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परेशान हैं राहुल भी!

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कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी कम परेशान नहीं हैं। वह अपने भाषणों में लगाातर कांग्रेस को अपने बूते खड़ा होने और किसी से चुनावी तालमेल किए बगैर चुनाव लडऩे की नसीहत देते रहते हैं। उनकी इस नसीहत का ही असर था कि यूपी और बिहार में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी और लालू प्रसाद यादव के राजद और राम विलास पसवान की लोजपा के साथ किसी तरह का चुनावी तालमेल नहीं किया था। लेकिन इस बार कांग्रेस आलाकमान ने उनकी नसीहत को ताक पर रखते हुए झारखंड में गुरू जी यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो (अगर उनके महत्वाकांक्षी पुत्र हेमंत सोरेन को इस पर आपत्ति नहीं हो) शिबू सोरेन के साथ मिलकर उनके बेटे के नेतृत्व में न सिर्फ सरकार बनाने का फैसला किया, बल्कि झारखंड में लोकसभा का चुनाव भी मिलकर ही लडऩे का फैसला कर लिया। बिहार में भी कांग्रेस के राजद और लोजपा अथवा नीतीश कुमार के जनता दल (यू) के साथ मिलकर चुनाव लडऩे के कयास मजबूत होने लगे हैं। राहुल जी यह सब टुकुर टुकर देख रहे हैं-ऐसे तो कांग्रेस अपने पैरों पर नहीं खड़ी होनेवाली।
बुरा हो राघवजी का
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बुरा हो मध्यप्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री राघव जी जी का जो नौकर के साथ अनैतिक यौन संबंध के फेरे में फंस गए। कांग्रेस के ताकतवर प्रवक्ता रहे अभिषेक मनु सिंघवी के राजनीतिक पुनर्वास के प्रयासों को ग्रहण सा लग गया। एक महिला अधिवक्ता को जज बनवाने का प्रलोभन देकर उनके साथ यौन संबंध कायम करने की सीडी सार्वजनिक होने के बाद वह राजनीतिक बियाबान में चले गए थे। वक्त बीतने के साथ लोग इस किस्से को भूलने से लगे थे और सिंघवी जी गाहे बगाहे खबरिया चैनलों पर कांग्रेस की ओर से वकालत भी करते नजर आने लगे थे, लेकिन अपने नौकर के साथ राघव जी के अप्राकृतिक यौन संबंधों की सीडी बाजार में आने के साथ ही सिंघवी की पुरानी सीडी भी नए सिरे से बाजार में नजर आने लगी है। किसी ने उसे एक पोर्न साइट पर भी चस्पा कर दिया है।
करेला नीम पर चढ़ा
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एक तो करेला, वह भी नीम चढ़ा। कहावत पुरानी है लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद पर बिल्कुल फिट बैठती है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने जहां लालू जी को फौरी राहत दी वहीं एक दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस फैसले के जरिए दो साल अथवा उससे अधिक की सजा प्राप्त लोगों की सांसदी, विधायकी छिन जाएगी और भविष्य में उनके चुनाव लडऩे पर भी रोक लग जाएगी। आज या कल, चारा घोटाले में अदालत अपना फैसला तो सुनाएगी ही और सजा अगर दो साल से अधिक की हो गई (इसकी संभावना ज्यादा है) तो?
फिर राबड़ी!
