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मोदी के रमजान सन्देश से परेशान कांग्रेस

रमजान का पवित्र महीना शुरु हो गया है। यह महीना हिजरी सम्वत का नौवाँ मास है और ईस्वी सम्वत के हिसाब से नौ जुलाई को शुरु हुआ है। इस महीने में मुसलमान उपवास रखते हैं और जीवन में बुराइयों को त्यागने का प्रयास करते हैं। यद्यपि अहमदिया सम्प्रदाय को पाकिस्तान मुसलमान नहीं मानता, लेकिन इसके बाबजूद वे भी रमज़ान में उपवास की परम्परा का निर्वाह करते हैं। भारत में शिया और अहमदिया सम्प्रदाय के लोग भारतीय सम्प्रदायों से ही मतान्तरित होकर इन नए सम्प्रदायों में गए हैं। इन मतान्तरित लोगों ने कुछ पुरानी परम्पराएं भी सहेज रखीं हैं, और कुछ नई परम्पराएं भी अख्तियार कर ली हैं। उपवास भारत की प्राचीन परम्परा का हिस्सा है। लेकिन उसका निर्वाह व्यक्तिगत स्तर पर होता है। मुसलमानों में शिया समाज के लोगों ने इसमें सामाजिकता को जोड़ कर इसको सामाजिक आधार प्रदान किया है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रमजान के महीने में उपवास करने वाले सभी सम्प्रदायों के लोगों को मुबारकबाद कहा और कामना की किरमजान सभी के जीवन में सुख समृद्धि और शान्ति लाए। यह ऐसी कामना है, जिससे किसी को आपत्ति नहीं करनी चाहिए। कोई अपने पड़ोसी मित्र अथवा समीपस्थ समाज के लोगों के लिए शुभ कामना प्रकट करता है तो, उसका आभार ही प्रकट किया जाता है। फिर मोदी ने तो उपवास के इस पावन पर्व को किसी खास सम्प्रदाय तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने तो कहा कि इस पावन पर्व से सभी लोगों को सुख शान्ति मिले। यह उनकी सकारात्मक दृष्टि का प्रतीक है। रमजान के महीने में उपवास रखने वाले विभिन्न सम्प्रदायों में भी किसी को मोदी की शुभ कामना पर एतराज नहीं हुआ।
दूसरों का दर्द दूर करना ही खास मतलब है रमजान का
सैयद निजाम अली रिजवी
मुस्लिम पवित्र माह रमजान का अपना विशेष महत्व है। इस महीने में कुरान नाजिल हुआ। खुदा की नजर में यह सबसे पवित्र व बुलंद महीना है। इमाम-ए-जुमा मौलाना सैयद कल्बे जव्वाद के मुताबिक अगाह ने इस माह में कहा है कि अगर बंदा उसके 30 रोजे रखता है तो वह उसके सारे गुनाह माफ करता है।

रमजान का महीना रहमतों का महीना है। खुदा अपने बंदे की हर वह मांग पूरी करता है जो उसने सच्चे दिल से मांगी हो।

ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंग महली के मुताबिक रोजा इस्लाम की पांच जरूरी बातों में से एक है। अगाह ने कुरान में फरमाया है कि ऐ ईमान वालों रोजा तुम्हारे पर फर्ज (जरूरी) है, जैसा कि तुमसे पहले की नस्लों पर था। रोजा रखने का यह मतलब नहीं है कि कोई दिन भर भूखा-प्यासा रहे। बल्कि इसका मतलब यह है कि जब रोजे में भूख व प्यास का एहसास होगा तो रोजा रखने वाले को उन गरीबों व यतीमों की भूख-प्यास व दुख-दर्द का एहसास होगा जो दो वक्त की रोटी भी नहीं खा सकते। इसलिए रमजान माह में जितना हो सके गरीबों, यतीमों व बेवाओं की दिल खोलकर मदद करनी चाहिए। उन्हें भी बराबरी का दर्जा देना चाहिए। ईद से पहले खुम्स व जकात निकाल कर गरीबों को आर्थिक सहायता पहुंचानी चाहिए ताकि वह और उनके बच्चे भी खुशी-खुशी ईद मना सकें।

रोजे में सिर्फ खाने व पीने पर ही नियंत्रण रखने की बात नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों व जज्बात पर भी नियंत्रण रखना चाहिए। किसी का बुरा करने से बचना चाहिए और सच बोलना चाहिए। हर उस शख्स की मदद करनी चाहिए जो उसका तलबगार हो। यही नहीं, बल्कि जानवरों पर भी रहम करनी चाहिए। उन्हें भूखा व प्यासा नहीं बांधना चाहिए। अगर किसी का पड़ोसी भूखा है तो उस पर खाना हराम है। पड़ोसी किसी भी मजहब का क्यों न हो, यदि वह भूखा है तो पहले उसका पेट भरना चाहिए, फिर खुद रोटी खानी चाहिए।

