के लिए लाभांश का दुरूपयोग करता है। इस देश की जन वितरण प्रणाली में प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार का घुन लगा है। इस पर कैसे अंकुश लगे यह एक विचारणीय बात है। इसके लिए प्रभावी व सामायिक वित्तीय व भौतिक अनुश्रवण व्यवस्था की आवश्यकता है। कार्यक्रम में अवरोध पहुंचाने वाले तत्वों पर त्वरित कार्यवाही आवश्यक होगी। यदि इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन में प्रभावी सावधानियां न बरती गई तो हो सकता है कि यह महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी पूर्व कार्यक्रमों की तरह अपेक्षित परिणाम न दे सके।

(लेखक ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान हेतु कार्यरत -‘ग्रामीण कल्याण संस्थान’ के अध्यक्ष हैं।

 

इ. कप्तान सिंह

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