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राजस्थान में शुरू हुई टिकटों की जंग कांग्रेस ने शुरू की टिकट प्रक्रिया, बीजेपी अभी विचारमग्न

राजस्थान में बीजेपी फिलहाल तो आपसी गुटबाजी में ही उलझी हुई है। बीजेपी के दो बड़े नेता राजेंद्र राठौड़ और गुलाबचंद कटारिया का नाम दो अलग-अलग फर्जी एनकाउंटर में आने से पार्टी बैकफुट पर आ गई है। दोनों ही नेता जमानत पर चल रहे हैं, इससे पार्टी की छवि पर बुरा असर पड़ रहा है। बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष वसुंधरा राजे अपनी यात्रा के दौरान उम्मीदवारों का फीडबैक तो ले रही हैं, लेकिन अभी चयन प्रक्रिया जैसा काम शुरू नहीं किया है।

जैसे-जैसे राज्य विधानसभा के चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, राजस्थान की कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां अपनी-अपनी जीत को आश्वस्त करने के जतन में जुट गई है। इसी क्रम में बारी आती है टिकटों की जंग की। दोनों ही पार्टियों के उम्मीदवार अपनी-अपनी दावेदारी की तैयारी में लगे हुए हैं। हालांकि टिकटों की प्रक्रिया शुरू कर कांग्रेस ने बाजी मार ली है। यात्रा शुरू करने के मामले में भी बीजेपी कांग्रेस के पीछे रही और अब टिकट प्रक्रिया में भी बीजेपी पीछे है। यात्रा शुरू करने में भी कांग्रेस ने ही पहल दिखाई। बीजेपी अभी यात्रा के साथ-साथ आपसी गुटबाजी में ही उलझी हुई है। कांग्रेस के बाजी मारने में इस बार राहुल गांधी के नए दिशानिर्देश साफ तौर पर दिखाई दे रहे हैं।

कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों ने अब तक अपनी-अपनी यात्राओं के जरिए राज्य के 200 विधानसभा क्षेत्रों में से तकरीबन आधे विधानसभा क्षेत्रों के दौरे पूरे कर लिए हैं। इन यात्राओं के जरिए दोनों ही पार्टियां चुनाव जीत कर सत्ता हासिल करना चाहती है। कांग्रेस और बीजेपी की ये चुनावी यात्राएं लगभग एकसाथ शुरू हुईं और खत्म भी कुछ दिनों के अंतर में करीब एकसाथ ही होंगी। कांग्रेस ने यात्रा शुरू करने के साथ-साथ टिकटों की प्रक्रिया में भी तत्परता दिखाई है। जबकि बीजेपी में अब तक यात्रा के अलावा कोई और चुनावी प्रक्रिया दिखाई नहीं दे रही है। कांग्रेस ने उम्मीदवारों का फीडबैक लेना शुरू कर दिया है, जो 15 जुलाई तक पूरा भी हो जाएगा। इसके लिए कांग्रेस ने कई केंद्रीय पर्यवेक्षक लगा दिए हैं, जो हर ब्लॉक कांग्रेस कमेटी में जाकर उम्मीदवारों का फीडबैक ले रहे हैं और रिपोर्ट तैयार करेंगे। राज्य में कांग्रेस में इस तरह की प्रक्रिया को पहली बार अपनाया जा रहा है।

अब तक होता यह आया था कि चुनाव आते थे और हर जिलों से उम्मीदवार अपना-अपना बायोडाटा लेकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पहुंच जाते थे। इन उम्मीदवारों की कोई छानबीन या इनका फीडबैक भी नहीं लिया जाता था। ऊपर ही ऊपर बड़े नेताओं से संपर्क करके उम्मीदवारों का पैनल तैयार हो जाता था और

दिल्ली में इन पर मुहर भी लग जाती थी। राहुल गांधी ने यह तरीका ही बदल कर उम्मीदवारों का चयन कार्यकर्ताओं में से ही करने का फैसला लिया है।