इफ्तार पार्टियां सियासी बनी
रमजान में दस रोजों के बाद हर जगह इफ्तार पार्टियों का दौर शुरू होता है। पहले इफ्तार पार्टियों का मकसद होता था कि जिस गरीब के पास रोजा खोलने के लिए खाने-पीने का सामान न हो उसको रोजा इफ्तार कराया जाए। इस तरह सब गरीब व अमीर साथ रोजा खोल करके इस्लाम के बराबरी के सिद्धांत का पालन करते थे।

लेकिन अब इफ्तार पार्टियों सियासी लाभ-हानि के लिए होने लगी हैं। एक तो अमीर इफ्तार पार्टी के आयोजन में विशिष्ठ व्यक्तियों को बुलाकर अपने रूतबे व अमीरी का एहसास कराने लगे हैं। इसके बहाने वे राजनेताओं व अधिकारियों से जनसंपर्क मजबूत करके अपने कारोबारी फायदे पूरे करने लगे हैं। उधर सियासी दल इफ्तार पार्टी करके यह दिखाने लगे हैं कि वह ही मुसलमानों के सच्चे हमदर्द हैं। प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, राज्यपालों व मुख्यमंत्रियों ने इफ्तार पार्टी को अहम आयोजन बना दिया है। इसमें अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ वे दूसरे दलों के नेताओं, बड़े मुस्लिम नेताओं, अधिकारियों व राजनयिकों को बुलाते हैं। वास्तव में ऐसी पार्टियाँ इफ्तार कम सियासी पार्टियाँ ज्यादा दिखाई देती हैं। मुख्यमंत्री व राजनेताओं से अपनी नजदीकियां दिखाने व उनसे दूसरे काम करवाने के लिए मजहबी नेता भी इन इफ्तार पार्टियों में आना अपनी शान समझते हैं। उनके साथ उनके 20-25 समर्थक होते हैं। राजनेता भी समझते हैं कि वह धार्मिक नेताओं से जो चाहे करवा लेंगे। इस तरह इफ्तार पार्टियों के बहाने दोनों एक-दूसरे का इस्तेमाल करते हैं।

(लखनऊ से उदय इंडिया के लिए विशेष)

