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मोदी को घेरने की कोशिश में खुद फंस गयी केन्द्र सरकार

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को सबक सिखाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही केन्द्र सरकार क्या देश की आंतरिक सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही है? इस सवाल के उत्तर अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार केन्द्रीय गृहमंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी इसका उत्तर ‘हां’ में दे रहे हैं। उनका मानना है कि देश की दो प्रमुख एजेंसियां केन्द्रीय जांच ब्यूरो और इंटेलिजेंस ब्यूरो में जिस तरह की लड़ाई चल रही है, उसने देश के सूचना तंत्र को तोड़ दिया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि सुरक्षा के लिए जीवन दायिनी माने जाने वाली सूचनाओं का प्रवाह रुक गया है।

यह पूरा मामला गुजरात में एक दशक पहले हुई इशरत जहां मुठभेड़ से जुड़ा है। गुजरात पुलिस के साथ हुई उस मुठभेड़ में इशरत जहां के साथ लश्कर का आतंकी जावेद शेख तथा दो अन्य लोग भी मारे गए थे। यह मुठभेड़ इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा दी गई सूचना के आधार पर हुई थी।

इस मुठभेड़ के फर्जी होने के आरोपों के बाद गुजरात हाईकोर्ट ने केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को मामले की जांच का आदेश दिया था। जांच के बाद सीबीआई ने गुजरात पुलिस के बड़े अधिकारियों को तो मुजरिम बनाया ही है, साथ ही इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी को भी मुजरिम बनाने की तैयारी कर ली है। इसी वजह से बवाल मचा हुआ है। अपने वरिष्ठ अधिकारी को सीबीआई द्वारा जांच के दायरे में लिए जाने से देश की आंख और कान माने जाने वाले इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी खासे नाराज हैं। खुद गृहमंत्रालय इंटेलिजेंस ब्यूरो के साथ खड़ा हुआ है।

मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमले की साजिश की सूचना गुजरात पुलिस को देने वाले आईबी के तत्कालीन संयुक्त निदेशक राजेन्द्र कुमार इस समय आईबी में विशेष निदेशक हैं। वे आंतरिक आतंकवाद, खासतौर पर जेहादी आतंकवाद से जुड़ी सूचनाओं के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उनकी छवि एक तेजतर्रार और प्रभावी अधिकारी की रही है। पाकिस्तानी मामलों पर उनकी अच्छी पकड़ है।

इशरत जहां मुठभेड़ के मामले में सीबीआई उनसे पूछताछ कर चुकी है। सीबीआई उन्हें भी गुजरात के पुलिस अधिकारियों के साथ मुजरिम बनाने की तैयारी में है। देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि खुफिया सूचनाएं उपलब्ध कराने वाले अधिकारियों को ही मुजरिम बनाने की तैयारी की जा रही है।

इस मुद्दे को लेकर गृहमंत्रालय की ओर से समाधान की तमाम कोशिशें की गयी हैं, लेकिन कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है। खुद केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इसके लिए कोशिश की। उन्होंने सीबीआई और आईबी के निदेशकों को सामने बिठाकर बात की। लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। गृहमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भी सीबीआई ने राजेन्द्र कुमार से पूछताछ की। अब वह उन्हें फर्जी मुठभेड़ में अभियुक्त बनाने की तैयारी में है। हालांकि गृहमंत्रालय यह तय कर चुका है कि वह राजेन्द्र कुमार के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देगा। लेकिन सीबीआई बिना अनुमति के ही चालान पेश करने की तैयारी कर चुकी है।

दरअसल वास्तविकता यह है कि नरेन्द्र मोदी और उनके तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह को ‘फंसाने’ के चक्कर में गृहमंत्रालय अपने ही जाल में फंस गया है। गृहमंत्रालय ने अगस्त 2009 में एक हलफनामे में इशरत जहां और उसके साथ मारे गए चार अन्य लोगों को पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य बताया था। उस हलफनामें में गृहमंत्रालय ने उक्त मुठभेड़ की सीबीआई जांच का भी विरोध किया था।

लेकिन बाद में गृहमंत्रालय का यह हलफनामा बदल दिया गया। उस समय पी. चिदंबरम देश के गृहमंत्री थे। दूसरे हलफनामे में गृहमंत्रालय ने अपना पुराना बयान बदलते हुए कहा कि इस बात के पुख्ता सबूत नहीं हैं कि इशरत जहां और उसके साथ मारे गए लोग आतंकवादी ही थे। दूसरे हलफनामे में गृहमंत्रालय ने सीबीआई जांच का समर्थन कर दिया था। अब यही हलफनामा सरकार के गले की फांस बन गया है। दरअसल नरेन्द्र मोदी को फंसाने के उद्देश्य से हलफनामा बदलते समय गृहमंत्रालय के तत्कालीन अधिकारियों ने यह सोचा नहीं था कि एक दिन यही उनके गले की हड्डी बन जाएगा।

अब सीबीआई एक ओर जहां नरेन्द्र मोदी का नाम अपनी चार्जशीट में शामिल करने की तैयारी में है, वहीं आईबी के विशेष निदेशक राजेन्द्र कुमार का नाम भी उसकी सूची में है।