वहीं राज्य में बीजेपी इस मामले में तत्पर दिखाई नहीं दे रही है। बीजेपी फिलहाल तो आपसी गुटबाजी में ही उलझी हुई है। बीजेपी के दो बड़े नेता राजेंद्र राठौड़ और गुलाबचंद कटारिया का नाम दो अलग-अलग फर्जी एनकाउंटर में आने से पार्टी बैकफुट पर आ गई है। दोनों ही नेता जमानत पर चल रहे हैं, इससे पार्टी की छवि पर बुरा असर पड़ रहा है। बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष वसुंधरा राजे अपनी यात्रा के दौरान उम्मीदवारों का फीडबैक तो ले रही हैं, लेकिन अभी चयन प्रक्रिया जैसा काम शुरू नहीं किया है। बीजेपी में पर्यवेक्षकों की जगह टिकट वितरण की मुख्य कमान वसुंधरा के पास ही है। अन्य नेता अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों तक ही सीमित है। राज्य में दिल्ली की भूमिका ज्यादा नहीं है। प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद लगभग सभी वर्तमान विधायक वसुंधरा के समर्थन में आ गए हैं, जिससे सभी वर्तमान विधायकों को फिर से टिकट मिलने की संभावना बढ़ गई है। बीजेपी और कांग्रेस अपने किन चेहरों को जनता के सामने लेकर आएगी यह तो टिकट वितरण होने के बाद ही पता चलेगा, क्योंकि इन्हीं चेहरों के दम पर पार्टियों की जीत और हार निर्भर करेगी।

उम्मीदवारों के लिए मापदंड
 कांग्रेस पार्टी इस बार भी दो बार लगातार चुनाव हार चुके नेताओं की छुट्टी कर सकती है। पिछली बार भी करीब एक दर्जन ऐसे ही नेताओं को टिकट नहीं दिया गया था।
 15 हजार से ज्यादा वोटों से हारने वाले नेताओं का भी टिकट इस बार पार्टी काट सकती है।
 युवा चेहरों को मौका देने के लिए पार्टी 70 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले नेताओं को भी टिकट नहीं देने का मन बना रही है। इसकी एवज में उनके पुत्र और पुत्रियों या अन्य रिश्तेदारों को टिकट दिया जा सकता है।
 जिन विधायकों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है, उन पर भी इस बार गाज गिर सकती है, उनका टिकट कट सकता है।
 युवा के साथ-साथ पार्टी महिलाओं, ओबीसी व अल्पसंख्यक नेताओं को ज्यादा टिकट देगी।
राहुल गांधी का विचार
राहुल गांधी का कांसेप्ट है कि निचले स्तर से जो फीडबैक आए, उसी आधार पर उम्मीदवार का चयन हो। इससे कार्यकर्ताओं में उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी नहीं हो सके। मई में जयपुर और बीकानेर के अपने दौरे के दौराने राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह वादा किया था कि पार्टी में पैराशूटी और बाहरी उम्मीदवार स्वीकार नहीं किए जाएंगे। उम्मीदवारों का चयन कार्यकर्ताओं के बीच में से ही किया जाएगा। उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि जुलाई तक कांग्रेस के सभी उम्मीदवारों के नाम घोषित हो जाएं ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर चुनाव प्रचार में जुट जाएं। लेकिन कांग्रेस संस्कृति को जानने वाले नेताओं का मानना है कि जुलाई तक टिकट उम्मीदवार घोषित करना संभव नहीं है। यह काम कम से कम दो माह और आगे खिसक सकता है। दूसरे तर्क यह भी है कि चार माह पहले उम्मीदवार घोषित करने से ज्यादा खर्च होगा, वहीं जिन नेताओं को टिकट नहीं मिलेगा वह उम्मीदवार के खिलाफ गुटबाजी व उसे हराने के काम में लग जाएंगे। फिर भी यह तय है कि पार्टी अपने चेहरे जल्द ही जनता के सामने ला देगी।
कांग्रेस ने अपने दो नए चेहरे बदले हैं। काफी लंबे अरसे से प्रदेश प्रभारी पद पर काम कर रहे मुकुल वासनिक और उनके साथ कुछ समय पहले ही लगाए गए सहप्रभारी और राष्ट्रीय सचिव अरुण यादव बाहर हो गए हैं। अब इनकी जगह महाराष्ट्र के सांसद गुरुदास कामत को प्रदेश प्रभारी व हरियाणा के सांसद अशोक तंवर को सह प्रभारी लगाया गया है। यह दोनों नेता युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। इनमें अशोक तंवर तो राजस्थान में एनएसयूआई के जमाने से काम कर रहे हैं और वे राजस्थान की राजनीति से काफी हद तक वाकिफ भी हैं। जबकि कामत राजस्थान में पहली बार जरूर आए हैं मगर राजनीति में वे काफी पुराने खिलाड़ी हैं। पांच बार मुंबई से सांसद, युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्र में राज्यमंत्री भी रह चुके हैं।