लेकिन जैसे सोनिया और उनकी कांग्रेस की तो मानो नींद ही हराम हो गई है। मानो मोदी ने किसी को गाली दे दी हो। गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष अर्जुन मुढवाडिया तो एक कदम और आगे गए। उन्होंने कहा कि मोदी वोटों के लिये कुछ भी कर सकते हैं। उनके अनुसार ये लोग एक ओर सच्चर कमेटी की रपटें जलाते हैं और दूसरी ओर रमजान की बधाई भी देते हैं। यानी कांग्रेस की नजर में रमजान की बधाई देने का हकउसी को है, जो सच्चर समिति की सिफारिशों से सहमत है, जबकिअब मुसलमानों में से भी अनेक बुद्धिजीवी यह स्वीकार करते हैं कि सच्चर समिति की सिफारिशें इस देश केआम मुसलमान को शेष समाज से काट कर, अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति केलिए, सोनिया कांग्रेस द्वारा रचा गया एक षड्यंत्र है। हो सकता है कल सोनिया कांग्रेस का कोई प्रवक्ता, खासकर दिग्विजय सिंह, कहने लगें कि मुसलमानों में से केवल उन्हें ही रमजान के रोजे रखने का अधिकार है, जो कांग्रेस के साथ हैं। जो मुसलमान भाजपा, समाजवादी दल, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, अकाली दल, या साम्यवादी दलों का साथ देते हैं, उन्हें रोजा रखने का भी अधिकार नहीं है। पाकिस्तान सरकार से संकेत लेते हुए शिया समाज और अहमदिया समाज के लिए तो रोजा रखना मामून करार दे सकती है। दरअसल सोनिया कांग्रेस की, मुसलमानों, शिया समाज, अहमदिया समाज और रमजान में रोजा रखने वाले अन्य सम्प्रदायों या जनजातियों के प्रति, यह साम्प्रदायिक नीति भारतीय समाज में अलगाव के बीज बो रही है।
इस देश का मुस्लिम समाज जितना सोनिया कांग्रेस के साम्प्रदायिकजाल से बाहर निकलने का प्रयास कर रहा है, सोनिया कांग्रेस उतना ही उन पर शिकंजा कसने का प्रयास करती है। इसका ताजा नमूना ‘कुत्ते केपिल्ले’ वाले प्रसंग में मिला। नरेन्द्र मोदी से किसी न्यूज एजेंसी ने इन्ट्रव्यू लिया। प्रश्नकर्ता ने 2002 में गुजरात में हुए दंगों केबारे में प्रश्न किया। मोदी का कहना था कियदि कुछ गलत होता है तो उसका दुख होता ही है। यदि आपकी गाड़ी के नीचे आकर कुत्ते का पिल्लो भी मर जाये, तब भी दुख होता है। यह मुख्यमंत्री होने या न होने से जुड़ा हुआ मामला नहीं है। यह मानवीय संवेदना से जुड़ा मामला है। यदि कहीं कुछ बुरा होता है तो निश्चय ही दुख होता है। मोदी ने कहा दंगों के दौरान जितनी मेरी क्षमता थी, मैंने उसके अनुसार स्थिति नियंत्रित करने का प्रयास किया। यह बयान बहुत सीधा और
सपाट है। गुजरात में कुछ गलत होता है तो मोदी को दुख होता है और उन्होंने यथाशक्ति स्थिति नियंत्रित करने की कोशिश की थी। सोनिया कांग्रेस मोदी के इस सीधे सपाट बयान को भी अपने सियासी मुफीद के लिए प्रयोग कर रही है। कांग्रेस ने मोदी के दुख को छोड़ दिया और उनके मरे हुए कुत्ते के बच्चे को पकड़ लिया। कपिल सिब्बल सोनिया गान्धी के असली सिपाही हैं। उन्हें मोदी द्वारा दिये गये इस उदाहरण से बहुत कष्ट हुआ है। यदि उनके चेहरे को ध्यान से देखें तो यह दर्द उनके चेहरे पर झलकता है। लेकिन यह दर्द एक इंसान का दर्द नहीं है, एक वकील का दर्द है। उनका कहना है कि मुसलमानों की मौत हो गई है और मोदी इन घटनाओं पर अपने दुख को प्रकट करने के लिये कुत्ते केबच्चे का उदाहरण दे रहे हैं। कपिल सिब्बल पेशे से वकील हैं। किसी घटना की या फिर किसी बयान की किस प्रकार व्याख्या करनी है, इस कला में वे निष्णात हैं। वकील को इस बात की चिन्ता नहीं होती किसच क्या है और झूठ क्या है, उसे इस बात की चिन्ता भी नहीं होती किसामने वाला क्या कह रहा है या नहीं कह रहा है। उसकी चिन्ता एकही होती है किइन तमाम बातों की व्याख्या इस प्रकार की जाए, जिससे उसके मुवक्किल को लाभ होता हो। वकील के लिए अन्तिम सच्चाई उसका मुवक्किल और उसका लाभ ही होता है। कपिल सिब्बल की इस केस में मुवक्किल सोनिया गांधी हैं, और उसके माध्यम से सोनिया कांग्रेस है। इसलिये कपिल सिब्बल की चिन्ता यह नहीं है कि मोदी ने सचमुच क्या कहा, उनकी चिन्ता यह है कि मोदी के बयान का ऐसा अर्थ निकाला जाये जिससे उसके मुवक्किल को किसी भी तरीके से लाभ मिल सके। इसकी संभावना सिब्बल को तब दिखाई देती है, जब किसी तरह ‘कुत्ते के बच्चे’ के उदाहरण को मुसलमानों से जोड़ दिया जाये, और आजकल वे अपने सभी काम छोड़ कर इस काम में ही लगे हुये हैं। लेकिन कपिल सिब्बल का एकदुर्भाग्य है। यदि केस किसी न्यायालय में होता, तो शायद वे केस जीत भी जाते। लेकिन यह केस जनता केन्यायालय में चल रहा है। जनता सिब्बल की व्याख्याओं के पीछे छिपे झूठ को अच्छी तरह पहचानती है। कपिल सिब्बल के झूठ के बहकावे में सोनिया गांधी आ सकती हैं और हो सकता है, इस बहकावे में आकर उन्हें कुछ इनाम-इकराम भी दे दें, लेकिन भारत की जनता इस बहकावे में नहीं आ सकती। मोदी के बयान को लेकर की गई अपनी व्याख्या की इस सीमा को सिब्बल भी अच्छी तरह जानते हैं। परन्तु उनका मकसद भी सोनिया गान्धी को बहकावे में लाकर पार्टी में अपना रुतबा बढ़ाना है, जनता से उनको भी कुछ लेना देना नहीं है।

परन्तु सोनिया कांग्रेस के इस सारे द्रविड़ प्राणायाम से इतना तो स्पष्ट है कि मोदी को लेकर सोनिया कांग्रेस में भयंकर अफरा तफरी मच गई है। उसी घबराहट में वह मोदी के रमजान मुबारकके सन्देश से लेकर कुत्ते केबच्चे की मौत केउदाहरण तक को अपने गले में लटकाकर मुसलमानों के मुहल्ले में घूम रही है। पीछे पीछे उसकी सेना पंथ निरपेक्षता के बुर्के में मुसलमानों को रिझाने के लिए हर तरीका इस्तेमाल कर रही है। लेकिन सोनिया कांग्रेस के कपिल सिब्बलों की सबसे बड़ी समस्या यह है किमुसलमानों के इस मुहल्ले में मायावती, लालू नीतिश भी गोल टोपी लगा कर घूमना शुरु हो गए हैं। अब कपिल सिब्बल ने भी सोनिया कांग्रेस की ओर से गले में ‘कुत्ते के मरे बच्चे’ को लटकाकर घूमना शुरु किया है। कपिल सिब्बल चाहते हैं कि मुसलमान इस में स्वयं को देखें। अब देखना केवल इतना ही है किमुसलमान ‘कुत्ते के बच्चे’ के पीछे छिपे कपिल सिब्बल का साम्प्रदायिकचेहरा देख पाते हैं या नहीं?

 

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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