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तो राजद सुप्रीमो लालू जी एक बार फिर जेल जाते जाते रह गए। बिहार के मशहूर चारा घोटाले में मुख्य अभियुक्त लालू प्रसाद के सिर पर झारखंड में सीबीआई की विशेष अदालत की तलवार लटकी है। सुनवाई पूरी हो चुकी है, जज 15 जुलाई को सजा सुनाने वाले थे। लेकिन भला हो सुप्रीम कोट के उस फैसले का जिसमें सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले पर फौरी रोक लगा लगा दी गई। इससे पहले लालू के दरबारियों में इस बात पर चर्चा चल पड़ी थी कि अगर लालू जी जेल चले गए तो राजद की कमान किसके हाथ में होगी। दरबारियों में से एक की राय थी कि पार्टी का नेतृत्व पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह को सौंप देना चाहिए, लेकिन तपाक से दूसरे ने टोका, ”बुड़बक हैं का, लालू जी कवनो पहली बार जेल गए हैं? जब मुख्यमंत्री थे तब भी तो इसी मामले में जेल गए थे। तब पार्टी और सरकार की कमान किसके हाथ में गई थी। बताइए।” जवाब स्पष्ट था, ‘राबड़ी जी के हाथ में।’ नेताजी ने समझाया कि उस समय भी खुद को उनका बौद्धिक गुरु कहने वाले एक नेता रंजन यादव ने दावा जता दिया था, नतीजतन दरबार से बाहर कर दिए गए थे। लंबे राजनीतिक बनवास के बाद अभी नीतीश कुमार की पार्टी से लोकसभा के सदस्य हैं। सच मानिए रघुवंश बाबू ऐसी गलती नहीं करेंगे।
क्या करें टंडन जी?
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उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक बड़े नेता, राज्य सरकार में नगर विकास मंत्री रहे लालजी टंडन इन दिनों बेतरह परेशान हैं। वह अपनी परेशानी अपने करीबी लोगों के साथ ही अब मीडिया से भी बांटने लगे हैं। दरअसल, टंडन जी इस समय उस लखनऊ से लोकसभा के सदस्य हैं जिसका प्रतिनिधित्व कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी करते थे। लेकिन हाल के दिनों में कभी राजनाथ सिंह और मुरली मनोहर जोशी तो कभी उत्तर प्रदेश के रास्ते दिल्ली की दूरी तय करने का सपना देख रहे नरेंद्र मोदी अपने कनफुसिया तंत्र के जरिए खबर चलवाते रहते हैं कि वे अब लखनऊ से ही लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। बेचारे टंडन जी को अफसोस इस बात का भी है कि कोई उनसे पूछना भी जरूरी नहीं समझता कि आखिर वे क्या चाहते हैं। वह खुद भी तो उसी सीट से लडऩा चाहेंगे जिसे उन्होंने अटल जी के जमाने से ही सींचा है। उनके एक समर्थक सवाल करते हैं कि राजनाथ सिंह और जोशी जी ने अपने चुनाव क्षेत्रों की उपेक्षा की है तो उसकी सजा टंडन जी क्यों भुगतें। टंडन जी अपनी व्यथा कथा नागपुर भी पहुंचाने में लगे हैं।
हे राम, हाय राम
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चुनाव से पहले भाजपा को अक्सर अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के अपने अधूरे कार्य पूर करने के संकल्प की याद आने लगती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। नागपुर के संघ मुख्यालय से संकेत मिलने के बाद कि सहयोगी दलों की चिंता में भाजपा को अपनी विचारधारा और मुद्दों से समझौता किए बगैर आगे बढऩा चाहिए, पार्टी के उत्तर प्रदेश मामलो के प्रभारी महासचिव अमित शाह अयोध्या रामलला के दरबार में पहुंच गए। दर्शन किए और बोल गए कि उनकी पार्टी ने मंदिर निर्माण का मुद्दा छोड़ा नहीं है। वह इसके लिए कृत संकल्प है। अगले लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में सत्तारूढ़ होने के सपने देख रही भाजपा में अमित शाह की स्थिति इसी से समझ सकते हैं कि गुजरात में इशरत जहां ‘मुठभेड़’ मामले में जमानत पर रिहा अभियुक्त होने के बावजूद पार्टी की ओर से अघोषित रूप से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किए जा रहे नरेंद्र मोदी के दबाव पर उन्हें न सिर्फ पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया, बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और संवेदनशील राज्य का प्रभारी भी बना दिया गया। लेकिन अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर बनाने का संकल्प जाहिर करने संबंधी उनके बयान के तुरंत बाद ही पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अमृतसर में इस संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में कह दिया कि अमित शाह पार्टी के अधिकृत प्रवक्ता नहीं हैं। हक्क-बक्के शाह और मोदी समर्थक अध्यक्ष जी के इस बयान का अर्थ ढूंढने में लगे हैं।

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