अब इन दोनों के जिम्मे राजस्थान में कांग्रेस की सरकार फिर से बनाना सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। अभी हाल ही में कामत ने अपने जयपुर दौरे में पार्टी के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के सम्मेलन में यह भी कहा कि वह टिकट बंटवारे में सभी गुटों को साथ लेकर चलना चाहेंगे।

दूसरी ओर बीजेपी ने भी अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाने के बाद कई प्रदेशों के प्रभारियों को बदला है।

राजस्थान में भी चर्चा चल रही थी कि भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी को प्रदेश में प्रभारी बनाकर यहां की कमान सौंपी जा सकती है, क्योंकि वसुंधरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में गड़करी की भूमिका काफी अहम है। बीजेपी ने प्रदेश में पहले से प्रभारी पद पर काम कर रहे कप्तान सिंह सोलंकी पर फिर से भरोसा जताया है। वे अब वसुंधरा के साथ यहां की बीजेपी की कमान संभाल रहे हैं और चुनाव में भी वे इसे जारी रखेंगे।
टिकटों में दिखेगा इनका दमखम
सी.पी. जोशी –राहुल के भरोसेमंद सी.पी. जोशी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर बंगाल, बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य दिए गए हैं। इन्हें कांग्रेस कार्यसमिति में सदस्य भी बनाया गया है। यह मेवाड़ में टिकट बंटवारे में अपनी बड़ी भूमिका निभाएंगे। खासकर उदयपुर, राजसमंद जैसे जिलों में। इसके अलावा भीलवाड़ा, चित्तौडग़ढ़ को भी प्रभावित करेंगे और ज्यादा से ज्यादा अपने समर्थकों के लिए टिकट लाना चाहेंगे।

जितेंद्र सिंह –अलवर के सांसद व रक्षा राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह को राहुल का दूसरा भरोसेमंद साथी माना जाता है। यह अलवर और जयपुर ग्रामीण लोकसभा क्षेत्र में टिकटों के बंटवारे में दखल रखेंगे।

सचिन पायलट –सचिन पायलट को अभी से काफी अनुभवी युवा नेता माना जाने लगा है। वे अजमेर क्षेत्र में टिकटों पर अपनी कमान रखेंगे।

अशोक गहलोत –राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजनीति के जादूगर माने गए हैं। इनके कंधों पर प्रदेश में दुबारा सरकार बनाना चुनौती है। वे प्रदेश की हर विधानसभा और वहां के नेताओं से परिचित हैं। ऐसे में टिकटों में सर्वाधिक दखल गहलोत का रहना तय है।

कांग्रेस में टिकट की प्रक्रिया
देश की सबसे पुरानी पार्टी का चुनाव में उम्मीदवार बनाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है। जिसमें ब्लॉक कांग्रेस कमेटी से करीब तीन से पांच नेताओं का पैनल होता है। इसके अलावा जिला कांग्रेस कमेटी भी अपना पैनल बनाकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भिजवाती है। इसके साथ ही प्रदेश कांग्रेस की चुनाव समिति की अपने नामों की सिफारिश एआईसीसी को देती है। एआईसीसी के केंद्रीय पर्यवेक्षक भी अपने नामों का अलग पैनल भिजवाते हैं। इन सब प्रक्रिया के अलावा राहुल गांधी के निर्देश पर कई निजी एजेंसियां भी उम्मीदवारों के सर्वे का काम कर चुकी है। इन सब एजेंसियों के सर्वे रिपोर्ट को भी देखा जाएगा। अलग-अलग स्तरों से आए यह सब नाम राजस्थान के लिए गठित की गई स्क्रीनिंग कमेटी में जाते हैं। स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन अजय माकन और सदस्य सांसद आर.सी. खूंटिया को बनाया गया है। स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में मुख्यमंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व प्रदेश के प्रभारी महामंत्री भाग लेते हैं। यह
कमेटी उम्मीदवारों का पैनल में से हर सीट पर एक या दो नाम चयन करती है और फिर इन नामों को कांग्रेस की सर्वोच्च इकाई कांग्रेस कार्यसमिति को भेजा जाता है, जो उम्मीदवारों पर अंतिम मोहर लगाती है। इतने सारे फीडबैक लेने का अर्थ यही निकाला जा रहा है कि राहुल गांधी इस बार उम्मीदवारों के चयन के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे।

 

 

 

प्रीति जोशी

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