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जेल जाने का अनुभव जरूरी हो

अगर कोई जेल मे रहकर चुनाव जीतता है तो इससे उसकी अपार लोकप्रियता ही साबित होती है। समाज को तो उसका सम्मान करना चाहिए।

जब से सुप्रीम कोर्ट ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) को निरस्त करने का फैसला दिया है, हमारे राजनीतिक दलों की स्थिति सांप-छछूंदर वाली हो गई है। इस फैसले का मतलब यह है कि अगर किसी माननीय सांसद या विधायक को निचली अदालत से भी दो साल या उससे ज्यादा की सजा सुनाई जाती है तो भी उसकी सद्स्यता तत्काल खत्म हो जाएगी। एक अन्य फैसले में कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर किसी व्यक्ति को पुलिस या न्यायिक हिरासत में लिया गया है तो उसे उस अवधि में चुनाव लडऩे का अधिकार नहीं होगा। यह भी कोई बात हुई? हमारे देश में लोकसभा के लगभग 162 सदस्यों और राज्यसभा के कोई 40 सदस्यों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। कई राज्यों में तो आधे से भी कहीं ज्यादा विधायक आपराधिक आभामंडल के साथ सदन को सुशोभित कर रहे हैं। इस जमीनी सच्चाई को देखते हुए कोर्ट को निर्वाचन आयोग को निर्देश देना चाहिए था कि वह अपनी ओर से ऐतिहासिक पहल करते हुए सभी प्रत्याशियों के लिए यह आवश्यक बना देता कि वे कम से कम दो साल जेल में रहे हों और फिर संसद से इस दिशा में बाकायदा कानून बनाने की सिफारिश करता। यही नहीं चुनाव लडऩे के लिए जेल में रहना भी बल्कि जेल में रहना ही एक जरूरी शर्त घोषित किया जाना चाहिए था।

आखिर यह किससे छिपा है कि निचली अदालतों से सजा पाने के बावजूद अनेक मान्यवर बार-बार चुनाव लड़ते है और मुख्यमंत्री या मंत्री पद तक को सुशोभित करते है? देश और प्रदेश का काम सुचारू रूप से चल ही रहा है? मतदाता उन पर जैसा भी हो, भरोसा कर ही रहे हैं ना? इसी तरह अगर कोई जेल मे रहकर चुनाव जीतता है तो इससे उसकी अपार लोकप्रियता ही साबित होती है। समाज को तो उसका सम्मान करना चाहिए। वह जेल में रहे या सदन में, किसी को इससे क्या मतलब? सदन ही कौन से सुचारू रूप से चलते हैं? मान्यवर जेल में रहें या जेल के बाहर, क्या फर्क पड़ता है, वे अहर्निश देश की सेवा में जीजान से लगे रहते हैं। जिन्हें हम अपराध समझते है, वे तो इन माननीयों के लिए उनकी देश सेवा की अनुपम और माधुरी भंगिमाएं हैं। उन्हें तो उनके काम के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। जेलें तो वैसे भी आदमी का परिष्कार करने का काम करती हैं। उनकी महिमा तो वे ही गुणी जन जानते हैं, जो वहां रहते हैं, रहे हैं ।

अपने लालू जी जब जेल गए थे, तब उन्होंने याद दिलाया था कि भारतीय परम्परा में जेल का क्या महत्व है। उन्होंने कहा था कि भगवान श्री कृष्ण भी जेल में रहे थे। उनका तो जन्म ही कंस के कारावास में हुआ था और उनकी महिमा ऐसी थी कि जेल के दरवाजे आप से आप खुल गए थे। पहरेदार मूर्छित हो गए थे। वसुदेव जी अपना काम पूरा करके जेल वापस लौट आते हैं तो इसलिए कि जेल की मर्यादा निभाना भागने से ज्यादा पुनीत कर्म है। जेलें आदमी को सोचने का मौका देती हैं। वे आदमी को विचारक तक बना सकती हैं। उनकी महिमा अपरम्पार है। इसीलिए वे ठसाठस भरी रहती है पर इसके बावजूद जेल भरो आन्दोलन चलाने वाले महानुभाव उन्हें और ठसाठस भरते रहते है। ठूंसते रहते है। ऐसे भी लोग हैं जिन्हें जेल अधिकारी रिहा कर देते हैं, मगर वे वहीं कुंडली मारकर बैठ जाते हैं। ऐसे साधु-पुरूष तो बहुत कम होते हैं जो गेरूआ वस्त्र त्यागकर जनाने वेश में भागने की कोशिश करते हैं। इसलिए जेल जाने और उसका पात्र बनने को कम करके मत आंकिए। जेल जाने वाले के महान गुणों को समझिए। उनके देश सेवा के महान जज्बे को समझिए और चुनाव लडऩे के नियमों में सुधार कीजिए। प्रत्याशी की आवश्यक योग्यता-पात्रता की शर्त बनाइए – वह भारत का नागरिक हो, देश सेवा के ऐसे कार्यों में लिप्त रहा हो जो अपराध की संज्ञा में आते हों और जेल में रहकर चुनाव लड़ सकता हो। ऐसे दिवंगत हुए देश सेवकों को लोग नित्यप्रति स्मरण करें और जीवित कर्मरत-सेवारत देश सेवकों से डरें। इससे लोकतंत्र की जड़े मजबूत रहेंगी।

 

मधुसूदन आनंद

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