यही वजह है कि गृहमंत्रालय के आला अफसर अब एक बार फिर सच की शरण में हैं। अब आला अफसर यह मान रहे हैं कि इशरत जहां के साथ मुठभेड़ में मारा गया जावेद शेख लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य था। लेकिन वह आईबी को भी जानकारी मुहैया करा रहा था। जावेद शेख ने ही आईबी को यह जानकारी दी थी कि पाकिस्तानी आतंकी कब भारत पहुंचे, कहां से उन्हें हथियार मिले और नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाने की उनकी योजना क्या है। आईबी ने यही जानकारी गुजरात पुलिस को दी थी।

गृहमंत्रालय के अधिकारी यह मान रहे हैं कि राजेन्द्र कुमार को अभियुक्त बनाने की कोशिश का विपरीत असर इंटरलिजेंस ब्यूरो की कार्यप्रणाली पर पड़ा है। ब्यूरो के अफसरों में गुस्सा और मायूसी तो है ही, उनकी कार्यक्षमता भी प्रभावित हो रही है। उनका सूचना तंत्र भी कमजोर हुआ है।

इंटेलिजेंटस ब्यूरो के अधिकारी वर्षों की मेहनत के बाद अपना नेटवर्क इन संगठनों के बीच खड़ा करने में सफल हुए हैं। अब अगर उनकी सूचनाओं को उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा तो कोई क्यों अपनी जान जोखिम में डालेगा। सही सूचनाएं राज्यों तक क्यों पहुंचाई जाएंगी। सीबीआई की हरकत ने आईबी का नेटवर्क ही ध्वस्त कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक राजेन्द्र कुमार के खिलाफ सीबीआई की मुहिम के बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम लगभग ठप्प हो गया है। वरिष्ठ अधिकारी उन राज्यों में जाना नहीं चाहते हैं, जहां आंतरिक अशांति है। गुजरात, कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में कोई अधिकारी काम करने का इच्छुक नहीं है।

यही वजह है कि गृहमंत्रालय ने तय किया है कि वह सीबीआई के खिलाफ राजेन्द्र कुमार की मदद करेगा। वह अदालत में यह सबूत देगा कि इशरत जहां और उसके साथी आतंकी थे। उनके लश्कर-ए-तैयबा से संबंध थे। लेकिन वे यह भी मान रहे हैं कि राजेन्द्र कुमार तो कानून के दायरे से बच जाएंगे, लेकिन इस वजह से एक महत्वपूर्ण संस्था को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी।

कहीं यह अहं की लड़ाई तो नहीं
सीबीआई द्वारा आईबी के अफसर राजेन्द्र कुमार को अभियुक्त बनाने की कोशिश को दो प्रमुख एजेंसियों के प्रमुखों में अहं की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है।

इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक आसिफ इब्राहिम को शीर्ष पर लाने के लिए केन्द्र सरकार ने आईबी का इतिहास बदल दिया है। पहले जहां वरिष्ठतम अधिकारी को ही ब्यूरो का निदेशक बनाया जाता था, वहीं इस बार ब्यूरो के चार वरिष्ठ अधिकारियों को ब्यूरो से बाहर करके 1977 बैच के इब्राहिम को निदेशक बनाया गया। यही नहीं गुजरात विधानसभा चुनावों के समय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने यह दावा भी किया था कि कांग्रेस ने पहली बार एक मुसलमान को इंटेलिजेंस ब्यूरो का मुखिया बनाया है।

ऐसा ही हाल सीबीआई के मुखिया रंजीत सिन्हा का भी है। 1974 बैच के आईपीएस अधिकारी रंजीत सिन्हा को ढ़ाई साल पहले सीबीआई निदेशक पद की दौड़ से बाहर कर दिया गया था। हालांकि सिन्हा तब भी वरिष्ठ थे, लेकिन तब उनका नाम सूची में ही शामिल नहीं किया गया था। उन्हें तब इस पद के लायक नहीं माना गया था। माना जाता है कि बिहार के चर्चित घोटाले में शामिल एक नेता से करीबी रिश्ते के चलते रंजीत सिन्हा को सीबीआई निदेशक नहीं बनने दिया गया था।

दो साल बाद सिन्हा यह पद पाने में सफल हो गए। इंटेलिजेंस ब्यूरो के अफसर यह कह रहे हैं कि सिन्हा अब अपने उस अपमान का बदला ले रहे हैं। दरअसल आईबी की रिपोर्ट के कारण ही पहले उनका नाम सीबीआई निदेशक के लिए बने पैनल में शामिल नहीं किया गया था। दूसरी बात यह है कि आसिफ इब्राहिम रंजीत सिन्हा से तीन साल जूनियर भी हैं। जबकि अब तक की परंपरा यह रही है कि आईबी का डायरेक्टर देश का सबसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ही होता था।

अब वास्तविकता क्या है, यह तो केन्द्र सरकार, सीबीआई और आईबी ही जाने, पर इतना साफ है कि नरेन्द्र मोदी को कठघरे में लाने के लिए देश की आंतरिक सुरक्षा दांव पर लगा दी गयी है। गृहमंत्रालय का एक हलफनामा उसके ही गले पड़ गया है। इसका खामियाजा मोदी भुगते या न भुगते लेकिन देश को अवश्य भुगतना पड़ेगा।

 

अरूण रघुनाथ

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